Wednesday, 3 July 2013

स्नोडन : अपराधी नहीं, विश्व नागरिक



एडवर्ड स्नोडन को मास्को विमानतल के ट्रांजिट एरिया में रहते हुए ग्यारह दिन बीत चुके हैं। अमेरिका ने उसका पासपोर्ट रद्द कर दिया है, और आज वह किसी भी देश का वैधानिक तौर पर नागरिक नहीं है। वह अमेरिका तो खैर वापिस जा ही नहीं सकता। जब तक कोई अन्य देश उसे अपने यहां शरण न दे दे। वह इस विशाल पृथ्वी पर एक अनागरिक बन कर ही जी सकता है। सवाल उठता है कि एक विमानतल की बंद इमारत के भीतर वह कब तक रह पाएगा। उसकी हालत फिलहाल विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे के तरह है, जो पिछले एक साल से लंदन में इक्वाडोर के दूतावास में शरण लिए हुए है। उस छोटे से मुल्क के दूतावास के सामने समस्या है कि असांजे को राजनीतिक शरण तो दे दी है, दूतावास से निकालकर उसे इक्वाडोर कैसे ले जाया जाए, क्योंकि इक्वाडोर की प्रभुसत्ता दूतावास के दरवाजे के भीतर ही है। दूतावास की चौखट पार करते ही ब्रिटिश पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी।

यही समस्या एडवर्ड स्नोडन की भी है। चूंकि इक्वाडोर ने उसे हांगकांग से मास्को जाने के लिए अपने देश का अस्थायी यात्रा पत्र मुहैया करवा दिया था इसलिए वह मास्को पहुंच सका अन्यथा हांगकांग में ही उसे गिरफ्तार या अगवा किया जा सकता था। अब स्थिति विकट है। अभी तो विश्व के मीडिया की निगाहें उस पर लगी हुई हैं। उसकी खोज खबर मीडिया को प्रतिदिन मिल जाती है, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। हो सकता है कि हफ्ते दो हफ्ते बीतते न बीतते मीडिया का ध्यान इस चर्चित व्यक्ति से हट जाए, संभव है कि उसके बाद ही रूस या अन्य किसी देश की सरकार उसे शरण देने के बारे में सोचे। वैसे बताया जा रहा है कि विमानतल पर भी रूसी पुलिस उसकी सुरक्षा कर रही है। इस बीच में स्नोडन ने दुनिया के इक्कीस देशों से राजनैतिक शरण पाने के लिए आवेदन किया। इनमें से अभी तक किसी ने भी उसे सकारात्मक जवाब नहीं दिया है। ऐसे में एक कल्पना मन में उभरती है कि एडवर्ड स्नोडन का हाल कहीं उस व्यक्ति की तरह तो नहीं होगा जिसने किसी एयरपोर्ट को ही तीस-पैंतीस साल के लिए अपना घर बना लिया था।

स्नोडन ने जिन इक्कीस देशों को शरण देने हेतु आवेदन किया था, उनमें भारत भी एक था। हमारे देश में राजनीतिक शरण देने की बहुत पुरानी परंपरा रही है जिसका सबसे ज्वलंत उदाहरण दलाईलामा के रूप में सामने है। श्रीलंका, बर्मा, नेपाल, बंगलादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि के राजनेताओं को भी भारत ने समय-समय पर पूरे सम्मान और सुरक्षा के साथ शरण दी है। इसका श्रेय पंडित नेहरू द्वारा स्थापित उदार जनतांत्रिक परंपराओं को दिया जाना चाहिए, यद्यपि उसकी जड़ें भारतीय इतिहास की उदारवादी परंपरा में खोजी जा सकती है। भारत ही दुनिया का अकेला देश है जहां यहूदियों को प्रताड़ना के बदले सम्मान मिला। पारसियों को भी जब इरान छोड़ना पड़ा तब भारत ही उनका घर बना।

इस इतिहास को देखते हुए यह अजीब लगता है कि भारत ने एडवर्ड स्नोडन की शरण याचिका ठुकराने में ज़रा  भी देर नहीं की। 2 जुलाई को उसका आवेदन मिला और दो-चार घंटे के भीतर ही उसे खारिज कर दिया गया। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने तो यहां तक कह दिया कि भारत ऐसी जगह नहीं है जहां हर कोई मुंह उठाए चला आए। तकनीकी रूप से देखें तो स्नोडन को राजनीतिक शरणार्थी शायद नहीं माना जा सकता। वह कोई राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं है। इसके विपरीत वह अमेरिकी सुरक्षातंत्र का एक छोटा कर्मचारी था जिसने अपने देश के कानून को और अपनी सेवा शर्तों को जाहिरा तौर पर तोड़ा जिसके कारण वह अपने आप मुलजिम की श्रेणी में आ जाता है, लेकिन क्या सिर्फ इसी बिना पर भारत ने उसे शरण देने से इंकार किया या इसके पीछे कोई और कारण हैं।

यह सबको पता है कि पिछले पच्चीस साल से भारत लगातार अमेरिकापरस्ती कर रहा है। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, लगभग हर मोर्चे पर भारत की राजसत्ता अमेरिका की समर्थक और ताबेदार बन गई है। पी.वी. नरसिंह राव, अटलबिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह- प्रधानमंत्री कोई भी हो, अमेरिका का अनुसरण करने में ही सबको अपनी भलाई नज़र आती है। आज भले ही इंदिरा गांधी की पार्टी देश पर राज कर रही हो, लेकिन इंदिराजी की स्वतंत्र विदेश नीति को हमने पूरी तरह तिलांजलि दे दी है। इसीलिए भारत के विदेश मंत्री को इस कड़वी सच्चाई से भी कोई तकलीफ नहीं हुई कि अमेरिका प्रमुख रूप से जिन पैंतीस देशों की साइबर जासूसी कर रहा है, उसमें भारत का स्थान पांचवें नंबर पर है। खुर्शीदजी ने इस बात को बहुत हल्के में टाल दिया कि अमेरिका छानबीन कर रहा है, जासूसी नहीं। ऐसा कह कर वे अपने आपको समझा सकते हैं, लेकिन जनता को नहीं।

हमारा ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि उपरोक्त पैंतीस देशों में यूरोपीय संघ के अनेक देश जैसे इटली, फ्रांस व जर्मनी शामिल हैं। ये देश जी-8 के सदस्य हैं याने पूंजीवादी जगत के सिरमौर हैं। इनके साथ अमेरिका के गहरे राजनीतिक व आर्थिक ताल्लुकात हैं। यूरोपीय संघ अपने आप में भी अमेरिका का मित्र है। अमेरिका दुनिया में अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए जब भी कोई कदम उठाता है, जैसे इराक या अफगानिस्तान पर आक्रमण या ईरान की आर्थिक नाकेबंदी या सीरिया के विद्रोहियों को समर्थन- यूरोपीय संघ के देश मोटे तौर पर उसका साथ ही देते हैं। फिर भी जासूसी के इस कांड का खुलासा होने के बाद अमेरिका के इन मित्र देशों ने उसकी खुलकर आलोचना की है। उनमें से हरेक ने अलग-अलग यही कहा है कि, इससे आपसी दोस्ती को नुकसान पहुंचेगा कि एक दोस्त मुल्क से इस तरह के व्यवहार की कतई अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।

जब अमेरिका के निकट मित्र उसकी आलोचना करने में पीछे नहीं हैं तब भारत को अमेरिका की तरफ से सफाई देने या उसके बचाव में उतरने की क्या जरूरत थी? श्री खुर्शीद कम से कम इतना तो कह ही सकते थे कि अभी हम इस मामले की जांच कर रहे हैं। अमेरिका के प्रति ऐसी फौरी वंफादारी व्यक्त करने का परिणाम यह हुआ कि टीवी की बहसों में कांग्रेस के प्रवक्ता बगलें झांकते नज़र आए क्योंकि अमेरिका ने जो किया वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति या नैतिकता की दृष्टि से क्षम्य नहीं है। विश्व में इंटरनेट सेवाओं का जो आल-जाल बिछा है उसका केन्द्रीय नियंत्रण अमेरिका में है। जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय न्यूयार्क में होकर भी वह एक सार्वभौम इकाई है; उसी तरह इंटरनेट कंपनियों के मुख्यालय अमेरिका में होने का मतलब यह नहीं होता कि उनकी हर गतिविधियों को नियंत्रित करें।

यह एक बात है कि इंटरनेट सेवाओं का आविष्कार और विकास मुख्यत: अमेरिका की सशस्त्र सेवाओं के उपयोग के लिए हुआ था, लेकिन समय के साथ-साथ उन सेवाओं का अभूतपूर्व ढंग से विस्तार हुआ और गैर-सैनिक प्रयोजनों के लिए इन सेवाओं का इस्तेमाल पूरी दुनिया के नागरिक एक निजी माध्यम के रूप में कर रहे हों। उनके लिए ई-मेल, मोबाईल फोन जैसे अभिकरण आधुनिक युग के पोस्टकार्ड या टेलीग्राम की तरह हैं।  उन्हें लेशमात्र भी शंका नहीं होती कि कोई और उनके संदेशों को गुपचुप तरीके से पढ़ रहा है। इस तरह एक  ओर तो अमेरिका गूगल आदि कंपनियों की व्यापारिक स्वायत्तता का अतिक्रमण कर रहा है, तो दूसरी ओर वह एक आम नागरिक की जिंदगी में भी अनाधिकृत घुसपैठ कर रहा है। इसकी निंदा ही की जा सकती है। 
अमेरिका का तर्क हो सकता है कि दुनिया में चल रही आतंकवादी गतिविधियों पर नज़र रखने और समय रहते उसे रोकने की दृष्टि से इस तरह की जासूसी करना अपरिहार्य है। लेकिन यह तर्क एक सीमा के आगे बेमानी हो जाता है। मान लीजिए उसे भारत में किसी संगठन या व्यक्ति पर आतंकवादी होने की शंका है, ऐसे में उसे यह सूचना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा करना चाहिए ताकि भारत इस बारे में जो भी आवश्यक कार्रवाई है, कर सके। आखिरकार अमेरिका और भारत के बीच अथवा अमेरिका और अन्य देशों के बीच इस तरह की जानकारियां साझा करने की व्यवस्थाएं बनी हुई हैं, पर मुद्दे की बात यह है कि अमेरिका अपने को दुनिया का खुद मुख्तार मानता है और अपने अहंकार के चलते किसी की परवाह नही करता। पाकिस्तान पर बिना इजाजत हो रहे ड्रोन हमले इसका प्रमाण है। 

दरअसल अमेरिका को एक तरफ सर्वशक्तिमान होने का मुगालता है तो दूसरी ओर वह हर पल एक भयग्रस्त मानसिकता में जीता है। अभी कल बोलीविया के राष्ट्रपति ईवा मोरालेस जब रूस यात्रा से वापिस लौट रहे थे तो उनके विमान को पूर्व निर्धारित पड़ावों पर नहीं ठहरने दिया गया कि कहीं विमान में उनके साथ स्नोडन तो नहीं है। इसी तरह रूस यात्रा से लौट रहे वेनेजुएला के राष्ट्रपति मडेरो के विमान में भी स्नोडन के छिपे होने की आशंका जाहिर की गई। इससे पता चलता है कि अमेरिका किस तरह से अपने काल्पनिक शत्रु खड़े करता है। बहरहाल, एडवर्ड स्नोडन के बारे में मैं दो बातें कहना चाहूंगा- एक तो अमेरिका से बाहर निकलने के बाद उसे पहले कहीं राजनीतिक शरण मांगना चाहिए थी। एक बार शरण मिल जाती तो अमेरिकी करतूतों का खुलासा बाद में होते रहता। दूसरे, अब रूस या अन्य किसी देश को उसे मानवीय आधार पर शरण दे देना चाहिए। उसने जो किया वह अमेरिका की नजर में अपराध हो सकता है, लेकिन वास्तव में उसने एक जिम्मेदार विश्व नागरिक होने का रोल अदा किया है।

देशबंधु में 4 जुलाई 2013 को प्रकाशित