Wednesday, 1 January 2014

क्या अमेरिका भारत का दोस्त है?

अमेरिका की धरती पर भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागडे क़ी गिरफ्तारी का प्रसंग दुर्भाग्यपूर्ण है, किन्तु वह भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों पर नए सिरे से सोचने का अवसर भी देता है। बशर्ते भारत ऐसा करने के लिए तैयार हो।

भारत और अमेरिका के संबंध आज के नहीं हैं। भारत जब अंग्रेजों की गुलामी झेल रहा था तब भी भारत में एक वर्ग ऐसा था जिसके मन में अमेरिका के प्रति एक नई संभावनाओं का देश होने का आकर्षण था। मुझे अगर ठीक से पता है तो पिछली सदी के प्रारंभ में ही पंजाब से कुछ किसान उस दौर में यात्रा की तमाम तकलीफें उठाकर कैलिफोर्निया पहुंचे थे और वहां खेती शुरू की थी। यह शायद प्रथम विश्वयुध्द के पहले का समय था जब पासपोर्ट का आविष्कार नहीं हुआ था। इन किसानों के परिवार में ही सरदार दलीप सिंग सोंढ हुए थे जो संभवत: 1950 के दशक में कैलिफोर्निया प्रांत की विधानसभा  के लिए चुने गए थे। यह इतिहास का एक रोचक प्रसंग है, यद्यपि आज के विषय से इसका कोई विशेष संबंध नहीं है। प्रसंगवश यह जिक्र भी कर देना चाहिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना जीवन दर्शन विकसित करने में जिन महान व्यक्तियों से प्रेरणा मिली, उनमें से एक हेनरी डेविड थोरो अमेरिकी ही थे।


भारत के स्वाधीनता संग्राम के पन्ने पलटने से ज्ञात होता है कि अमेरिका में बड़ी संख्या में ऐसे उदारवादी राजनीतिज्ञ एवं बुध्दिजीवी थे, जो भारत के साथ सहानुभूति रखते थे और चाहते थे कि उसे शीघ्रातिशीघ्र परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्ति मिले। इनमें अमेरिका के महान राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट भी थे, जो इस बारे में ब्रिटिश सरकार पर अपनी ओर से दबाव डालते रहे। महात्मा गांधी को जहां अश्वेत अमेरिकी नेता बुकर टी वाशिंगटन ने गहरे रूप से प्रभावित किया था, वहीं मार्टिन लूथर किंग (जूनि) का पूरा जीवन ही गांधीजी से प्रेरित था। अमर अश्वेत गायक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता पॉल रॉब्सन पंडित नेहरू के आत्मीय मित्र थे तथा जब विजयलक्ष्मी पंडित की बेटियां अमेरिका पढ़ने के लिए गईं तो श्रीमती रॉब्सन को पंडितजी ने उनका अभिभावक नियुक्त किया, क्योंकि तब रॉब्सन जेल में थे। भारत में अमेरिकी राजदूत रहे सुप्रसिध्द अर्थशास्त्री जॉन केनेथ गॉलब्रेथ भी नेहरू जी के व्यक्तिगत मित्र थे। मुझे यह भी याद आता है कि एक अन्य अमेरिकी राजदूत चेस्टर बोल्स की बेटी सिंथिया ने ''भारत मेरा घर'' नाम से अपने संस्मरणों की पुस्तक प्रकाशित की थी।


ऐसे उदाहरणों से एकबारगी लगता है कि भारत और अमेरिका के बीच संबंध बेहद सौहार्द्रपूर्ण होना चाहिए लेकिन वस्तुस्थिति इस सदेच्छा के एकदम विपरीत है। बीसवीं सदी में अमेरिका का उदय एक महाशक्ति के रूप में हो रहा था। द्वितीय विश्वयुध्द समाप्त होते न होते उसने यह स्थान मुक्कमल तौर पर हासिल कर लिया था, जबकि ब्रिटिश साम्राय बिखरने की कगार पर पहुंच चुका था। यही समय था जब अमेरिका को लगा कि सारे विश्व को उसके सामने सिर झुकाना चाहिए। इसमें अडचन इस बात की थी कि सोवियत संघ दूसरी महाशक्ति के रूप में सामने था तथा आगे-पीछे चीन के उभरने की संभावनाएं भी दिखने लगी थीं। इस नाते अमेरिका के लिए यह जरूरी था कि वह रूस, चीन व साम्यवाद  को आगे बढ़ने से रोके ही नहीं, बल्कि उन्हें तोड़ कर रख दे।


अपनी इस वैश्विक परियोजना के लिए अमेरिका को दुनिया के अलग-अलग कोनों में सहयोगियों की जरूरत थी। उस समय दक्षिण अमेरिका या लैटिन अमेरिका लगभग उसकी मुट्ठी में था, यूरोप को द्वितीय विश्व युध्द के ध्वंस के बाद पुनर्निर्माण के लिए अमेरिकी पूंजी दरकार थी, उसने चीन के बजाय ताइवान को संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बनाया, मध्य पूर्व में इजराइल के रूप में उसका एक एजेंट देश स्थापित हो चुका था, सुदूर जापान भी युध्द के बाद शक्तिहीन था; इस परिदृश्य में अमेरिका को बस, दक्षिण एशिया के विशाल भू-भाग पर एक कठपुतली देश की जरूरत थी। उसे मालूम था कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत कभी भी उसका ताबेदार नहीं बनेगा। इसलिए उसने एक तरफ काश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने की भूमिका रची, वहीं उसने पाकिस्तान को शुरू से ही अपने चंगुल में ले लिया। अब वह पाकिस्तान में अपने पैर जमाकर वहां से एक तरफ चीन, दूसरी तरफ रूस और तीसरी तरफ ईरान, इराक आदि पर नज़र  रख सकता था। 


1947 से लेकर अब तक का घटनाचक्र बतलाता है कि विश्व में अपनी दादागिरी स्थापित करने के चक्कर में अमेरिका ने भारत को कभी भी अपना मित्र नहीं माना। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में काश्मीर के मसले पर हमेशा भारत का विरोध किया, बंगलादेश मुक्ति संग्राम के दौरान उसने भारत के साथ दुश्मनों जैसा बर्ताव किया, उसकी गुप्तचर संस्था सीआईए ने भारतीय विमान ''काश्मीर प्रिंसेस'' को विस्फोट से उड़ाकर भारत-चीन के बीच दुश्मनी पैदा करने की कोशिश की और जब कभी भारत के प्रति सहायता का हाथ बढ़ाया तो सिर्फ ऐसे मौकों पर जब उसे ऐसा करने में अपना फायदा प्रतीत हुआ। पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी अमेरिका के इन मंसूबों को भलीभांति समझते थे। इसलिए उन्होंने कभी भी अमेरिका के साथ अपने संबंधों में कोई उतावलापन नहीं दिखाया।


इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू है। भारत को स्वाधीनता के बाद अपने नवनिर्माण में यदि किसी देश ने सबसे यादा सहायता दी, वह भी उदार और निशर्त, तो वह सोवियत संघ था। काश्मीर के प्रश्न पर उसने अपने वीटो का इस्तेमाल हमेशा भारत के पक्ष में किया, उसने भिलाई इस्पात संयंत्र स्थापित करने में भरपूर मदद की, बुदनी (म.प्र.) का ट्रेक्टर प्रशिक्षण केन्द्र और सूरतगढ़ (राज.) का सामुदायिक कृषि फार्म जैसी संस्थाएं उसके सहयोग से स्थापित हुईं, उसने विदेशी मुद्रा के बदले हमसे रुपयों में सौदा किया, भले ही भारतीय मुद्रा की उसे कोई जरूरत नहीं थी। सैन्य सामग्री में भी सोवियत संघ ने भारत की मदद की। इस सबके बावजूद यह विडंबना ही कही जाएगी कि भारत के सुखी-सम्पन्न-स्वार्थी तबके ने सोवियत संघ को अपना मित्र नहीं माना, बल्कि हर मौके पर उसका मखौल उड़ाया और जो अमेरिका भारत को अपने पैरों तले रखना चाहता है उसकी चरण-धूलि अपने माथे पर लगाकर यह वर्ग विभोर होते रहा।


एक पल के लिए भारत और लैटिन अमेरिका के देशों की तुलना करके देखें। दक्षिण अमेरिका के अधिकतर देश अभी हाल तक ''बनाना रिपब्लिक'' के रूप में जाने जाते थे। केले का बहुतायत उत्पादन करने वाले इन देशों की राजनीति, अर्थनीति और सैन्यनीति पर अमेरिका का ही नियंत्रण था, लेकिन इन देशों के नागरिकों ने लंबे समय तक इस दासता को स्वीकार नहीं किया। क्यूबा के फिडेल कास्त्रो से प्रेरणा लेकर इन देशों ने स्वयं को अमेरिकी प्रभाव से मुक्त किया और आगे बढ़ने के लिए अपना रास्ता खुद तय करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने अनगिनत कुर्बानियां भी दीं, लेकिन इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है? इस देश के नौजवान आईआईटी, आईआईएम और अन्य संस्थाओं से पढ़कर अमेरिका की ओर भागे जा रहे हैं कि मानो मुक्ति वहां जाकर ही मिलेगी। जिनके पास यादा साधन है वे तो अपने बच्चों की पढ़ाई अमेरिका में ही करवाते हैं। ये जब कभी हिन्दुस्तान आते हैं तो आते साथ बीमार पड़ जाते हैं। इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि अमेरिका ने एक राजनीतिक शक्ति के रूप में भारत के साथ कैसा व्यवहार किया है। दूसरे शब्दों में, इस स्वार्थी समाज के लिए देश कोई मायने नहीं रखता, अपनी सुख-सुविधा ही इनके लिए सर्वोपरि है। श्रीकांत वर्मा की एक प्रसिध्द कविता पंक्ति है - ''दोस्तो! देश को खोकर प्राप्त की है मैंने कविता''। इस पंक्ति को बदलकर कहना होगा कि-''हिंदुस्तानियों! देश को खोकर मैंने प्राप्त की है अमेरिका की चाकरी।''


आज यदि अमेरिका ने देवयानी खोब्रागड़े को गिरफ्तार करने का दु:साहस दिखाया है तो उसकी वजह यही है कि अमेरिका जानता है कि भारत में उसके क्रीतदास इस व्यवहार को बर्दाश्त करने या उसकी अनदेखी करने, बल्कि इस मामले में अमेरिका का समर्थन करने तक के लिए तैयार बैठे हैं। हमारे लिए मानो एक सौ नब्बे साल की गुलामी का अनुभव पर्याप्त नहीं था इसीलिए हमने एक बार फिर खुशी-खुशी अपने को गुलाम बनाने के लिए अमेरिका के हाथों सौंप दिया है।


देशबंधु में 02 जनवरी 2014 को प्रकाशित