Thursday, 5 November 2015

कुंभलगढ़ और हल्दीघाटी


 मन मयूर नाच उठा जैसे मुहावरों का प्रयोग अब शायद ही कोई करता हो। मयूर पंख, नाचे मयूरी जैसे नामवाली फिल्में भी अब किसे याद हैं। मयूर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है, लेकिन उसकी चर्चा भी कहां सुनने मिलती है। जब वन्य जीवन की बात होती है तो बाघ को बचाने की फिक्र ही सामने आती है। मोर बेचारा किसी गिनती में नहीं आता। कुल मिलाकर जंगल में मोर नाचा किसने देखा वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है। इसलिए उस दिन जब अरावली की पर्वतमाला में बसे उस छोटे से गांव में मोरों का एक पूरा कुनबा देखा तो मन सहज  प्रफुल्लित हो उठा। दिल्ली भी अरावली की गोद में बसी है। वहां भी कभी-कभार मोर देखने मिल जाते हैं। ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय पक्षी को आश्रय देने की पूरी जिम्मेदारी इसी पर्वतमाला ने उठा रखी है जो दिल्ली से लेकर दक्षिण राजस्थान में गुजरात की सीमा तक फैली हुई है।

हमें मयूर दल के दर्शन अनायास ही हो गए। मुख्य मकसद तो कुंभलगढ़ को देखना था। पंद्रहवीं शताब्दी में राणा कुंभा द्वारा बनवाया गया यह किला इधर कुछ वर्षों से चर्चा में आ गया है और एक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित हो रहा है। एक समय जब लोग उदयपुर घूमने आते थे तो वहां की झीलों को और महल को देखकर खुश हो लेते थे। श्रद्धालुजन निकट स्थित नाथद्वारा और एकलिंगजी के दर्शन करने भी चले जाते थे। देशप्रेम पर्यटकों को हल्दीघाटी तक भी ले जाता था। लेकिन कुंभलगढ़ अपने भव्य सूनेपन में अकेले रहा आता था। यह कुछ आश्चर्य की ही बात है कि इस प्राचीन किले की तरफ अभी तक सैलानियों और पर्यटन प्रबंधकों का ध्यान क्यों नहीं गया। अब स्थिति कुछ बदल रही है। इस स्थान के साथ हमारे इतिहास के दो महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े हुए हैं। एक तो चित्तौडग़ढ़ में जब राजवंश को समूल नष्ट करने का षडय़ंत्र रचा गया तब पन्ना धाय पांच साल के बालक उदयसिंह को लेकर यहीं आई थीं। दूसरे, महाराणा प्रताप का जन्म इसी किले में हुआ था।

कुंभलगढ़ के किले से इतिहास की एक और ऐसी कथा जुड़ी है जिसका उल्लेख पाठ्य पुस्तकों में नहीं मिलता। जिन राणा कुंभा ने इस अभेद्य गढ़ का निर्माण करवाया था उनकी हत्या उनके सगे बेटे ऊधा ने साम्राज्य के लालच में कर दी थी। आजकल किले में शाम को ध्वनि और प्रकाश का जो कार्यक्रम चलता है उसमें इस तथ्य का उल्लेख किया जाता है। यह घटना बताती है कि सत्ता के लिए बाप को कैद कर लेना, या मार डालना या भाई की हत्या कर देना- इन सबका किसी धर्म विशेष से लेना-देना नहीं है। जब हम सत और असत के प्रतिमान धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर गढ़ लेते हैं तब ऐसे तथ्यों की सच्चाई तक पहुंचने में हमारी सहायता करती है और इसलिए इनकी अनदेखी नहीं की जाना चाहिए।

कुंभलगढ़ उदयपुर से लगभग अस्सी किलोमीटर की दूरी पर है। केलवाड़ा नामक गांव से चढ़ाई प्रारंभ होती है और लगभग आठ-नौ किलोमीटर तक आप ऊपर चलते जाते हैं। जिस पहाड़ी पर किला अवस्थित है उसकी ऊंचाई समुद्र सतह से कोई इकतीस-बत्तीस सौ फीट होगी। इसके बाद एक के बाद एक कई दरवाजों और सीढिय़ों को पार करते हुए लगभग पांच सौ फीट और ऊपर चढऩा होता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण किले की देखभाल करता है, लेकिन अब वहां सूनी दीवालों के अलावा और कुछ नहीं है। ऊपर पहुंच जाने के बाद यह अनुमान अवश्य होता है कि इस किले पर चढ़ाई करना और इसे जीत लेना असंभव सी बात रही होगी। बताया जाता है कि सिर्फ एक बार दुश्मन की सेना यहां तक पहुंच पाई थी। एक तरह से यह गढ़ राणा कुंभा की समर-सिद्धता की गवाही देता है।

कुंभलगढ़ की दूसरी बड़ी विशेषता उसका परकोटा है। मूल रूप में इस परकोटे की लंबाई छत्तीस किलोमीटर थी और इसकी चौड़ाई कोई पच्चीस-तीस फीट के आसपास होगी। परकोटा लगभग नष्ट हो चुका है। सिर्फ एक दिशा में लगभग एक किलोमीटर लंबा हिस्सा बाकी है जिसे देखकर चीन की दीवार की याद आ जाना स्वाभाविक है। परकोटे का शेष भाग कब, कैसे नष्ट हो गया और उसे कैसे बचाया नहीं जा सका, यह हमें कोई नहीं बता पाया। किले के अलावा तलहटी में कई वर्ग कि.मी. में फैले विशाल प्रक्षेत्र में तीन सौ से अधिक मंदिर अवस्थित हैं। इनमें से अनेक किले का निर्माण होने के पहले के हैं। इनमें जैन मंदिरों की संख्या काफी है। समझा जाता है कि यहां पहले कभी जैन मंदिर ही रहे होंगे। कालांतर में किसी कारणवश वहां पूजा-पाठ बंद हो गया होगा।

जैसा कि हम जानते हैं मेवाड़ राज्य की पहली राजधानी चित्तौडग़ढ़ में थी। इसके बाद कुंभलगढ़ बसा, फिर राणा उदयसिंह ने उदयपुर की स्थापना की। उदयपुर से कुंभलगढ़ को जाने वाले रास्ते पर भी कोई पंद्रह किलोमीटर बाद एक सड़क हल्दीघाटी की ओर फूटती है जो आगे नाथद्वारा की ओर चली जाती है। हल्दीघाटी के  साथ महाराणा प्रताप की वीरता और उनके स्वामिभक्त चपल वेग घोड़े चेतक की कहानी जुड़ी हुई है। इस जगह का नाम हल्दीघाटी एकदम सटीक और उपयुक्त है। यहां एक संकरा दर्रा है जिसमें महाराणा प्रताप ने अकबर के सेनापति राजा मानसिंह की फौज को घेरने की व्यूह रचना की थी। इस दर्रे की मिट्टी का रंग हल्दी की ही तरह पीला है। इसके पास में ही चेतक की समाधि है। पहले लोग यहां आते थे तो इस समाधि पर और दर्रे पर जाकर माथा नवाते थे, लेकिन अब यहां इक्के-दुक्के पर्यटक ही आते हैं और इसका कारण है।

हल्दीघाटी में दर्रे के दो किलोमीटर पहले जो गांव है वहां एक स्थानीय उद्यमी ने महाराणा प्रताप म्यूजियम की स्थापना कर दी है। यह स्थान सैलानियों के आकर्षण का बड़ा केन्द्र बन गया है। भीतर एक प्रेक्षागृह है जिसमें महाराणा प्रताप के जीवन पर लगभग दस मिनट की एक फिल्म दिखाई जाती है। इसमें एक जगह सूत्रधार एक महत्वपूर्ण बात कहता है- शहंशाह अकबर एवं महाराणा प्रताप के बीच हुई लड़ाई साम्प्रदायिक नहीं थी। अकबर की सेना का नेतृत्व जयपुर के राजा मानसिंह कर रहे थे, जबकि प्रताप के सेनापति हकीम खान सूर थे। फिल्म खत्म होती है। अंत में स्वाधीनता सेनानियों के चित्र दिखाए जाते हैं उनमें लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और भगतसिंह के साथ-साथ डॉ. हेडगेवार किस तर्क से उपस्थित हैं, यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं।

फिल्म खत्म होती है तो एक गुफानुमा लंबी सी दीर्घा में दर्शकों को ले जाया जाता है जहां उपकरणों की सहायता से संचालित महाराणा प्रताप के जीवन की त्रिआयामी झलकियां दिखाई जाती हैं। यहां एक बार फिर आप उन सूचनाओं से रूबरू होते हैं जो पहले आप फिल्म में देख आए हैं। इसके आगे का दृश्य रोचक है। दीर्घा से बाहर निकलते साथ सामने गुलकंद, गुलाबजल और ऐसी कुछ अन्य सामग्रियां बेचने की दुकानें सजी हुई हैं। आपका गाइड आपसे इन दुकानों पर खरीदारी करने का जोरदार आग्रह करता है। दुकानदार भी हांक लगाकर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। देखते ही देखते आप जिस देशभक्ति की भावना को हृदय में धारण कर बाहर निकले थे वह व्यापार के कौतुक में तिरोहित हो जाती है। इसके बाद आप अपने स्मार्टफोन में संजोई सैल्फियों के साथ खुशी-खुशी अगले ठिकाने के लिए चल पड़ते हैं।

देशबन्धु में 05 नवंबर 2015 को प्रकाशित