Thursday, 4 May 2017

नक्सल समस्या कैसे हल हो?


 बस्तर में माओवाद अथवा नक्सलवाद के बारे में अब तक न जाने कितनी बहसें हो चुकी हैं, कितने लेख और टिप्पणियां लिखी जा चुकी हैं, चर्चाओं के कितने ही दौर चल चुके हैं, लेकिन इस समस्या का समाधान कैसे हो, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है। नक्सली जब कभी हिंसा की किसी बड़ी वारदात को अंजाम देते हैं तो स्वाभाविक तौर पर लोगों के मन में गुस्सा आता है, निंदा प्रस्ताव पारित होते हैं, वीर जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए मोमबत्तियां जलाई जाती हैं, नगर बंद और प्रदेश बंद का आह्वान किया जाता है, कठोर से कठोर कार्रवाई करने की मांग होती है, बस्तर को सेना के हवाले करने का सुझाव आता है, तो कभी और कोई सुझाव आ जाता है। लेकिन सरकार, वह भी निर्वाचित और उत्तरदायी सरकार, भावनाओं में बहकर कोई ताबड़तोड़ फैसले नहीं ले सकती। उसे जनभावनाओं का आदर करने के साथ-साथ कठोर वास्तविकताओं के धरातल पर भी स्थितियों का आकलन करना होता है।

बस्तर में लंबे समय से नक्सली वीभत्स हत्याएं कर रहे हैं। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि वे अपनी हिंसापूर्ण योजनाओं को अंजाम देने में कैसे सफल हो जाते हैं। अभी 24 अप्रैल को सुकमा के निकट उन्होंने सशस्त्र बलों पर जो खूनी हमला किया उसमें पच्चीस जवानों को प्राणों की आहुति देना पड़ी। इस वारदात को लेकर विशेषज्ञों की राय में तीन प्रमुख बिन्दु उभरे हैं।  जो लोग सुरक्षातंत्र की बारीकियों को जानते हैं उनका कहना है कि खुफियातंत्र की नाकामी सबसे प्रमुख कारण है। वे आश्चर्य कर रहे हैं कि तीन सौ नक्सली घात लगाने के लिए एक जगह इकट्ठे हुए और सुरक्षाबलों को उसकी भनक तक नहीं लगी। ऐसा कैसे हुआ? जाहिर है कि इंटैलिजेंस का काम राज्य पुलिस के जिम्मे है न कि सीआरपीएफ के। इससे दूसरा बिन्दु उभरता है कि सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के बीच तालमेल का अभाव है, अन्यथा सीआरपीएफ को नक्सली हलचल की सूचना मिल गई होती।

यहां तीसरा बिन्दु स्पष्ट होता है कि नक्सलियों से लडऩे में राज्य पुलिस की क्या भूमिका है। सीआरपीएफ के अधिकारी और जवान खुलकर आरोप लगाते हैं कि उन्हें राज्य पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिलता। सीआरपीएफ की प्रकृति और कार्यशैली एकदम अलग है। उसका चरित्र प्रादेशिक न होकर देशव्यापी है। वे स्थानीय भूगोल, स्थानीय भाषा से परिचित नहीं होते। ऐसे में खुद होकर नक्सलियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई करना उनके लिए तब तक दुष्कर होता है जब तक कि स्थानीय पुलिस बल का साथ न हो। विडंबना यह है कि राज्य सरकार सीआरपीएफ के ऊपर नक्सलियों से लडऩे की जिम्मेदारी डालकर किसी हद तक निश्चिंत हो गई है। यह प्रस्ताव सुकमा कांड के बाद आया कि डीजी नक्सल ऑपरेशन का मुख्यालय रायपुर के बजाय बस्तर में हो। मुझे ध्यान आता है कि मध्यप्रदेश के दिनों में भी नक्सल ऑपरेशन के आईजी का मुख्यालय बस्तर के बजाय राजनांदगांव में रखा गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि पुलिस के उच्चाधिकारी निरापद परिस्थितियों में रहना पसंद करते हैं!

दूसरी ओर राज्य सरकार नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में जिन पुलिस अधिकारियों को तैनात करती है उनका ध्यान मुख्यत: अपने राजनैतिक संरक्षकों से वाहवाही पाने में लगा रहता है। इसके लिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचते हैं। कभी निर्दोष ग्रामीणों को नक्सली बताकर उनका आत्मसमर्पण कराया जाता है, तो कभी नक्सलियों के खिलाफ जुलूस और रैलियां निकाली जाती हैं।  मानो इनके जुलूस देखकर नक्सली डर जाएंगे। यही नहीं, ऐसे अधिकारियों के इंगित पर निर्दोष आदिवासियों को मानसिक यातना और शारीरिक प्रताडऩा देने के प्रकरण भी सामने आए हैं। अगर कोई व्यक्ति या समूह संवैधानिक तंत्र द्वारा नागरिक अधिकारों के हनन के विरुद्ध आवाज उठाए तो उसे भी प्रताडि़त करने में इन्हें संकोच नहीं होता। ये अधिकारी अपने समर्थन में कुछ ऐसी संस्थाएं भी खड़ी कर लेते हैं जिनके सदस्यों के साथ इनके निजी हित जुड़े होते हैं।

एक पत्रकार होने के नाते मैं प्रदेश में नक्सलवाद के बारे में विगत चार दशकों से जानने-समझने की कोशिश करता रहा हूं। एक समय था जब बस्तर हो या सरगुजा, नक्सलवाद जैसा कोई मुद्दा यहां नहीं था। जबकि हमारे लिए सरगुजा मानो किसी अन्य प्रदेश का हिस्सा था और बस्तर कालापानी। रियासती काल में भी बस्तर की दशा कोई बहुत अच्छी नहीं थी। आजादी के बाद स्थितियां बदलने के प्रयत्न हुए थे, लेकिन टिम्बर, टिन, कोरंडम आदि के तस्करों और उनसे जुड़े अन्य निहित स्वार्थों का ही बस्तर पर वर्चस्व बना रहा। जब 85-86 के आसपास नक्सलियों का बस्तर के भीतरी इलाकों में आना शुरु हुआ तब भी वनोपज के तेंदूपत्ता के व्यापारी मित्र खुश होकर बताते थे कि उन्हें काम करने में कोई तकलीफ नहीं होती, क्योंकि दादा लोगों को अर्थात नक्सलियों को उनका हिस्सा दे दिया जाता है। आज तीस साल बाद भी स्थितियां वहीं के वहीं हैं।

1990 में सुदीप बनर्जी बस्तर के कमिश्नर होकर आए। उन्होंने आदिवासियों के शोषण को रोकने की कोशिश की। शराब लॉबी ने उनका तबादला करवा दिया। ललित जोशी भी कमिश्नर रहे। उन्होंने साइकिल से पूरे संभाग की यात्रा की, किन्तु वे भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। बहुत पहले शायद 53-54 में धर्मेन्द्रनाथ बस्तर के कलेक्टर थे। तब संभाग नहीं बना था। आदिवासियों के मौरुसी हक याने मालिक मकबूजा के पेड़ों को काटने की प्रक्रिया में टिम्बर व्यापारी उनका कितना शोषण कर रहे हैं इस पर एक उन्होंने लंबी रिपोर्ट लिखी थी। जब बैलाडीला से लौह अयस्क का उत्खनन प्रारंभ हुआ लगभग उसी समय ब्रह्मदेव शर्मा जिलाधीश बनकर पहुंचे। उन्होंने आदिवासियों का शोषण रोकने के तमाम प्रयत्न किए। बाबा बिहारीदास जो कि टिम्बर व्यापारियों के हाथों कठपुतली था उसे जिले से बाहर किया। लेकिन दो दशक बाद उनके साथ बस्तर में स्वार्थी तत्वों की शह पर जो सुलूक हुआ उसकी सभ्य समाज में कल्पना नहीं की जा सकती थी। एक तरफ ये सारे दृष्टांत हमारे सामने हैं, लेकिन इनको याद करेंगे तो खेल बिगड़ जाएगा, शासक वर्ग में शायद यही भावना है।

कहना होगा कि बस्तर में नक्सलवाद को पनपने का अवसर हमारी सरकारों ने ही दिया है। सलवा जुड़ूम और उसके बाद की बहुत सी बातों के लिए रमन सरकार को दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन उसके पूर्व के सालों में क्या स्थिति थी? अंचल की आश्रम शालाओं में रहकर बहुत से बच्चे पढ़े, उनकी सोच का दायरा बढ़ा, अनेक युवा कम्युनिस्ट पार्टी में भी गए। महेन्द्र कर्मा आदिवासियों के हक में लडऩे वाले एक जुझारू नेता थे लेकिन समय के साथ उनकी संघर्षशीलता समाप्त हो गई। कांग्रेस के युवा नेता अरविंद नेताम को इंदिरा जी ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था। उन्होंने साल वन काटकर पाइन रोपण का विरोध किया, आगे चलकर छठवीं अनुसूची की मांग जैसे तार्किक सवाल उठाए।  लेकिन राजनीति की मृगतृष्णा में वे बार-बार दल बदलते गए और धीरे-धीरे कर हाशिए पर चले गए। आज एक मनीष कुंजाम हैं तो व्यापक दृष्टिकोण लेकर सही बात करते हैं लेकिन नक्सली उनको चुनाव नहीं जीतने देते।

1980 के दशक में अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे और डॉ. रामचन्द्र सिंह देव राज्य योजना मंडल के उपाध्यक्ष। सिंहदेवजी ने शायद उसी समय बस्तर विकास योजना का प्रारूप तैयार किया था। वे आज भी उसके बारे में बात करते हैं, अगर कोई सुनने को तैयार हो तो। डॉ. रमन सिंह को भी बस्तर ही क्या, प्रदेश की वनराशि से बहुत लगाव है। उन्होंने बस्तर और सरगुजा दोनों के लिए विकास प्राधिकरण बनाए हैं, जिसके वे स्वयं अध्यक्ष हैं। वे बस्तर की युवा पीढ़ी को आधुनिक दौर में लाना चाहते हैं। जावंगा से लेकर दिल्ली तक आदिवासी बच्चों के पढऩे के लिए उन्होंने ढेर सारी व्यवस्थाएं की हैं। उनके शासनकाल में कुछेक ऐसे अधिकारी भी आए हैं जिन्होंने ईमानदारी से विकास योजनाओं को मूर्तरूप देने का काम किया है। फिर भी बात बनती नजर नहीं आ रही है। इसके कारणों के समझने की आवश्यकता है।

सर्वप्रथम बस्तर और अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पांचवीं अनुसूची तथा पेसा कानून ईमानदारी के साथ लागू करना लाजमी है। आदिवासियों को स्वशासन का अधिकार संविधान की सीमाओं के अंतर्गत मिलना ही चाहिए। डीजी नक्सल ऑपरेशन का मुख्यालय बस्तर में हो, मैं इस प्रस्ताव का स्वागत करता हूं। साथ ही अपने एक पुराने सुझाव को भी दोहराना चाहूंगा कि बस्तर में चीफ सेक्रेटरी के समकक्ष अधिकारी नियुक्त हो जो सीधा मुख्यमंत्री के प्रति जिम्मेदार हो। नक्सलियों से लडऩे के लिए प्रदेश पुलिस की क्षमता का विकास करना आवश्यक है। इसके साथ ही आदिवासी समाज के बीच यह संदेश भी जाना चाहिए कि प्रदेश की सरकार उनकी हितैषी है। नागर समाज आदिवासियों का जो तिरस्कार और उपहास करता है उसे भी अपनी इस हीन मानसिकता को छोडऩा होगा। आखिरी बात मुख्यमंत्री को अपने द्वार उनके लिए खुले रखना चाहिए जो इस विकट समस्या पर गंभीर चर्चा करने में सक्षम व उसके लिए उत्सुक हों।

 देशबंधु में 04 मई 2017 को प्रकाशित