Wednesday, 21 October 2015

लेखक का विद्रोह बनाम सत्ता का अहंकार

 



अगर
कुछ लेखकों ने पद, सम्मान या पुरस्कार लौटा दिए हैं तो इसमें केंद्र सरकार को इतना आग-बबूला क्यों होना चाहिए था? प्रधानमंत्री के विश्वस्त और देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि ये सब लोग कांग्रेसी, वामपंथी या नेहरूवादी हैं और उनका यह विरोध कागजी है। मान लेते हैं कि आप ही सही कह रहे हैं, लेकिन उससे क्या सिद्ध होता है? जो लोग आपकी विचारधारा, आपके कामकाज और आपके तौर-तरीकों में इत्तिफाक नहीं रखते क्या उन्हें अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार नहीं है? अगर आप ऐसा मानते हैं तब तो यह जनतंत्र वाली बात नहीं हुई। और यदि उनका विरोध कागजी है तब तो आपको रंचमात्र भी चिंता नहीं करना चाहिए, क्योंकि उससे आपको कोई नुकसान होने से रहा। लेकिन श्री जेटली, अन्य मंत्रियों एवं समर्थक पत्रकारों-लेखकों ने जो टीका-टिप्पणियां की हैं, उससे अनुमान होता है कि लेखकों के  विरोध से सरकार की छवि को जो धक्का पहुंचा है, उससे सरकार व उसके सहयोगी समूह किसी हद तक चिंतित हो उठे हैं। भाजपा को शायद पहिली बार पता चला है कि लेखक इस किस्म के भी होते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के साथ सदा से दिक्कत रही है कि वह भावनाओं की राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई। उसके लिए देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम वही है कि जो मनोज कुमार की फिल्मों में दिखाया जाता है। यह अकारण नहीं है कि भाजपा में बड़े-छोटे परदों के अभिनेताओं का बड़ा सम्मान होता है। यही देशभक्ति उन्हें सेना व पुलिस के अफसरों की ओर भी आकर्षित करती है और जब साहित्य की बात उठती है तो वे उन मंचीय कवियों पर बिछे जाते हैं जो वीररस या हास्यरस की कथित कविताएं सुनाकर मनोरंजन करते हैं। ये समझते हैं कि चीनी तुमको पानी में घोलकर पी जाएंगे या पाक तू नापाक है जैसी कविताओं से मोर्चा फतह किया जा सकता है। ऐसा कहना बहुत गलत नहीं होगा कि इन्हें एक असुरक्षा की भावना हरदम घेरे रहती है। यूं तो संघ परिवार प्राचीन भारतीय संस्कृति का निरंतर जयघोष करता है, लेकिन वास्तविकता यही है कि अधिकतर नेता नाम-जाप और कर्मकांड से आगे संस्कृति से वास्ता नहीं रखते।

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में अटल बिहारी वाजपेयी अपवाद के रूप में उपस्थित हैं। उनका अपने समकालीन लेखकों में से अनेक से संपर्क रहा है और विचारधारा के परे जाकर भी उनके साथ संवाद स्थापित करने में लेखकों ने संकोच नहीं किया। शिवमंगल सिंह सुमन उनके अध्यापक थे तथा वाजपेयीजी उनका बराबर सम्मान करते रहे। हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. शांताकुमार व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भी समकालीन साहित्य में थोड़ी-बहुत रुचि रही है। ऐसे कतिपय अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं। अब जब उदयप्रकाश से प्रारंभ कर मृत्युंजय प्रभाकर तक अनेक जाने-माने लेखकों ने विरोध प्रकट किया, तब शायद भाजपा को पहिली बार पता चला कि देश में बुद्धिजीवियों की कोई ऐसी भी जमात है जो चरण स्पर्श, साष्टांग दंडवत और पेट के बल रेंगने के बजाय आंखों से आंखें मिलाकर बात करना जानती है तथा जो हर बात में, हर मौके पर जय-जयकार करने के बजाय अपनी बात कहने से नहीं हिचकती। काश! सरकार ने इस सच्चाई को जानने का प्रयत्न किया होता!

हम याद दिलाएं कि उदयप्रकाश ने 4 सितंबर को अपना पुरस्कार लौटाने की घोषणा तब की, जब अकादमी पुरस्कार विजेता व अकादमी की सामान्य सभा के सदस्य प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने न तो शोकसभा की और न ही शोक प्रस्ताव पारित किया। अगर देश के लेखकों की सर्वोच्च संस्था अपने एक वर्तमान सदस्य की हत्या से भी बेखबर है तो इससे बढ़कर विडंबना क्या हो सकती है? उदयप्रकाश ने एक सटीक सैद्धांतिक बिंदु उठाया था, जिसका संज्ञान लिया जाना चाहिए था। इसके बाद नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी और अन्यों के विरोध प्रदर्शन की खबरें एक के बाद एक आईं। उन्होंने वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक वातावरण के बारे में प्रश्न उठाए। देश में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता व्यक्त की। अगर केंद्र सरकार में कोई सही सलाह देने वाला होता तो सार्वजनिक रूप से इन लेखकों की भावनाओं से अवगत होने का संज्ञान लिया गया होता तथा देश में सद्भाव बनाए रखने के लिए हर संभव उपाय अपनाने का आश्वासन दिया जाता। ऐसा नहीं किया गया तो उसके पीछे यही मानसिकता काम कर रही थी कि 25-50 लेखक हमारा क्या बिगाड़ लेंगे।

सच तो यह है कि जब मैं यह कॉलम लिख रहा हूं, उस दिन तक सत्तापक्ष की ओर से जो ढेरों प्रतिक्रियाएं आई हैं उनका केंद्रीय स्वर यही है कि लेखकों के विरोध से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम जानते हैं कि लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और अगले साढ़े तीन साल तक प्रत्यक्षत: सरकार के सामने कोई चुनौती दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन सत्ताधीशों का यह अहंकार किसी भी दिन उन पर भारी पड़ सकता है। राम और रावण की तुलना करते समय जो कहा जाता है, वह तो भाजपा के शीर्ष नेताओं को अवश्य ही स्मरण होगा। और न हो तो कम से कम आज दशहरे के दिन याद कर लें कि रावण की पराजय अपने किस दुर्गुण के चलते हुई थी। जो हम कह रहे हैं उसके छोटे-मोटे लक्षण दिखना भी प्रारंभ हो गए हैं। जिन ओवैसी को भाजपा ने परोक्ष रूप से बिहार के चुनावी मैदान में उतारा था, वे सिमट कर एक कोने में बैठ गए हैं; उसी प्रदेश में शरद पवार की राकांपा ने मुलायम सिंह की सपा से गठजोड़ तोड़ लिया है, क्योंकि सपा नेता भाजपा के मुरीद हो चले हैं और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ नाभि-नाल संबंध होने के बावजूद सब कुछ ठीक नहीं है।

आगे बढऩे के पहिले यह तथ्य रेखांकित करना उचित होगा कि जिन लेखकों ने पुरस्कार-सम्मान लौटाए हैं, वे लगभग पूरे भारत का और लगभग सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें कश्मीर से केरल व पूर्वोत्तर से लेकर महाराष्ट्र तक के लेखक हैं। इनमें वृद्ध, प्रौढ़, युवा, स्त्री, पुरुष सभी हैं। अनेक ने पुरस्कार वापिस नहीं किए हैं, लेकिन केन्द्र सरकार की वर्तमान रीति-नीति की उन्होंने खुलकर आलोचना की है तथा विरोध जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया है। फिर जेटली जी इन्हें चाहे जो घोषित करें, ये स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवी हैं तथा इनमें से कई को हमने सत्ता चाहे जिसकी रही हो, बुनियादी मानवीय मूल्यों की रक्षा के प्रश्न पर सत्ता के विरोध में खड़ा होते देखा है। ये लेखक किसी सैन्य प्लाटून का हिस्सा नहीं है कि जैसा हुकुम मिला, वैसी तामील कर दी; इनमें से हरेक में अपने विवेक- बुद्धि से निर्णय लेने की क्षमता है।

लेखकों ने सम्मान-पुरस्कार क्यों लौटाए, इस पर तरह-तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं, जिनमें से अधिकांश प्रसंगच्युत, संदर्भहीन व असंगत हैं। मसलन अर्णब गोस्वामी ने अपने चैनल पर वक्तव्य दिया कि आपातकाल में हिटलर की जर्मनी से छह गुना अधिक नसबंदियां की गईं, तब संजय गांधी का विरोध क्यों नहीं किया। पहिले तो श्री गोस्वामी को यह सवाल करना ही था तो केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी से करते। दूसरे, टीवी के इस सुपरस्टार को याद नहीं आया कि नयनतारा सहगल ने आपातकाल का विरोध करने के साथ पीयूसीएल को स्थापित करने में भी अग्रणी भूमिका निभाई थी। इसी तरह के और न जाने कितने सवाल दागे गए हैं। इसका उत्तर यही है कि लेखक को जब सही लगा, उसने विरोध दर्ज किया। पहिले नहीं किया का अर्थ यह नहीं कि आज भी न करें। फिर यह महत्वपूर्ण बिन्दु नोट किया जाना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी नीतिगत रूप से दो राष्ट्र अवधारणा का विरोध करते आई है जबकि संघ की प्रेरणा से भाजपा भारत में हिन्दू राष्ट्र बनाने की पक्षधर है तथा वर्तमान में जो वातावरण बना है, उसके पीछे यही भावना काम कर रही है। कांग्रेस ने संगठन व सरकार दोनों स्तर पर ऐसा नहीं होने दिया, बावजूद इसके कि पार्टी में एक तबका प्रारंभ से ही रूढि़वादी सांप्रदायिक सोच का हामी रहा।

अब तक हम देख चुके हैं कि इस पूरे प्रसंग में लेखक चार वर्गो में बंट गए हंै। एक- जिन्होंने पुरस्कार आदि लौटाए। दो- जो विरोध तो करते हैं, लेकिन पुरस्कार नहीं लौटाना चाहते। तीन- जो अपने घर में चुपचाप बैठे हैं। कोऊ हो नृप, हमें का हानि। चार- जो पुरस्कार न लौटाने का औचित्य सिद्ध कर रहे हैं। विनोद कुमार शुक्ल ने दो बातें
पते की कहीं। एक तो उन्होंने कहा कि पुरस्कार कोई उधार नहीं था, जिसे लौटाया जाता। मैं कहना चाहता हूं कि पुरस्कार वाकई आप पर समाज का उधार है। उसके साथ कुछ अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं उन्हें पूरा करने पर ही आप उऋण होते हैं। एक लेखक को गाढ़े वक्त में समाज को राह दिखाना चाहिए। यह उससे सबसे बड़ी अपेक्षा है। शायद शुक्लजी की दृष्टि में वह गाढ़ा वक्त नहीं आया। उन्होंने दूसरी बात कही कि जीवन भर पुरस्कार को सलीब की तरह ढोते रहेंगे। आमीन। लेकिन क्या यह तुलना तर्कसंगत है। कोई भी अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि दंडाधिकारी के आदेश से सलीब ढोता है। तुलसीदास के मुताबिक यह देह धरने का दंड भी हो सकता है। जो बात विनोद भाई कह रहे हैं उसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि पुरस्कार वापिस न करने पर उनसे प्रश्न किया जाएगा कि आप क्यों पीछे रह गए। हां, सवाल शायद पूछा जा सकता है, लेकिन उसकी परवाह करने की आवश्यकता नहीं है। हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह अपने मनोनुकूल निर्णय ले। मैं पुरस्कार वापिस न करने वाले सभी मित्रों से कहना चाहूंगा कि यह सलीब नहीं है। अगर आपके मन पर इसका बोझ नहीं है तो मत उतारिए।
देशबन्धु में 22 अक्टूबर 2015 को प्रकाशित