Thursday, 12 July 2018

विधानसभा चुनाव 2018 : 1


                                              
क्या लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे? या सिर्फ चार राज्यों के आसन्न विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव होंगे? क्या एनडीए के घटक दल और स्वयं बीजेपी समय पूर्व चुनाव के लिए तैयार हैं? यदि नहीं तो चार राज्यों की स्थिति क्या बनेगी? क्या इन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा? क्या इसकी कोई वैधानिक गुंजाइश है? क्या भाजपा शासित तीन राज्यों के मुख्यमंत्री विधानसभा भंग करने की सिफारिश की स्थिति में हैं? ऐसे तमाम सवाल आम जनता और राजनैतिक हल्कों में गूंज रहे हैं। चुनाव आयोग बार-बार कह रहा है कि एक साथ चुनाव करवाने के लिए वह सक्षम है। आयोग का रोल बाद में आएगा, पहले तो इस प्रस्ताव के कानूनी पहलुओं को समझना और उनसे उठी आपत्तियों का निराकरण करने की आवश्यकता होगी। मैंने उत्तरप्रदेश चुनाव के पूर्व लिखा था कि अगर अभी भाजपा शासित राज्यों की सरकारें भंग कर उत्तरप्रदेश के साथ-साथ लोक सभा के भी मध्यावधि चुनाव हो जाएं तो नरेन्द्र मोदी की इच्छा संपूर्ण रूप से न सही, आंशिक रूप से पूरी हो ही जाएगी; लेकिन श्री मोदी उस वक्त जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं थे!
मेरा अनुमान है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनके पार्टी अध्यक्ष अमित शाह आज भी जोखिम उठाने तैयार नहीं हैं। वे जिस तरह से लगातार राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के दौरे कर रहे हैं उसे देखकर मेरे लिए कोई दूसरा अनुमान लगाना कठिन है। आने वाले दिनों में इनके दौरों की रफ्तार और तेज हो सकती है। विगत चार वर्षों में हर विधानसभा चुनाव के समय हमने यही देखा है। मोदी-शाह की जोड़ी अपनी विजय के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती। यदि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ नहीं होते तो उसके पीछे बड़ा कारण यही होगा। आज चार राज्यों में तूफानी दौरे कर भाजपा नेतृत्व अपनी सामर्थ्य सिद्ध करने की स्थिति में आ सकता है, लेकिन यदि लोकसभा के समय पूर्व चुनाव साथ-साथ हुए तो श्री मोदी और श्री शाह कहां-कहां दौड़ते फिरेंगे? भाजपा शासित इन तीन राज्यों के अलावा उन्हें अन्य प्रदेशों में भी समय देना पड़ेगा और तब इन राज्यों का गणित बिगड़ने का खतरा बना रहेगा। इस आधार पर कहा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव भी मार्च-अप्रैल 2019 में निर्धारित समय पर ही होंगे।
यदि सारी बातें यथावत रहीं तो राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में क्या होगा? तीन बड़े राज्यों में भाजपा की सरकार है और वहां से जो संकेत मिल रहे हैं उनसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन है। मोटे तौर पर यह सुनने मिल रहा है कि वसुंधरा राजे की सरकार खासी अलोकप्रिय हो चुकी है। भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत करवाने में राजे को अवश्य सफलता मिली और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की एक न चली।  इसके बावजूद भाजपा इस पश्चिम प्रदेश में हार की कगार पर खड़ी दिखाई दे रही है। सचिन पायलट के रूप में कांग्रेस को बेहतरीन युवा नेता मिला है जिसकी संघर्षशीलता, स्वच्छ छवि और व्यवहारिक राजनीति के साथ-साथ सैद्धांतिक सूझ-बूझ का भी भरपूर परिचय विगत समय में देखने मिला है। अशोक गहलोत को केन्द्रीय महासचिव बनाकर प्रदेश में शक्ति संकलन भी साधा गया है। लेकिन हां, अभी प्रधानमंत्री की ताजा राजस्थान यात्रा के समय कांग्रेस के सोशल मीडिया सेल ने जो पुराना वीडियो ताजा बताकर जारी किया है ऐसी मूर्खता और लापरवाहियों से पार्टी को बचने की जरूरत है।
मध्यप्रदेश में कांग्रेस को कोई युवा नेता नहीं मिल रहा है इसलिए कमलनाथ को लाया गया है। कुछ वैसे ही जैसे कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब की बागडोर सौंप दी गई।  कैप्टन के सामने प्रतापसिंह बाजवा के अलावा और किसी की चुनौती नहीं थी लेकिन यहां कमलनाथ को बहुत से समीकरण साधना पड़ रहे हैं। वे छिदवाड़ा में अत्यन्त लोकप्रिय हैं और प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी उनके समर्थक हैं। लेकिन हमें लगता है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस को कमलनाथ की चुनावी रणनीति से अधिक शिवराज सरकार की गलतियों के कारण ही सफलता मिल पाएगी। इसमें शक नहीं कि शिवराज सिंह की आत्मुग्धता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर कमलनाथ जमीनी होने के बजाय वणिक वृत्ति के धनी हैं इसलिए  वे आम जनता के बीच कितनी पैठ बना पाएंगे यह देखना होगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया की एक युवा नेता की छवि बनाने के अनेक प्रयत्न इस बीच हुए हैं, लेकिन उनमें सचिन पायलट जैसी सहजता नहीं है।  कहने का आशय यह कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस को यदि जीतना है तो उसे बहुत परिश्रम करना पड़ेगा; नेतृत्व को चाटुकारों से दूर रहना होगा; पार्टी के पुराने शुभचिंतकों के साथ संबंध मजबूत करना होंगे और इन सबके अलावा शिवराज सरकार की गलतियों को तथ्यों और तर्कों के साथ जनता के बीच में ले जाना पड़ेगा। यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिए कि हम तो जीत ही रहे हैं।
अब बात आती है छत्तीसगढ़ की। मैं स्वयं चूंकि यहीं रहता हूं और विभिन्न पार्टियों के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं से जब-तब चुनावी चर्चा होती रहती है इस आधार पर मैं कुछ कयास लगा सकता हूं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस बेहद संघर्ष कर रही है। फिर भी तीन राज्यों में कांग्रेस की स्थिति छत्तीसगढ़ में अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है। यह सवाल बार-बार उठता है कि राजस्थान में सचिन पायलट, मध्यप्रदेश में कमलनाथ, लेकिन छत्तीसगढ़ में कौन? भूपेश बघेल यद्यपि अपने पूर्ववर्ती अध्यक्षों की तुलना में अधिक सक्रिय साबित हुए हैं तथापि अगले मुख्यमंत्री के तौर पर उनके नाम को स्वीकार करने में कांग्रेसजन ही क्यों हिचकिचाते हैं? यह एक अटपटा सा प्रश्न है। बीच में एक ऐसा प्रसंग भी आया था जब कोई आधा दर्जन नेताओं ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी ठोक दी थी। उस समय राहुल गांधी ने उन सबको बुलाकर कठोर शब्दों में चेतावनी दी थी यह बात कांग्रेसी ही कहते घूम रहे थे। कांग्रेस के पक्ष में एक अच्छी बात यह हुई है कि वर्तमान प्रदेश  प्रभारी महासचिव पी.एल. पुनिया अपने पूर्ववर्ती प्रभारियों से कहीं अधिक सक्रिय और सजग हैं। वे प्रदेश कांग्रेस के सभी नेताओं को एक साथ लेकर चल रहे हैं। फिर भी कांग्रेसजनों में चुनाव जीतने के लिए जो सामूहिक उत्तेजना होना चाहिए थी वह अभी तक दिखाई नहीं दी है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बारे में एक रोचक तथ्य यह है कि दिग्विजय सिंह यहां के सब नेताओं के नेता हैं। टी.एस. सिंहदेव, रवीन्द्र चौबे, चरणदास महंत, धनेन्द्र साहू, सत्यनारायण शर्मा सब उनके अनुगत हैं। दिग्विजय सिंह केन्द्र में और अपने गृहराज्य याने मध्यप्रदेश में फिलहाल क्या भूमिका निभा रहे हैं, इस बारे में बहुत कुछ नहीं पता किन्तु उनका जादू यहां तारी है इसमें हमें शक नहीं है। कहने को ये सब बड़े-बड़े नेता हैं, लेकिन इनमें से कुछ थक चुके हैं, कुछ के क्रियाकलाप आम जनता की समझ में नहीं आते और कुछ ऐसे हैं जो मतदाताओं का विश्वास खो चुके हैं। इतने सारे नाम लेते समय यह विचार भी उठता है कि प्रदेश से इकलौते लोकसभा सदस्य ताम्रध्वज साहू क्या कर रहे हैं। उन्हें पार्टी ने अपने राष्ट्रीय ओबीसी प्रकोष्ठ का अध्यक्ष बनाया है। संभव है कि वे वहां अधिक व्यस्त हों!
जब निठल्लों के बीच राजनीति पर बात होती है तो एक सुझाव यह दिया जाता है कि टी.एस. सिंहदेव को प्रदेश अध्यक्ष और भूपेश बघेल को नेता प्रतिपक्ष बना दिया जाए। लेकिन अब इसकी गुंजाइश खत्म हो चुकी है क्योंकि इस विधानसभा का आखिरी सत्र भी सम्पन्न हो चुका है। वैसे श्री सिंहदेव और श्री बघेल जोड़ी बनाकर काम करते रहे हैं इसलिए इस सुझाव में कोई दम नहीं था; सिवाय इसके कि टी.एस. सिंहदेव आयु में बड़े होने के बावजूद बराबरी से भागदौड़ करते आ रहे हैं और उनकी विनम्रता उन्हें लोगों से जल्दी जोड़ देती है। जो भी हो, हमारा मत यह है कि प्रदेश कांग्रेस कुल मिलाकर भाजपा के खिलाफ ऊपरी-ऊपरी लड़ाइयां लड़ रही है और इसमें व्यक्तिगत दोषारोपण शालीनता की सीमाएं पार कर चुका है। प्रदेश कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भाजपा सरकार के साथ भी अपना तालमेल खूब बैठा रखा है। मजे की बात यह है कि छत्तीसगढ़ की आम जनता चौथी बार भाजपा की सरकार नहीं देखना चाहती, लेकिन डॉ. रमनसिंह के ऊपर उसका विश्वास अभी भी बना हुआ है। उनकी इस लोकप्रियता की काट निकालना कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है
 देशबंधु में 12 जुलाई 2018 को प्रकाशित