Thursday, 30 May 2013

''नक्सली हिंसा : लोकतंत्र पर हमला''



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश के सबसे बड़ी समस्या निरूपित कर चुके हैं। जब भी नक्सली हिंसा की किसी बड़ी वारदात को अंजाम देते हैं उस पर सामान्यत: पहली प्रतिक्रिया ''यह लोकतंत्र पर हमला है''- कहकर दी जाती है। इस बिन्दु पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में सहमति नजर आती है। अन्यान्य राजनीतिक दलों की राय भी यही दिखती है। बहुत से समाज-सजग बुध्दिजीवी एवं कार्यकर्ता भी इसी स्वर में बात करते हैं। 25 मई को दरभा (बस्तर) के नक्सली हमले के बाद यही पहली प्रतिक्रिया चारों तरफ से सुनने मिली। बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक  ई.एन. राममोहन व जाने माने सामाजिक अध्येता व लेखक रामचंद्र गुहा ने भी लगभग इन्हीं शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी। इन दोनों के नाम मैं जानबूझ कर इसलिए उल्लेख कर रहा हूं कि 2006 में सलवा जुड़ूम का अध्ययन करने के लिए सिविल सोसायटी का जो दल आया था, ये दोनों उसके सदस्य थे, याने अतिवादी टीकाकारों की दृष्टि में वे नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले ही माने गए थे!

लोकतंत्र पर हमला एक प्रचलित जुमला जरूर बन गया है, लेकिन कहीं जुमलेबाजी में मूल प्रश्न न खो जाए इसलिए जरूरी है कि इसका बारीकी से अध्ययन किया जाए। एक सार्वभौम देश की लोकतांत्रिक अस्मिता पर हमले के कई स्वरूप हो सकते हैं। उस पर कोई दूसरा देश सीधे-सीधे आक्रमण कर सकता है, कोई दूसरा देश या बाहरी शक्तियां प्रत्यक्ष युध्द की बजाय कूटनीति अथवा अर्थनीति का इस्तेमाल करके भी लोकतंत्र को कमजोर कर सकती हैं, देश के भीतर ऐसे समूह और शक्तियां हो सकती हैं जो राज्य के भीतर सशस्त्र संघर्ष करें जैसा कि नक्सली कर रहे है; इन श्रेणियों के अलावा देश के भीतर ऐसे तत्व भी हो सकते हैं जो निजी आकांक्षाओं व स्वार्थों की पूर्ति के लिए कभी जाने में, कभी अनजाने में लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला कर सकते हैं। संभव है कि इन व्यापक श्रेणियों में कुछ उप श्रेणियां भी बनाई जा सकें।

मैं श्री राममोहन और श्री गुहा जैसे विद्वानों की राय से इत्तफाक रखता हूं। आज भारत में अंग्रेजों का राज नहीं है। अपने संविधान की व्यवस्था के अंतर्गत देश में सोलह आम चुनाव हो चुके हैं। इन चुनावों ने नागरिकों को बार-बार यह मौका दिया है कि वे जिस राजनीतिक दल के नीतियों, सिध्दांतों, कार्यक्रमों अथवा क्रियाकलापों से संतुष्ट नहीं हैं उन्हें सत्ता से बाहर फेंक दें। जो कहते हैं कि चुनाव हथकंडों से जीते जाते हैं वे पूरे सच का एक बहुत छोटा सा अंश बयान करते हैं। बड़ी सच्चाई यह है कि जब जनता अपने पर उतर आती है तो फिर सत्तालोलुपों के हथकंडे धरे रह जाते हैं। अगर ऐसा न होता तो एक बार जो पार्टी चुनाव जीती वही अपने हथकंडों के बल पर अनंतकाल तक सत्ता पर काबिज रही आती। दरअसल यह सोच उन कुंठित और हारे हुए लोगों की है जो जनता के बीच काम करने जाने से कतराते हैं।

इस दृष्टिकोण से विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नक्सली भले ही शोषण से मुक्ति की आड में अपनी हिंसक कार्रवाई को जायज ठहराने का कितना भी प्रयत्न क्यों न करें, ऐसी हिंसा के लिए लोकतंत्र में न तो कोई जगह है और न वह किसी तरह से जायज है। वे जो लड़ाई लड़ रहे हैं उसमें उनकी जीत कभी नहीं होगी, लेकिन इसके चलते देश में जो अशांति और अस्थिरता का वातावरण बन रहा है वह लोकतंत्र के हित में नहीं है। नक्सलियों से एक सीधा सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि जनता का शोषण क्या सिर्फ आदिवासी अंचलों में ही हो रहा है? आदिवासियों के अलावा देश में किसानों पर, मजदूरों पर, हाशिए पर धकेल दिए लोगों पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उनका जिस तरह से शोषण हो रहा है क्या वह उन्हें दिखाई नहीं देता? फिर उनकी लड़ाई कैसे लड़ी जाएगी और कौन लड़ेगा?

यह हमें दिख रहा है कि नक्सली लोकतंत्र के शत्रु हैं, लेकिन आज यह विचार करना भी जरूरी है कि जिन परिस्थितियों के चलते नक्सलियों को बस्तर व अन्य आदिवासी क्षेत्रों में अपने पैर जमाने की जगह मिली, क्या वैसी परिस्थितियां देश के गैर आदिवासी इलाकों में बिल्कुल भी नहीं है?  दरअसल इस प्रश्न के दो हिस्से हैं।  हमने जिन्हें सरकार चलाने के लिए चुना है एक तो उन्हें इस बात का जवाब देना चाहिए कि आदिवासी इलाकों में व्याप्त विषम परिस्थितियों के निराकरण के लिए उन्होंने क्या प्रयत्न किए व इसमें कहां तक सफल हुए? दूसरे देश के अन्य भागों में ऐसी स्थितियां न बनें और अगर कहीं बन रही हैं तो उन्हें तत्काल सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए? मुझे यहां एक विशेषण का ध्यान आता है जिसका इस्तेमाल कई बरसों से भारत की कार्यपालिका कर रही है।

जैसा कि हम जानते हैं पिछले तीस साल में बार-बार और जगह-जगह प्रशासन के ''संवेदनशील'' होने की बात उछाली गई है। कुछ साल पहले इसमें एक और विशेषण जुड़ गया है- ''पारदर्शी''। हर सरकार दावा करती है कि वह एक संवेदनशील सरकार है और उसके प्रशासन में पारदर्शिता है, लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? हम मानते हैं कि राजकाज में सरकार को कई बार अप्रिय निर्णय लेना पड़ते हैं। हम यह भी मानते हैं कि चौबीस घंटे चीखने वाले मीडिया के कारण बहुत से मुद्दों पर ठंडे दिमाग से बहस नहीं हो पाती, इस सीमा को स्वीकार करने के बावजूद आम धारणा यही है कि सरकार में संवेदनशीलता व पारदर्शिता दोनों का अभाव है।

जब लोकतंत्र पर हमले की बात की जाती है तो इस बारे में भी विचार करना होगा कि आतंकवादियों अथवा नक्सलवादियों द्वारा खुलेआम अंजाम दिए गए हिंसक कृत्यों के परे क्या कहीं वे शक्तियां भी काम कर रहीं हैं जो भीतर ही भीतर पोशीदा तरीके से भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने में लगी हुई हैं? हिन्दी फिल्म के एक संदर्भ से तुलना करने से बात बेहतर समझ आ सकेगी। एक समय प्राण, जीवन, कन्हैयालाल जैसे खलनायक होते थे जिन्हें देखकर समझ आ जाता था कि वे क्या करने वाले हैं। फिर गोविंद निहलानी की फिल्म 'अर्धसत्य' आई जिसमें सदाशिव अमरावपुरकर ने खलनायक के बाह्य व्यक्तित्व को एकदम से बदल दिया। यह बात वृहत्तर फलक पर हम अपने वर्तमान समय में लागू कर सकते हैं जहां मीठी-मीठी बातें और ऊंचे-ऊंचे वायदे तो बहुत हैं, लेकिन हकीकत में कहानी कुछ और ही है। 

आज देश में ऐेसे तमाम आंदोलन चल रहे हैं जिनसे पता चलता है कि जनता तथाकथित संवेदनशील सरकार के इस या उस निर्णय से क्षुब्ध और दु:खी है। सरकार कांग्रेस की हो, भाजपा की, चाहे किसी क्षेत्रीय दल की- स्थितियां सब जगह एक समान हैं। इन सरकारों से भी सीधे सवाल पूछा जाना चाहिए कि आपके जिस कदम से जनता प्रसन्न नहीं है वह निर्णय आप वापिस क्यों नहीं ले सकते और यदि आपका निर्णय सचमुच जनहित में है तो आप जनता को वैसा समझा क्यों नहीं पा रहे हैं? जो लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनाव जीतकर सत्ता में आए हैं उन्हें लोकतंत्र का शत्रु मानना तो बहुत बड़ी गलती होगी, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं है कि वे लोकतंत्र को नष्ट करने वाली उन शक्तियों के इशारे पर  ऐसे निर्णय ले रहे हैं, जिनके पास अपनी स्वार्थपूर्ति के आगे कोई एजेंडा नहीं है?

देशबंधु में 31 मई 2013 को प्रकाशित