Thursday, 11 May 2017

एक जागा हुआ ग्राहक !



एक फोन आया। आप ललित सुरजन बोल रहे हैं? जी हां। सर, मैं डाबर कंपनी से अमरेन्द्र बोल रहा हूं, आपसे मिलना चाहता हूं। ठीक है, फलाने समय आ जाइए। नियत समय पर अमरेन्द्र आए। आपने कंपनी में हमारे किसी उत्पाद के बारे में शिकायत की थी?  हां, लेकिन आपकी वेबसाइट पर जाकर शिकायत दर्ज की, उसके दो-तीन घंटे बाद ही आपके किसी अधिकारी का फोन आ गया था। उनके साथ बातचीत से मैं संतुष्ट हो गया था। हां सर, लेकिन मेरे पास हेडऑफिस से फोन आया है कि आपसे जाकर मिलूं और आपको जो परेशानी हुई उसके लिए माफी माँगूं। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी, मुझे अब कोई शिकायत नहीं है। आपने एक ग्राहक की शिकायत को गंभीरता से लिया, मेरे लिए इतना ही संतोष का कारण है। बात खत्म हुई। अमरेन्द्र ने डाबर आंवला तेल की एक छोटी शीशी मुझे भेंट की और जिस पुरानी शीशी की कैप ठीक नहीं होने की शिकायत मैंने की थी, वे उसे अपने गुणवत्ता नियंत्रण विभाग को भेजने के लिए वापिस ले गए। बात सचमुच बहुत छोटी थी, लेकिन एक पूरी कहानी बन गयी।

 यह मेरी आदत में शुमार है कि अगर किसी सेवा या उत्पाद में कोई कमी प्रतीत होती है तो अक्सर मैं उसकी शिकायत कर देता हूं और मेरी यह आदत ‘जागो ग्राहक जागो’ का नारा गढ़े जाने के पचास साल पहले से बनी हुई है। मैंने यह गुण, जिसे बहुत लोग दुर्गुण भी मानेंगे, बाबूजी से शायद विरासत में हासिल किया है।  बहुत लोग बातों को आयी-गयी कर देते हैं, कौन समय बर्बाद करें, कौन पचड़े में पड़े, ऐसी भावना अक्सर रहती है। मैं भी कई बार ऐसी बातों को टाल देता हूं, लेकिन कभी-कभी दिमाग पर भूत सवार हो जाता है तो ऐसे किस्से बन जाते हैं। बहुत पहले 1970 में बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर वजन की मशीन में सिक्का डाला, तब शायद पच्चीस पैसे का ही सिक्का लगता था। मशीन खराब थी, वजन का टिकट नहीं निकला। मैंने कंपनी के कलकत्ता ऑफिस चिट्ठी भेजकर शिकायत की तो कुछ दिनों बाद चार-चार आने के दो डाक टिकट जवाब के साथ मिले। एक टिकट हर्जाने का, दूसरा टिकट मेरे द्वारा लगाए गए डाक टिकट का खर्च। आज इस घटना को याद करता हूं तो अपने आप हंसी आ जाती है। 

 इस तरह के एक-दो प्रसंग और घटित हुए। एक बार विल्किंसन शेविंग ब्लेड बनाने वाली मल्होत्रा एण्ड कंपनी को शिकायत भेजी तो उन्होंने पांच ब्लेड का नया पैकेट हर्जाने के रूप में भेज दिया।  एक बार मैंने कुछ गुस्ताखी भी की। 1967 की बात है। ट्रेन यात्रा में कोई परेशानी हुई। मैं दिल्ली में राज्यसभा सदस्य महंत लक्ष्मीनारायण दास जी के 6-साऊथ एवेन्यू निवास पर रुका था। उनके पते से ही रेलवे बोर्ड को शिकायत भेज दी। राज्यसभा सदस्य का पता था, कुछ हड़बड़ी मची होगी। दो अधिकारी जांच करने उनके निवास पर पहुंचे। मैं तब तक रायपुर आ चुका था तो वे यहां तक आए, मुझसे सारी बात समझकर दोषी टीटी पर कार्रवाई की जिसकी बाकायदा सूचना मुझे भेजी गई। 
मेरा अनुभव है कि उन दिनों रेलवे को वैसे भी कोई शिकायत भेजो तो उसके निराकरण के प्रयत्न होते थे। पत्र का जवाब तो निश्चित रूप से मिलता ही था। फिलहाल ऐसा है कि प्रचार तो बहुत है, लेकिन ट्विटर पर शिकायत भेजने के बाद भी उसे दूर करने रेलवे की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जाता। 

एक अन्य प्रसंग याद आ रहा है। यह शायद 1972-73 के आस-पास की बात होगी। बजाज इलेक्ट्रिकल्स में अजीत सेठ नामक सज्जन कार्यकारी निर्देशक नियुक्त हुए थे। वे रायपुर आए और छत्तीसगढ़ के अपने विक्रेताओं के सम्मेलन में उन्होंने एक सुन्दर और व्यवहारिक बात कही। उन्होंने कहा कि अगर ग्राहक शिकायत लेकर आता है तो उससे बिना बहस किए बेचा गया सामान बदल दो। यदि वह कीमत वापस चाहता है, तो वह भी कर दो। ऐसा करने से बहस में समय बर्बाद नहीं होगा, माथा भी गरम नहीं होगा और वही ग्राहक दो दिन बाद अवश्य लौटकर आएगा। उन्होंने कहा कि अगर शिकायत झूठी भी है तो भी बहस मत करो। इस सलाह पर विक्रेताओं ने जब अमल शुरू किया तो उस दौर में बजाज इलेक्ट्रिकल्स की साख व बिक्री दोनों में बढ़ोतरी हुई। मैंने जो डाबर कंपनी का उदाहरण पूर्व में दिया, उसमें मानो इस सलाह का ही पालन हुआ है। हमारे देश में आफ्टर सेल्स सर्विस की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन ये उदाहरण बेहतरीन अपवाद के रूप में सामने आते हैं।  

इन उदाहरणों से यह न समझिए कि मैं कोई झगड़ालू ग्राहक हूं और सिर्फ शिकायत ही करता हूं। इस आदत का दूसरा पहलू है कि अच्छी सेवा मिलने पर मैं प्रशंसा अथवा अनुशंसा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखता और ऐसा करने में मेरे मन को सचमुच संतोष मिलता है। एक उदाहरण सन् 2005 का है जिसका जिक्र मैंने 10 मार्च 2005 तारीख के अपने कॉलम में किया था। हावड़ा-मुंबई मेल की पेन्ट्री कार के वेटर अली असगर खान ने भोजन का समय समाप्त हो जाने के बाद भी मेरे लिए भोजन की व्यवस्था की। मैंने उसकी प्रशंसा में दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक को पत्र भेजा। कुछ दिनों बाद महाप्रबंधक का फोन आया कि हमारी कमियों की शिकायत तो बहुत होती है, लेकिन अच्छा करें तो उसकी तारीफ शायद ही कोई करता है। आपने जिस वेटर की प्रशंसा की है, उसे मैं आगामी रेलवे दिवस पर सम्मानित कर रहा हूं और उसे अपनी ओर से पुरस्कार राशि भी प्रदान कर रहा हूं। मुझे बहुत अच्छा लगा कि रेलवे ने एक छोटी सी नौकरी करने वाले व्यक्ति की कर्मनिष्ठा और सेवा भावना का इस तरह से सम्मान किया।

एक अन्य प्रसंग हवाई यात्रा का है। मैंने इंडियन एयरलाइंस के कूपन खरीद रखे थे। नब्बे दिन की अवधि की मान्यता थी। मैं उसे तीन माह मान कर चल रहा था। जिस दिन आखिरी कूपन दिल्ली में इंडियन एयरलाइंस के चेकिंग काउंटर पर दिया तब नब्बे दिन पर एक दिन ऊपर हो चुका था। मेरे पास टिकट खरीदने के लिए पर्याप्त नकद राशि नहीं थी, सोच में डूबा था कि क्या किया जाए। एक सज्जन आए। मैं ड्यूटी मैनेजर हूं, आपको काफी देर से खड़े देख रहा हूं, क्या परेशानी है? मैंने उन्हें स्थिति बताई, वे मुझे अपने दफ्तर ले गए, कुछ औपचारिकताएं पूरी कीं और मेरा कूपन मान्य हो गया। मैं रायपुर समय पर लौट सका। आने के बाद इंडियन एयरलाईंस के सीएमडी को पत्र लिखकर धन्यवाद दिया। कुछ माह बाद इंडियन एयरलाइंस के एक परिचित सज्जन से बातों-बातों में इस घटना का जिक्र हुआ तो मालूम पड़ा कि मेरा पत्र मिलने के बाद ड्यूटी मैनेजर की तत्काल पदोन्नति हुई, उन्हें स्टेशन मैनेजर बनाकर किसी अच्छे हवाई अड्डे पर भेज दिया गया।

 जेट एयरवेज के रायपुर विमानतल स्थित कार्यालय का भी मेरा ऐसा ही अनुभव है। दसेक साल पहले मैंने टेलीफोन कर सीट आरक्षित करना चाही। उत्तर मिला कि आप हमारे नियमित यात्री नहीं हैं, इसलिए यह सुविधा आपको नहीं दी जा सकती। मैंने आग्रह किया कि मैं सीनियर सिटीजन हूं, इसी नाते सीट आरक्षित कर दीजिए। मेरी बात मान ली गई। उसके बाद मैंने लगातार देखा कि जेट का स्टाफ यात्रियों की सुविधा का हर तरह से ख्याल रखने की कोशिश करता है, फिर वह चाहे विमान का परिचालक दल या क्रू हो, चाहे विमानतल स्टाफ। एक दिलचस्प बात इंडियन एयरलाइंस और जेट एयरवेज दोनों में देखी कि यात्रा के दौरान अगर आपने फीडबैक फार्म मांगा तो विमानकर्मी सशंकित होकर पूछते हैं कि कोई गलती तो नहीं हो गई है जिसकी शिकायत कर रहा हूं। मुझे तब आश्वस्त करना पड़ता है कि शिकायत नहीं प्रशंसा करने के लिए फार्म मांग रहा हूं, तब वे खुश हो जाते हैं। 

इतने सारे प्रसंगों का उल्लेख करते समय मैं अपने आप से पूछ रहा हूं कि यह सब लिखने की क्या आवश्यकता है। इन साधारण सी घटनाओं का क्या महत्व है? मेरा उत्तर है कि हमारी मानसिकता में एक निहायत आवश्यक बदलाव लाने के लिए इन प्रसंगों को उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है। एक तो हमारे यहां हर स्तर पर भेदभाव का माहौल है, जो हमसे बली है, सजोर है उसके सामने हम घुटने टेकते हैं; जो हमसे कमजोर हैं, उसे दबाने की कोशिश करते हैं;  जहां आवाज उठाना चाहिए वहां हम चुप रहते हैं और जहां जरूरत नहीं है वहां शोर मचाते हैं।  इस तेजी से बदलती दुनिया में जिस पूंजीवादी जनतंत्र को हमने अपनाया है उसमें उत्पादन के संबंधों को लेकर हमारा आज भी वही पुराना सामंती नजरिया चला आ रहा है। मेरा कहना है कि समाजवादी समाज की रचना आज के भारत में तो एक दिवास्वप्न है, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में सामाजिक संबंधों का क्या स्वरूप हो, कम से कम इतना तो हम सीख लें।
 
देशबंधु में 11 मई 2017 को प्रकाशित