Wednesday, 1 October 2014

धर्म : पुल या खाई - 2




आज गांधी जयंती है, कल है दशहरा और दो दिन बाद ईदुज्जुहा या कि बकरीद। जब ऐसा संयोग है तब गांधीजी का वह प्रिय भजन याद आ जाना स्वाभाविक है- ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। इस वक्त देश का राजनीतिक माहौल जैसा बना हुआ है उसमें गांधी को याद करना और उनके विचारों को दोहराना पहले के मुकाबले में कहीं ज्यादा आवश्यक हो गया है। देश के मतदाताओं ने अपनी बुद्धिमत्ता में सत्ता के सूत्र ''छद्म धर्मनिरपेक्षों" के हाथ से छीन कर उन लोगों के हाथों में दे दिए हैं जो स्वयं  के असली धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हैं। पहले के सत्ताधीशों ने यदि अल्पसंख्यकों के ''तुष्टिकरण" की नीति अपनाई थी तो अब उनके साथ किस तरह न्याय हो रहा है, उन्हें आगे बढऩे के कैसे अवसर मिल रहे हैं व भारतीय समाज में उनके लिए जगह कहां बनाई जा रही है, यह सब जनता के सामने है। यह मेरा मानना रहा है कि संगठित धर्म से उदारता की अपेक्षा नहीं करना चाहिए। दुनिया का इतिहास इसका गवाह है।

हम भारतवासी वसुधैव कुटुम्बकम् की बात अवश्य करते हैं और इसके बरक्स अन्य धर्मों में व्याप्त असहिष्णुता के दृष्टांत खोज-खोज कर निकालते हैं। मैं इस बारे में सिर्फ यही पूछना चाहूंगा कि आप अपने सद्गुण को छोड़कर दूसरों के दुर्गुण क्यों अपनाना चाहते हैं? अगर हमारे भीतर धार्मिक सहिष्णुता रही आई है तो इससे हमें क्या नुकसान है? जिन समाजों में सहिष्णुता एवं उदारता नहीं थी या कम थी उनका पतन या विघटन जिस तरह से हुआ उससे अगर हम अपनी तुलना करें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन नहीं है कि हमें अपने मूल स्वभाव को, अपनी सहिष्णु परंपरा को, अपनी विशाल हृदयता को कायम रखना ही श्रेयस्कर है। बहुत दूर न जाएं, अपने पड़ोस में ही देखें तो समझ आता है कि धार्मिक कट्टरता के चलते पाकिस्तान किस तरह अशांति व अवनति के रास्ते पर चल पड़ा है। इसी तरह श्रीलंका को भी एक लंबे समय तक गृहयुद्ध का सामना करना पड़ा और आज भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वहां सब कुछ ठीक है।

पश्चिम एशिया और यूरोप के भी अनेक मुल्कों में धार्मिक व जातीय असहिष्णुता, अनुदारता व अविश्वास के चलते समय-समय पर अशांत वातावरण बना है। युगोस्लाविया का विघटन हुआ तो उसके पीछे एक प्रमुख कारण आर्थोडॉक्स, लूथरन और रोमन कैथोलिक आदि पंथों के बीच व्याप्त मनोमालिन्य था। आज इस्लामिक स्टेट (आईएस) के नाम पर अरब जगत में जो कहर बरपा है उसके पीछे भी शिया, सुन्नी और कुर्द के बीच अस्मिता और वर्चस्व को लेकर चल रहा संघर्ष ही है। ऐसे और भी बहुत से उदाहरण हैं। नहीं भूलना चाहिए कि धर्म के नाम पर हुई इन लड़ाईयों के पीछे आर्थिक वर्चस्व का मामला भी प्राचीनकाल से विद्यमान रहा है। यह प्रवृत्ति वर्तमान युग में कुछ और ज्यादा स्पष्ट होकर उभर आई है। इसकी शुरूआत उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के प्रारंभ में हो गई थी जब इजरायल नामक नए देश की योजना बनाई गई। अफगानिस्तान में पहले मुजाहिदीन और फिर तालिबान भी इसी पूंजीवादी सोच से उपजे। इंडोनेशिया से तिमोर ले ईस्ट को भी अलग कर एक नया राष्ट्र अस्तित्व में आया। कुर्द आबादी क्षेत्र में भी यही हो रहा है।

इन सारे उदाहरणों को देने का एक ही मकसद है कि इतिहास के सबक नहीं भूलने चाहिए। विश्व इतिहास की यदि थोड़ी भी समझ हम विकसित कर लें तो समझ सकते हैं कि पूंजीवादी लुटेरों के गिरोह किस तरह संगठित धर्म का सहारा लेकर समाज को तोड़ते रहे हैं। अंग्रेजों की ''फूट डालो और राज करो" की कुटिल नीति का परिणाम भारत ने जिस तरह भुगता है वह कौन नहीं जानता। साम्राज्यवादी शक्तियों का तो मंसूबा था कि पाकिस्तान बनने के अलावा देशी रियासतें भी अपना-अपना सार्वभौम देश बना लें। दक्षिण अफ्रीका के नक्शे पर नज़र डालकर देखिए वहां एक देश के भीतर दो अन्य स्वतंत्र देश देखने मिल जाएंगे- लेसोथो और स्वाज़ीलैंड। भारत के बारे में भी उनका कुछ वैसा ही इरादा था। कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने का षडय़ंत्र तो 1942-43 में ही रच लिया गया था, जिसका खुलासा राजदूत नरेन्द्र सिंह सरीला ने अपनी पुस्तक 'द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियन पार्टीशन' (भारत विभाजन की अनकही कहानी) में किया है। (प्रसंगवश यह बताना उचित होगा कि उस समय माउंटबेटन के भारत आने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं थी।)

जब कश्मीर का जिक्र आ गया है तो मुझे भूतपूर्व पत्रकार व भाजपा के प्रवक्ता एम.जे. अकबर की कश्मीर पर लिखी पुस्तक का ख्याल आता है। कोई बीस साल पहले इस शोधपरक पुस्तक में उन्होंने लिखा था कि कश्मीर का बौद्ध राजा अपनी बहुसंख्यक प्रजा के धार्मिक विश्वासों का आदर करते हुए हिन्दू बन जाना चाहता था, तब वहां के पंडितों ने इसके लिए यह कहकर मना कर दिया कि हिन्दू जन्मना होता है बनाया नहीं जाता। इस उत्तर से खिन्न होकर राजा ने बौद्ध धर्म छोड़कर इस्लाम की दीक्षा ले ली क्योंकि राज्य में हिन्दुओं के बाद दूसरी बड़ी आबादी मुसलमानों की थी। राजा की देखा-देखी बहुत सारे दरबारी भी मुसलमान बन गए जिनमें पंडित भी शामिल थे। आज भी बहुत से कश्मीरी मुसलमान यह बताने में संकोच नहीं करते कि उनके दादे- परदादे हिन्दू थे। यह प्रसंग इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि धार्मिक हठवादिता और असहिष्णुता से कोई भी धर्म खुद अपना कितना नुकसान कर सकता है। अफसोस कि ऐसे प्रसंग ठीक से जनचर्चा में नहीं आ पाते।

दरअसल हमारी बहुत सारी अध्ययन सामग्री पूर्वाग्रहों से प्रेरित होती है। इसकी शुरूआत स्कूल की पाठ्य पुस्तकों से ही होने लगती है। मसलन औरंगजेब का उल्लेख एक कट्टर हिन्दू विरोधी शासक के रूप में किया जाता है। कौन नहीं जानता कि औरंगजेब एक निर्दयी यद्यपि चतुर शासक था।  उसने तो अपने भाईयों तक की हत्याएं करवाई थीं और  पिता को कारावास दे दिया था। शाहजहां को उसने कैद किया तो शायद ठीक ही किया था! जो राजा अपनी रानी का मकबरा बनाने के लिए राजकोष खाली कर दे उसे प्रजापालक तो नहीं कहा जा सकता। औरंगजेब के पक्ष में भी बहुत बातें लिखी गई हैं, लेकिन हमारा मुद्दा दूसरा है। हमारे सामाजिक अध्ययन और इतिहास की पुस्तकों में औरंगजेब के बजाय या उसके अलावा उसके बड़े भाई दारा शिकोह के बारे में विस्तारपूर्वक क्यों नहीं बताया जाता, जिसने उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया था?

देश के ताजा इतिहास की ओर आएं तो फादर कामिल बुल्के के बारे में आज की पीढ़ी कितना जानती है और अगर नहीं जानती तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? छत्तीसगढ़ के लोगों को पता है कि स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव ने आदिवासियों के लिए ''ऑपरेशन घर वापसी" चलाया था। उनके जशपुरनगर से झारखण्ड की राजधानी रांची बहुत दूर नहीं है जहां फादर कामिल बुल्के ने अपना पूरा जीवन बिता दिया। वे कोई सामान्य ईसाई नहीं, बल्कि विधिवत दीक्षित पादरी थे। लेकिन उन्हें रामकथा ने आकर्षित किया, तो वे उसी में रम गए। उन्होंने रामायण पर जो प्रामाणिक शोध की वह आज भी शोधकर्ताओं को प्रेरित करती है। यहीं नहीं, उन्होंने जो अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोष तैयार किया वैसा गुणवत्तापूर्ण कार्य हिन्दी का कोई दूसरा धुरंधर कर न सका।

मैं अगर यह कहूं कि आज जिस हिन्दी पर हम इतना गर्व करते हैं वह भी प्रारंभिक रूप में एक मुसलमान कवि की ही देन है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह पद आज से कोई सात सौ वर्ष पहले लिखा गया था-
''गोरी सोवे सेज पर
मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने
रैन भई चहुं देस।
"
इसी कवि ने ग्रामीण स्त्रियों के इसरार पर समस्यापूर्ति करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में एक दूसरा पद कहा था-
''खीर पकाई जतन से
चरखा दिया चला
आया कुत्ता खा गया
तू बैठी ढोल बजा।
"

हिन्दी के उद्भव का प्रमाण देते इन दोहों के रचयिता का नाम बहुत से पाठक जानते होंगे- अमीर खुसरो। अब बताइए अमीर खुसरो के योगदान को हम किस रूप में रेखांकित करना चाहेंगे? क्या हम सब हिन्दी छोड़कर देवभाषा में बात करने लगेंगे या फिर किसी दिन उनके साथ वही व्यवहार करेंगे जो सन् 2002 में एक दिन अहमदाबाद में शायर वली दक्कनी की मजार के साथ किया था? आज गांधी जयंती है तो मैं विश्वास करना चाहूंगा कि हम अंतत: गांधी के रास्ते को नहीं छोड़ेंगे।
देशबन्धु में 2 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित