Thursday, 15 February 2018

मालदीव और भारत


 
अभी एक सप्ताह पहले तक हम आसियान देशों और भारत के साथ उनके संबंधों की बात कर रहे थे। इस बीच सार्क का सदस्य और दक्षिण एशिया में हमारा पड़ोसी मुल्क मालदीव वहां तेजी से बदले राजनैतिक घटनाचक्र के कारण सुर्खियों में आ गया और उसके साथ भारत के संबंधों का विश्लेषण होने लगा। मालदीव हमारे लिए क्या अर्थ रखता है, उसका सामरिक महत्व क्या है, चीन के साथ उसके संबंध कैसे हैं, अतीत में भारत और मालदीव के बीच संबंधों का स्तर क्या था, ऐसे तमाम मुद्दों पर राजनीतिक पंडितों के विद्वतापूर्ण विचार सामने आने लगे। इस बारे में मैं कोई गंभीर बात करूं उसके पूर्व एक छोटा सा संस्मरण पाठकों के साथ साझा करना चाहूंगा। मेरे रायपुर निवासी दिवंगत मित्र हरिकिशन चांडक लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व मालदीव गए। लौटने के बाद मुझे सलाह दी कि मैं भी वहां घूम आऊं। उन्होंने कुछ कारण गिनाए- भारतीयों को वीजा नहीं लगता, विदेश तो है ही, सुंदर बहुत है, कोचीन से आने-जाने का विमान किराया मात्र चौदह सौ रुपए है, और शापिंग के लिए भी सिंगापुर के मुकाबले सस्ता है। अफसोस कि मैं न तब और न उसके बाद मित्र की सलाह पर अमल कर पाया।
इस उल्लेख का आशय यह बतलाना था कि आज से पैंतीस वर्ष पहले का मालदीव कैसा था और यह कि उस वक्त तक भारतीयों के लिए वह एक लगभग अनजाना देश था। अब स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। साउथ एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन याने सार्क के गठन के बाद से मालदीव के साथ हमारे संपर्क तेजी से विकसित होना शुरू हुए। जब चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने तब मालदीव की राजधानी माले में सार्क का शिखर सम्मेलन हुआ था। इन तीन दशकों के दौरान मालदीव ने एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन याने एक महत्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र के रूप में अपना विकास किया। वहां के द्वीपों पर पांच सितारा और सात सितारा होटल बनना शुरू हुए। भारत के ताज ग्रुप का एक रिसोर्ट भी वहां पर है। अनेक द्वीपों को मिलकर बना मालदीव अपनी नैसर्गिक शोभा और हिंद महासागर के बीच समशीतोष्ण जलवायु के कारण पर्यटकों के लिए एक स्वर्गोपम स्थान बन गया और इससे वहां की अर्थव्यवस्था में भी बेहतरी आई।
मालदीव पर लगभग तीन दशक तक राष्ट्रपति मैमून अब्दुल गयूम का एक छत्र राज रहा। देश की आबादी साढ़े चार लाख से भी कम है। सैकड़ों द्वीपों वाला देश इस्लाम का अनुयायी है, जो कि वहां बारहवीं सदी से है। 1965 तक मालदीव एक ब्रिटिश उपनिवेश था। स्वतंत्रता पाने के पहले भी वहां राजनीतिक उथल-पुथल कई स्तरों पर चलती थी। 1968 में मालदीव ने अपने को गणराज्य घोषित किया, लेकिन देश की जो वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक स्थिति है उसका श्रेय मुख्यत: 1978 में राष्ट्रपति बने गयूम को ही जाता है। वे लगातार छह बार राष्ट्रपति चुने गए। पर्यटन का विकास भी उनके कार्यकाल में हुआ। किंतु वे धीरे-धीरे कर एक निरंकुश शासक बनते चले गए। 2008 में मोहम्मद नशीद सत्तारूढ़ हुए, गयूम को पद छोड़ना पड़ा लेकिन यह उनको बर्दाश्त नहीं हुआ। नशीद अधिक समय राष्ट्रपति नहीं रह सके। वे पदच्युत किए गए। जेल भेजे गए। अंतत: ब्रिटेन में उन्हें राजनीतिक शरण मिली। गयूम के बदले उनके सौतेले भाई अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बन गए।
अब्दुल्ला यामीन ने गयूम की बेटी दुनिया गयूम को विदेश मंत्री बनाया। अन्य रिश्तेदारों को भी पद दिए। दूसरी तरफ गयूम के पदचिह्नों पर चलते हुए विपक्षी नेताओं को न सिर्फ जेल भेजा बल्कि उनके चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। उनके निर्णयों को जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया तो दो न्यायाधीश जेल भेज दिए गए और तीन ने अपना ही दिया निर्णय बदल दिया। देश में आंतरिक आपातकाल लागू हो गया है। इसी साल आम चुनाव होना है। यामीन जैसे भी हो, दुबारा राष्ट्रपति बनने की ठाने हुए हैं। जिस सौतेले भाई ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया, वे गयूम भी अब उनके दुश्मन हो गए हैं। कुल मिलाकर मालदीव में फिलहाल गणतंत्र सिर्फ कहने को है। राष्ट्रपति का एकछत्र निरंकुश शासन चल रहा है। सवाल उठता है कि इस मौके पर भारत की क्या भूमिका हो?
अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद इंग्लैंड से आकर श्रीलंका में टिके हुए हैं। उनसे मिलने के लिए मालदीव से बहुत से विपक्षी नेता श्रीलंका इस बीच आए। यहीं यामीन को खतरे की घंटी सुनाई दी। नशीद चाहते हैं कि भारत मालदीव में हस्तक्षेप करें और वहां संवैधानिक गणतंत्र दुबारा स्थापित करने निर्णायक भूमिका निभाए। यह सही है कि यामीन का रुख भारत-विरोधी रहा है और नाशीद ने भारत के साथ मधुर संबंध बनाए रखे लेकिन नशीद की स्वयं लोकतंत्र में कितनी आस्था है इस पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। कुछ प्रेक्षकों का कहना है कि राजीव गांधी ने 1988 में मालदीव में जब गयूम के खिलाफ बगावत हो रही थी तब भारतीय सेना भेजकर वहां बगावत को विफल कर दिया था। इसे दृष्टांत मानकर कदम उठाना  गलत हो सकता है क्योंकि 1988 के सैनिक विद्रोह को लिट्टे के ही एक समूह याने तमिल आतंकियों का समर्थन हासिल था। अर्थात वह मालदीव की संप्रभुता के खिलाफ था। आज की स्थिति तब से बिल्कुल भिन्न है।
यह तर्क भी दिया गया है कि जैसे अमेरिका ने मुनरो डॉक्टरीन के अंतर्गत लैटिन अमेरिका को अपना आंगन बना लिया है वैसे ही भारत को भी दक्षिण एशिया में पूरी तरह से अपना दबदबा कायम करना चाहिए। यह तर्क देने वाले 1988 के अलावा श्रीलंका में भारतीय शांति सेना, दलाई लामा तथा ऊ नू को राजनीतिक शरण, बंगलादेश मुक्ति संग्राम, श्रीलंका के नौसैनिक विद्रोह इत्यादि में भारत की भूमिका को रेखांकित करते हैं। हमारी राय में स्थितियां इतनी सरल नहीं हैं। आज भारत यदि मालदीव में हस्तक्षेप करता है तो उसका अंतिम परिणाम हमारे अनुकूल ही होगा, यह कहना कठिन है। कैसे भूल जाएं कि श्रीलंका में उसके ही आग्रह पर शांति सेना भेजने का कैसा दुष्परिणाम अपने देश को भुगतना पड़ा!

यह सच है कि मालदीव हिन्द महासागर में जहां अवस्थित है उसका भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बहुत महत्व है। वैश्विक राजनीति में हिन्द महासागर के विशाल क्षेत्र में भारत की निर्णायक स्थिति है और होना चाहिए। यह विश्व शांति के लिए भी आवश्यक है। दूसरी तरफ हम यह भी जानते हैं कि चीन बजरिए हिन्द महासागर एक मैरीटाइम सिल्क रूट याने सामुद्रिक व्यापार पथ का विकास करना चाहता है। उसे अपना व्यापार बढ़ाने के लिए एक समुद्रीरास्ते की आवश्यकता है। इसी कारण यह आशंका भी उठती है कि चीन कहीं भारत को इसकी आड़ में घेरने की कोशिश तो नहीं कर रहा है? यह आशंका निर्मूल नहीं है लेकिन यह भी सोचना होगा कि क्या चीन सचमुच इतना शक्तिसंपन्न है कि वह चारों दिशाओं से भारत जैसे विशाल देश को घेर सके और क्या चीन के साथ शक्ति संतुलन बनाने के लिए हम स्वयं अपनी सामरिक क्षमता का विकास नहीं कर रहे हैं? उदाहरण के लिए अगर उसके पास पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है तो हमने इरान के चाबहार में बंदरगाह स्थापित कर लिया है।
ध्यान देने योग्य है कि मालदीव एक इस्लामी देश है। हाल के वर्षों में अमेरिका और सऊदी अरब ने मिलकर इस्लाम में कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया है। मालदीव भी उससे मुक्त नहीं है। आज अगर भारत, मालदीव में सैन्य हस्तक्षेप करे तो यह बात सऊदी अरब व खाड़ी के देशों के अलावा दो अन्य पड़ोसी मुल्कों याने पाकिस्तान और बंगलादेश को नागवार गुजर सकती है। बंगलादेश में बीच में जब गैरलोकतांत्रिक मज़हबी कट्टरता वाली हुकूमत कायम थी तब भारत ने संयम बनाए रखा था। पाकिस्तान में जनतांत्रिक ताकतें सेना और मुल्लाओं के आगे कमजोर हैं तब भी हम संयम से ही काम ले रहे हैं। मालदीव में भी यही संयम बनाए रखना हमारे लिए शायद बेहतर होगा। यह तो वहां की जनता पर निर्भर करता है कि वह निरंकुश सत्ता के विरुद्ध जम्हूरियत कायम करने के लिए लड़े। हमारी भूमिका अपने पड़ोसी मुल्कों में लोकतंत्रवादी ताकतों को नैतिक समर्थन देने तक सीमित रहे, शायद यही श्रेयस्कर होगा।
देशबंधु में 15 फरवरी 2018 को प्रकाशित