Thursday, 4 October 2012

क्षेत्रीय दलों की सीमायें





इन  दिनों मीडिया का पूरा ध्यान यूपीए सरकार के आर्थिक निर्णयों पर लगा हुआ है। कोयला घोटाला जो कल तक जलता हुआ अंगारा प्रतीत होता था अब बुझे हुए कोयले की तरह कहीं कोने में डाल दिया गया है। विदेशी मीडिया के लिए डॉ. मनमोहन सिंह एक बार फिर नायक बन गए हैं। उनके साहस, सूझबूझ और निर्णय क्षमता की फिर से तारीफ होने लगी है। देशी चैनलों में अब उद्योगपतियों से साक्षात्कार लिए जा रहे हैं। देश का आर्थिक विकास आने वाले दिनों में कैसे होगा, खुदरा व्यापार में एफडीआई के आने से रोजगार के कितने नए अवसर सृजित होंगे, गांव-गांव तक आधारभूत सुविधाएं कैसे पहुंचेंगी, किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य कैसे मिलेगा, उपभोक्ताओं को सस्ता और खरा माल कैसे उपलब्ध होगा आदि तमाम बिन्दुओं पर हम अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। देशी अखबारों में भी एक तरफ सरकार की प्रशंसा हो रही है तो दूसरी तरफ भाजपा की भर्त्सना कि वह देश को आगे बढ़ने से रोकना चाहती है।

इस बीच प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति को जो सम्मति दी है उसके कारण कांग्रेस के हौसले और बुलंद हो गए हैं। पी.चिदम्बरम, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद आदि मंत्रियों ने सीएजी को नसीहत दी है कि वह सुप्रीम कोर्ट की राय की अनदेखी न करें। मंत्रीगण आने वाले दिनों में आर्थिक सुधार के लिए और भी कड़े कदम उठाने के संकेत देने लगे हैं। स्वयं प्रधानमंत्री भी अपने विरोधियों से दो-दो हाथ करने के लिए प्रस्तुत नजर आ रहे हैं। यह जो नया माहौल बना है इसमें ऐसे अनेक प्रसंगों और मुद्दों से जनता का ध्यान हट गया प्रतीत होता है जिन पर कुछ दिन पहले शायद जोरदार चर्चा होने की संभावना होती।

मिसाल के लिए अन्ना हजारे की ही बात करें। एक साल में अन्ना कहां से कहां पहुंच गए। एक दिन ऐसा लग रहा था कि वे हुंकार भरेंगे तो सरकार गिर जाएगी। आज वे अरण्यरोदन कर रहे हैं कि सरकार लाख कोशिशों के बावजूद उनकी टीम को नहीं तोड़ पाई, लेकिन टीम के सदस्यों ने ही अपनी महत्वाकांक्षा के चलते आन्दोलन को बिखेर दिया। सामान्य स्थिति में इस बारे में जनचर्चा होना चाहिए कि अन्ना के आन्दोलन से देश ने क्या पाया और क्या खोया। इस पर भी बहस होना चाहिए थी कि उनके सबसे विश्वस्त और सर्वाधिक सक्रिय शिष्य अरविंद केजरीवाल द्वारा आंदोलन को राजनीतिक दल में तब्दील करने व चुनाव लड़ने की मंशा व्यक्त करने में क्या बुध्दिमानी है, लेकिन ऐसा लगता है कि अन्ना और उनके साथी लोकस्मृति से उसी तरह उतर गए हैं जैसे सिनेमा घर में कोई फिल्म उतर जाने के बाद उसके पोस्टर भी उतार दिए जाते हैं।

इस समय प्रदेशों की राजनीति जिस तरह से करवटें बदल रही हैं उसकी भी सटीक विवेचना अभी देखने नहीं मिली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अभी हाल में प्रदेशव्यापी अधिकार यात्रा निकाली। इस यात्रा के दौरान उन्हें जगह-जगह उग्र विरोध का सामना करना पड़ा। कई जगह पर उन्हें काले झंडे दिखाए गए और जैसी कि खबर है पुलिस ने कोई छह-सात सौ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। मुझे याद आता है कि अभी चार माह पूर्व रणबीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बिहार में जगह-जगह उपद्रव हुए थे। यह स्थिति हैरान करने वाली है। ऐसा सामान्य तौर पर माना जाता है कि नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में प्रदेश में सुशासन देने के लिए माकूल कदम उठाए थे जिसका पुरस्कार उन्हें दुबारा विजय के रूप में मिला। मीडिया में उन्हें एक लोकप्रिय नेता के रूप में चित्रित किया जाता है, फिर ऐसा क्या हुआ कि उनके खिलाफ लोग सडक़ों पर आ गए। क्या इसके पीछे जदयू की आपसी गुटबाजी है या फिर भाजपा और जदयू के बीच दरार आ गई है या कहीं ऐसा तो नहीं है कि नीतीश विरोधी आंदोलन खड़ाकर उनके प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न भंग किया जा रहा हो।

यह भी विचारणीय है कि यूपीए से तृणमूल के अलग हो जाने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में क्या परिवर्तन आते हैं। विगत एक वर्ष के दौरान प्रदेश की जनता ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उग्र तेवरों और हठीलेपन को खूब देखा है। ममता बनर्जी अपनी जरा सी भी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पातीं; यह बात उन सबको नागवार गुजर रही है जो कल तक सीपीआईएम विरोध के चलते उनके पक्ष में खड़े थे। महाश्वेता देवी ने तो अपनी अप्रसन्नता खुलकर जाहिर की है। अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि कहीं पश्चिम बंगाल को केन्द्र से मिलने वाली मदद में कटौती तो नहीं होगी। शायद इसीलिए ममता बनर्जी अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सहारा लेने की इच्छुक दिखती हैं। श्री मुखर्जी द्वारा रिक्त सीट पर उनके बेटे के खिलाफ तृणमूल का कोई उम्मीदवार न खड़ा कर मुख्यमंत्री अपनी स्थिति सुधारने में लगी हैं, ऐसा मानना गलत नहीं होगा।

इधर महाराष्ट्र एक बार फिर चर्चा में है। किसी समय देश के सर्वश्रेष्ठ रायों में से एक महाराष्ट्र पिछले कुछ सालों से एक के बाद एक घोटालों के कारण चर्चा में है। प्रदेश की सिंचाई परियोजनाओं में हुए कथित घोटालों में तो उपमुख्यमंत्री की ही बलि ले ली है। शरद पवार के भतीजे व मराठा लॉबी के सशक्त नेता अजित पवार को अपना पद छोड़ना पड़ा है। ऐसी चर्चाएं हैं कि शरद पवार अपना उत्तराधिकार अपनी बेटी सुप्रिया सुले को सौंपना चाहते हैं, जिसके कारण काका-भतीजे में भीतर ही भीतर अनकही लड़ाई चल रही थी जिसकी परिणति पवार जूनियर के इस्तीफे से हुई है। यह स्थिति हमें तमिलनाडु की याद दिलाती है। करुणानिधि के सामने विकट समस्या है कि अपनी तीन संतानों में से वे किसे युवराज या युवराज्ञी बनाएं।

ये तमाम प्रसंग प्रकारान्तर से क्षेत्रीय दलों की सीमाओं को प्रकट करते हैं। यह स्पष्ट होता है कि इन दलों के राजनीतिक हित सीमित और संकीर्ण हैं। ये अपनी शक्ति प्रादेशिक और क्षेत्रीय भावनाओं के उभार से पाते हैं और इनका समूचा तंत्र उस एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसे स्वयं को सुप्रीमो कहे जाने में आनंद प्राप्त होता है और इनमें उस राजनैतिक प्रतिभा का अभाव है जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने व उनमें हस्तक्षेप करने में कारगर हो सकेंगे।मैंने ऊपर सिर्फ तीन प्रांतों के उदाहरण दिए हैं, लेकिन अन्य प्रांतों में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। भारतीय जनता पार्टी जो स्वयं को कांग्रेस का विकल्प मानती है, में भी एक व्यापक सोच का अभाव परिलक्षित हो रहा है। देश की भावी राजनीति निर्धारित करने के लिए यह आवश्यक है कि छुटपुट घटनाओं पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय बुनियादी प्रश्नों पर विचार किया जाए। खोखले भाषणों और कोरी नारेबाजी से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

देशबंधु में 4 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित