Sunday, 19 August 2012

समृध्दि (?) की कीमत





1991
 में सक्रिय राजनीति को अलविदा कह चुके पी वी नरसिम्हाराव संयोगवश प्रधानमंत्री बने और उनके पद सम्हालने के साथ ही देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ। कहना न होगा कि वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उस अवधि में वित्तमंत्री के रूप में अपने नेता का साथ खूब निभाया। यह एक विचित्र सच्चाई है कि जो डॉ. सिंह श्री राव के इतने विश्वस्त थे, उन्हीं को सोनिया गाँधी ने 2004 में प्रधानमंत्री बनाया। इसी से डॉ. सिंह के दबदबे का अनुमान लगाया जा सकता है।  उनकी अपनी तो कोई राजनीतिक धरोहर न तब थी, न अब है तो फिर क्या कारण था कि उन्हें इतना महत्व देकर सत्ता के शीर्ष पर बैठाया गया! क्या इसलिए कि देश की आर्थिक और राजनैतिक जरूरतों के बीच उनसे उम्दा समन्वय कोई और नहीं कर सकता था? क्या इसलिए कि देशहित में आवश्यक कठोर आर्थिक नीतियां लागू करने में वही एकमात्र व्यक्ति थे, जिसे अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने की कोई चिंता नहीं थी? क्या इसलिए कि बदलती हुई दुनिया के नए आर्थिक समीकरणों को उनसे बेहतर कोई और नहीं जानता था?

जो भी हो, इतना तो स्पष्ट है कि 1991 में जो आर्थिक नीतियां लागू की गईं, वे ही कमोबेश आज तक चली आ रही हैं। अल्पकालिक प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के समय देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आई थी, उस स्थिति से उबारने का श्रेय मनमोहन सिंह को ही दिया जाता है। हमें उनकी नीतियाँ न तो राव सरकार के दौरान पसंद आयीं थी, और न आज ही जंचती है, लेकिन इसे क्या कहियेगा कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार भी उन्हीं नीतियों पर चलती रही। इसका सीधा मतलब है कि देश की आर्थिक-वाणियिक-वित्तीय नीतियों से प्रत्यक्ष सरोकार रखने वाले समुदाय का बहुमत इन बीस सालों के दौरान उनका लगातार समर्थन करते रहा है। हमें भले ही जीडीपी में बढ़त से कोई फर्क न पड़ता हो, लेकिन एक वर्ग तो है, जिसके लिए ऐसे आंकड़े मायने रखते हैं। शेयर मार्केट से उद्योगपति और निवेशक तो प्रभावित होते ही हैं, दफ्तरों के बाबू भी अपने आधे समय का उपयोग कंप्यूटर पर शेयर मार्केट का उतार-चढ़ाव देखने में ही बिताते हैं। इसी तरह अन्य  वर्ग भी हैं जिन्हें नई आर्थिक नीतियां मुफीद आ रही हैं।

आज जब सीएजी द्वारा एक के बाद एक रिपोर्ट में सरकारी कामकाज में कथित भ्रष्टाचार का खुलासा किया जा रहा है, तब यह याद कर लेना उचित होगा कि इन नीतियों से किसे लाभ पहुंचा है। अगर ये नीतियां न होतीं तो न तो जीडीपी बढ़ती, न शेयर मार्केट और उद्योगों में पूंजी निवेश होता, न छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो पातीं, न फोरलेन-सिक्सलेन राजमार्ग बनते, न दिल्ली का टी-3 विमानतल बनता, न माल खुलते, न बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाइल फोन होता, न वे अन्य सारी सुख-सुविधाएँ जुड़तीं जिनके लिए भारत का मध्यवर्ग तरसता था। जब अर्थनीति और उसके साथ-साथ सामाजिक परिदृश्य में इतना क्रांतिकारी परिवर्तन आना था तो उसके साथ बहुत सी विसंगतियाँ भी आनी ही थीं। अभी यादा वक्त नहीं गुजरा है, 2010 तक तो देश का मध्यवर्ग मनमोहन सिंह पर मुग्ध था। 

यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के ऐसे संगीन आरोप तो पिछले डेढ़-दो साल के दौरान ही लगे हैं। ऐसा कैसे हुआ कि जो डॉ. सिंह इतने लम्बे समय तक सदाचार की प्रतिमूर्ति माने जाते थे, अब उन पर ही व्यक्तिगत आरोप लग रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग हो रही है? हमें एक कारण तो यह प्रतीत होता है कि भाजपा सत्ता में लौटने के लिए बेसब्र है। गुजरात जीतना उसके अजेंडे में सर्वोपरि है, उसे आधार बनाकर वह अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी करना चाहती है। दूसरे, विदेशी निवेश के चलते मीडिया न सिर्फ आत्मसंयम खो चुका है, वह विदेशी निवेशकों के इशारों पर भी चल रहा है। वह एक साथ फरियादी, वकील, पुलिस और जज- ये सारी भूमिकाएं निभाने लगा है। तीसरे, उद्योग जगत को जनतांत्रिक राजनीति पसंद नहीं आती। यदि खुदा-न-खास्ता कांग्रेस में नयी पीढ़ी आगे आ गयी तो वैश्विक पूंजीवाद को तकलीफ होगी। ठीक वैसे ही जैसे कि उसे अपरिपक्व राजीव गाँधी स्वीकार्य थे, लेकिन सही सबक सीख कर वापस लौट रहे राजीव नहीं। 

दुनिया का ऐसा कोई भी समाज नहीं है जो भ्रष्टाचार को मान्यता देता हो, लेकिन ऐसा कोई शासन भी नहीं है, न था जो पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्त रहा हो। यह हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन की अनिवार्य किन्तु अवांछित विवशता है। केंद्र सरकार पर जब आरोप लग रहे हैं तो यह भी देख लेना उचित होगा कि कोई भी प्रदेश सरकार आज आरोपमुक्त नहीं है, यद्यपि कुछेक मुख्यमंत्री सत्यवादी हो सकते हैं! हमने लगभग बीस वर्ष पूर्व जिस उपभोक्ता-केन्द्रित, बाजार-नियंत्रित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अंगीकार किया था, उसके परिणामस्वरुप आज की विषम स्थिति बननी ही थी। यूपीए में कौन कितना पाक-साफ है, हम नहीं जानते, लेकिन विपक्ष की चादर भी उजली नहीं है। जब तक हम समाजवादी अर्थव्यवस्था की ओर नहीं लौटते, यह मांर ऐसा ही बना रहेगा। फिर भले दिल्ली की कुर्सी पर चाहे यूपीए का कब्जा हो या एनडीए का। इसलिए पाठकों से हमारा अनुरोध है कि इस बारे में नेताओं के जो भी बयान आ रहे हों, उन्हें ब्रह्मवाक्य मानने की गलती न करें। 

देशबंधु में 20 अगस्त 2012 को प्रकाशित