Tuesday, 13 December 2016

सेतुबंध


सेतुबंध 

शतरंज की बिसात
धीरे से समेट ली है
व्याकुल मंदोदरी ने और
अशोक-वाटिका में अभी भी
विनत-अशोक की डाल-सी
उदास बैठी हैं भूमिसुता
युद्ध अब किसी भी पल
छिड़ सकता है लेकिन
भावना के तट पर अकेले
संशय में भीगे खड़े हैं अर्जुन

सेनाएं आमने-सामने हैं और
योद्धा हैं उत्सर्ग के लिए तैयार
राम समुद्र पर पुल बनाने का
रास्ता ढूंढ रहे हैं और
कृष्ण अपने शब्दों से
पुल बांध रहे हैं अब
शिविर के किसी एकांत में
आंसू बहा रही हैं सुभद्रा

पुल बन रहा है और
उत्तेजना से चीख रहे सैनिक
खुद के आवेश को सम्हाल नहीं
पा रहे हैं भीम और सुग्रीव
विजय की कल्पना से
थरथरा रहे हैं विभीषण और
धर्मराज प्रस्तुत हो रहे हैं
असत्य संभाषण के लिए

शैशव से अब तक के
संघर्ष याद करते हुए
पूर्णपुरुष कृष्ण लिख रहे हैं
इतिहास के लिए अपनी भूमिका
और समुद्र की लहरों में
मर्यादा का अर्थ
खोज रहे हैं पुरुषोत्तम राम

गंगा की गोद में लौटने की
प्रतीक्षा में रुके हैं
खुद से हारे हुए भीष्म और
धरती की कोख में लौटने के
दिन गिन रही हैं
परीक्षाओं से थकी वैदेही

हस्तिनापुर से लौट आए हैं माधव
और द्वारिका में एकदम अकेले हैं
लंका से लौट आए हैं रघुनाथ
और अयोध्या में एकदम अकेले हैं
विजय के बाद इस अकेलेपन में
न कहीं सुदामा के चावल हैं
न कहीं शबरी के बेर
और न कहीं केवट की नाव

कुरुक्षेत्र में एक अनंत निस्तब्धता है
रामेश्वरम् में एक वीरान पुल
और राम की स्मृति में डूबी
एक बूढ़ी गिलहरी
बार-बार सोचती है
किसके लिए हुआ यह समर
किसके लिए बना यह सेतु
किसकी हुई है विजय
और किसके निमित्त!

अक्षर पर्व दिसम्बर 2016 अंक (युद्ध विरोधी कविता विशेषांक) में पुनर्प्रकाशित एक पुरानी कविता