Wednesday, 10 July 2013

फर्जी मुठभेड़ : खतरनाक प्रवृत्ति

इशरत जहां हत्याकांड में जिस तरह की बयानबाजी अनथक चल रही है, वह व्यथित और परेशान करने वाली है। कांग्रेस और भाजपा दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे हुए हैं। दरअसल इन दिनों ऐसा कुछ माहौल बन गया है कि कोई भी मामला क्यों न हो, छोटा या बड़ा, जरा सी गुंजाइश दिखते साथ दोनों दल आरोप-प्रत्यारोप में उलझ पड़ते हैं और ऐसा करते हुए राजनीतिक मर्यादाओं को पूरी तरह से भुला देते हैं। उत्तराखंड की त्रासदी में भी यही हुआ, महाबोधि मंदिर में हुए आतंकी विस्फोटों पर भी और मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री राघवजी के सीडी प्रकरण में भी। लोकसभा चुनाव के पहले चार राज्यों मेंविधानसभाओं के चुनाव होने हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा ही एक-दूसरे के आमने-सामने हैं तथा दोनों को शायद यह लगता है कि ऐसी बयानबाजी करके चुनाव जीते जा सकते हैं। वे इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि भारत का मतदाता इस तरह के झांसों में नहीं आता। 

बहरहाल यह प्रकरण कुछ बुनियादी सवालों की ओर हमारा ध्यान खींचता है। भाजपा की ओर से अथवा मोदी सरकार के समर्थन में जो वक्तव्य दिए गए हैं, उनसे भी कुछ सवाल उपजते हैं। भारतीय जनता पार्टी की एक मुखर प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने इशरत जहां के चरित्र पर जो टीका की, उससे पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी आज भी पुरुष सत्तात्मकता में ही विश्वास रखती है। यूं तो इस पार्टी ने राजनीति में महिलाओं को आगे आने के बहुत मौके दिए हैं, इसके बावजूद उसे अभी भी स्त्री की स्वतंत्र हैसियत कुबूल नहींहै। भाजपा हमेशा मातृ शक्ति का उद्धोष करती है व औरत को मां, पत्नी या बहन से अलग रूप में देखने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहींहै। जो बात निर्भया कांड के बाद कथित संत आसाराम बापू ने कही थी, कुछ वैसी ही बात सुश्री लेखी ने भी की। इस देश के अनुदार, रूढ़िवादी सामाजिक ढांचे में जिनका मानसिक विकास हुआ है, उन्हें भाजपा प्रवक्ता की टिप्पणी से शायद कोई ऐतराज न हो, लेकिन शेष समाज इससे सहमत नहीं होगा।  

 मोदी सरकार के पैरोकार बार-बार इशरत जहां के आतंकवादी संगठनों से तार जुड़े होने की बात उठा रहे हैं। इस बारे में अपनी सीमित जानकारी के कारण मैं कोई पक्ष लेने में असमर्थ हूं, लेकिन किसी व्यक्ति के आतंकवादी होने के आधार पर क्या उसे फर्जी मुठभेड़ में मारा जा सकता है, यह एक चिंताजनक प्रश्न है। पाठकों को याद दिलाने की जरूरत नहींहै कि मुंबई आतंकी हमले के एकमात्र जीवित अपराधी अजमल कसाब को भी फांसी पर चढ़ाने के पहले इस देश की न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने में किसी किस्म की कोताही नहींबरती गई। ऐसे लोग कम नहीं थे, जो कसाब को सरेआम चौराहे पर तुरंत फांसी पर लटका देने के पक्ष में थे। इसके बाद जेल में उसे कानूनन जो भी सुविधाएं दी गईं, उन पर भी बहुत बड़े वर्ग ने ऐतराज जताया था। कसाब की पैरवी करने के लिए जब वकील तैयार नहींथे, तब न्यायालय के आदेश से उसे वकील मुहैया कराया गया। यह सब करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि भारत एक सभ्य देश है और विधि-विधान में विश्वास रखता है। निस्संदेह ऐसे अवसरों पर सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन इस वजह से किसी भी सरकार को अपनी वैधानिक भूमिका से विचलित नहींहोना चाहिए। कसाब के बाद अफजल गुरु को भी फांसी दी गई। उसमें सरकार ने परिवार के लोगों को समय रहते सूचना न देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभाई,  इसके लिए भी उसे आलोचना सुनना पड़ी।  

देश में अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिराने का चलन नया नहीं है। मुझे ध्यान आता है कि आज से 40 साल पहले दिल्ली-उत्तरप्रदेश की सीमा पर शायद यमुना के किसी पुल पर एक कुख्यात अपराधी को दिल्ली पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। उस समय वह शायद इस तरह का पहला प्रसंग था और इसके कारण दिल्ली पुलिस को कोई वाहवाही नहींमिली थी, उल्टे सारे राजनीतिक दलों ने इस अवैधानिक कृत्य की आलोचना ही की थी। दुर्भाग्य से यह सिलसिला वहीं खत्म नहीं हुआ, बाद के बरसों में महाराष्ट्र में खासकर मुंबई में तस्करी, हत्या आदि अपराधों में लिप्त अपराधियों को एनकाउंटर में मारने का चलन प्रारंभ हुआ और यहां तक बढ़ा कि कुछ पुलिस कर्मी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के विशेषण से विभूषित होने लगे। इनमें से कुछेक का महिमामंडन इस सीमा तक हुआ कि उन पर फिल्में बनने लगीं तथा बालीवुड के महानायकों ने इन्हें पुरस्कृत भी किया। एक दुर्दांत अपराधी के खात्मे से शांतिप्रिय समाज कुछ समय के लिए राहत महसूस कर सकता है, लेकिन यह प्रवृत्ति अपनी परिणति में समाज के लिए किस तरह घातक हो सकती है, यह मीमांसा की जाना अभी बाकी है।

लड़ाई के मोर्चे पर सैनिक आमने-सामने एक-दूसरे को मारते हैं, कुछ उसी तरह अपराधी व पुलिस के बीच यदि आमने-सामने मुठभेड़ हो और पुलिस अपराधी को मार गिराए तो वह उचित और स्वाभाविक है, लेकिन जब पुलिस न्यायप्रक्रिया को नजरअंदाज कर कानून अपने हाथ में ले ले तो ऐसा पुलिस अधिकारी स्वयं अपने को अपराधी के सांचे मेंढाल लेता है। एक फर्जी मुठभेड़ को सही सिध्द करने के लिए उसे कितने सारे प्रपंच रचना पड़ते हैं, झूठी गवाहियां, झूठे साक्ष्य, बनावटी घटनास्थल, नकली सच आदि। ऐसा एनकाउंटर कोई एक व्यक्ति तो करता नहींहै, इसलिए एक झूठ को सच बनाने में न्यायतंत्र की बहुत सारी कड़ियां एक-दूसरे के बचाव में जुड़ जाती हैं। इसका अर्थ यह होता है कि एक फर्जी एनकाउंटर, एक समांतर न्यायतंत्र का निरर््माण करने लगता है। यहां पंजाब में आतंकवाद के दौर में की गई फर्जी मुठभेड़ों के हाल में हुए खुलासों का संज्ञान लेना उचित होगा।

जो पुलिस अधिकारी फर्जी मुठभेड़ में अपराधियों को मार गिराते हैं, उन्हें अपने अपराधी होने का एहसास हमेशा बना रहता है और वे फिर कानून-व्यवस्था का पालन करने में जिस समर्पण के साथ काम करना चाहिए, आगे वैसा नहींकर पाते। उन्हें हर वक्त अपने बचाव की चिंता रहती है और ऐसे में वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों यहां तक कि अपराधियों के दूसरे गिरोहों के द्वारा भी ब्लैकमेल किए जा सकते हैं। इशरत जहां मामले में निष्पक्ष रूप से विचार करने पर समझ आता है कि फर्जी मुठभेड़ में उसको मारना एक अपराध ही था, जिसे अंजाम देने में संलिप्त पुलिसकर्मियों ने अपने विवेक को खो दिया था। वह आतंकवादी थी या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। इन दोनों बातों में घालमेल करेंगे तो सही निष्कर्ष तक नहींपहुंच पाएंगे।
देशबन्धु में 11जुलाई 2013 को प्रकाशित