Wednesday, 13 December 2017

यात्रा वृतांत : पश्चिमी सीमांत की ओर


 पूर्वी दिल्ली में यमुनापार बेटी तिथि के घर से निकलकर रोहतक रोड पर पीरागढ़ी चौक तक पहुंचने में ही एक घंटा लग गया। इसके बाद आधा घंटा बहादुरगढ़ चौक तक पहुंचने में लगा जहां से हमें देश की पश्चिमी सीमा तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलना था। गूगल का नक्शा बता रहा था कि घर से फ़ाज़िल्का पहुंचने में आठ घंटे लगेंगे। हमने सोचा था नाश्ता करके आराम से नौ बजे निकलेंगे और पांच बजे गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। अगर वैसा करते तो दिल्ली पार करने में ही ढाई-तीन घंटे निकल जाते। अजय की सलाह मानकर साढ़े सात बजे निकले तो सड़कों पर यातायात का दबाव अपेक्षाकृत कम था और हम आठ-साढ़े आठ घंटे में सफर तय कर सके। लौटते समय अवश्य मुसीबत हुई। दिल्ली में प्रवेश करते हुए पांच बज चुके थे और कम टै्रफिक वाले एक लंबे रास्ते पर चलकर घर पहुंचने में दो घंटे से अधिक वक्त लग गया। इतनी मैट्रो, इतनी बसें, इतने फ्लाईओवर, फिर भी दिल्ली में यातायात के हाल बेहाल हैं और उसके चलते जो प्रदूषण बढ़ रहा है उससे भी दिल्लीवासी त्रस्त हैं।
बहरहाल हम जा रहे थे फ़ाज़िल्का। इक्यावन साल पहले पहली बार इस सीमांत नगर में आने का मौका मिला था। बुआजी के बेटे अनुपम भैया की बारात में। यह अप्रैल 1966 की बात है। 1965 के भारत-पाक युद्ध को बीते बमुश्किल छह माह ही हुए थे। सारे बाराती नगर से लगभग तेरह किलोमीटर दूर बार्डर तक गए थे। न कांटेदार तार और न कोई दीवार। बस इस पार और उस पार साधारण सी चेकपोस्ट बनी थीं। पाकिस्तानी सिपाहियों ने भी हम लोगों का अभिवादन किया था कि आप हमारे गांव की बेटी लेने आए हैं। इन पांच दशकों में बहुत कुछ बदल गया है। अब जैसे वाघा बार्डर पर शाम की परेड होती है उसी का लघु संस्करण फ़ाज़िल्का बार्डर पर भी देखने मिलता है। दोनों तरफ दर्शक दीर्घा भी बन गई हैं। इसी तरह का एक दृश्य तीन एक साल पहले फिरोजपुर के पास हुसैनीवाला बार्डर पर देखा था। वाघा चूंकि अमृतसर के निकट है इसलिए वहां काफी गहमागहमी रहती है। हुसैनीवाला और फ़ाज़िल्का में हम जैसे भूले-भटके  पर्यटक परेड का नजारा देखने आ जाते हैं।
दिल्ली से फ़ाज़िल्का के कुछ पहले मलौट नगर तक राष्ट्रीय राजमार्ग-9 चलता है। इसे अगर मैं वीवीआईपी राजमार्ग की संज्ञा दूं तो अतिशयोक्ति न होगी। बहादुरगढ़ चौक पार करने के बाद महम पड़ता है। यह आधुनिक हरियाणा के निर्माता बंशीलाल का नगर है। बंशीलाल ही थे जिन्होंने हरियाणा को देश में सबसे पहले पूर्ण विद्युतीकृत राज्य बनाने का काम किया था। यही बंशीलाल थे जो आगे चलकर आपातकाल की ज्यादतियों के लिए अपयश के भागीदार बने थे। महम से आगे बढ़ो तो हिसार आता है। यह भजनलाल का चुनाव क्षेत्र है। ओ.पी. जिंदल और उनके बेटे यहीं से आगे बढ़े हैं। सावित्री देवी जिंदल भारत की सबसे धनी महिला मानी जाती हैं। भजनलाल और जिंदल को पीछे छोड़ते हुए थोड़ी देर बाद हम अग्रोहा से गुजरते हैं जो अग्रवाल समाज के लिए एक तीर्थ का रूप ले चुका है। इसके बाद आता है सिरसा। पाठकों को ध्यान होगा कि गुरमत रामरहीम के कारण यह नगर हाल के दिनों में सुर्खियों में आ चुका है। हरियाणा के एक और पूर्व मुख्यमंत्री जिन्हें देश का उपप्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य मिला, उन चौधरी देवीलाल का गांव चौटाला सिरसा से बहुत दूर नहीं है। ताऊ के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
अभी तक हम हरियाणा में हैं। कुछ किलोमीटर आगे मंडी डबवाली है। यहां बीस वर्ष पूर्व 23 दिसम्बर 1996 को भीषण अग्निकांड में कई लोगों की मौत हो गई थी। इस नगर की खासियत है कि आधा शहर हरियाणा में और आधा पंजाब में पड़ता है। रेलवे स्टेशन शायद पंजाब में है। पंजाब के बुजुर्ग नेता और पांच बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाशसिंह बादल का गांव बादल  तथा विधानसभा क्षेत्र लांबी भी इसी सड़क पर है। इस तरह लगभग तीन सौ किलोमीटर के भीतर हम एक उपप्रधानमंत्री, आधा दर्जन मुख्यमंत्री और लगभग उतने ही सांसदों के गांवों से गुजरते हैं। इन सबने भारत की राजनीति-वाणिज्य, व्यापार और धर्म-आध्यात्म को अपनी-अपनी तरह से प्रभावित किया है। ... तो हुआ न यह वीवीआईपी रोड !
फ़ाज़िल्का की ओर जाते समय बहादुरगढ़ के पास एक बेहतरीन ढाबा मिल गया था। सोचा था कि दोपहर का भोजन आगे चलकर ऐसे ही किसी अच्छी जगह पर कर लेंगे। पंजाब-हरियाणा की सड़कें तो अच्छी हैं ही, वहां रास्ते में ढाबे भी बहुत अच्छे हैं, यह हमने सुन रखा था। लेकिन आश्चर्य की बात कि पूरे रास्ते हमें कहीं भी भोजनालय तो क्या, चाय की दूकान भी ठीक-ठाक नहीं मिली। गनीमत थी कि साथ में रोटी-सब्जी लेकर चले थे। मंडी डबवाली में टैक्सी को पंजाब का रोड टैक्स पटाना था, चौकी पर तैनात कर्मचारी कहीं गया हुआ था; उसके इंतजार में गाड़ी में वहीं बैठे-बैठे हमने टिफिन खोलकर भोजन कर लिया। इस बीच मोबाइल पर एसएमएस आया- पंजाब में आपका स्वागत है। कोई दिक्कत हो तो डिप्टी चीफ मिनिस्टर से फलाने नंबर पर बात कीजिए। मैं फोन लगाने ही वाला था कि आरटीओ का कर्मचारी लौट आया और शिकायत करने की नौबत नहीं आई। 
हरियाणा-पंजाब दोनों में पहले गेहूं बहुत होता था, बाद में बड़े पैमाने पर धान की फसल किसान लेने लगे। रास्ते के दोनों तरफ खेतों में धान कट चुकी थी। अनेक स्थानों पर गन्ने की फसल लहलहाती हुई मिली। दो-तीन जगह शक्कर कारखाने भी नज़र आए। अनेक स्थानों पर नहर से आबपाशी की सुविधा है, लेकिन अधिकतर खेतों में ट्यूबवेल लगे हुए देखे। सड़क के दोनों किनारों पर कांस की ऊंची-ऊंची झाड़ियां यहां से वहां तक देखने मिलीं, और साथ-साथ बबूल और महारुख के पेड़। आम के वृक्ष कहीं-कहीं ही दिखे। रोहतक बहादुरगढ़ के बीच कुछेक अमरूद याने बिही के बगीचे थे और सड़क किनारे अमरूद की ढेरियां बिक्री के लिए लगी हुई थीं। उधर लांबी के आसपास कीनू के उद्यान भी कहीं-कहीं दिखे। कीनू एक तरह का संतरा ही है जो इधर लोकप्रिय होने लगा है। हरियाणा और पंजाब का मैदानी इलाका इस तरह एक अलग ही दृश्यावली प्रस्तुत करता है। दूर-दूर तक फैले खेत, उनके बीच में कीकर याने बबूल के वृक्ष, फसल कट जाए तो मिट्टी का धूसर रंग, लेकिन उसी में जब सरसों फूलने लगे तो एक नई तरह की छटा।
मैं यह सोच-सोच कर परेशान था कि इस रास्ते पर खाना छोड़, चाय तक क्यों नहीं मिल रही है। सिरसा बस्ती में कुछ अच्छे रेस्तरां हैं, ऐसा गूगल पर आ रहा था, लेकिन हम बायपास से गुजर रहे थे और वहां कुछ भी नहीं था। मंडी डबवाली भी खासी बड़ी बस्ती है, लेकिन वहां हमें सिर्फ मोटर पार्ट्स की दूकानें और मोटर गैरेज ही दिखाई दे रहे थे। कुछेक स्थानों पर बड़े-बड़े मैरिज गार्डन और मैरिज पैलेस दिखाई दिए, लेकिन वहां भी चाय मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। हिसार में विश्वविद्यालय है, कृषि और पशुपालन से संबंधित केन्द्र सरकार के संस्थान हैं लेकिन वहां भी बायपास पर कुछ नहीं था। लौटते समय सिरसा के पास एक छोटे से होटल में रुके तो उस होटल के मालिक ने मेरी शंका का समाधान किया। यह सड़क बार्डर तक जाती है। यहां टूरिस्टों का कोई खास आना-जाना नहीं है इसलिए यहां होटल-ढाबे नहीं चलते। बाकी जो स्थानीय लोग हैं वे घंटे-दो घंटे में अपने ठिकाने पहुंच ही जाते हैं। उन्हें रास्ते में रुकने की जरूरत ही नहीं।
हम जब दिल्ली से रवाना हुए थे तो महानगर के पश्चिमी छोर पर एक स्थान पड़ा हिरणकूदनी। श्रीमतीजी ने उस ओर ध्यान  आकृष्ट किया। मन में विचार उठा कि यह नाम इसीलिए पड़ा होगा कि कभी यहां हिरणों का वास रहा होगा! आज भी दिल्ली-गुड़गांव के बीच कहीं-कहीं मोर देखने मिल जाते हैं। इधर हिरण रहते होगें, लेकिन दिल्ली के विस्तार ने सबको लील लिया है।  दिल्ली में जब मेट्रो प्रारंभ हुई, तो पश्चिमी दिशा में मुंडका उसका आखिरी स्टेशन था, वहां दिल्ली मेट्रो कार्पोरेशन का बहुत बड़ा कई एकड़ में फैला यार्ड है; लेकिन अब हरियाणा में बहादुरगढ़ तक मेट्रो बिछ रही है और वहां भी एक बड़ा मेट्रो यार्ड बन रहा है। हिरणों का कूदना अब सिर्फ स्मृतियों में बचा रहेगा। 
देशबंधु में 14 दिसंबर 2017 को प्रकाशित