Wednesday, 31 July 2013

परिभाषा और आंकड़ों में उलझी गरीबी



आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में विचार करें तो उसमें आंकड़ों और परिभाषाओं का कोई खास मतलब नहीं होता। विशेषज्ञ इनका उपयोग नीतियां निर्धारित करने के लिए कर सकते हैं, लेकिन असली मुद्दा तो इतना ही है कि एक सामान्यजन या सामान्य परिवार के जीवन में आर्थिक सुरक्षा कितनी है तथा उस दिशा में सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। अर्थशास्त्री आंकड़ों को लेकर बहस कर सकते हैं कि शहर में एक व्यक्ति की न्यूनतम आय क्या हो और गांव में क्या हो, लेकिन ये आंकड़े न तो मनुष्य के श्रम को तौल सकते हैं और न उनसे जिन हालात का मनुष्य को दिन-प्रतिदिन सामना करना पड़ता है उसका कोई संकेत मिलता है। पार्टियों के प्रवक्ता भी पांच रुपए और बारह रुपए और तैंतीस रुपए को लेकर अपनी मुखरता का परिचय भले ही दे दें, परंतु इसके आगे उनका भी अर्थ नहीं है। इसलिए बात तो बुनियादी मुद्दों की ही करना चाहिए, तभी एक स्पष्ट तस्वीर बनाई जा सकती है। यहां से शुरू करें तो एक तो हम पाते हैं कि देश-प्रदेश में सरकार किसी की भी हो, जन आकांक्षाओं की अनदेखी करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है। हर चुनाव के पहले पार्टियां अपने घोषणा पत्र में कुछ वायदे करती हैं, कुछ नारे देती हैं और जिसकी सरकार बनती है वह अपने घोषणा पत्र के अनुसार कुछ न कुछ सकारात्मक कदम उठाती ही है। इसके लिए जो योजनाएं बनती हैं उनके क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार या लापरवाही या अन्य जो बुराइयां देखने मिलती हैं, वे न सिर्फ राजनीतिक दलों के दोहरे चरित्र की ओर बल्कि भारत की नौकरशाही और व्यापार तंत्र में व्याप्त अनैतिकता का भी सबूत देती हैं, गो कि आम बहसों में इस पक्ष को भुला दिया जाता है।

बहरहाल, राजनीतिक दलों की आधी-अधूरी संकल्पबध्दता का ही यह परिणाम है कि ऐसे अनेक कार्यक्रम और योजनाएं लागू की गई हैं, जिन्होंने नागरिकों को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक अधिकार-सम्पन्न बनाया है। यदि पिछले नौ साल के दौरान केन्द्र की यूपीए सरकार ने ऐसे अनेक अधिकार जनता को सौंपने की पहल की है तो विपक्षी दलों द्वारा शासित अनेक राज्यों में भी अपने स्तर पर ऐसे कदम समय-समय पर उठाए गए हैं। इसके बाद भी यदि जनता में असंतोष नज़र  आता है तो उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि समाज में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ है, लोग अपने अधिकारों के प्रति पहले की अपेक्षा ज्यादा सजग हुए हैं तथा उन्हें अपना असंतोष अथवा अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए अब माध्यमों की भी कोई कमी नहीं है। यह रेखांकित करना जरूरी है कि मेरा यह अवलोकन सापेक्ष है और उसे इसी तरह से समझने का मैं आग्रह करता हूं। 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी का ही उदाहरण लें। मनरेगा की वर्तमान दरों पर छत्तीसगढ़ में छोटी सी छोटी ग्राम पंचायत वाले ग्राम में भी, मेरा अनुमान है कि दस लाख रुपया प्रतिवर्ष इस खाते में आ रहा है। अगर मनरेगा का क्रियान्वयन सही हो तथा इसे गांव में स्थायी परिसम्पत्तियां निर्मित करने में लगाया जाए तो गांव के हालात तेजी से बदल सकते हैं। अभी जैसे भारतीय रेलवे ने पटरी किनारे के गांवों में मनरेगा से सहयोग लेने का नीतिगत निर्णय लिया है, यह एक स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन ऐसा न हो तब भी ग्राम पंचायत के माध्यम से गांवों में पैसा पहुंच रहा है और इससे गांव की तस्वीर कुछ न कुछ तो बदली ही है।  अगर गड़बड़ियां हैं तो उनको उजागर करने का साहस भी स्थानीय जनता करने लगी है। तथापि योजना का सुचारु संचालन कैसे हो, इसकी जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की न हो, नौकरशाही, चुने हुए पंच-सरपंच तथा गांव के प्रबुध्दजन- उन्हें भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

कुछ इसी तरह की स्थिति शिक्षा का अधिकार, मध्यान्ह भोजन योजना, आंगनबाड़ी, संस्थागत प्रसूति, आशा अथवा मितानिन इत्यादि कार्यक्रमों में भी देखने मिलती है। सर्वशिक्षा अभियान के तहत स्कूलों की अधोसंरचना के विकास के लिए अरबों रुपया आबंटित किया जाता है। आप जीडीपी का कितना प्रतिशत शिक्षा व स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि जो वित्तीय आबंटन है उसका सही इस्तेमाल किया जाए। अगर स्कूल के भवन सही बनेंगे व वहां अन्य व्यवस्थाएं भी ठीक हो जाएंगी तो देश में एक संपूर्ण शिक्षित समाज बनाने में बहुत यादा समय नहीं लगेगा। मिड डे मील के कारण स्कूलों में बच्चों की आवक बढ़ी है, लेकिन यह ध्यान देना भी आवश्यक है कि उनकी पढ़ाई ठीक से हो।


यह बात विचित्र लगती है कि देश में बड़े स्तर पर हुए उन घोटालों का ढिंढोरा तो बहुत पीटा जाता है जिनका आम जनता के साथ प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है, लेकिन जब बात आम आदमी से जुड़े सीधे मसलों याने रोटी, कपड़ा, मकान, पढाई, सेहत जैसे सीधे प्रश्नों की हो वहां भ्रष्टाचार पर परदा डालने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जाती। ऐसा क्या इसलिए है कि निचले स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार में जनता का एक बड़ा वर्ग भी अक्सर स्वेच्छा से शामिल रहता है और उसे उजागर करने में सामान्य व्यक्ति खतरा महसूस करता है? मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से ही उदाहरण लें तो कितने ही शासकीय कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के प्रकरण हाल के समय में उजागर हुए, लेकिन उनमें से एक पर भी कोई सटीक कार्रवाई पिछले दस साल के दौरान सुनने नहीं मिली।

मैं अपने अवलोकन के आधार पर कह सकता हूं कि भारत में हाल के बरसों में आर्थिक तरक्की तो निश्चित रूप से हुई है तथा वह दिल्ली या मुंबई तक सीमित न रहकर देश के सुदूर कोनों तक भी पहुंची है, लेकिन उसका पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिए स्वयं जनता को जिस सजगता का परिचय देना चाहिए वह उसने नहीं दिया है। जो यथास्थितिवादी दल हैं याने कांग्रेस और भाजपा उन्होंने भी मैदानी स्तर पर जनता को तैयार करने से परहेज ही किया है। क्षेत्रीय दलों से तो कोई उम्मीद रखना ही बेकार है, लेकिन वामदलों की आलोचना करते हुए कहना होगा कि उन्होंने अपना खोया जनाधार वापिस पाने का एक बड़ा और लंबा मौका यूं ही गंवा दिया है। साथ ही एक विडम्बना यह भी देखने मिली कि पहले जो गांव-गांव में नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मिल जाते थे, उनकी प्रजाति भी लगभग विलुप्त हो चुकी है।

इससे परे हटकर दो अहम् मुद्दे हैं जो विचार की मांग करते हैं। एक तो यह सच्चाई है कि पिछले पच्चीस साल के दौरान देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बहुत तेजी के साथ बढ़ी है। यह ठीक है कि बहुत सी कल्याणकारी योजनाओं के चलते अब भूख से मरने की खबर शायद ही कहीं से आती हो, लेकिन बड़े और छोटे के बीच इतना बड़ा फर्क पहले कभी नहीं था। इसके लिए सारे राजनीतिक दल एक समान दोषी हैं। जिस तरह से अंबानी बंधु इत्यादि सम्पन्न लोग अपने वैभव का अहंकारपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं वह जुगुप्सा पैदा करता है। मुझे लगता है कि वाम मोर्चा या मेधा पाटकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता यदि अंबानी महल के सामने जाकर प्रदर्शन करते तो वह अधिक कारगर होता। दुर्भाग्य से इस मसले पर कोई राजनेता, कोई बुध्दिजीवी, कोई समाज चिंतक बात ही नहीं करता। 
दूसरा गंभीर मसला देश की जनसंख्या का है। मेरी दृष्टि में वह अवधारणा अर्थहीन हो गई है कि ज्यादा बच्चे होंगे तो ज्यादा काम करने वाले हाथ होंगे। इस मुद्दे पर क्या राजनेता, क्या बुध्दिजीवी, सब अपने आपको धोखे में रख रहे हैं। देश के पास जो भी संसाधन हैं- धरती, जल, खनिज, वन-सब सीमित हैं। जबकि बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण आवश्यकताएं तेजी से बढ़ रही हैं। संजय गांधी के अति उत्साह का जो दुष्परिणाम हुआ उसके भय से आज कोई भी जिम्मेदार राजनेता इस बारे में सीधे-सीधे से बात करने में कतराता है, लेकिन सच्चाई से कब तक मुंह छिपाया जाएगा? 

मेरे तर्कों से पाठक असहमत हो सकते हैं, लेकिन मुख्य बात यही है कि विमर्श को वायवी परिभाषाओं, कटाक्षों, चरित्रहनन आदि से हटाकर वापिस मूलभूत प्रश्नों की ओर लाया जाए। 

देशबंधु में 01 अगस्त 2013 को प्रकाशित