Wednesday, 22 January 2014

'आप' की राह निराली




मेरा
हमेशा से मानना रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असंतोष व असहमतियों का निराकरण संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही होना चाहिए। भारत के संविधान ने हमें एक तरफ प्रतिनिधि संस्थाएं दी हैं और दूसरी तरफ नागरिकों को यह अधिकार भी दिया है कि वे अहिंसक और शांतिपूर्ण रास्ते से आंदोलन कर सकें। दूसरे शब्दों में यदि जनता की आवाज निर्वाचित सदनों में अनसुनी की जा रही है, तो सड़क पर आने का विकल्प उसके सामने खुला हुआ है। देश में विभिन्न समुदाय अपने संगठन बनाते रहे हैं। औपचारिक व अनौपचारिक ढंग से आंदोलनों का एक लंबा चलता हुआ सिलसिला 1947 से अब तक देखा जा सकता है। जनांदोलनों की सफलता अथवा असफलता के अनेक उदाहरण सामने हैं। देश ने इन्हीं में से समय-समय पर नए नेतृत्व का उभार होते भी देखा है। जब-जब नया नेतृत्व उभरा है तब-तब देश की राजनीति में भी छोटे-बड़े परिवर्तन देखने भी मिले हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि यदि प्रतिनिधि सदन और जनांदोलन दोनों संवैधानिक आदर्शों और मर्यादाओं का पालन करते चलें तो इससे भारतीय लोकतंत्र मजबूत ही होगा।

इस पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल दोनों का परीक्षण किया जाना सम्यक, समीचीन है। हाल के विधानसभा चुनावों में दिल्ली में आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के बावजूद उसे मिला वोट प्रतिशत और सीटें यह सिध्द करने के लिए पर्याप्त थे कि दिल्ली का मतदाता अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उभरी इस नई पार्टी में राजनीति की एक नई दिशा बनने की संभावना देख रहा था। मैं समझता हूं कि कांग्रेस पार्टी ने अपने बाहरी समर्थन से श्री केजरीवाल को सरकार बनाने का मौका देकर दिल्ली के मतदाताओं की इस जनतांत्रिक इच्छा का सम्मान ही किया। भारतीय जनता पार्टी इस बारे में चाहे जो आरोप लगाती रहे, उसके अपने कारण हैं, लेकिन एक नए प्रयोग को स्वयं को सिध्द करने का अवसर देना उचित ही था। यूं तो सबसे बेहतर प्रदर्शन के कारण सरकार बनाने का पहला हक भाजपा को मिला ही था, लेकिन उसे आशंका थी कि उसकी सरकार विश्वास मत में पराजित हो सकती थी। उसकी सरकार कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त से ही बन पाना संभव था। भाजपा को इससे कोई परहेज भी नहीं होता। कर्नाटक, झारखंड और अन्यत्र उसने ऐसा पहले किया भी है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने जो नया राजनीतिक वातावरण रचा उसमें ऐसा करने से भाजपा की बदनामी होती।

आम आदमी पार्टी ने सुदीर्घ विचार मंथन के बाद दिल्ली में सरकार बनाने का फैसला लिया। इतना समय तो सीपीआईएम के  पोलित ब्यूरो ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने का निर्णय लेने में भी नहीं लिया था। श्री केजरीवाल ने इस विचार मंथन की प्रक्रिया में जनमत संग्रह करने जैसे नाटकीय कदम भी उठाए। बहरहाल, जब एक बार तय हो गया था कि सरकार संभालना है तो सांकेतिक कदमों के साथ एक ठोस कार्य योजना बनाने पर भी उन्हें शीघ्रातिशीघ्र विचार करना चाहिए था। सार्वजनिक जीवन में सादगी और शुचिता लाने के लिए ''आप'' ने जो जो सांकेतिक कदम उठाए, उनमें से कुछ की मैं सराहना करता हूं। मसलन मोटर-कार पर लालबत्ती न लगाना, मंत्रियों की सुरक्षा में कटौती, छोटे मकान में आवास इत्यादि। लेकिन पहले दिन ही उनके दो सांकेतिक कदम ऐसे थे जिनमें सादगी की भावना कम, दिखावा यादा था। एक तो शपथ ग्रहण के लिए मैट्रो में आने से कोई बात नहीं बनती। यह कार्य सिर्फ दिखाने के लिए ही किया गया था। दूसरे रामलीला मैदान में भारी भीड़ के बीच में शपथ लेना भी एक प्रदर्शन ही था। श्री केजरीवाल और उनके साथी राजभवन में सादे समारोह में शपथ लेकर अपनी नई जिम्मेदारियां संभाल सकते थे।

यह आजकल का फैशन हो गया है कि विशाल जनसमूह की उपस्थिति में शपथ ग्रहण की जाए। इसकी शुरूआत 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सरकार ने की थी। अब यह चलन सब तरफ चल पड़ा है। इसमें होता यह है कि सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता स्वेच्छा से या दबाव से सभास्थल पर लाए जाते हैं। उन्हें संभालने में पुलिस और प्रशासन को मजबूरन अतिरिक्त काम करना पड़ता है। ऐसे अवसर पर मंत्रियों और वीआईपीजनों  को कोई कष्ट नहीं होता, लेकिन आम जनता के हिस्से में सिर्फ उड़ती हुई धूल आती है। असली फायदा होता है शामियाना और पंडाल लगाने वालों को। मैं नहीं समझता कि श्री केजरीवाल इस सच्चाई से वाकिफ नहीं थे। खैर! यह तो जो होना था हुआ। इसके बाद सरकार को जनाकांक्षा पूरी करने के लिए  जिस ठोस कार्ययोजना की जरूरत थी उसका क्या हुआ? अपने घोषणापत्र में समयबध्द कार्य सम्पन्न करने के जो वायदे किए गए थे उनका भी क्या हुआ? चलिए मान लेते हैं कि गैर-अनुभवी होने के कारण उन्हें नए सिरे से अपनी रीति-नीति एवं समय सीमाओं को संशोधित करने की जरूरत है तो क्या वे ऐसा कर रहे हैं?

श्री केजरीवाल को दिल्ली का शासन संभाले हुए साढ़े तीन सप्ताह बीत चुके हैं। ऐसा दिखाई तो देता है कि वे बहुत कुछ एक झटके में कर लेना चाहते हैं। वे और उनके मंत्री इसीलिए खलीफा हारून अल रशीद की तरह रात-बिरात सड़कों पर गश्त लगाते घूम रहे हैं। औरों की तो पता नहीं, स्वयं श्री केजरीवाल का स्वास्थ्य उन्हें ऐसी भाग-दौड़ करने की इजाजत नहीं देता है। टीवी पर नज़र आता है कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हैं। इसे शायद वे अपनी बहादुरी मान रहे हैं, लेकिन यदि उनके जीवन में कोई बड़ा लक्ष्य है, तो वह खुद की सेहत की उपेक्षा करने से हासिल नहीं हो सकता। संभव है कि देश-विदेश में उनका जो गुणगान हो रहा है उससे वे प्रेरित ही नहीं, बल्कि उत्तेजित हैं। मेरी राय में उन्हें इस समय उत्तेजना की बजाय धैर्य व संयम से काम लेने की जरूरत है। हिन्दी कहावत कहूं तो यार-दोस्तों के कहने से ''चढ़ जा बेटा सूली पर'' के मनोभाव से उन्हें बचना चाहिए।

मैं श्री केजरीवाल के गुरु (?) अन्ना हजारे के उस कार्य का प्रशंसक था, जो उन्होंने अपने गांव रालेगांव सिध्दि में किया था। इससे उत्साहित हो वे मसीहा बनने की राह पर चल पड़े थे। इस राह में उन्हें श्री केजरीवाल जैसे समर्थक मिले। 2011 में दिल्ली में अन्ना हजारे ने जो आंदोलन किया उसका वर्णन दुबारा करने की यहां जरूरत नहीं है। मैंने उस वक्त भी श्री हजारे एवं उनके साथियों के आंदोलन की लगातार आलोचना की थी। वह आंदोलन मुझे स्वस्फूर्त होने की बजाय प्रायोजित लगा था। कालांतर में गुरु-शिष्य के बीच मतभेद उभरे यह समझ आया कि जो संघ परिवार अन्ना के आंदोलन को हवा दे रहा था वहीं उन्हें भाजपा के राजनीतिक दर्शन की ओर आकर्षित कर रहा था। यह बात धीरे-धीरे कर साफ भी हो रही है। उधर श्री केजरीवाल ने आंदोलन का रास्ता छोड़ एक राजनीतिक पार्टी खड़ी कर ली। इसका स्वागत इस रूप में हुआ कि अरविंद केजरीवाल के आने से देश की राजनीतिक जीवन में शुचिता बढ़ेगी, लेकिन अब जो हो रहा है उसे क्या समझा जाए?

श्री केजरीवाल दिल्ली में धरने पर बैठ गए। एक मुख्यमंत्री का सड़क पर धरने पर बैठना भारत के लिए अभूतपूर्व तो नहीं, लेकिन विचित्र सत्य अवश्य है। श्री केजरीवाल ने सोमवार को यह भी कहा कि- ''हां, वे अराजकतावादी हैं।'' यह दूसरा विचित्र सत्य है। एक मुख्यमंत्री चाहे कितने भी अतिवादी विचारों का हो वह एक राजनीतिक ढांचे का ही अंग है और इसलिए वह अराजक नहीं हो सकता। अगर श्री केजरीवाल को अपने अराजक होने पर इतना ही विश्वास है तो फिर उन्हें स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद त्याग देना चाहिए। आज वे जहां हैं वहां अपने सपनों को सच्चाई में बदलने के लिए उनके पास एक पूरा तंत्र मौजूद है, किन्तु जब वे उसी तंत्र के विरोध में सड़क पर आकर खड़े हो जाते हैं तो फिर वे सदन में बने रहने की अपनी पात्रता को संदिग्ध बना देते हैं। आम आदमी पार्टी के प्रमुख भाष्यकार योगेंद्र यादव व उनके समर्थक चाहे जो स्पष्टीकरण दें, आप सरकार अभी जो कुछ कर रही है उसमें संवैधानिक प्रक्रियाओं का निषेध ही दिखाई देता है।


देशबंधु में 23 जनवरी 2014 को प्रकाशित