Wednesday, 25 April 2018

नोटबंदी का दूसरा दौर

                                                   
मैं जब यह कॉलम लिख रहा हूं तब देश में नकदी का अभूतपूर्व संकट चल रहा है। संभव है कि कॉलम प्रकाशित होने के पहले ही संकट का निवारण हो जाए! सरकार के प्रवक्ताओं ने इसी आशय के आश्वासन दिए हैं। फिर भी यह सवाल तो अपनी जगह पर खड़ा हुआ है कि देश में आखिरकार ऐसी स्थिति क्यों बनी और इसकी जवाबदेही किस पर निर्धारित की जाए? भारतीय जनता पार्टी के प्रखर और निष्ठावान नेता अरुण जेटली विगत चार वर्षों से देश के वित्त मंत्री हैं। उनके बारे में कुछ हफ्ते पहले ही मैंने लिखा था कि वे शायद हमारे सबसे अधिक अलोकप्रिय वित्तमंत्री साबित हुए हैं। अभी पता चला है कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है और उन्हें डायलिसिस की आवश्यकता पड़ी है। वे व्यस्त भी बहुत हैं और प्रधानमंत्री के सर्वाधिक विश्वासपात्र हैं। उन्हें लगातार भारी-भरकम दायित्व संभालना पड़ रहे हैं। यह स्पष्ट है कि वित्त मंत्री पद की महती जिम्मेदारी संभालने के लिए उनके पास पर्याप्त समय नहीं है और न ही शक्ति। उनके ही वरिष्ठ पार्टी नेता जैसे यशवंत सिन्हा और सुब्रह्मण्यम स्वामी वित्तीय मामलों में उनकी समझ पर भी सवाल उठाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री को विचार करना चाहिए कि श्री जेटली की सेवाएं किस रूप में जारी रखी जाएं।
इस संदर्भ में प्रधानमंत्री के सामने कुछ पुराने दृष्टांत मौजूद हैं। मोरारजी देसाई बंबई प्रांत के मुख्यमंत्री पद से हटाकर केन्द्रीय मंत्री बनाए गए थे। यशवंत राव चव्हाण भी केन्द्रीय मंत्री बनने से पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। स्वयं नरेन्द्र मोदी ने मनोहर पार्रिकर को गोवा से दिल्ली बुला लिया था। हमारे कहने का आशय यह है कि आर्थिक मोर्चे पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। सरकार इसे माने या न माने, नोटबंदी के कारण आम जनता को बेहद तकलीफ के दौर से गुजरना पड़ा और उसका प्रभाव आज तक जारी है। इस दौरान ऐसे और भी फैसले लिए गए हैं जिनके कारण सरकार के इरादों पर जनता को शक होने लगा है। एक धारणा बलवती हो रही है कि मोदी जी के शासन में नवपूंजीवादी शक्तियां ही भारत की अर्थव्यवस्था को संचालित कर रही हैं। वर्तमान में जो संकट उत्पन्न हुआ है वह भी इस धारणा को पुष्ट करता है।
8 नवंबर 2016 को जब पूरे देश को सकते में डालते हुए विमुद्रीकरण किया गया था, तब उसके चार फायदे गिनाए गए थे। देखना मुश्किल नहीं है कि इनमें से एक भी फायदा फलीभूत नहीं हुआ। उस समय एक हजार के नोट प्रचलन से बाहर कर दिए गए, लेकिन उसके बदले दो हजार के नोट क्यों लाए गए, यह आज तक किसी की समझ में नहीं आया। उस समय अठारह लाख करोड़ की मुद्रा चलन में थी। वह सारी की सारी वापिस आ गई, लेकिन उसकी गिनती का काम शायद आज तक पूरा नहीं सका है और अभी भी पुराने नोटों के बंडल कहीं न कहीं से बरामद हो रहे हैं। फिर जब पुरानी मुद्रा वापिस आ गई याने ब्लैक मनी पूरी तरह खतम हो गई तो उसके बाद बैंक खातों की पड़ताल, दुनिया भर की पूछताछ, आयकर के छापे, कुल मिलाकर एक डर का वातावरण बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ना चाहिए थी और इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ?

बहरहाल अभी जो संकट उपस्थित हुआ है उसके कारणों की तलाश की जाए। रिजर्व बैंक की  एक पूर्व डिप्टी गर्वनर का बयान आया है कि विमुद्रीकरण के समय अठारह लाख करोड़ की मुद्रा प्रचलन में थी जो आज की परिस्थितियों में बढ़कर तेईस लाख करोड़ हो जाना चाहिए थी। मतलब यह कि देश में जितनी नकदी चाहिए उसमें पांच लाख करोड़  या लगभग पच्चीस प्रतिशत राशि कम उपलब्ध है। संकट का यह एक कारण हो सकता है। एक अन्य तकनीकी कारण सामने आया है कि रिजर्व बैंक ने दो सौ रुपए के नए नोट तो जारी कर दिए लेकिन अधिकतर एटीएम में इन नए नोटों को भरने और निकालने का प्रबंध नहीं किया गया। बैंक  अधिकारियों के एक संगठन के एक प्रवक्ता ने तो एक सनसनीखेज बात की है। उनका कहना है कि रिजर्व बैंक से या करेंसी चैस्ट से एटीएम में पैसा भरने का ठेका निजी कंपनियों को दिया गया है। वे सप्ताह में एक निर्धारित दिन रकम उठाते हैं और बिना किसी नियंत्रण के अपनी मनमर्जी से एटीएम में पैसा भरते हैं। 
हमें इनके अलावा एक बड़ा कारण समझ में आ रहा है। देश की जनता का विश्वास अपनी बैंकिंग व्यवस्था पर से उठता जा रहा है। एक तो बैंक घोटालों की खबरें जो सामने आई हैं उनसे जनता विचलित हो गई है। मोदी-माल्या की तो बात ही क्या, हर दिन अखबारों में बैंकों द्वारा ऋण वसूली के नोटिस छपते हैं। आम आदमी को लगता है कि उसकी गाढ़ी कमाई सरकार और बैंकों की मिलीभगत से लुटेरों के पास जा रही है। दूसरे, बैंकों ने कई-कई तरह के सेवाशुल्क आरोपित कर दिए हैं। जिन सेवाओं के लिए पहले कभी अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ता था वह ग्राहक के खाते से अपने आप काट लिया जाता है। बैंक को अपनी आमदनी दिए गए ऋण के ब्याज से करना चाहिए। यह सामान्य सोच है कि हमारी जमा रकम पर तो ब्याज मिलना चाहिए। अब ठीक उसका उल्टा हो रहा है।
यह बड़ी वजह है जिसके चलते अब आम आदमी बैंक में रकम जमा रखने से डरने लगा है। एक और कारण यह भी है कि मोदी सरकार चाहे जितनी कोशिश कर ले व्यापारिक लेन-देन पूरी तरह से मुद्राविहीन नहीं हो सकता। नोटबंदी के बाद सारी रकम वापिस आ जाने के बाद आज उससे कुछ ज्यादा राशि प्रचलन में आ चुकी है तो यह किस तथ्य का सूचक है? यही न कि व्यापारी वर्ग का नकदी लेन-देन बदस्तूर जारी है। ऐसा नहीं कि यह सारा लेन-देन दो नंबर का है। नकदी लेन-देन का एक व्यवहारिक पक्ष भी है। और अगर कोई समझता हो कि गांव से लेकर दिल्ली तक रिश्वत लेना बंद हो गया है तो वह शेखचिल्ली का सपना देख रहा है। औसत आमदनी वाले लोगों को भी नकदी लेन-देन में सुविधा प्रतीत होती है तथा गृहणियों को भी, इसीलिए मुद्राहीन कारोबार का जो समां बांधा गया था तथा छोटे-छोटे गांव से सब्जी के ठेले तक जो पीओएस मशीनें लगाई गई थीं वे एक-एक कर बंद हो रही हैं।
बैंकिंग व्यवस्था के जानकार यह भी बता रहे हैं कि मुद्रारहित लेन-देन के लिए इतने अधिक विकल्प दे दिए गए हैं कि जनता उन्हें देखकर भ्रम में पड़ गई है। प्रधानमंत्री जी का प्रिय पेटीएम तो है ही, इसके अलावा और दर्जन भर ऐप बाजार में आ गए हैं। किसे अपनाएं, किसे छोड़ दें, कुछ समझ नहीं आता। हर जगह पर हर ऐप स्वीकार भी नहीं होता। ऐसे में लेन-देन नकदी में ही करने की व्यवस्था हो जाती है। एटीएम से पैसा निकालने में सुविधा अवश्य है, लेकिन उसमें ठगी की वारदातें लगातार बढ़ रही हैं। लूटमार भी साथ-साथ होने लगी है। इतना ही नहीं, यदि तकनीकी खराबी के कारण कोई दिक्कत पेश आए तो उसका समाधान लगभग असंभव हो जाता है। बैंक कर्मचारी वैसे ही काम के बोझ से इतने दबे हुए हैं कि ग्राहकों की छोटी-मोटी शिकायत पर ध्यान देने का उन्हें समय ही नहीं मिलता।
सबसे अहम बात तो यह है कि संकट एक दिन में तो पैदा हुआ नहीं है। स्थिति धीरे-धीरे कर बिगड़ रही थी, लेकिन वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ने समय रहते उस पर ध्यान नहीं दिया। पांच सौ के नोट मंगलवार सत्रह अप्रैल से जो छपना शुरू हुए वह काम पन्द्रह दिन पहले भी हो सकता था। मैंने सुना है कि दो हजार के नोटों की छपाई बंद कर दी गई है। इसका क्या औचित्य था? सरकारी प्रवक्ता  बहाने तो बहुत से बना रहे हैं लेकिन उनमें से एक भी विश्वास करने योग्य नहीं हैं। जो स्थिति इन्हीं दिनों पिछले साल पैदा नहीं हुई यह इस साल क्यों? सबसे पते की बात तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की। उन्हें इसमें विरोधियों की साजिश नज़र आई। गनीमत है कि उन्होंने संघ की रीति-नीति के अनुरूप जवाहरलाल नेहरू को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया।

 देशबंधु में 26 अप्रैल 2018 को प्रकाशित