Sunday, 9 August 2015

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा

 स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा। जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, यह विशद विवेचन का विषय है, जिसे एक व्याख्यान या आलेख में साधना लगभग असंभव है। यदि विषय के साथ न्याय करना है तो इस हेतु एक सुचिंतित, सुदीर्घ ग्रंथ लिखने की आवश्यकता होगी। फिलहाल इसके कुछेक पहलुओं पर सरसरी तौर पर चर्चा हो सकती है। अपने आपमें विषय महत्वपूर्ण है, प्रासंगिक भी तथा आज की चर्चा को एक प्रस्थान बिंदु मानकर आगे बढ़ा जा सकता है। जब हम हिंदी साहित्य के इतिहास, कालखंड निर्धारण, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों की चर्चा करते हैं तो तीन चार नाम प्रमुख रूप से सामने आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1920 के दशक में हिंदी शब्द सागर की भूमिका लिखी, वही कुछ वर्ष बाद ''हिंदी साहित्य का इतिहास" के रूप में सामने आई, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का चर्चित ग्रंथ ''हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी" 1941 में प्रकाशित हुआ तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित ''हिन्दी साहित्य-उद्भव व विकास" 1950 के आसपास आया। इसके अलावा समय-समय पर अन्य पुस्तकें आई होंगी, जिनके बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं है। उपरोक्त तीनों पुस्तकों को लिखे लगभग सत्तर वर्ष से नब्बे वर्ष तक का समय बीत चुका है। आचार्य शुक्ल ने जिसे आधुनिक काल माना है, वह एक तरह से वर्तमान साहित्य का शैशवकाल था तथा वाजपेयी जी व द्विवेदी जी ने भी उस दौर की विवेचना तक ही अपने को सीमित रखा। 

स्मरणीय है कि अज्ञेय द्वारा संपादित ''तार सप्तक" का प्रकाशन 1943 में हुआ था। उसकी चर्चा द्विवेदी जी के ग्रंथ में अभीष्ट थी, किन्तु वह नहीं हुई। इसी तरह वाजपेयी जी ने अपनी पुस्तक, जो कि मूलत: स्वतंत्र प्रकाशित लेखों का संकलन था, का शीर्षक तो महत्वाकांक्षी रखा, लेकिन वह इसलिए असमय था, क्योंकि उसका प्रकाशन तब हुआ जब बीसवीं सदी का प्रथमार्द्ध पूरा होने में भी दस साल बाकी थे। इन तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य का नया इतिहास लिखने का समय आ चुका है। इसीलिए मैंने आज की चर्चा को प्रस्थान बिंदु मानने का प्रस्ताव ऊपर किया है। किसी उद्यमी शोधार्थी को अब यह बीड़ा उठा लेना चाहिए। यूं तो जब भी समग्र इतिहास लिखा जाएगा उसमें सभी विधाओं का समावेश स्वाभाविक रूप से होगा; किन्तु आज की संगोष्ठी कविता पर केन्द्रित है, इस नाते मैं समझता हूं कि वर्तमान कविता की विवेचना तार सप्तक के प्रकाशन को आधार मानकर की जानी चाहिए। 1943 और 1947 में मात्र चार वर्ष का अंतर है, तदपि कविता की मीमांसा एक ऐतिहासिक किन्तु मूलत: राजनैतिक घटना की पृष्ठभूमि में करने के बजाय कविता के अपने विकास क्रम में आए एक ऐतिहासिक अवसर से करना अधिक श्रेयस्कर होगा। 

मेरी समझ में देश को आजादी मिलने और हिंदी कविता में एक नए युग का सूत्रपात होने के पीछे जो परिस्थितियां व कारण रहे हैं, उनमें भी कई स्थानों पर समानता देखी जा सकती है। सारे विश्व में और देश में विचारों की जो नई बयार बह रही थी, उससे तार सप्तक के कवि भली-भांति परिचित थे और तेजी से बदलते हुए घटनाचक्र पर सतर्क दृष्टि रखे हुए थे। कहा जा सकता है कि कवि समय के साथ चल रहा था। दूसरे, यह तो स्वीकार्य है कि रचनाकार अपने दौर की राजनैतिक हलचलों से स्वयं को काटकर नहीं रख सकता, उसका प्रभाव तो किसी न किसी रूप में पड़ता ही है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि एक घटना विशेष का फौरी प्रभाव उसकी रचनाशीलता पर पड़े। आशुकवि ही इसका अपवाद हो सकते हैं। अतएव किसी राजनैतिक कालखंड अथवा कैलेंडर को आधार मानकर यदि साहित्य लेखन का विभाजन किया जाए तो उस पर एक प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा। मसलन क्या बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को सिर्फ इस कारण से पृथक किया जा सकता है कि एक नई सहस्राब्दि का उदय हो गया है? 

बहरहाल, तार सप्तक के प्रकाशन एवं स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत रची गई हिंदी कविता की दशा-दिशा पर विचार करते हुए पहले तो यह नोट करना होगा कि सात-आठ दशक की इस लंबी यात्रा में कविता अनेक मोड़ों से गुजरी है, अनेक पड़ावों पर ठहरी है और इस बीच उसने नए-नए रूप ग्रहण किए हैं। विचार, कथ्य, भाषा, शिल्प, सभी दृष्टियों से कविता किसी एक बिंदु पर टिकी नहीं रही, बल्कि उसने निरंतर अपना विकास किया। इस अवधि में वैश्विक एवं राष्ट्रीय क्षितिज पर जो परिवर्तन हुए, कविता उनसे भी अछूती नहीं रही। आचार्य शुक्ल ने जिस आधार पर कविता को कालखंडों में बांटा, उसे प्रमाण मानकर कहा जा सकता है कि सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में आए युगांतकारी परिवर्तनों से कविता प्रभावित होती है। हमारे विवेच्य कालखंड में ऐसा सबसे पहला परिवर्तन था कि भारत दो सौ साल की गुलामी से मुक्ति पाकर स्वाधीन देश के रूप में उदित हुआ। यह अध्ययन का विषय है कि इस एक बड़ी घटना ने कविता को किस सीमा तक प्रभावित किया। हम पाते हैं कि परवर्ती समय में ऐसी घटनाओं, प्रसंगों व परिस्थितियों की लंबी श्रृंखला है जिसने विश्वजन के साथ-साथ कवि मन को भी आंदोलित किया होगा। इनकी एक सूची बनाने से बात स्पष्ट हो सकेगी:- 

(1) 1939-1945 द्वितीय विश्व युद्ध
(2) 1942 : 'भारत छोड़ो'आंदोलन
(3) 1945 : अणुबम का आविष्कार व हिरोशिमा व नागासाकी पर एटमी हमला
(4) 1947 : भारत में एशियाई संबंध सम्मेलन
(5) 1948 : चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना व इजराइल में धर्म आधारित देश की स्थापना
(6) 1950-60 : कोरिया का युद्ध व विभाजन, स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण व उस पर पश्चिमी हमला, बांडुंग सम्मेलन, क्यूबा का स्वतंत्र होना
(7) 1960 : एक दशक में अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका के अनेक गुलाम देशों की स्वतंत्रता
(8) 1964 : पं. नेहरू व मुक्तिबोध जी का निधन
(9) 1965-75 : अमेरिका का वियतनाम युद्ध
(10) 1967 : भारत में नक्सलवाद का उदय
(11) 1952 से अब तक : भारत में आम चुनाव, जनतांत्रिक आकांक्षाओं का बीजारोपण, राजनैतिक चेतना का विस्तार
(12) 1950 के दशक से देश के योजनाबद्ध विकास की कल्पना, बांधों व कारखानों का निर्माण, औद्योगीकरण की शुरूआत
(13) 1962 : भारत-चीन युद्ध
(14) 1965- भारत-पाक के बीच दूसरा युद्ध
(15) 1965-67 : देश में बड़े पैमाने पर अकाल, हरित क्रांति की शुरूआत
(16) 1971 : बांग्लादेश का उदय
(17) 1975-77 : आपातकाल
(18) 1992 : बाबरी मस्जिद विध्वंस
(19) 1998 : भारत का एटमी परीक्षण
(20) 1999 : कारगिल युद्ध

यह फेहरिस्त अभी पूरी नहीं हुई है। भारत में क्षेत्रीय तथा जातिगत अस्मिता का उभार, औद्योगीकरण के साथ शहरीकरण, विस्थापन व पलायन, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों पर संघर्ष, समाज में स्त्री, दलित व आदिवासी विमर्शों का प्रारंभ; दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी तथा संचार साधनों का विकास, कम्प्यूटर से स्मार्टफोन तक का सफर, बहुराष्ट्रीय निगमों का बढ़ता वर्चस्व, पूंजीबाजार के जटिल खेल, रत्नगर्भा अफ्रीका की धरती का बेरहम शोषण, इजराइल की संकीर्ण साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से उदित इस्लामी आतंकवाद, अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी हमले, सोवियत संघ का विघटन जैसी तमाम अन्य घटनाएं हैं जिन सबका प्रभाव साहित्य रचना पर पडऩा ही था। यहां हम ध्यान दें कि स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद के वर्षों में भारतीय लेखक जिस तरह वैश्विक घटनाचक्र में दिलचस्पी लेता था, वह 1975 के बाद लगभग समाप्त हो गई। दरअसल, स्वातंत्र्योत्तर कविता की बात करें तो इस समय को प्रमुख रूप से तीन खंडों में बांटा जा सकता है- (1) 1943/1947-1964, (2) 1964-1984 एवं (3)1984 से अब तक। मैंने यह विभाजन खंड विशेष की प्रमुख राजनैतिक, आर्थिक, हलचलों को ध्यान में रखकर किया है; इसमें विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में समयानुसार हुई प्रगति को भी आधार माना है; और कविता के अपने स्वरूप में जो परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं उनका संज्ञान लिया है। इसके पश्चात यह कहना भी आवश्यक होगा कि यह निर्धारण पत्थर की लकीर नहीं है। विचारों व भावनाओं के तरल प्रवाह में ऐसा होना संभव नहीं है। 

इस मोटे वर्गीकरण में पहिले खंड याने तार सप्तक के प्रकाशन से लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन तक की अवधि की विवेचना करने से एक बात समझ आती है कि छायावाद के उत्तराधिकारी रूप में जो नई कविता सामने आई थी, वह प्रयोगवाद तथा प्रगतिवाद इन दो धाराओं में विभक्त हो गई थी; किन्तु छायावाद के कतिपय मूल्यों का प्रभाव इस दौर की कविता पर स्पष्ट था। इसमें देशप्रेम व प्रकृति प्रेम था, आजादी की छटपटाहट थी, विश्व नागरिकता की गूंज थी, व्यक्तिगत स्वाधीनता का मूल्य था, युद्ध, हिंसा एवं वैभव का तिरस्कार था। कविता एक अनिवार्य कर्म की तरह थी एवं उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध था। देश एवं दुनिया के नव-निर्माण की, एक यूटोपिया फलित होने की आशा थी। इस अवधि में दो बड़े कवि सामने आए- अज्ञेय एवं मुक्तिबोध। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों एक मंच पर साथ-साथ प्रकट हुए। यह बाद की बात है कि दोनों की दिशाएं बदल गईं। अज्ञेय ने आगे चलकर दूसरे, तीसरे व चौथे सप्तक का भी संकलन-संपादन किया। दूसरे व तीसरे में कुछ महत्वपूर्ण कवि सामने आए किन्तु चौथा सप्तक तो एक तरह से निष्फल प्रयोजन ही सिद्ध हुआ। प्रयोगवाद की धारा एक मुकाम पर पहुंचकर न सिर्फ रुक गई, बल्कि विलुप्त हो गई, जबकि प्रगतिवादी धारा अपना रास्ता तलाश करते हुए आगे बढ़ती चली गई। मुक्तिबोध की असमय, मात्र 47 वर्ष की आयु में मृत्यु एक हृदय विदारक ट्रैजेडी थी, किन्तु उनके विचार भावी-पीढिय़ों के लिए प्रकाश स्तंभ बन गए। सन् 1964 तक के प्रथम कालखंड की एक और विशेषता गौरतलब है यह समय था जब कवियों की तीन, बल्कि चार पीढिय़ां एक साथ रचनाकर्म में संलग्न थीं। इस दौर में मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, निराला, महादेवी और बच्चन सक्रिय थे तो अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध, फिर अपेक्षाकृत युवा धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्त, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह इत्यादि तथा चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि बनकर विनोदकुमार शुक्ल, शलभ श्रीराम सिंह इत्यादि दस्तक दे रहे थे।

एक अन्य रोचक तथ्य यह भी है कि छंदमुक्त कविता का युग भले ही प्रारंभ हो गया हो, अभी गीत के लिए कविता के संसार में सम्मान हासिल था। गोपालसिंह नेपाली, नीरज, वीरेंद्र मिश्र, मुकुटबिहारी सरोज, शंभुनाथ सिंह, उमाकांत मालवीय, रामानंद दोषी आदि की कविताएं सुनी और सराही जाती थीं। धर्मयुग व साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं में उन्हें उचित स्थान मिलता था। क्या इसकी वजह यह थी कि वह अपेक्षाकृत सरल समय था और अपनी बात गीत में कह पाना संभव था? या फिर क्या ऐसा हुआ कि बाद के कवि लय-ताल को पकड़ पाने में असफल हुए और उन्होंने चिढ़कर गेय कविता को खारिज कर दिया? एक तीसरा कारण यह भी तो हो सकता है कि गीतकार आत्ममुग्धता के शिकार हो गए तथा वर्तमान समय की जटिलताओं को समझ गीतों में उन्हें बांध नहीं पाए।

 वर्तमान समय की कविता के दूसरे चरण में याने 1964 के बाद से लेकर लगभग 1984 तक हम पाते हैं कि देश अनेक प्रकार के झंझावातों से जूझ रहा था। इस अवधि में एक गहरी निराशा का वातावरण भी बन रहा था। यद्यपि शुरूआत सन् 1960 के आसपास हो चुकी थी। इस दौर में जहां अमेरिका की सीआईए द्वारा प्रायोजित फोरम फॉर कल्चरल फ्रीडम जैसी संस्थाएं अपने एजेंडे के अनुसार सक्रिय थीं तो इन्हीं दिनों कविता में भांति-भांति के आंदोलन प्रारंभ हुए। मसलन अकविता, दिगंबर कविता, नवगीत, भुभुक्षु कविता, सनातन सूर्योदयी कविता इत्यादि। कुछ बीटल कवि भी थोड़े समय पूर्व ही भारत आए थे, एलेन गिंसबर्ग का नाम मुझे ध्यान आ रहा है, और वे कविता नहीं, बल्कि अपने क्रियाकलापों के चलते भारत में चर्चित हुए थे। यही समय था जब भोगा हुआ यथार्थ व अनुभूति की प्रामाणिकता जैसे नारे प्रचलन में आए। इस कालावधि में अनास्था, अविश्वास व संशय का जो स्वर मुखर हुआ उसके प्रमुख कवियों में शायद रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, राजकमल चौधरी व धूमिल आदि नाम लिए जा सकते हैं। धर्मवीर भारती की अंधा युग भी इसी दौरान प्रकाशित-चर्चित हुई। दूसरी ओर त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह आदि की प्रगतिशील कवियों के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा मुकम्मल तौर पर हुई। इसी समय में प्रतिभाशाली कवियों की उस पीढ़ी ने अपनी पहिचान बनाना प्रारंभ किया, जो वर्तमान दौर में शीर्ष पर माने जाते हैं। इनमें विनोदकुमार शुक्ल, मलय, चंद्रकांत देवताले, अरुण कमल, सोमदत्त, भगवत रावत, राजेश जोशी, विजेंद्र, प्रयाग शुक्ल, अशोक वाजपेयी आदि के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। 


इस दूसरे चरण में नई कविता या छंदमुक्त कविता का तीव्रगति से विकास तो हुआ लेकिन पाठकों या कहें कि समाज के बीच कविता पहुंचने के अवसर सिमटने लगे। जो दो लोकप्रिय साप्ताहिक और दो-तीन पत्रिकाएं हर पढ़े-लिखे हिंदीभाषी परिवार में खरीदी जाती थीं, वे या तो बंद कर दी गईं या उन्हें बंद होने के लिए छोड़ दिया गया। इस दौर के कवियों को चूंकि कवि सम्मेलन शब्द से ही अरुचि थी और चूंकि वे कविता को एक श्रेष्ठ कर्म मानते थे, इसलिए कविता धीरे-धीरे कर कमरों में होने वाली आत्मीय गोष्ठियों तक सीमित हो गई। कवि का वृहत्तर समाज के साथ संपर्क कट गया। उसने यहां तक कहना शुरू कर दिया कि पाठक को कवि के पास आना चाहिए। इसका परिणाम यह निकला कि मंच पूरी तरह उन गीतकारों के हवाले हो गया जो आधुनिक भावबोध को साध पाने में अक्षम थे। पर इस दरम्यान एक नई बात हुई। कमलेश्वर ने  'सारिका' में अपने मित्र दुष्यंत कुमार की गलों को प्रमुखता से छापना शुरू किया तो हिंदी गल नामक एक नई विधा का ही जन्म हो गया। चंद्रसेन विराट व ओम प्रभाकर जैसे गुणी गीतकार गलगो हो गए। आज हिंदी कविता के नाम पर गज़ल का ही बोलबाला है। अब तो गुजराती, मराठी, बुंदेली व छत्तीसगढ़ी में भी गलें कही जा रही हैं। नवगीत को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका।

तीसरा चरण यूं तो 1984 से माना जा सकता है, लेकिन इसका ठीक-ठाक स्वरूप बनना 1991 के आसपास प्रारंभ हुआ, जब नवसाम्राज्यवाद की पगचापें भारत की धरती पर सुनाई देने लगीं। आज बाजारवाद की बात खूब होती है, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आज का बाजार वैश्विक पूंजीवाद का एक अस्त्र मात्र है। जब सिर्फ बाजारवाद की आलोचना होती है तो उसकी नियामक शक्ति की तरफ दुर्लक्ष्य हो जाता है। इस दौर में जो स्थापित कवि हैं उनसे सुधी पाठक भलीभांति परिचित हैं। कवियों की एक और नई पीढ़ी स्वाभाविक क्रम में सामने आ रही है। उसकी रचनाओं में वर्तमान की आर्थिक-राजनैतिक-वैज्ञानिक जटिलताओं को पकड़ पाने की, उनका विश्लेषण करने की इच्छा प्रतिबिंबित होती है। अच्छी बात यह है कि मुक्तिबोध की कृतियां इस तीसरी पीढ़ी का पथ आलोकित कर रही हैं। इस लंबी अवधि में, हमारा ध्यान जाता है कि, महिलाओं ने जहां कहानी व उपन्यास लेखन में अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया, वहीं कविता लेखन में कुछ गिने-चुने नाम ही सामने आ पाए। यह भी दृष्टव्य है कि मुक्तिबोध के बाद उन जैसी महाकाव्यात्मक विस्तार की कविता और कोई नहीं लिख पाया, लंबी कविताएं भले ही कितनी भी लिखी गई हों। यह भी नोट करना उचित होगा कि पहिले की भांति आज भी कविता में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। निराला ने गक़ालें, त्रिलोचन ने सॉनेट, कईयों ने नवगीत लिखे तो आज ''हिंदी गज़ल" के साथ हाईकू आदि भी लिखे जा रहे हैं। ये प्रयोग कितने सार्थक हैं, उस पर फिलहाल क्या कहें?

टिप्पणी : राष्ट्रभाषा सेवी समाज, अकोला (महा.) द्वारा 28 जून 2015 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिए उद्घाटन व्याख्यान का संशोधित स्वरूप। 

अक्षर पर्व अगस्त 2015 अंक की प्रस्तावना