Thursday, 18 July 2013

जातिसूचक रैलियों पर प्रतिबंध




भारत की जातीय व्यवस्था अति प्राचीन एवं जटिलताओं से भरपूर एक सामाजिक संस्था है, जिसे समझने व जिसका निर्मूलन करने के लिए लंबे समय से प्रयत्न चल रहे हैं। लेकिन आज तक न तो देश की संसदीय राजनीति इसका कोई माकूल समाधान खोज पाई  है और न उदारचेता, प्रगतिकामी समाज सुधारकों के प्रयत्न पूरी तरह से सफल हो सके हैं। स्वाधीन देश के संविधान में इस दिशा में जो प्रावधान किए गए हैं, तथा जिनके आधार पर न्यायपालिका समय-समय पर हस्तक्षेप करती है, वे भी वस्तुस्थिति को देखते हुए नाकाफी ही कहे जाएंगे।

उत्तरप्रदेश उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने पिछले सप्ताह जातिसूचक रैलियों पर प्रतिबंध लगाने का जो आदेश जारी किया है, उसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अदालत के निर्णय का मोटे तौर पर पूरे देश में स्वागत हुआ है। अनेक राजनीतिक दलों ने भी बुझे मन से ही सही इस आदेश का पालन करने के प्रति सहमति जतलाई है। बसपा की सर्वोच्च नेता मायावती ही एकमात्र प्रमुख राजनेता हैं, जिन्होंने खुलकर इस पर अपनी असहमति दर्ज की है। मीडिया भी इस निर्णय से खासा प्रसन्न नजर आता है। टीवी सूत्रधारों के उध्दत नायक अर्णब गोस्वामी ने तो यहां तक कह दिया कि इक्कीसवींसदी में यह सब नहीं चलेगा। जाति व्यवस्था टूट जाए, बिखर जाए, एक नई सामाजिक व्यवस्था इसका स्थान ले, ये सारे विचार कर्णप्रिय हो सकते हैं, लेकिन क्या हाईकोर्ट के फैसले के बाद स्थितियां सचमुच बदल जाएंगी?

यह देखना कठिन नहीं है कि जाति के प्रश्न पर देश दो धड़ों में बंटा हुआ है। आज चूंकि देश का संविधान जाति के आधार पर भेदभाव की इजाज़त नहीं देता, इसलिए उसे खत्म करने या उसके अप्रासंगिक हो जाने की बात जो लोग करते हैं, वे एक तरह से अपना मन बहलाव ही करते हैं। यह सच है कि आज के समय में बहुतेरे नवयुवा जातिबंधन के परे जाकर प्रेमविवाह करते हैं, लेकिन इनका प्रतिशत कितना है? दूसरी तरफ अखबारों में जो वैवाहिक विज्ञापन छपते हैं, उनमें अन्य अहर्ताओं के साथ जाति की अनिवार्यता अथवा जाति का उल्लेख जिस प्रमुखता के साथ किया जाता है, वह क्या दर्शाता है? आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर निकलने वाले बच्चे भी अपनी रूढ़िवादी मानसिकता के चलते स्वयं को जातिवाद से मुक्त नहींकर पाते हैं। सच तो यह है कि जो लोग जाति प्रथा अप्रासंगिक हो जाने की बात करते हैं, वे तथाकथित निचली जातियों के राजनीतिक या आर्थिक सशक्तिकरण से घबराए हुए लोग हैं। 

देश के बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों में जहां आरक्षण के कारण दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों के बच्चों को प्रवेश मिल जाता है, वहां आए दिन उनके साथ उच्च वर्ण के विद्यार्थियों द्वारा जो दुर्व्यवहार और उत्पीड़न किया जाता है, वह एक कड़वी सच्चाई है। यही स्थिति सरकारी दफ्तरों में भी है। निजी क्षेत्र की बात करें तो वहां सरकार की मंशा और अनुरोधों के बावजूद इनके लिए कोई व्यवस्था अभी तक नहींबनने दी गई है। इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट का यह फैसला समस्या के सिर्फ एक पहलू का संज्ञान लेता है, उससे जुड़े बाकी आयामों का नहीं। 

यह ठीक है कि चुनाव के समय या वैसे भी जनतांत्रिक राजनीति में जातिवाद को प्रश्रय नहींदिया जाना चाहिए। लेकिन क्या सिर्फ रैलियों पर प्रतिबंध लगने से जातिवाद समाप्त हो जाएगा? अगर अदालत के फैसले को व्यापक धरातल पर देखें तो धर्म, भाषा, प्रांत आदि तमाम पहचानों को सूचित करने वाले रैलियां प्रतिबंधित होना चाहिए। फिर रैलियां ही क्यों, सम्मेलन, संगोष्ठियों आदि पर भी प्रतिबंध क्यों न लगे? जब किसी भाषा विशेष को क्लासिक भाषा का दर्जा दिया जाता है या जब राजनेता धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं, तब भी क्या अदालत की मंशा की अवहेलना नहीं होती? फिर चुनावों के समय जातीय समीकरणों के आधार पर टिकिट भी क्यों दिए जाते हैं? 

हमारे ध्यान में आता है कि स्वतंत्रता के बाद राजनीति में वंचितों व हाशिए के लोगों की हिस्सेदारी धीरे-धीरे कर के बढ़ी है। उनके भीतर संविधान से मिली नई ताकत का एहसास धीरे-धीरे बढ़ रहा है। वे चूंकि संख्याबल में अधिक हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर राजनीति में उनकी भूमिका आने वाले दिनों में और भी बढ़ेगी। उनके राजनीतिक विवेक व कौशल का विकास जैसे-जैसे होगा, वैसे-वैसे उनकी राजनीतिक निर्णय लेने की क्षमता का भी विकास होगा। भविष्य की यह तस्वीर उन लोगों के दिलों में खौफ पैदा करती है, जिन्हें इस प्रक्रिया में अपने वर्ग के हाशिए पर चले जाने की आशंका सताती रहती है। लेकिन यह आशंका किसी हद तक निर्मूल है। अगर समाज के सभी वर्ग बराबरी से सशक्त हैं तो वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप देश की राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।

सुश्री मायावती ने अदालती फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व विश्व हिन्दू परिषद् आदि को प्रतिबंधित करने की मांग की है। यह तस्वीर का दूसरा पहलू है। आज देश के जनतांत्रिक ढांचे को जातिवाद के मुकाबले सांप्रदायिकता से कहींज्यादा खतरा है, जिसकी ओर मायावतीजी ने सही इशारा किया है। जब भाजपा नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी के लिए उतावली नजर आ रही है, तब देश की अदालतों को टोपी, बुर्का, पिल्ला जैसे अर्थप्रगल्भ वचनों की भी अनदेखी नहींकरना चाहिए। अदालत पूछे या न पूछे जनता को यह भी पूछना चाहिए कि हत्याकांड के आरोपी राजनेता को उत्तरप्रदेश का प्रभारी नियुक्त कर राम मंदिर बनाने की पुर्नघोषणा करने से क्या देश के संविधान का सम्मान होता है। 

देशबंधु में 18 जुलाई 2013 को प्रकाशित