Wednesday, 12 August 2015

सरकार बनाम संस्थाएं


 

प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त 2014 के लालकिले की प्राचीर से पहिले उद्बोधन में अन्य घोषणाओं के बीच दूरगामी परिणामों वाली एक बड़ी घोषणा योजना आयोग को समाप्त करने की थी। इस 15 अगस्त को भी क्या वे ऐसी कोई चौंकाने वाली घोषणा करेंगे? या शायद उसकी आवश्यकता नहीं है? मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष के दौरान नेहरू युग अथवा नेहरू परंपरा की अनेक संस्थाओं को जिस तरीके से विसर्जित, खंडित या परिवर्तित किया है, वह देश के सामने है। बीते स्वाधीनता दिवस पर संभवत: प्र्रधानमंत्री के मन में यह विचार रहा हो कि अपने पहिले संबोधन में उन्हें ऐसी कोई बात कहना चाहिए जिसकी व्यापक स्तर पर चर्चा हो सके। इस दरमियान उनकी मुखरता का स्थान मौन ने ले लिया है। दिल्ली के अनुभव से वे शायद यह जान गए हैं कि हर काम घोषणा करके करना जरूरी नहीं है। जो काम चुपचाप किया जा सकता है, उसमें व्यर्थ प्रचार क्यों किया जाए? इसीलिए योजना आयोग को विघटित करने के अलावा ऐसे कई अन्य निर्णय इस बीच लागू कर दिए गए, जिन पर आम जनता को गौर करने का अवसर ही नहीं मिला।

मैं यह स्वीकार करता हूं कि लोकतंत्र में एक चुनी हुई सरकार को अपनी नीतियों व सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार होता है। इसमें यह भी शामिल है कि सरकार अपने अधीनस्थ संस्थाओं का संचालन भी अपनी इच्छा से करे व शीर्ष पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करे जो उसके अनुकूल हों। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ बहुमतवाद नहीं होता, इस सत्य को ध्यान में रखकर सरकार का यह उत्तरदायित्व भी बनता है कि इन संस्थाओं के जो मूल लक्ष्य हैं, उनकी अनदेखी न की जाए तथा संचालन उन व्यक्तियों के हाथों में हो, जो अपनी वैचारिक/सांगठनिक प्रतिबद्धता के बावजूद उस विषय विशेष में निपुण हों। यह सोचकर मुझे हैरानी होती है कि क्या भाजपा/संघ में प्रतिभाशाली व्यक्तियों का टोटा पड़ गया है! मोदी सरकार के गठन के बाद से ही विभिन्न संस्थाओं के कामकाज में जिस तरीके से  हस्तक्षेप किया गया है, वह हमें निराश करता है। इसके अलावा यह संदेह होता है कि लोकसभा में स्पष्ट बहुमत का अहंकार सरकार को जनतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करने से रोक रहा है।

राष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविज़न प्रशिक्षण संस्थान, पुणे याने एफटीटीआई के शासी निकाय के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति सत्ता के अहंकार का एक उदाहरण है। यह हमें पता है कि एफटीटीआई जैसे संस्थान में दैनंदिन कामकाज पूर्णकालिक वेतनभोगी निदेशक के जिम्मे होता है जबकि अध्यक्ष का काम मुख्यत: शासी निकाय की बैठक की अध्यक्षता करना एवं समय-समय पर नीतिगत मार्गदर्शन करना होता है। आज तक इस संस्थान में जो अध्यक्ष हुए, वे सिने जगत के कद्दावर व्यक्ति थे। उन्हें अपने ज्ञान एवं अनुभव के बल पर प्रतिष्ठा हासिल की थी। देश-विदेश में जहां भी मौका हो, उनके नाम से संस्थान की भी प्रतिष्ठा वृद्धि होती थी। आज गजेंद्र चौहान के अध्यक्ष बनने एवं साथ-साथ संघ से जुड़े कुछ गैर-फिल्मी लोगों के सदस्य बनने से आशंका उपजती है कि एक सरकारी सेवक याने निदेशक जो मर्जी आएगी, वैसा काम करेगा व शासी निकाय सम्यक समझ व अनुभव के अभाव में उसके प्रस्तावों की पुष्टि मात्र करने तक सीमित रह जाएगा। जो छात्र इस नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह कहकर डराया जा रहा है कि सरकार संस्थान को ही विघटित कर देगी। यह भूलकर कि संस्था तोडऩा आसान है, संस्था खड़ी करना उतना ही दुष्कर।

एक अन्य प्रसंग जिसमें पुस्तकों में अपनी रुचि के चलते मुझे पीड़ा हुई है, वह है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास-याने एनबीटी के अध्यक्ष पद पर हुई नियुक्ति। एनबीटी ने विगत पांच दशकों में पुस्तकों के प्रति आम जनता की रुचि बढ़ाने के लिए यथेष्ट काम किया है। तमाम भारतीय भाषाओं में न्यास पुस्तकें छापता है एवं सस्ते दामों पर बिक्री हेतु उपलब्ध कराता है। उसकी मोबाइल वैन पूरे देश का सफर करती हैं तथा स्थान-स्थान पर बिक्री के लिए स्टॉल लगाती है। अगर आप किसी को पुस्तकें भेंट देना चाहते हैं तो बेहिचक एनबीटी के सुंदर प्रकाशनों का सैट भेंट कर सकते हैं। इसके अध्यक्ष पद पर भी किसी ऐसी शख्सियत की नियुक्ति होना चाहिए थी, जो लेखन-प्रकाशन के बारे में भरपूर जानकारी रखता हो। मोदी सरकार चाहती तो नरेन्द्र कोहली, महीप सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे किसी ख्यातिनाम लेखक को यह दायित्व दे सकती थी। ऐसा कोई व्यक्ति अध्यक्ष होता तो पुस्तक-प्रेमी समाज में सही संदेश जाता, एक आश्वस्ति होती कि एनबीटी अपनी गुणवत्ता कायम रखेगा। अब देखना होगा कि नए अध्यक्ष बलदेवभाई शर्मा कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं, क्योंकि पुस्तक जगत से उनका पहिले कोई खास नाता नहीं रहा।

ललित कला अकादमी में जिस तरह से अध्यक्ष को हटाया गया, वह तो और भी हैरानी एवं चिंता उपजाता है। देश की इस शीर्ष संस्था के अध्यक्ष की नियुक्ति स्वयं राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को ही बनाया जाता है जिसने कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण योगदान किया हो। यह संयोग की बात है कि कुछ वर्ष पूर्व म.प्र. के अशोक वाजपेयी अकादमी के अध्यक्ष थे। उनका ललित कलाओं व अन्य रचनात्मक विधाओं के उन्नयन में जो दीर्घकालीन योगदान रहा है, उससे सभी परिचित हैं। दो वर्ष पूर्व राष्ट्रपति ने म.प्र./छ.ग. के कल्याण कुमार चक्रवर्ती को इस पद पर मनोनीत किया। श्री चक्रवर्ती का पुरातत्व, कला-इतिहास व संबंधित विषयों पर जो काम है, वह भी सुविदित है। वे दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के भी सदस्य सचिव रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति को अचानक अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, जबकि वे दलगत राजनीति से तटस्थ रहकर अपना दायित्व निर्वाह कर रहे थे। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत एक उच्च पदस्थ व्यक्ति को क्या एकाएक इस तरह पदमुक्त किया जा सकता है, एक सवाल तो यही है। दूसरे, उन्हें हटाकर संस्कृति मंत्रालय ने क्या हासिल कर लिया? अध्यक्ष पद पर अभी तक कोई दूसरी नियुक्ति भी नहीं की गई है। 

कहा जा सकता है कि कांग्रेस राज में भी इसी तरह कामकाज चलता था। बात किसी हद तक सही है, लेकिन एक बड़ा फर्क है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस ने सिर्फ और सदैव कांग्रेसियों को ही उपकृत किया हो। उनके शासन के दौरान साम्यवादी, समाजवादी यहां तक कि अघोषित भाजपाईयों को भी लगातार अवसर मिलते रहे हैं। जिस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय याने जेएनयू पर कम्युनिस्टों का गढ़ होने का आरोप लगता रहा है, क्या वहां सारे शिक्षक साम्यवादी ही थे? आप सूची उठाकर देख सकते हैं कि ऐसा नहीं था। कांग्रेस चूंकि कैडर-आधारित पार्टी नहीं है, इसलिए उसके राज में व्यवहारिक कारणों से ऐसा होना संभव भी नहीं था। केंद्र के अलावा राज्यों में भी अनेकानेक उदाहरण हैं कि जिसे कांग्रेसी अपना समझते थे, वह सत्ता पलटते साथ भाजपाई निकला। दूसरे शब्दों में,यदि कांग्रेस शासन के दौरान पद पाने के लिए चाटुकारिता प्रमुख गुण था तो भाजपा राज में संघ निष्ठा अनिवार्य शर्त है। लेकिन फिर भाजपा को अपने निष्ठावान एवं सुयोग्य जनों की एक सूची बना लेना चाहिए जिन्हें किसी पद पर निर्विवाद बैठाया जा सके।

मेरी इस बिनमांगी सलाह का एक अन्य पक्ष भी है। भाजपा आज सत्ता में है और यह सबको पता है कि सत्ता के साथ अपने आप कुछ बुराईयां जुड़ जाती हैं। सत्ताधारी को कबीर के वचन कड़वे लगने लगते हैं, लेकिन उसकी अपनी भलाई इसी में है कि वह चाटुकारिता से बचकर रहे। जनतंत्र में तो उसे विपरीत विचारों का भी समादर करना आना चाहिए। यदि सत्ता का मकसद सिर्फ सत्ता का आनंद उठाना है तब तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि सत्ताधारी अपने पांच, दस या पंद्रह साल के कार्यकाल को लोक-स्मरणीय बनाना चाहता है तो उसे अपनी व्यवस्था में ऐसे अधिकारी नियुक्त करना चाहिए जो विचारों के अनुकूल होने के अलावा अपने पद व कार्य की पवित्रता की रक्षा करने में सक्षम हों। भाजपा को अटलबिहारी वाजपेयी से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है। स्वाधीनता दिवस पर हम यही कामना कर सकते हैं कि ऐसा हो।
देशबन्धु में 13 अगस्त 2015 को प्रकाशित