Wednesday, 14 October 2015

विकलांग चेतना का दौर


 



विगत सप्ताह इसी स्थान पर मैंने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े कुछ पहलुओं की चर्चा की थी, लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ और संतप्त नेता लालकृष्ण अडवानी ने तो मानो नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के लिए मांग उठा दी है कि नेताजी की मृत्यु से संबंधित सारे दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाएं तभी इस विवाद पर अंतिम रूप से विराम लगेगा। इस बीच नेताजी के कुछ कुटुम्बीजनों ने ममता बनर्जी सरकार पर जो शक प्रकट किया है उस पर कोई अधिकृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। शायद प. बंगाल सरकार ने ठीक ही किया है। यदि राज्य सरकार के पास सचमुच कोई बचे कागजात हैं वे भी सार्वजनिक कर दिए जाएं तो क्या बोस परिवार के संशयग्रस्त सदस्य उससे संतुष्ट हो पाएंगे या फिर कोई नया शिगूफा छोडऩे की तैयारी में जुट जाएंगे?

जो भी हो, इस दरम्यान भाजपा के शुभचिंतक पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता का एक लेख कोलकाता के द टेलीग्राफ अखबार में प्रकाशित हुआ है। इसमें उन्होंने स्पष्ट मत व्यक्त किया है कि दस्तावेजों का खुलासा होने से कुछ आना-जाना नहीं है। वे पंडित नेहरू को भी संदेहमुक्त करते हैं, जो कि श्री दासगुप्ता की दक्षिणपंथी रुझान के चलते आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। उनका कहना है कि नेहरूजी जानते थे कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की सच्चाई को शोकग्रस्त बोस परिवार स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है और इसलिए उन्होंने आधिकारिक तौर पर इसके खंडन-मंडन में कोई रुचि नहीं ली। बहरहाल, इसका यह परिणाम जरूर हुआ कि नेताजी के अंधभक्तों को उन्हें लेकर रहस्य का आवरण बुनने का मौका मिल गया। मुझे याद है कि जबलपुर में हमारे दफ्तर में 1961-62 में मोहन लहरी नाम के एक सज्जन ने कुछ समय काम किया था। वे नेताजी के जीवित होने का दावा हर किसी से करते थे।  लगभग चालीस साल बाद ये सज्जन बस्तर में कहीं आकर बस गए थे। नेताजी का साथी होने के आधार पर उनको जो सम्मान मिला उसके चलते उनका अंतिम समय ठीक-ठाक कट गया।

बहरहाल नेताजी तक चर्चा सीमित रहती तब भी गनीमत थी। लेकिन हो यह रहा है कि इस प्रकरण को जो हवा मिली उससे कुछ और लोगों की भी हौसला अफजाई हो गई है। लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र व कांग्रेस नेता अनिल शास्त्री ने मांग  की है कि शास्त्रीजी की मृत्यु से संबंधित सारे दस्तावेज जनता के सामने रखे जाएं। वे अपनी स्वर्गीया मां के हवाले से कहते हैं कि उन्हें शास्त्रीजी की हृदयाघात से मौत होने पर विश्वास नहीं था। मुझे ध्यान आता है कि रायपुर में 1965 में शरद पूर्णिमा के कवि सम्मेलन में पधारे एक मंचीय कवि ने जो कविता सुनाई थी उसमें वर्णन था कि उनके सपने में ललितादेवी शास्त्री यह कहने के लिए आईं कि तुम्हारे बाबूजी (शास्त्रीजी) को जहर देकर मारा गया है। इस तथाकथित कविता में इंदिरा गांधी पर सीधे-सीधे आरोप मढ़ा गया था। उनके इस विषवमन के बाद श्रोताओं ने उन्हें बुरी तरह हूट कर दिया था। हाल के समय में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने भी अपनी आत्मकथा में शास्त्रीजी की हत्या किए जाने का आरोप लगाया है। अब प्रश्न उठता है कि अनिल शास्त्री को आज यह मुद्दा उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वैसे वे इस बात से दुखी होंगे कि जांच कराने की बात तो दूर रही, प्रधानमंत्री मोदी 2 अक्टूबर को विजयघाट तक नहीं गए!

नेताजी और शास्त्रीजी के बाद शहीदे-आज़म भगतसिंह की तीसरी-चौथी पीढ़ी के सदस्य भी सामने आ गए हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि स्वतंत्र भारत में भी उनके घर की जासूसी होते रही है। अब जिसे मानना है वह इसे सच मान ले, किन्तु लाल बहादुर शास्त्री और भगतसिंह इन दोनों के प्रसंग में भी सहजबुद्धि कुछ और ही कहती है। जैसा कि सब जानते हैं शास्त्रीजी की मृत्यु ताशकंद में हुई थी। यह भी कोई छुपी बात नहीं है कि शास्त्रीजी को दिल की बीमारी थी। ताशकंद की जनवरी की हाड़ जमा देने वाली ठंड का उनकी सेहत पर क्या असर हुआ होगा यह सिर्फ अनुमान का विषय है, लेकिन जिस सोवियत संघ ने ताशकंद में सुलह वार्ता के लिए लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान दोनों को आमंत्रित किया था, उसकी कोई दिलचस्पी शास्त्रीजी की मृत्यु में होगी, यह कैसे और क्यों माना जाए? अपनी धरती पर किसी मेहमान की मृत्यु सोवियत सरकार के लिए अप्रत्याशित और दु:खद घटना ही रही होगी। दूसरी तरफ शास्त्रीजी की मृत्यु से भारत में किसको लाभ होता, यह भी एक नाहक प्रश्न है। याद रखना चाहिए कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मोरारजी देसाई वरिष्ठतम नेता थे तथा नेहरूजी व शास्त्रीजी दोनों की मृत्यु के बाद वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। इस तथ्य को ध्यान में रखेंगे तो अनर्गल आरोप का उत्तर अपने आप मिल जाएगा।

शहीदे-आज़म भगत सिंह के परिवार की खुफिया निगरानी होती थी यह आरोप भी हमें दूर की कौड़ी प्रतीत होता है। भगतसिंह को फांसी देने के बाद अंग्रेज सरकार ने भले ही उनके रिश्तेदारों पर नज़र रखी हो, लेकिन देश को स्वाधीनता मिलने के बाद इसकी कोई वजह दिखाई नहीं देती। इन तीनों प्रकरणों को लेकर मैं एक अन्य दृष्टि से विचार करता हूं। हमें ज्ञात है कि स्वाधीनता सेनानियों के वंशजों को सरकार द्वारा काफी सुविधाएं दी जाती हैं जैसे कि उनकी तीसरी पीढ़ी के लिए मेडिकल कॉलेज आदि में सीटें आरक्षित होती हैं। हम बहुत सारे फर्जी स्वाधीनता सेनानियों को जानते हैं। जब ऐसे लोग सरकारी सुविधाएं हासिल कर सकते हैं तो भगतसिंह, नेताजी व शास्त्रीजी के वंशज भी लाभ उठाने की क्यों न सोचें? मृत्यु की जांच के लिए नए सिरे से कमीशन बन जाए, उस बहाने कुछ पूछ-परख हो जाए, जांच के बहाने विदेश यात्रा का मौका मिल जाए, दिवंगत के नाम पर शोध संस्थान स्थापित करने के लिए अनुदान प्राप्त हो जाए और यह सब न भी हो तो कम से कम अखबारों में तस्वीर के साथ इंटरव्यू छपे, रोटरी क्लब वाले भाषण देने बुला लें और इस तरह पुरखों के नाम पर अपने को सम्मान मिलता रहे। यह भावना कहीं न कहीं काम करते दीखती है।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सारा देश ''थियेटर ऑफ द एब्सर्ड" में तब्दील हो गया है। मैं इसके लिए हिन्दी में पर्याय सोच रहा था। नौटंकी से बेहतर और कोई संज्ञा समझ नहीं आई, लेकिन जो दृश्य बना हुआ है उसे व्यक्त करने के लिए नौटंकी कहना पर्याप्त नहीं है। हरिशंकर परसाई ने काफी पहले विकलांग श्रद्धा का दौर शीर्षक से निबंध लिखा था। इसे थोड़ा बदलकर कह सकते हैं कि अब हम विकलांग चेतना के दौर से गुजर रहे हैं। हमें समझ नहीं आ रहा है कि आगे का रास्ता क्या है तथा किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में सब बैठे हुए हैं। जो सत्ता में हैं उनकी जीभ पर लगाम नहीं है। जिसकी जब जो मर्जी आती है कह देता है और जिन्हें प्रतिकार करना चाहिए वे घिसे-पिटे बयानों से आगे नहीं बढ़ते। अपने आप को उदारवादी, जनतंत्रवादी मानने वाले अनेकानेक बुद्धिजीवी तो तात्कालिक लाभ की प्रत्याशा में प्रतिगामी शक्तियों के सामने दंडवत तक करने लगे हैं। हमारे आसपास नित्यप्रति दिल दहलाने वाले अपराध घटित हो रहे हैं, लेकिन उनको रोकने में आज हम अपने आपको जितना असहाय पा रहे हैं ऐसा शायद पहले कभी नहीं हुआ। (नोट: इस कॉलम के लिखने व छपने के दरम्यान दस दिन का अंतराल रहा है। इस बीच अनेक जाने-माने लेखक प्रतिरोध करने सामने आए हैं। मुझे खुशी है कि उन्होंने मुझे एक सीमा तक गलत सिद्ध किया है)

एक गहरी हताशा सामाजिक जीवन में घर  करते जा रही है। महान लेखक आल्बेयर कामू ने एब्सर्ड को परिभाषित करते हुए ग्रीक मिथक से सिसीफस का उदाहरण दिया था- वह ऐसा इंसान है जो रोज एक चट्टान को ऊपर पहाड़ की चोटी तक ले जाने की कोशिश में लगा हुआ है। वह जितनी बार कोशिश करता है उतनी बार चट्टान खिसक कर नीचे आ जाती है याने एक निरर्थक उद्यम में वह अपना जीवन बिता रहा है। क्या यही स्थिति आज आम भारतीय की नहीं हो गई है? जब कोई अनहोनी हो जाए तो थोड़ी देर हाय-हाय कर लो, फिर चुप बैठ जाओ, फिर टीवी के समाचार चैनलों पर जो बहसें होती हैं, उसी में तत्व दर्शन की खोज कर अपने मन को समझा लो।
देशबन्धु में 15 अक्टूबर 2015 को प्रकाशित