Friday, 7 August 2015

अकोला में हिंदी


 आज के इस लेख में कुछ अतीत राग है, कुछ यात्रा विवरण एवं कुछ साहित्य चर्चा। मैं आपको एक ऐसे स्थान ले चलना चाहता हूं जिसके साथ मेरे बचपन की एक रोचक स्मृति जुड़ी हुई है। यह वाकया है मई 1956 का। छठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद गर्मी की छुट्टियों में बाबूजी-बाई (माँ) के साथ मैं अकोला आया था। ननिहाल पक्ष में एक विवाह का अवसर था। बाबूजी बारात के साथ नागपुर चले गए थे। विवाह वाले घर में मेरी बराबरी का कोई बच्चा नहीं था। जो भैया दूल्हा बनकर गए थे, उनके कमरे में एक पुस्तक मुझे मिल गई। जासूस जे.बी. और उसके सहायक जैकब के कारनामों की। जबलपुर में घर के पुस्तकालय (बाबूजी ने उसे बड़े प्यार से ग्रंथ चयन नाम दिया था) से मैं प्रेमचंद, सुदर्शन तथा शरतचंद्र को समझे-बिना समझे पढ़ चुका था। किंतु जासूसी उपन्यास पढऩे का यह पहिला मौका मुझे लगा था। तीसरे दिन बारात लौटकर आने तक मैंने उपन्यास को शुरु से आखिरी तक पूरा पढ़ लिया था। जासूस अपने सहायक के साथ किस तरह अपराधियों को कानून के शिकंजे में जकड़ता था, यह पढऩे में वाकई बहुत मज़ा आ रहा था। इसके बाद मैंने खोज-खोज कर जासूसी उपन्यास पढ़े। विनोद-हमीद, राजेश-जयंत, सुरेश-कमल, वर्मा-रमेश आदि जासूसी जोडिय़ों की ढेर सारी किताबें पढ़ डालीं। नोट करने लायक है कि इनमें से हरेक जासूस अपने सहायक के साथ ही चलता है। इन्हें पढ़ते हुए फिर यह पता चला कि अंग्रेजी के चर्चित सैक्सटन ब्लैक-टिंकर की जोड़ी के किस्सों की ही जे.बी.-जैकब में नकल की गई थी। आज भी रहस्य-रोमांच के ऐसे लोकप्रिय लेखक हमारे बीच हैं जिनके उपन्यासों में कहीं अर्ल स्टनले गार्डनर की पैरी मैसन सीरीज़ की खूबसूरत ढंग से चोरी की गई है तो कहीं जेम्स हेडले चेज़ के रोमांच भरे उपन्यासों से, जिसमें अपराधी के हाथ अन्तत: शून्य ही आता है।

इस तरह अकोला ने भले ही मेरी साहित्यिक रुचि को ''बिगाडऩे" का काम किया हो, लेकिन सच पूछिए तो अकोला एक लंबे समय से हिंदी रचनाशीलता का एक प्रमुख केंद्र रहा है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। रायगढ़ के मूल निवासी प्रो. सुभाष पटनायक अकोला के किसी महाविद्यालय में प्राध्यापक बनकर आए थे और यहीं के होकर रह गए थे। उनकी बहुत इच्छा थी कि मैं एक बार हिंदी साहित्य पर केंद्रित किसी कार्यक्रम में अकोला अवश्य आऊं। उनके स्नेहिल निमंत्रण को स्वीकार करना किसी न किसी कारण से टलता रहा और दुर्भाग्य से लगभग एक वर्ष पूर्व वे दिवंगत हो गए। किंतु अकोला के कुछेक अन्य लेखक मित्रों से इस बीच संपर्क बना रहा, बल्कि प्रगाढ़ भी हुआ। इसलिए जब सुकवि-प्राध्यापक रामप्रकाश वर्मा ने हिंदी कविता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करने का आग्रह किया तो उसे स्वीकारने में फिर मैंने विलंब नहीं किया। मेरे मन में अकोला प्रवास का लोभ तो था ही, उसके साथ यह भावना भी थी कि पास के उस गांव के भी एक बार दर्शन कर लूं जहां अपनी ननिहाल में मेरा जन्म हुआ था। संयोगवश यह दूसरी इच्छा अधूरी रह गई, किंतु अकोला में बिताया लगभग तीस घंटे का समय नए, शिक्षाप्रद एवं आनंददायी अनुभवों से भरा सिद्ध हुआ।

अकोला एक लंबे समय तक सी.पी. एंड बरार (मध्यप्रांत एवं बरार) प्रदेश का हिस्सा था। प्रदेश की राजधानी नागपुर में थी और नागपुर, जबलपुर, रायपुर व अकोला इसके चार प्रमुख नगर थे। 1 नवंबर 1956 को नए मध्यप्रदेश का गठन होने के साथ विदर्भ के मराठीभाषी आठ जिले नए महाराष्ट्र में समाहित कर दिए गए। उन दिनों अकोला की एक यह ख्याति सुनने मिलती थी कि वह भारत का सबसे गर्म स्थान है। स्वतंत्रता पूर्व यह ओहदा जकोबाबाद को हासिल था जो पाकिस्तान में चला गया। पता नहीं यह बात कितनी सही थी। क्योंकि तब ऐसी भी चर्चाएं होती थीं कि नागपुर भारत का केंद्रीय स्थल है। (प्रो. एस.डी. मिश्र ने अपने संस्मरणों में नागपुर के ग्राउंड ज़ीरो का वर्णन किया है)। इन चर्चाओं से परे यह ठोस जानकारी भी थी कि अकोला प्रदेश की कृषि उपज की एक महत्वपूर्ण मंडी थी। मध्यप्रदेश के पहिले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल ने अपने विशाल प्रदेश के संतुलित विकास के लिए जो कार्ययोजना बनाई उसके तहत नागपुर में मेडिकल कॉलेज, जबलपुर में इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर में साइंस कॉलेज व अकोला में एग्रीकल्चर कॉलेज याने कृषि म.वि. की स्थापना की गई। कालांतर में इसका दर्जा बढ़ा और पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ के रूप में इसे विकसित किया गया। यही कारण है कि महाराष्ट्र राज्य बीज विकास निगम का मुख्यालय इसी नगर में ही रखा गया है।

इसी अकोला में विदर्भ के एक प्रमुख हिंदी समाचारपत्र की नींव रखी गई। स्वाधीनता सेनानी बृजलाल बियाणी ने सन् तीस के दशक में यहां से 'नव राजस्थान' नामक एक साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। बियाणीजी स्वयं शब्द-शिल्पी थे, किंतु पत्र का नियमित संपादन करने के लिए उन्होंने तब की हिंदी राजधानी इलाहाबाद से प्रतिष्ठित लेखक रामनाथ सुमन को आमंत्रित किया। सुमनजी इस पत्र से काफी समय तक जुड़े रहे। उनके सुपुत्र ज्ञानरंजन से भला कौन साहित्यप्रेमी परिचित नहीं है? उनकी गणना हिंदी के प्रमुख कथाकारों में होती है तथा उससे बढ़कर वे 'पहल' पत्रिका के यशस्वी संपादक के रूप में चर्चित-प्रतिष्ठित हैं। बृजलाल बियाणी ने स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, कई बार जेल यात्राएं कीं। उन्हें जनता ने 'विदर्भ केसरी' की उपाधि दी। बियाणीजी की आत्मकथा ''जेल में" शीर्षक से प्रकाशित हुई। स्वतंत्र देश में वे सीपी एंड बरार सरकार में मंत्री भी बने, किंतु उनका साहित्य से अनुराग बना रहा। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के गोंदिया अधिवेशन (1955) के समय वे संभवत: अध्यक्ष थे। उस समय काफी विवाद भी हुआ था। मुक्तिबोधजी ने बियाणीजी को लक्ष्य करके ही 'नया खून' में 'साहित्य के काठमांडो का राजा' शीर्षक से एक चुभता हुआ व्यंग्य लिखा था।

इस पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है कि अकोला में जो कि मूलत: एक मराठीभाषी क्षेत्र है, हिंदी साहित्य की अजस्रधारा पिछले सौ वर्ष से चली आ रही है। जिस साप्ताहिक की चर्चा ऊपर हुई, उसी ने आगे चलकर आज के प्रमुख हिंदी पत्र नवभारत का स्वरूप ले लिया। मुक्तिबोध मंडली के एक प्रमुख सदस्य रामकृष्ण श्रीवास्तव 1950 के आसपास अकोला के सीताबाई आर्ट्स कॉलेज में प्राध्यापक बन कर चले गए। थे। वे अपने दौर के एक सम्मानित कवि एवं गीतकार थे। 'चट्टान की आँखें' शीर्षक से उनका संकलन प्रकाशित हुआ। रामकृष्णजी की छवि एक विद्रोही तेवर वाले कवि की थी तथा उनकी कविता ''जिस पत्थर से देव बने तुम, मैं उस पत्थर का टुकड़ा हूं" खासी चर्चित हुई थी। उनका निधन भी असमय ही हो गया किंतु उनकी परंपरा को अकोला के रचनाकारों ने जीवित रखा है। रामप्रकाश वर्मा व मणि खेड़ेकर से मेरा पूर्व परिचय था; प्रवास के दौरान पता चला कि अंबिकापुर में जन्मे दामोदर खड़से ने भी एक लंबा समय यहां बिताया व यहां की साहित्यिक गतिविधियों को जीवंतता प्रदान की। यहीं मेरा परिचय घनश्याम अग्रवाल से हुआ, जो सटीक तरीके से मंच संचालन तो करते ही हैं, अपनी लघुकथाओं में भी उन्होंने सामाजिक विसंगतियों का बखूबी चित्रण किया है। यहीं प्रो. सुरेश केशवानी भी मिले, जिनकी स्कूली शिक्षा रायपुर में हुई थी। मुझे उनसे जानकर अच्छा लगा कि देशबन्धु के 'पूछिए परसाई से' और 'दरअसल' जैसे स्तंभों से उन्हें प्रेरणा मिली।

अकोला में राष्ट्रभाषा सेवी समाज नामक संस्था विगत तीस वर्षों से काम कर रही है। इसने नगर व क्षेत्र में पहिले से व्याप्त हिंदी प्रेम को पुष्ट करने के लिए अनेक काम किए हैं। मैं जिस राष्ट्रीय संगोष्ठी में आमंत्रित था, उसका आयोजन संस्था ने ही किया था। दिनभर चले कार्यक्रम में लगभग दो सौ लेखक, अध्यापक व हिंदीप्रेमी उपस्थित थे। मुझे दो बातों ने विशेषकर प्रभावित किया। एक तो संस्था के संचालन में यहां सभी वर्गों के नागरिक अत्यन्त रुचि लेकर सहयोग करते हैं। दूसरे-विदर्भ के महाविद्यालयों तथा माध्यमिक शालाओं के शिक्षकों का हिंदी के प्रति अनुराग दुर्लभ व अनुकरणीय है। गोष्ठी के सत्रों के संचालन मेें, आलेख पठन में, आभार प्रदर्शन में याने हर मौके पर इसका प्रमाण मुझे मिला। संगोष्ठी में जो परचे पढ़े गए, उनका स्तर बहुत अच्छा था। लगता था कि आलेख लेखकों ने पर्याप्त परिश्रम किया है। एक तरफ मैं हिंदी में उनकी दक्षता व रुचि पर चकित था तो दूसरी ओर यह सोचकर पीड़ा हो रही थी कि हमारे छत्तीसगढ़ में ऐसा क्यों नहीं है।

लिखने के लिए बहुत कुछ है। किंतु मेरी बात अधूरी रहेगी जब तक मैं महाबीज के प्रबंध संचालक अरुण उन्हाले के प्रति आभार व्यक्त न करूं। वे स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। अपने निवास पर ही उन्होंने आत्मीयतापूर्वक मुझे ठहराया और संगोष्ठी की पूर्व संध्या पर 27 जून से आयोजित कवि सम्मेलन में अपनी नहीं, हरिवंश राय बच्चन की कविता भी सुनाई।
देशबन्धु में 6 अगस्त 2015 को प्रकाशित