Wednesday, 11 May 2016

वृंदावन में फ्लाई ओवर



 भारत में जितने भी तीर्थस्थल हैं वे सब मुख्यत: किसी एक भगवान, देवी-देवता, संत या औलिया को समर्पित हैं। मदुरै में मीनाक्षी, तो सोमनाथ में शिव, शिरडी में साईंबाबा, गुवाहाटी में कामाक्षी, जम्मू में वैष्णो देवी इत्यादि। इसमें बृजभूमि की बात कुछ निराली है। वहां के छोटे-छोटे गांवों में, जो अब बड़े कस्बों में बदल चुके हैं, जैसे जतीपुरा में कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को छोटी उंगली पर उठा लेने की पुराकथा प्रचलित है, तो गोकुल में उनकी अनेक बाल लीलाओं का वर्णन सुनने मिलता है। मथुरा जो इन सबके केन्द्र में है, के बारे में कहावत प्रचलित थी कि तीन लोक से मथुरा न्यारी। किन्तु इधर कुछ दशकों से न्यारेपन का यह गौरव वृंदावन को प्राप्त हो गया है जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि कृष्ण राधा और गोप-गोपियों के साथ यहीं रासलीला करते थे। मैं नहीं जानता कि असली वजह क्या है किन्तु पिछले कई सालों से देख  रहा हूं कि वृंदावन के प्रति लोगों का आकर्षण निरंतर बढ़ते जा रहा है।

मैंने अपने स्कूल कॉलेज के दिनों में ही नहीं, उसके बाद भी कई सालों तक गर्मी-सर्दी की छुट्टियों में कई-कई दिन वृंदावन में गुजारे हैं और इसलिए आज जो इस लीला नगरी के प्रति बढ़ता आकर्षण देखता हूं तो विस्मित हो जाता हूं। ऐसा नहीं कि वृंदावन में सिर्फ श्रद्धालुजन ही आते हैं। यहां विदेशों के कई गैरसरकारी संगठन अथवा एनजीओ ने अपनी गतिविधियां चला रखी हैं। वे यहां किस अनुसंधान में आए हैं, यहां उनके लिए आकर्षण का केन्द्र क्या है, यहां उनको कौन सा लौकिक या पारमार्थिक लाभ मिल रहा है यह मेरी समझ में नहीं आता। एक बात जो स्पष्ट दिखाई देती है वह यह कि वृंदावन में अब न तो यमुना में जल है और न उसके किनारों में वह रजत रेणु याने चांदी समान रेत। अगर वृंदावन में लोग शांति की तलाश में आते हैं तो वह मानो यहां से सदा के लिए रूठ कर जा चुकी है। हां, जो भीड़ के बीच भी अकेले रहने और उस अकेलेपन में अपनी आत्मा की आवाज सुनने का योग साध सकते हों, ऐसे कोई महापुरुष हों, तो बात अलग है।

मैं याद करने की कोशिश करता हूं तो साठ के दशक तक राधा-कृष्ण के प्रेम की इस भूमि पर सचमुच शांति का साम्राज्य था जिसमें मानसिक शांति पा लेना शायद बहुत कठिन नहीं था। कुछ गिने-चुने मंदिर थे जिनमें बांके बिहारी याने बिहारी जी के मंदिर की सर्वाधिक मान्यता थी। यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जो उमड़ती थी वह किसी और में नहीं। दूसरा प्रसिद्ध मंदिर था राधावल्लभ जी का जो एक बड़े परकोटे के भीतर था, जिसमें पूजा का अधिकार प्राप्त गोस्वामी परिवार की अनेक शाखाओं के निवास भी थे। रंगजी का मंदिर अपने दक्षिण भारतीय स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध था। यह दरअसल रामानुज संप्रदाय अथवा श्री संप्रदाय का मंदिर था, जिसमें वही बालाजी स्थापित हैं जो तिरुपति में भी विराजते हैं। इस मंदिर का शिल्प तो आकर्षक था ही, परिसर के भीतर बना एक सरोवर इसके आकर्षण में वृद्धि करता था।

एक अन्य मंदिर जो आकर्षण के साथ कौतूहल का भी केन्द्र था वह था शाहजी का मंदिर। यह उस कृष्णप्रणामी संप्रदाय का था जिसका अनुयायी महात्मा गांधी का परिवार था। इस मंदिर में कांच का जड़ाऊ काम किया गया था, जिससे इसकी शोभा बढ़ जाती थी। हम लोग निधिवन भी जाते थे जिसके बारे में प्रचलित था कि राधा और कृष्ण रास यहीं रचाते थे। निधिवन के दरवाजे अंधेरा होने के पहले बंद हो जाते थे। वहां रात रुकने पर पाबंदी थी जो आज भी है। वह शायद इसलिए कि सांसारिक लोग ईश्वरीय लीला देखने के अधिकारी नहीं हो सकते। एक गोविंद जी का मंदिर भी था जो अधूरा बना था और कहा जाता था कि औरंगजेब ने इसको नहीं बनने दिया था। चैतन्य महाप्रभु को मानने वालों ने गौड़ीय मठ की स्थापना कर ली थी तथा रामकृष्ण मिशन ने एक परमार्थ अस्पताल भी स्थापित कर दिया था जिसके डॉक्टर मदन मोहन कपूर के साथ हम लोगों के पारिवारिक संबंध हो गए थे।

वृंदावन में घरों में पानी का मुख्य स्रोत कुंआ होते थे, जिनका पानी अधिकतर खारा हुआ करता था। गर्मी में लू चलती थी तो दिन में कहीं बाहर जाने का सवाल ही नहीं, लेकिन शाम को पैदल ही हम वृंदावन की संकरी गलियों में सैर करने निकल जाते थे। राधावल्लभ जी के मंदिर के आगे शायद गऊघाट था या शायद अन्य कोई घाट जहां सुबह-शाम हम यमुना स्नान के लिए चले जाते थे। खूब स्वच्छ, निर्मल पानी। बस कछुओं से डर लगता था। बड़े-बड़े कछुए कि कहीं पैर में आकर काट न जाए। कभी-कभी देखते ही देखते जल स्तर बढऩे लगता था कि शायद ग्लेशियर से पिघल कर आने वाले पानी की मात्रा बढ़ जाती थी तब हम भाग कर किनारे की तरफ आते थे। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि सूखी रेत पर रखे कपड़े, वहां तक पानी पहुंच जाने के कारण भीग जाते थे और तब भीगे वस्त्रों में ही घर पहुंचना होता था।

यह अतीत राग यूं तो शायद किसी काम का नहीं है, लेकिन जो आज वंृदावन यात्रा पर जा रहे हैं उन्हें तो एक पुराने वृंदावन की झलक मिल ही जाएगी। आज के वृंदावन में चारों तरफ भीड़ है। देश की जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है उसी अनुपात में भक्तों की संख्या भी बढ़ रही हो तो क्या आश्चर्य है। फिर यह भी तो है कि अपने जीवन में जो निराशा बढ़ रही है, आकांक्षाएं बढ़ रही हैं, भौतिक परिलब्धियों की चाहत बढ़ रही है, ऐसे में भगवान के पास न जाएं तो कहां जाएं! पहले बड़ी संख्या में लोग वृंदावन वास करने जाते थे कि प्रभु चरणों में शेष जीवन बीत जाए लेकिन अब इसलिए भी जाते हैं कि भाई भगवान! हम तुम्हारी सेवा कर रहे हैं तुम इसके बदले हमें क्या दे रहे हो। नए समय की रीत के अनुसार इस लीला नगरी में चमक-दमक के नए साधन भी उपस्थित हो गए हैं जो मन की अतृप्ति को शायद और बढ़ा देते हैं।

सबसे पहले नए भक्ति युग के प्रतीक के रूप में यहां इस्कॉन मंदिर बना जिसने विदेशी भक्तों के साथ भारत के सम्पन्न वर्ग के भक्तों को भी खूब लुभाया। बिहारी जी या राधावल्लभ जी की प्रसादी पत्तल या फिर दोनों मंदिरों के आस-पास की कुंज गलियों में मिल रहे ठेठ देशी व्यंजनों से जिनको तृप्ति नहीं मिली उन्हें इस्कॉन के प्रसाद से ही परितृप्ति हुई। अब तो वृंदावन में सबसे बड़े आकर्षण का केन्द्र हो गया है प्रेम मंदिर और फिर ऐसे कुछेक अन्य मंदिर जहां रात को रोशनी की झालरें देखकर भ्रम होता है कि आप कहीं किसी कार्निवाल या मीना बाजार में तो नहीं आ गए हैं। वृंदावन चूंकि दिल्ली से बहुत दूर नहीं है इस नाते लगभग पूरे बृज में ही दिल्ली इत्यादि के चतुर सुजानों ने रीयल एस्टेट में काफी बड़ी मात्रा में निवेश कर रखा है।  अब यहां धर्मशालाएं नहीं, अतिथिगृह हैं और होटलों की भी कोई कमी नहीं हैं।

अगर यमुना एक्सप्रेसवे से यात्रा करें तो नोएडा से वृंदावन पहुंचने में मात्र दो घंटे लगते हैं। गोया वीकेंड मनाने के लिए एक अच्छी जगह मिल गई है। पुराने मंदिरों के गोस्वामियों की वंशवृद्धि हो रही है, तो वे भी धीरे-धीरे कर अपने नए आश्रम और मठ स्थापित करते जा रहे हैं। जिसके भक्त जितने सम्पन्न उसकी गद्दी उतनी ऊंची और उसका आश्रम उतना बड़ा। पहले मथुरा से टांगा करके वंृदावन आना पड़ता था, अब टैक्सियों की भरमार है। वृंदावन में ई-रिक्शा भी चलने लगे हैं और स्थानीय के साथ-साथ बाहर से आने वाली कारों की संख्या भी निरतंर बढ़ रही है इसलिए आवश्यक था कि नगर नियोजन पर ध्यान दिया जाए। अब वृंदावन में परिक्रमापथ अथवा रिंगरोड जैसी कोई चीज बन गई है और सबसे नया आकर्षण तो एक फ्लाई ओवर है।

एक तरफ यमुना तट पर स्थापित मदनमोहन जी के मंदिर के नीचे टीले पर खुदाई का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कर रहा है। खुदाई में निकली पुरानी दीवारें वृंदावन की प्राचीनता की ओर हमें ले जाती हैं और तभी यह फ्लाई ओवर एक झटके से यात्री को वर्तमान में ले आता है।

देशबन्धु में 12 मई 2016 को प्रकाशित