Wednesday, 12 April 2017

पूर्वोत्तर : कुछ और बातें




 एक समय असम प्रांत और पूर्वोत्तर भारत पर्यायवाची थे। इस प्रदेश में अनेक जनजातियां निवास करती हैं, सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, भाषा, भूषा, धार्मिक विश्वास, सामाजिक परंपराएं, हरेक दूसरे से बिल्कुल अलग। इन जनजातियों की सामाजिक, सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण हो सके, वे स्वायत्त भाव से अपना सामाजिक जीवन जी सकें यह सोचकर इंदिरा गांधी के कार्यकाल में असम का विभाजन कर छह नए प्रांत बनाए गए। इन्हें अब सेवन सिस्टर्स या कि सात बहनों के नाम से जाना जाता है। सिक्किम के भारत में विलय के बाद सात की जगह आठ बहनें हैं। इसके बावजूद उतर-पूर्व के प्रांतों में किसी न किसी कारण से विग्रह बना रहता है। नगालैण्ड के राजनेता एक वृहत्तर नगालिम की स्थापना के लिए लगे हुए हैं। केन्द्र सरकार के साथ कई वर्षों से बातचीत चल रही है और कहते हैं कि कोई गुप्त समझौता भी हो चुका है। मणिपुर में कूकी, मैतेई और नगाओं के बीच हिंसक संघर्ष होते रहते हैं।  मिजोरम में शांति, सद्भाव और प्रगति का माहौल स्थापित हो चुका है, लेकिन असम अभी भी विवादों से मुक्त नहीं है। त्रिपुरा में शांति है, किन्तु मेघालय में जातीय अस्मिताओं का सवाल बीच-बीच में सिर उठाता है। अरुणाचल की चीन के साथ सीमा को लेकर एक अलग तरह की उलझन है। सिक्कम में धार्मिक पुनरुत्थानवादी ताकतें सक्रिय दिखाई देती हैं।

यह सब इसके बावजूद कि कंचनजंघा के हिमशिखर व महानद ब्रह्मपुत्र जैसे प्रकृति के अनमोल उपहारों के चलते यह भूभाग स्वर्ग के समान प्रतीत होता है। पहाड़, नदी, झरने, विशालकाय वृक्ष, सुन्दर और दुर्लभ फूल, हाथकरघा और हस्तशिल्प, लोकनृत्य व लोकसंगीत इत्यादि इस स्वर्ग में रंग भरते हैं। इसे सैलानियों और शोधकर्ताओं के लिए अनुपम आकर्षण का केन्द्र बनाते हैं। मैदानी इलाके में गर्मी का अहसास प्रारंभ हुआ कि नहीं बड़ी संख्या में पर्यटक उत्तर-पूर्व की राह पकड़ लेते हैं। कोई अरुणाचल देखना चाहता है, तो किसी का मन त्रिपुरा देखने का है, किसी का चित्त इस भूभाग की बड़ी-बड़ी झीलों को देखने का है, तो कोई जलप्रपात देखकर आंखों को ठंडा करना चाहता है, किसी को सैकड़ों किस्म के आर्किड फूल लुभाते हैं तो कोई हाथ से बुने रंग-बिरंगे दुशाले और कालीन लेकर घर लौटना चाहता है।

यह सब कुछ देखना सचमुच भला लगता है, लेकिन यह तो ऊपर-ऊपर दिखने वाली लुभावनी तस्वीर है। सैलानी के पास समय भी कहां कि जनजीवन को देखने समझने का यत्न करे। बहुत हुआ तो स्थानीय वेशभूषा में फोटो खिंचवा लिए। पहले इसके लिए कश्मीर जाते थे अब उत्तर-पूर्व जाते हैं। सिलीगुड़ी एक तरह से इन राज्यों के लिए प्रवेश द्वार है। सिलीगुड़ी नगर से लगा न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन एक महत्वूपर्ण रेलवे जंक्शन है। गुवाहाटी से लेकर न्यू जलपाईगुड़ी के काफी आगे तक ट्रेन में फेरीवाले चक्कर लगाते घूमते हैं। समय बदला है तो बिक्री का सामान भी बदल गया है। अब वे घड़ी और फाउंटेन पैन के बजाय पैन ड्राइव, पावर पैक और चार्जर इत्यादि की हांक लगाते हैं। यूं ट्रेन में बहुत सस्ते दाम पर साडिय़ां और चादरें भी मिल जाती हैं। ऐसी अविश्वसनीय कीमत की सामान या तो चोरी का है या तस्करी का। एक तरफ बंगलादेश की सीमा, दूसरी ओर नेपाल की, इसलिए तस्करी का सामान बिकता हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

देश में जिस रफ्तार से आबादी बढ़ रही है वाहनों की संख्या उससे अधिक गति से बढ़ रही है। गुवाहाटी उत्तर-पूर्व का सबसे बड़ा नगर है इसलिए वहां सडक़ों पर भीड़-भाड़ हो, जाम लग जाए तो स्वाभाविक, पर यह स्थिति तो चारों ओर है। गुवाहाटी और राजधानी नगर दिसपुर दोनों मिलकर एक हो गए हैं। यहां प्रगति के प्रतीक फ्लाईओवर भी बन चुके हैं। बाजार में गाडिय़ों के खड़े होने की जगह नहीं मिलती। यह अच्छा है कि गुवाहाटी स्टेशन से लगकर एक मल्टीस्टोरी पार्किंग भवन बन गया है। शिलांग और गंगटोक इन दोनों नगरों में भी भारी भीड़-भाड़ है। सुबह दफ्तर जाने के समय और शाम लौटने के समय जाम में आधा-आधा घंटा फंसना आम बात हो गई है। पर्यटन व्यवसाय के कारण टैक्सियों की अच्छी खासी तादाद है, लेकिन स्थानीय लोगों को अगर कार खरीदने और जाम में फंसने का शौक है, तो उन्हें कौन रोकेगा? गुवाहाटी से शिलांग व सिलीगुड़ी से गंगटोक के रास्ते पर भी आवागमन दिन-रात चलता रहता है।

यूं पर्वतीय प्रदेशों में पानी की कोई कमी नहीं होना चाहिए। इतनी सारी झीलें हैं, जब बर्फ पिघलती है तो पहाड़ी झरनों में पानी प्रवाहित होता ही है। इसके बावजूद अब देश का कोई भी हिल स्टेशन ऐसा नहीं है जहां पानी की किल्लत न होती हो। इसकी एक वजह निश्चित ही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई है। दूसरा बड़ा कारण है जल संरक्षण की पारंपरिक विधियों की ओर दुर्लक्ष्य। शिलांग में नगरपालिका ने जगह-जगह नल लगाए हैं। हमने वहां पानी के लिए लगी कतारें देखीं, प्लास्टिक की बाल्टियों और कनस्तरों में पानी भरकर ले जाते लोगों को देखा। शिलांग में एक अच्छी बात यह थी कि वहां नलकूप या बोरिंग खोदने पर प्रतिबंध है। जलसंकट के बारे में एक और अनुमान हुआ कि अब जो भवन बन रहे हैं, उनमें छतें ढलवां नहीं हंै जिस कारण वर्षा जल बहकर चला जाता है। इसके अलावा पर्यटकों की आवाजाही तथा आधुनिक जीवन शैली के चलते भी पानी की खपत में पहले की अपेक्षा काफी वृद्धि हुई होगी।

मेघालय में तीन प्रमुख जनजातियां हैं- खासी, गारो और जयंतिया। राजधानी शिलांग खासी पहाडिय़ों में है। खासी और गारों दोनों प्रमुखत: ईसाई मत के हैं, जबकि जयंतिया जनजाति ने किसी हद तक हिन्दू रीति-रिवाज अपना लिए हैं। इस प्रदेश में खासी स्टूडेंट यूनियन नामक एक संगठन है। उसकी गतिविधियों के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिल पाई। उधर सिक्किम में बहुसंख्यक आबादी नेपाली मूल के हिन्दुओं की है- पचास प्रतिशत से कुछ अधिक। तीसेक प्रतिशत बौद्ध हैं, शायद दसेक प्रतिशत ईसाई, दोनों प्रदेशों में मुसलमान भी आठ- दस प्रतिशत के आसपास होंगे या शायद कुछ कम। इनमें से कुछ असमिया मूल के हैं और कुछ बंगलादेशी मूल के। यह तथ्य नोट करने लायक है कि मेहनत मजूरी के अनेक काम जैसे ऑटोरिपेयर, पंचर बनाना, राजमिस्त्री आदि इन्हीं के  भरोसे चलते हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार से इन्हीं की तरह जीविका की तलाश में आए हिन्दुओं की भी कमी नहीं हैं।

स्थानीय शासन-प्रशासन में स्वाभाविक रूप से स्थानीय जन ही हैं, किन्तु व्यापार अधिकतर राजस्थान से आए कर्मठ-कुशल व्यापारियों के हाथों में हैं। गंगटोक के एमजी रोड पर एक दवा दुकान के संचालक से भेंट हुई। उन्होंने बताया कि उनके परदादा या उनके भी पिता तकरीबन एक सौ चालीस साल पहले तत्कालीन राजा जिसे चौग्याल कहा जाता था, के समय में यहां आए थे। राजस्थान से दिल्ली होकर सिलीगुड़ी ट्रेन से, आगे का रास्ता बैलगाड़ी या खच्चर गाड़ी से। उस समय आज की जैसी सडक़ें तो थीं नहीं। अनेक दशक पूर्व असम में मारवाड़ी-विरोधी आंदोलन हुआ था, अब वैसी स्थिति नहीं है। असम, सिक्किम, मेघालय सब जगह विभिन्न समाजों के लोग साथ मिलकर रहते हैं, लेकिन इधर-उधर बातचीत से पता चलता है कि भीतर ही भीतर एक अलगाव का भाव बना हुआ है। इधर हिन्दुत्व का जोर बढ़ा है और व्यापारी समाज इसमें तन-मन-धन से सहयोग कर रहा है।

हमारी आठ दिन की भागमभाग वाली यात्रा में कुछ और रोचक बातें हुईं। एक तो शिलांग में युवा लेखक, आलोचक श्यामबाबू शर्मा हमें मिल गए। उनके और उनके परिवार के साथ कुछ अच्छा समय बीता। श्यामबाबू एनसीसी में प्रशासनिक पद पर कार्यरत हैं। बड़ी लगन और जीवट के साथ उन्होंने साहित्य जगत में अपना स्थान बनाया है। फिर सिलीगुड़ी में कवि, लेखक व राजनैतिक कार्यकर्ता देवेन्द्रनाथ शुक्ल से भेंट हुई। वे सत्तर वर्ष की आयु में भी सुबह छह बजे न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर हमें लेने आ गए। उनके घर पर विश्राम कर हम आगे बढ़े। इस तरह यात्रा में दो स्थानों पर घर का माहौल और घर का भोजन मिला। उधर श्यामबाबू ने गुवाहाटी में हमारे लिए टैक्सी तय कर दी थी, इधर सिलीगुड़ी में शुक्लजी ने। गुवाहाटी से ड्रायवर जैनुल आब्दीन हमें शिलांग ले गया था। उसकी ड्राइविंग कमाल की थी। लौटने के लिए हमने उसे ही दुबारा बुलाया। सिलीगुड़ी से गंगटोक तक विमल नामक नेपाली ड्राइवर हमें मिला। वह भी पहाड़ी रास्तों पर चलने में दक्ष था। गंगटोक में कृष्णा नामक ड्राइवर के साथ हमने साइट-सीइंग की और उसको लेकर ही सिलीगुड़ी वापस लौटे।

सबसे मजेदार संयोग यह था कि गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के किनारे स्टीमर से उमानंद मंदिर जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी एक युवक आया- सुरजन जी? हां। सर, मैं निरंजन। अरे, तुम यहां कैसे? मेरी पोस्टिंग पिछले दो साल से यहीं है। निरंजन सेन छत्तीसगढ़ के हैं। रायपुर में जेट एयरवेज में थे, वहां से दिल्ली और अब गुवाहाटी जेट एयरवेज में ही ड्यूटी मैनेजर के पद पर काम कर रहे हैं। सुदूर प्रदेश में अपने गाँव का कोई मिल गया तो थी न यह खुशी की बात!

देशबंधु में 13 अप्रैल 2017 को प्रकाशित