Thursday, 28 July 2016

कश्मीर : पाक की भेड़िया नीति


 "आपने हमें भेडिय़ों के सामने फेंक दिया है।’’

यह प्रसंग भारत विभाजन के समय का है। अविभाजित देश के उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में सीमांत गांधी या बादशाह खान के नाम से समूचे देश में लोकप्रिय खान अब्दुल गफ्फार खान का सिक्का चलता था। उनका प्रदेश पाकिस्तान के साथ शामिल नहीं होना चाहता था। अंतरिम चुनावों में मुस्लिम लीग को इस लगभग शत-प्रतिशत मुस्लिम प्रांत में पराजय का सामना करना पड़ा था। फिर भी यह भूगोल की वास्तविकता थी कि प्रदेश भारत के साथ न रहकर पाकिस्तान के साथ जाता। सीमांत गांधी इससे मर्माहत थे और तब उन्होंने अपने नेता याने महात्मा गांधी से दुखी होकर कहा था कि आपने हमें भेडिय़ों के सामने फेंक दिया है। किन्तु यह एक ऐसी कठोर सच्चाई थी जिसे न गांधी बदल सकते थे और न कांग्रेस का कोई अन्य नेता। भारत की मुख्य भूमि से अलग-थलग प्रदेश कैसे भारत का हिस्सा बनता! आगे चलकर हमने देखा कि बंगलादेश के निर्माण में इस तरह की ही भौगोलिक स्थिति ने किसी हद तक योगदान किया।

आज कश्मीर के संदर्भ में इस प्रसंग को ध्यान रखना उचित होगा। कश्मीर घाटी में स्थानीय निवासियों का एक तबका है, जो कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखना चाहता है। जेकेएलएफ याने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की साठ साल से मांग यही है। वे न पाकिस्तान के साथ जाना चाहते और न भारत में रहने की उनकी इच्छा है। यह तबका मानकर चलता है कि कश्मीर का भविष्य एक स्वतंत्र सार्वभौम राष्ट्र बन जाने में ही है। भारत में भी कुछ जाने-माने हैं जो सोचते हैं कि कश्मीर को आज़ादी मिल जाना चाहिए। इनमें मशहूर लेखिका अरुंधति राय का नाम प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है। ऐसा सोचने वाले कश्मीर की अपनी विशिष्ट सामाजिक बुनावट, सांस्कृतिक परंपराओं और इतिहास का हवाला देते हैं। वे कश्मीरियत को बचाने की बात करते हैं। लेकिन वस्तुस्थिति क्या है इस पर गौर कर लें।

सबसे पहले तो यह समझना होगा कि आज़ादी किस भौगोलिक क्षेत्र के लिए मांगी जा रही है? क्या उसमें घाटी के अलावा जम्मू एवं लद्दाख क्षेत्र का समावेश है? जम्मू में साठ प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है और लद्दाख के दो हिस्सों याने लेह और कारगिल में क्रमश: बौद्ध और शिया पंथियों का बहुमत है। जिस कश्मीरियत की बात होती है क्या वह इस संपूर्ण प्रदेश में समान रूप से मौजूद है जो कि भारत का प्रांत है? यदि नहीं तो क्या सिर्फ कश्मीर घाटी की आज़ादी की बात की जा रही है? अगर सिर्फ घाटी को एक स्वतंत्र देश मान लिया जाए तो अपनी राजनैतिक आजादी और अपनी कश्मीरियत की रक्षा करने की सामर्थ्य घाटी के छोटे से भूभाग में किस सीमा तक है?

फिर यह सवाल भी उठता है कि फिलहाल पाकिस्तान का नियंत्रण जिस उत्तरी इलाके पर है याने शिया बहुल गिलगिट और बाल्टीस्तान आदि क्या वहां भी कश्मीरियत उसी रूप में मौजूद है जैसी कि श्रीनगर की घाटी में? इसी तरह पाकिस्तान ने आजाद कश्मीर के नाम पर जो पाखंड सत्तर साल से जीवित रखा है क्या सचमुच वहां कश्मीरियत जैसी कोई भावना है? क्या वह रावलपिंडी के ईदगिर्द की जो पंजाबियत है कुछ-कुछ उसके समान नहीं है? आज़ा दी मांगने वालों से मेरा यह भी सवाल है कि महाराजा हरिसिंह तो स्वयं स्वतंत्र कश्मीर चाहते थे। वे अविभाजित कश्मीर के राजा थे। जब पाकिस्तान के हुक्मरानों ने उनके रहते हुए कश्मीर को हड़पने के लिए कबाईली दस्ते मुहिम पर भेज दिए तब आज यदि कश्मीर स्वतंत्र हो भी जाए तो उसे बचाने की गारंटी कौन लेगा? पाकिस्तान का पुराना दोस्त अमेरिका या नया दोस्त चीन? इन दोनों देशों की हड़प नीति से हम वाकिफ हैं। पाकिस्तान भी उनके रास्ते पर चले तो इसमें आश्चर्य किसे होगा?

मैं नहीं जानता कि अरुंधति राय जैसे पंडितों ने भारत विभाजन का इतिहास कितना पढ़ा है इसीलिए बादशाह खान का प्रसंग सामने रखना मुझे आवश्यक लगा कि इतिहास से सबक न लेना नादानी ही कहलाएगी। मुझे लगता है कि स्वतंत्र कश्मीर की बात करना एक पवित्र और शायद किसी हद तक आध्यात्मिक भावना हो सकती है; और शायद इसकी पृष्ठभूमि में यूरोप के दृष्टांत काम कर रहे होंगे। यूरोप का इतिहास भारत से बिल्कुल अलग किस्म का है। अभी हाल में ब्रेक्जिट  का उदाहरण इसकी पुष्टि करता है। आज इंग्लैण्ड यूरोपियन यूनियन से अलग हो रहा है, लेकिन स्वयं इंग्लैंड में स्काटलैंड के अलग होने की कशमकश लगातार चल रही है। आयरलैण्ड और उत्तरी आयरलैण्ड धार्मिक कट्टरता के कारण एक-दूसरे से अलग बने हुए हैं। इसके बावजूद याद रखें कि यूरोप के देश अपने इतिहास को भूलकर अपनी एकजुटता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयत्न कर रहे हैं।

बहरहाल, कश्मीर को लेकर एक अन्य सोच भी हमारे यहां चल रही है। बहुत से अध्येता इस बात पर जोर देते हैं कि सरकार को कश्मीर में लोगों के साथ बात करना चाहिए। यह सलाह सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है। मैं भी मानता हूं कि परस्पर संवाद से ही बहुत से मुश्किलों के हल निकलते हैं। लेकिन मैं यह नहीं समझ पाता कि भारत सरकार ने कश्मीर के लोगों के साथ बात करने में कमी कहां की है! हमारी सरकार (चाहे जो पार्टी हो) तो यहां तक मानती है कि कश्मीर मुद्दे के समाधान हेतु पाकिस्तान के साथ बातचीत होना चाहिए और वह भी किसी न किसी रूप में लगातार चल रही है। कश्मीर घाटी में जो बहुत सारे राजनीतिक समूह हैं उनके साथ भी कभी ठंडा कभी गरम इस शैली में वार्तालाप होता रहा है। हुर्रियत कांफ्रेंस के विभिन्न धड़ों के साथ, जेकेएलएफ के नेताओं के साथ बातचीत कभी थमी हो, ऐसा ध्यान नहीं आता। वाजपेयी जी के समय में हुर्रियत के साथ वार्तालाप के अनेक दौर सम्पन्न हुए। डॉ. मनमोहन सिंह ने तीन प्रमुख लोगों की कमेटी बनाई जिसने पूरे एक साल लगातार घाटी के दौरे किए। नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में नवाज शरीफ को आमंत्रित किया। फिर काबुल से लौटते हुए लाहौर उनके घर भी चले गए। इसी शनिवार-रविवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह श्रीनगर गए। ऐसा भी नहीं है कि केन्द्र के प्रतिनिधि किसी एक धड़े से मिलकर आ जाते हों और किसी दूसरे की उपेक्षा करते हों। बीजेपी के पीडीपी के साथ गठजोड़ को राजनीतिक कलाबाजी माना जा सकता है, लेकिन इसमें यह तथ्य भी तो निहित है कि एक अनुदार पार्टी भी वक्त पडऩे पर लचीला रुख अपना सकती है।

मेरी समझ में कश्मीर घाटी की एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापना आकाशकुसुम अर्थात् असंभव कल्पना है। उस कल्पना में चूंकि लद्दाख, जम्मू, गिलगिट का कोई स्थान नहीं है इसलिए वह एकतरफा और पूर्वाग्रहपूर्ण भी है। घाटी में राजनीतिक चर्चा के द्वार हमेशा खुले रहना चाहिए इससे मैं सहमत हूं। इसमें भारत सरकार को और वर्तमान में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को सहजबुद्धि व विवेक से काम लेने की आवश्यकता है। इसका आशय यह है कि हमें पाकिस्तान की सेना और पाकिस्तान की जनता दोनों के बीच जो बहुत बड़ा फर्क है उसे हर समय ध्यान में रखना होगा। भाजपा के नेताओं को पाकिस्तान पर और अल्पसंख्यकों के बारे में अनर्गल बयान देने से बचना इसकी एक बड़ी शर्त है। यह भी ध्यान रखें कि पाक के सैनिक भारत को हर तरह से नीचा दिखाने और चुटकी लेने से बाज नहीं आएंगे। इसलिए हमारी ओर से कोई भी प्रतिक्रिया गुस्से और जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए। तीसरे, पाकिस्तान की शह पर घाटी में जो हिंसक वारदातें होती हैं उनके बारे में सतर्क रहना होगा। कश्मीर में भारतीय सेना का रोल कहां और कितना हो इसकी समीक्षा करना भी आवश्यक है। सीमा पर फौज की तैनाती समझ में आती है, लेकिन नागरिक जनजीवन पर फौज की उपस्थिति का कोई प्रतिकूल असर न पड़े यह भी सुनिश्चित करना परम आवश्यक है।

देशबंधु में 28 जुलाई 2016 को प्रकाशित