Thursday, 25 July 2013

मोदी : हवा में तलवारबाजी




इतनी बात तो छठवीं-सातवीं के विद्यार्थी भी जानते हैं कि देश में संसदीय शासन प्रणाली है। एक निर्धारित अवधि में या कभी-कभी समय पूर्व भी चुनाव होते हैं। चुनावों में जिस पार्टी को बहुमत मिलता है, वह अपने नेता का चयन करती है, और उसे केंद्र मे राष्ट्रपति के द्वारा अथवा प्रदेश में राज्यपाल के द्वारा सरकार बनाने का न्यौता मिलता है। पार्टी नेता का चुनाव सामान्यत: निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच में से होता है, यद्यपि इसके अपवाद भी देखे गए हैं। पार्टी नेतृत्व की भूमिका यहां निर्णायक भी हो सकती है। हमने यह शासन प्रणाली ग्रेट ब्रिटेन से ली है, क्योंकि हमारे संविधान निर्माताओं को यह व्यवस्था अपने देश की राजनीतिक परिस्थितियों के ज्यादा अनुकूल लगी। इसके बरक्स अमेरिका में राष्ट्रपति शासन प्रणाली है, तथा अन्य अनेक देशों में इन दोनों के मेल से बनी अपनी विशेष पध्दतियां भी हैं। 

भारतीय राजनीति में एक ऐसा तबका है, जो पिछले तीन-चार दशक से यहां राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू करने की मांग करते रहा है। इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि देश के भीतर एक वर्ग विशेष को अमेरिका शुरु से ही बहुत प्रिय रहा है। यह वर्ग अमेरिका को स्वर्ग मानता है और वहां की एक-एक वस्तु को अमृत फल। इस शक्तिसंपन्न और मुखर वर्ग की सोच के चलते हमने अपने दैनंदिन जीवन व्यवहार में अमेरिका से बहुत कुछ ग्रहण कर लिया है। यह स्थिति निजी स्तर पर अथवा एक छोटे स्तर पर तो स्वीकार हो सकती है, लेकिन जब किसी विचार या व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की बात उठे तो उसमें बहुत ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत पड़ना स्वाभाविक है। 

राजनीति के अध्येताओं को स्मरण होगा कि कांग्रेस के एक प्रखर नेता वसंत साठे ने सत्तर के दशक में पहले-पहल राष्ट्रपति शासन प्रणाली की वकालत की थी। वे चूंकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी माने जाते थे इसलिए एक शंका यह भी उठी थी कि कहीं स्वयं इंदिराजी तो ऐसा नहीं चाहतीं। लेकिन आगे चलकर स्पष्ट हुआ कि साठेजी ने अपने ही कारणों से यह मुद्दा उठाया था। वे इसके लिए लगातार एक आंदोलन जैसा छेड़े रहे! किंतु इसमें उन्हें पार्टी के भीतर ही समर्थन प्राप्त नहीं हुआ और उस समय बात खत्म हो गई। इसके बाद भी देश में जब कभी चुनाव सुधार की बात उठी, उसके साथ अनिवार्य रूप से संसदीय बनाम राष्ट्रपति प्रणाली का मुद्दा भी उठा। इसे भी न तो आम जनता ने गंभीरता से लिया और न राजनीतिक दलों ने। यद्यपि चुनाव सुधार के अन्य बहुत से बिंदुओं पर यथोचित निर्णय लिए गए।

2014 के आम चुनाव के पहले एक बार फिर देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू करने की कोशिश की जा रही है, प्रत्यक्ष नहीं तो प्रच्छन्न ही सही। इस उद्यम की पहल भाजपा के एक वर्ग ने की है और इसमें उसे उद्योग जगत, मीडिया तथा कथित विचार समूहों या थिंक टैंक्स के एक हिस्से का समर्थन मिल रहा है। लगभग दो साल पहले इस अभियान की शुरुआत हुई, अब धीरे-धीरे उसकी तस्वीर जनता के सामने खुल रही है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह समूचा अभियान गुजरात के विवादास्पद मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को केंद्र में रखकर संचालित किया जा रहा है। इसमें पहली बार यह अनुमान भी हो रहा है कि जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 50 साल से भाजपा की राजनीति को संचालित करते आया है, वह भी एक व्यक्ति के सामने कमजोर पड़ गया है। जिस संगठन में एकचालकानुवर्ती का सिध्दांत सर्वोपरि हो, जिसकी अवज्ञा अटल बिहारी वाजपेयी जैसा लोकप्रिय नेता भी न कर पाया हो, जिसके सामने लालकृष्ण आडवानी की न चली हो, वह संगठन आज सत्ता का एक समानांतर केंद्र स्थापित करने के लिए तत्पर हो जाए, इसके पीछे कौन सी रणनीति या कौन सी विवशता है, कह पाना मुश्किल है।

बहरहाल, भाजपा ने भले ही औपचारिक घोषणा न की हो, लेकिन नरेन्द्र मोदी अभी से ऐसा आचरण कर रहे हैं, मानो वे देश के अगले प्रधानमंत्री हों। उनकी इस छवि को गढ़ने में कार्पोरेट पूंजी से प्रायोजित एक सशक्त प्रचारतंत्र लगा हुआ है। बार-बार भाजपा से नरेन्द्र मोदी तो कांग्रेस से कौन का सवाल सधे हुए ढंग से उछाला जा रहा है। मोदी पक्ष ने अपने आप ही यह तय कर लिया है कि उसका मुकाबला कांग्रेस के राहुल गांधी से है और उन्हें बार-बार सामने आने के लिए उकसाया व ललकारा जा रहा है। मोदी खेमा मानकर चल रहा है कि उसके जबरदस्त प्रचार के आगे बाकी सारी बातें बेमानी हो जाएंगी। लेकिन हकीकत क्या है, भाजपा के परिपक्व नेतागण इसे जानते हैं। 

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में टीवी पर होने वाली बहसें अपना महत्व रखती हैं, लेकिन वह स्थिति भारत में नहींहै। 543 सीटों पर चुनाव होंगे और सरकार उसी की बनेगी, जिसके पास बहुमत याने कम से कम 272 सीटें होंगी। क्या नरेन्द्र मोदी को आगे करके भाजपा इतनी सीटें ला पाएगी? यह एक असंभव सी कल्पना है। क्या भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी, यह भी आज दूर की कौड़ी लगती है। भाजपा को गठबंधन के सहयोगी कहां से मिलेंगे? भाजपा में जब संसदीय दल का नेता चुनने का अवसर आएगा, क्या उस समय भी सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, शिवराज सिंह चौहान इत्यादि नेता चुपचाप बैठे रहेंगे?

इसके अलावा मोदी खेमा यह क्यों मान बैठा है कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के प्रत्याशी होंगे? 2004 और 2009 दोनों अवसरों पर कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बनीं। राहुल गांधी ने तो मंत्री बनना भी स्वीकार नहींकिया। कैसे मान लें कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं ! इसलिए कम से कम आज राहुल गांधी को नरेन्द्र मोदी से बहस में उलझने की कोई जरूरत नहींहै। दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने खुली चुनौती दी है कि उनका पद और अनुभव श्री मोदी के समकक्ष है, और वे उनसे बहस करने तैयार हैं। नरेन्द्र मोदी को श्री सिंह की यह चुनौती स्वीकार करने का साहस दिखाना चाहिए।  

देशबंधु में 25 जुलाई 2013 को प्रकाशित