Thursday, 14 May 2015

ग्रेट ब्रिटेन के आखिरी (?) चुनाव




 ग्रेट ब्रिटेन अथवा यूके के घटनाचक्र में भारत की दिलचस्पी मुख्यत: दो कारणों से रहती है। एक तो इसलिए कि अंग्रेजों के साथ हमारे संबंधों की एक लंबी ऐतिहासिक कड़ी जुड़ी हुई है। दूसरे इसलिए कि पिछले तीन दशकों के दौरान ब्रिटिश समाज में भारतवंशियों ने अच्छी खासी पैठ बना ली है। यही वजह थी कि ग्रेट ब्रिटेन में हाल में सम्पन्न आम चुनावों के प्रति भी भारत में काफी उत्सुकता देखी गई। इसके पीछे एक और कारण भी था। भारतीय मीडिया में इन चुनावों के बारे में कुछ ऐसी तस्वीर पेश की गई मानो भारतवंशी वोटर ही चुनावों में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। इसमें जो अतिरंजना थी उसका विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। इतना अवश्य था कि पिछली बार के मुकाबले इस बार अधिक संख्या में भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

बहरहाल चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं और इनसे ऐसे कुछ तर्क उभरते हैं जो भारतवासियों के लिए दिलचस्पी का सबब होने के साथ-साथ विचार मंथन का अवसर भी प्रदान करते हैं। सबसे पहले नोट करने लायक तथ्य तो यही है कि पूरे देश में एक साथ साढ़े छ: सौ सीटों पर 7 मई को चुनाव सम्पन्न हुए और उसी रात नतीजे आना भी शुरु हो गए। चौबीस घंटे बीतते न बीतते सारे परिणाम घोषित हो चुके थे। हमारे देश में जहां चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न होने में डेढ़-दो माह का समय लग जाता है यह एक आश्चर्यजनक खबर ही है। हमारा चुनाव आयोग जो तैयारियां करता है वे हनुमान की पूंछ की तरह कभी खत्म होने में ही नहीं आती। उम्मीदवार और वोटर दोनों थकने और ऊबने लगते हैं। कई-कई हफ्तों तक जरूरी सरकारी काम भी ठप्प पड़ जाते हैं। ब्रिटेन के चुनावों से क्या हम अपनी चुनावी प्रक्रिया को अधिक सुगम बनाने की कोई तरकीब हासिल कर सकते हैं?

यह सही है कि ब्रिटेन की आबादी कम है, मतदाताओं की संख्या भी उस अनुपात में भारत के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती, सुरक्षा प्रबंध भी देखना पड़ते हैं, किन्तु प्रश्न उठता है कि अपने लोकतंत्र के परिपक्व होने का प्रमाण हम कब दे पाएंगे? यह भी गौरतलब है कि हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए छह सौ पचास सीटों पर चुनाव होता है। मोटे तौर पर एक-सवा लाख आबादी के लिए एक संसद सदस्य। जबकि हमारे यहां प्रति लोकसभा सीट मतदाताओं की संख्या औसतन दस लाख से अधिक ही होती है। मैं लंबे समय से वकालत करते आया हूं कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए याने आज की संख्या से दुगुने। तभी संसद सदस्य मतदाताओं के साथ किसी हद तक न्याय कर पाएगा तथा भ्रष्टाचार व लापरवाही पर भी अंकुश लगाने में कुछ मदद मिलेगी।

इन चुनावों में एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य और उभरा है कि सारे चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ध्वस्त हो गए। सामान्य तौर पर माना जाता है कि इंग्लैंड, अमेरिका आदि में चुनावी सर्वेक्षण खरे उतरते हैं क्योंकि मतदाता वहां शिक्षित हैं तथा अपनी राय बेबाकी से प्रकट करने में हिचकते नहीं। यह धारणा इस बार टूट गई। ऐसा क्यों हुआ इसका विश्लेषण अभी मेरी निगाह से गुजरा नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों की विश्सनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इसमें भारत के लिए सबक छुपा हुआ है। हमारे यहां चुनावी सर्वेक्षण को अपने पक्ष में प्रदर्शित करने के लिए राजनीतिक दल, खासकर भाजपा, जिस तरह का व्यायाम करते हैं वह जनता के सामने है। चुनावी सर्वेक्षण एजेंसी व उसे प्रकाशित करने वाले मीडिया दोनों की साख पर बार-बार धब्बा लगता है, लेकिन वे लोभ से बच नहीं पाते। आज एक बार फिर सोचने का वक्त है कि इन सर्वेक्षणों और भविष्यवाणियों पर पूरी तरह से पाबंदी क्यों न लगा दी जाए?

इस बार भारतवंशियों में चुनाव लडऩे के प्रति बेहद उत्साह था। भारतीय मूल के 59 प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए थे। इनमें से मात्र दस ही विजयी हुए, जबकि पिछली संसद में इनकी संख्या आठ थी। पारंपरिक तौर पर भारतवंशी लेबर पार्टी के साथ रहते आए हैं, लेकिन अब कईयों का रुख कंजर्वेटिव पार्टी या टोरियों की तरफ मुड़ गया है। प्रधानमंत्री कैमरन ने तो यहां तक उन्हें कहकर बहलाया कि आने वाले समय में कंजर्वेटिव पार्टी से ही कोई एशियाई या अश्वेत प्रधानमंत्री बनेगा। खैर! इसमें नोट करने लायक यह भी है कि भारतवंशियों के अलावा पाकिस्तानी, चीनी तथा अन्य आप्रवासी समुदायों के लोग चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे। पाकिस्तानी मूल की एक उम्मीदवार ने तो वरिष्ठ एवं चर्चित नेता जॉन गॉलवे को ही करारी मात दी।  इस बार भारतवंशी कीथ वाज तो फिर से चुने ही गए। उनकी बहन वैलेरी वाज पहली दफा संसद में आ गईं। क्या इसे वंशवाद माना जा सकता है?

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि लेबर पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी और सरकार उसकी ही बनेगी। उसके मत प्रतिशत में खासी बढ़ोतरी होने का अनुमान था। कंजर्वेटिव पार्टी को भी मत प्रतिशत में हल्की बढ़ोतरी, लेकिन सीट संख्या में कमी आने की भविष्यवाणी की गई थी। अभी डेविड कैमरन लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिलकर साझा सरकार चला रहे थे। इसके बरक्स कयास लगाए जा रहे थे कि लेबर पार्टी के नेता एड मिलिबैंड किस दल के साथ गठबंधन करेंगे। ये सारे अनुमान धरे के धरे रह गए। लेबर पार्टी की सीटें बढऩे के बजाय कम हो गईं और कंजर्वेटिव पार्टी ने स्पष्ट बहुमत से आगे बढ़कर पांच अधिक सीटें जीत लीं। अब कैमरन देश को किए गए अपने वायदों पर बिना किसी दबाव के निर्णय ले सकते हैं।

दरअसल, लेबर पार्टी को सबसे बड़ा झटका स्काटलैंड में लगा जहां अलगाववादी स्कॉटिश नेशनल पार्टी ने 59 में से 56 सीटें पाकर लेबर का सूपड़ा साफ कर दिया। अभी एक साल पहले ही स्कॉटिश जनता ने जनमत संग्रह में ग्रेट ब्रिटेन के साथ बने रहने का फैसला किया था। इन नतीजों के बाद आशंका उभरती है कि क्या स्कॉटलैंड में स्वतंत्र सार्वभौम देश बनने की मांग फिर से उठेगी? प्रधानमंत्री कैमरन ने जीत के तुरंत बाद वायदा किया कि ग्रेट ब्रिटेन के सभी राष्ट्रों अर्थात् वेल्स, उत्तर आयरलैंड और स्कॉटलैंड को अधिकतम स्वायत्तता दी जाएगी तथा चारों राष्ट्र (इंग्लैंड सहित) मिलकर एक देश बने रहेंगे, लेकिन इस पर विश्वास करने के  लिए राजनीतिक पर्यवेक्षक फिलहाल तैयार नहीं हैं। कईयों का कहना है कि यह शायद ग्रेट ब्रिटेन का आखिरी आम चुनाव सिद्ध हो सकता है।

डेविड कैमरन ने चुनाव के दौरान मतदाताओं से यह वायदा भी किया था कि वे यूरोपीय संघ की सदस्यता छोडऩे पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे। यह एक बड़ा कूटनीतिक निर्णय होगा किन्तु अपनी घोषणा पर अमल करना प्रधानमंत्री के लिए शायद बहुत आसान न हो। यूरोप के सम्पन्न देशों में एक भावना बलवती होती जा रही है कि उन्हें कमजोर देशों का बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। ग्रीस, पुर्तगाल तथा पूर्वी यूरोप के अनेक देश निर्धन की श्रेणी में आ जाते हैं। इनके विरुद्ध जर्मनी और फ्रांस में भी आवा•ों उठ रही हैं। अगर ग्रेट ब्रिटेन इस दिशा में पहल करता है तो एक यूरोप का सपना बिखरते देर न लगेगी। किन्तु इससे स्वयं ब्रिटेन को क्या फायदा होगा यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अगर स्कॉटलैंड अलग हो गया तो उसका विपरीत प्रभाव इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

यह विचारणीय है कि लेबर पार्टी के हाथों में विजय आते-आते कैसे फिसल गई। एक तो स्कॉटलैंड के मतदाताओं ने उसका साथ नहीं दिया, दूसरे यह भी कहा जा रहा है कि लेबर पार्टी ने इंग्लैंड के ग्रामीण श्रमिक वर्ग की ओर ध्यान देना पिछले कई सालों से छोड़ दिया था। ये दोनों उसके पारंपरिक गढ़ थे। मोहभंग होने पर हार होना ही थी। युवा एड मिलिबैंड ने अपने सगे भाई डेविड मिलिबैंड को नेता पद के चुनाव में हराया था, लेकिन वे अपने पारंपरिक मतदाताओं का विश्वास जीतने में असफल सिद्ध हुए।

चलते-चलते यह खबर कि पुनर्निर्वाचित प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अपनी पत्नी सामन्था कैमरन के साथ जीत की खुशी मनाने लंदन के सबसे महंगे और संभ्रांत वर्ग के लिए सुरक्षित मेफेयर क्लब में रात्रि भोज पर गए। पूंजीवादी जनतंत्र में नेतृत्व की दिशा का संकेत इसमें मिलता है।
देशबन्धु में 14 मई 2014 को प्रकाशित