Wednesday, 20 May 2015

पीकू : नई सोच की फिल्म


 उस दिन सिनेमा घर से ‘पीकू’ फिल्म देखकर बाहर निकले तो मन हुआ कि इसके बारे में लिखना चाहिए। फिल्म की तारीफ मैं सुन चुका था, पारिवारिक मित्रों का साथ मिल गया था तो छह महीने के भीतर ही दुबारा मल्टीप्लेक्स में जाकर फिल्म देखने का योग बन गया। वरना अपना रिकार्ड यह है कि पिछले छह साल में टॉकीज जाकर शायद छह फिल्में भी नहीं देखी होंगी। टीवी पर जो फिल्में आती हैं बीच-बीच में उन्हें ही आधी-अधूरी देखकर काम चल जाता है। यह भी एक रोचक संयोग था कि छह महीने जो फिल्म देखी थी उसका टाइटिल था ‘पीके’ और अब यह ‘पीकू’। ह`मारे फिल्म बनाने वालों की कल्पनाशक्ति का भी कोई जवाब नहीं है। कहां-कहां से ऐसे शीर्षक ढूंढ लाते हैं।

‘पीकू’ फिल्म जिन लोगों ने भी देखी होगी उन सबने इसे एक स्वस्थ्य मनोरंजन वाली फिल्म के रूप में ही देखा होगा! फिल्म की कथा जैसा कि आप जानते हैं एक परिवार के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इसमें अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण तथा इरफान खान जैसे वर्तमान में लोकप्रिय कलाकार तो हैं ही, आज से तीन-चार दशक पहले की लोकप्रिय अभिनेत्री मौसमी चटर्जी को भी लम्बे अरसे बाद देखने का मौका मिला।  मेरे प्रिय अभिनेता रघुवीर यादव भी एक नए मेकअप में प्रकट हुए। उनकी अभिनय प्रतिभा का जो लाभ सिनेमा जगत को उठाना चाहिए था वह नहीं उठा पाया। इनके अलावा और कौन-कौन से अभिनेता थे, मुझे मालूम नहीं। मालूम करने की आवश्यकता भी नहीं थी क्योंकि उनमें से कोई भी साधारण अभिनय से ऊपर नहीं उठ पाया।

प्रथम दृष्टि में ‘पीकू’ एक हास्यप्रधान फिल्म प्रतीत होती है। इसका कथानक जिस बिन्दु से उठाया गया है वहां हास्य की सर्जना अपने-आप होती है। श्री बनर्जी याने अमिताभ बच्चन अपने कब्ज से परेशान हैं और इसके चलते उनके स्वभाव में जो चिड़चिड़ापन आ गया है वह दूसरों को भी परेशान करता है और चिड़चिड़ा बना देता है। घर में एक पुराना सेवक है जो स्वामीभक्ति में कोई कमी नहीं रखता। रघुवीर यादव ने डॉक्टर मित्र का रोल अदा किया है, वह भी मित्रता में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ता। रघुवीर यादव के रोल को देखकर पुरानी फिल्मों में डेविड द्वारा निभाए गए परिवार-मित्र डॉक्टर के रोल का ध्यान आ जाता है। लेकिन मिस्टर बनर्जी के चिड़चिड़ेपन का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है फिल्म की नायिका उनकी बेटी पीकू याने दीपिका पादुकोण पर। पिता के पास दवाईयों का भंडार है, लेकिन उन्हें किसी से फायदा नहीं होता। डॉक्टर की सलाह भी सुनी-अनसुनी कर दी जाती है। बेटी को विधुर पिता की देखभाल भी करना है और अपना कामकाज भी संभालना है। पीकू के स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन आ गया है और इससे वह न तो घर को व्यवस्थित रख पाती है, न दफ्तर में मनोयोग से काम करना हो पाता है और न मित्रों के साथ फुर्सत के पल आराम से बीत पाते हैं।

फिल्म की कहानी सबको पता है कि किस तरह राणा चौधरी इरफान की टैक्सी में सवार होकर पिता पुत्री-कोलकाता अपने पुराने घर को देखने के लिए निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में और उसके बाद भी जगह-जगह पर हास्य की सृष्टि हुई है, कहीं दृश्यों से, कहीं संवादों से। लेकिन मैं सोच रहा हूं कि क्या फिल्म सिर्फ इतनी ही है! इसमें कथा के भीतर जो उपकथाएं पिरोई गई हैं, क्या मेरी तरह अन्य दर्शकों ने भी उन्हें महसूस किया है? ये जो उपकथाएं हैं वे किस उद्देश्य से जोड़ी गई हैं और क्या उनका निर्वहन करने में डायरेक्टर सफल हो सका है? मुझे लगता है कि फिल्म के माध्यम से एक बहुत महीन संदेश देने का सायास प्रयत्न किया गया है जिसे चारों तरफ फूटते हँसी फव्वारों के बीच शायद दर्शक पकड़ पाने में चूक गए! इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

फिल्म में एक उपकथा है- अपने अतीत की स्मृतियों को जीवित रखने की। श्री बनर्जी की कोलकाता में चंपाकुंज नाम से विशाल हवेली है, जो उनकी मां के नाम पर है। वे उसे नहीं बेचना चाहते। बेटी सोचती है कि इसे बेच देना चाहिए। एक जमीन दलाल आकर्षक ऑफर लेकर बार-बार आता है।  फिलहाल कोठी में पीकू के काका-काकी रहते हैं, उन्हें भय है कि कोठी बिक गई तो वे कहां जाएंगे। टैक्सी मालिक राणा चौधरी पीकू का मित्र भी है। वह उसे समझाता है कि अतीत से इस तरह खुद को नहीं काटना चाहिए। स्मृतियों से कटने का मतलब अपनी जड़ों से कट जाना है। उसकी यह बात पीकू को समझ आ जाती है। मिस्टर बनर्जी अपने पुराने घर में आकर एक नए किस्म की प्रफुल्लता महसूस करते हैं और वहीं बहुत शांति के साथ, उनकी मृत्यु हो जाती है। पीकू घर पहुंचने का इरादा छोडक़र यह तय करती है कि इस हवेली का रख-रखाव कैसे किया जाए। यह उपकथा विरासत संरक्षण करने वालों की प्रशंसा पाने योग्य है!

एक और उपकथा है जो सर्वोदयी किस्म के गांधीवादियों को अवश्य पसंद आएगी। चौधरी की कार में ड्राइवर द्वारा रखा एक चाकू मिल जाता है जिसे फेंकने के लिए मिस्टर बनर्जी किाद पकड़ लेते हैं। अंत में पीकू के आग्रह पर चौधरी चाकू फेंक देता है। इस तरह हिंसा पर अहिंसा की विजय हो जाती है। इसके अलावा राणा चौधरी मिस्टर बनर्जी को कब्ज से मुक्ति पाने के लिए उकड़ू बैठकर शौच करने व तुलसी, पुदीना का काढ़ा पीने आदि की सलाह भी देता है जिस पर वे अमल भी करते हैं। इसे हम अंग्रेजी दवाइयों पर प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति की विजय मान सकते हैं।

बहरहाल, पीकू के कथानक में एक अन्य उपकथा है जो हमारी पारंपरिक सोच व सामाजिक रूढिय़ों को चुनौती देती है, उनका तिरस्कार करती है। इस उपकथा पर भारतीय संस्कृति का दंभ भरने वालों का ध्यान क्यों नहीं गया, यह अपने आप में आश्चर्यजनक है। पीकू आज के जमाने की एक आत्मनिर्भर कुंवारी युवती है। एक मित्र के साथ उसके दैहिक संबंध हैं। उसके इन संबंधों के बारे में पिता को भी मालूम है और उसी शहर में रहने वाली मौसी को भी। घर के इन दो बुजुर्गों को पीकू के संबंधों पर कोई एतराज नहीं है बल्कि मिस्टर चौधरी तो अपरिचित लोगों के सामने भी यह कहने में नहीं हिचकिचाते कि उनकी बेटी के विवाहेतर संबंध हैं। एक तरह से फिल्म का परिवेश ऐसा गढ़ा गया है जिसमें विवाहेतर संबंध को बहुत बारीक ढंग से मान्यता मिली हुई है।

भारतीय सिनेमा ने सौ साल का सफर पूरा कर अगली सदी में प्रवेश कर लिया है। इस लम्बी अवधि में फिल्मों में अभिनय और तकनीक के अलावा कथानक याने विचार के स्तर पर भी बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं। ऐसी तमाम फिल्में अलग-अलग समय में बनी हैं जिनमें विगलित सामाजिक रूढिय़ों से मुक्त होने का संदेश दिया गया है। कभी बेमेल विवाह का विरोध हुआ, तो कभी विधवा विवाह की वकालत हुई। धर्म, जाति, भाषा, रंग, प्रांतीयता के नाम पर हो रहे भेदभावों को समाप्त करने का संदेश देने वाली फिल्में भी बनीं। अपराधियों का हृदय परिवर्तन संभव है, यह भी दर्शाया गया। वेश्यावृत्ति के लिए स्त्री नहीं बल्कि समाज जिम्मेदार है, यह संदेश भी सामने आया। गरज यह कि एक नए समाज की रचना का विश्वास लेकर सैकड़ों फिल्में पिछले सौ साल के दौरान बनी होंगी।

लगता है कि अब परिर्वतन की एक नई लहर चल पड़ी है। इन दिनों बन रही अनेक फिल्मों के विषय ऐसे हैं जिनके बारे में चार दशक पहले सोचना भी मुश्किल था। फिल्मों में भाषा के साथ जो सलूक हो रहा है, वह भी एक समय अकल्पनीय था। इसमें क्या अच्छा है और क्या बुरा, इस पर मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता। यदि सामाजिक सोच में परिवर्तन आ रहा है तो वह आंखें मूंद लेने से तो नहीं रुक जाएगा। इस परिवर्तन का प्रतिबिंब यदि साहित्य में एवं फिल्मों पर पड़ रहा है तो उसे भी अनदेखा करने से काम नहीं चलेगा। यदि ‘पीकू’ में बिना विवाह किए युवाओं के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होने का चित्रण आज के समाज का यथार्थ है तो मानना होगा कि फिल्मकार ने समय के अनुरूप विषय चुनकर अपनी कलाधर्मिता को ही निभाया है। दूसरी ओर फिल्मकार की शायद यह सोच भी हो कि विवाहेतर संबंध तो होते हैं, उस बारे में ढकोसलेबाजी क्यों की जाए; समाज में इस विषय पर खुल कर बहस हो तो इस तर्क को मान लेने में आपत्ति नहीं होना चाहिए।

देशबन्धु में 21 मई 2015 को प्रकाशित