Tuesday, 21 August 2012

शीशे का मसीहा



भारत की जनता, खासकर मध्यवर्ग, को हर वक्त एक न एक मसीहा की तलाश रहती है। आगे चलकर फिर वह शीशे की मूरत क्यों न हो। ख्याल आता है किसी शायर ने 'शीशे का मसीहा' इस शीर्षक से एक रचना भी की  थी। पिछले तीस-चालीस साल में हमने ऐसे बहुत से मसीहाओं को देखा है। वे रंगमंच पर आते हैं, कुछ समय तक अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित और मुग्ध करते हैं और फिर या तो नेपथ्य में खो जाते हैं अथवा अपना रोल ही बदल डालते हैं।

टी.एन. शेषन एक ऐसे ही मसीहा थे। जनता ने उन्हें खूब सिर-आंखों पर बैठाया। ऐसा लगा कि वे अकेले ही चुनाव सुधारों के माध्यम से देश की राजनीति में आ रही गंदगी को एक सिरे से साफ कर देंगे, लेकिन फिर क्या हुआ? जिस कांग्रेस के वे इतने कृपापात्र थे उसे छोड़कर वे शिवसेना की शरण में चले गए और फिर उसी गंदी (?) राजनीति  में अपने लिए बसेरा ढूंढ़ने लगे। उस दौर में उनके कुछ लघु अवतार भी जनता के देखने में आए। वे शेषन की तरह अपनी विराट उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाए।

पिछले साल देश ने दो मसीहाओं को एक साथ देखा। एक ने अपने इर्द-गिर्द श्रीराम पंचायतन जैसा तामझाम खड़ा कर लिया और दूसरे लगभग अकेले ही गरजते रहे। हमने इन दोनों की होड़ भी देखी और एक दूसरे का साथ देने की कसमें भी सुनी। इनमें से एक मुम्बई जाकर जो फिसले तो फिर फिसलते ही चले गए, अब वे राजनीतिक पार्टी बनाने की बात कर रहे हैं। पाठक जान गए होंगे हमारा आशय अन्ना हजारे से है। उनकी पंचायत के सदस्यों में कौन कहां है , कुछ ठीक पता नहीं चल रहा है, लेकिन सवाल अपनी जगह पर है कि राजनीतिक दल बनाना था तो पहले ही क्यों नहीं बना लिया!

दूसरे याने बाबा रामदेव रामलीला मैदान से स्त्रीवेश धारणकर जो भागे तो काफी समय बाद लौटकर मंच पर आए। वे अब भी पहले की ही तरह गरज रहे हैं और जांच एजेंसियों द्वारा जारी नोटिस को राजनीति प्रेरित बता रहे हैं। उनसे पूछने को जी करता है कि सरकार के विरूध्द आंदोलन खड़ा करना क्या अपने आप में राजनीतिक कदम नहीं है और फिर सरकार आपको  नोटिस पर नोटिस भेजे, यह नौबत ही आपने क्यों आने दी। बाबा से यह भी पूछा जाना चाहिए कि अपने साथी बालकृष्ण को उन्होंने कैसे गांधी, भगत और सुभाष की पंक्ति में खड़ा कर दिया। इस आखिरी प्रश्न का जवाब चाहें तो उनके नए-नए सहयोगी वेदप्रताप वैदिक या देविन्दर शर्मा ही दे दें।

पिछले साल जनरल वी.के. सिंह ने भी मसीहा बनने की कोशिश की। वे सरकार में एक अहम और संवेदनशील ओहदे पर रहते हुए उसी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए। वहां से हार जाने के बाद भी उनकी हिम्मत कम नहीं हुई है। वे कभी राजपूत सभा में जाकर अपना अभिनंदन करवाते हैं, तो कभी अन्ना हजारे, तो कभी बाबा रामदेव के मंच पर पहुंच जाते हैं। हमें आश्चर्य नहीं होगा अगर भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर वे अपनी सेवाएं किसी दिन भाजपा को सौंपने की पहल कर दें। उन्हें हम इतना ही याद दिलाना चाहेंगे कि मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूरी जैसे सैनिक से राजनेता बने ईमानदार व्यक्ति को भाजपा नहीं झेल पाई और अब वे फिलहाल हाशिए पर छोड़ दिए गए हैं। 

लगभग साल-डेढ़ साल पहले मीडिया में सीबीआई के निदेशक ए.के. सिंह का नाम बड़ी प्रमुखता से लिया जा रहा था। किसी पत्रिका ने उन्हें भ्रष्टाचार के विरूध्द आशा की चमकती किरण के रूप में देखा था। यह शायद राष्ट्रमण्डल खेलों के आसपास की बात है। श्री सिंह ने शायद हो कि इस तरह फेंके गए चारे निगलने से इंकार कर दिया, इसलिए अब उनकी बात कोई नहीं करता! सीबीआई पर राजनीतिक मकसद से वैसे ही आरोप लगातार लग रहे हैं, जैसे पहले लगाए जाते थे।

शीशे के मसीहाओं की इस लंबी कतार में सबसे ताजा नाम देश के महालेखानियंत्रक वी.के. राय का है. जनता को ऐसा बताया जा रहा है मानो भ्रष्टाचार से खात्मे के लिए वे ही देश की आखिरी उम्मीद हैं। श्री राय भी महाप्रतापी पांडव भीम की भांति आगे-पीछे देखे बिना अपनी गदा घुमाए जा रहे हैं। हम ऐसे अफसरों को जानते हैं जो शासकीय सेवा में रहते हुए भी अपनी सामाजिक प्रतिबध्दता के लिए जाने जाते थे और जिन्हें नौकरी के दौरान अपने मूल्यबोध के कारण असुविधाओं का सामना भी करना पड़ा था। श्री विनोद राय निश्चित रूप से इस परम्परा के वारिस नहीं हैं। इसलिए आज एक तबका जहां उनकी वाहवाही कर रहा है, तो एक बड़ा वर्ग उनका मुखर आलोचक भी बन गया है। यूपीए सरकार की घोर विरोधी पत्रकार तवलींन सिंह ने तो अपने कॉलम में तो साफ-साफ लिखा है कि श्री राय सीएजी से रिटायर होने के बाद राजनीति के मैदान में उतर सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। 

अनुमान होता है कि देश  को 2014 के आमचुनावों के पहले ऐसे दो चार और अवतारी पुरुषों को देखने और झेलने का दुर्भाग्य मिलेगा।

देशबंधु में 21 अगस्त 2012 को प्रकाशित