Thursday, 28 August 2014

योजना आयोग का अंत?




जैसे केन्द्र में योजना आयोग है उसी तरह प्रांतों में लंबे समय से राज्य योजना मंडल चले आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में तीन-चार वर्ष पूर्व इसको दर्जा बढ़ाकर राज्य योजना आयोग में तब्दील कर दिया गया। प्रदेश के सेवानिवृत मुख्य सचिव शिवराज सिंह इस नवगठित आयोग के पहले उपाध्यक्ष बनाए गए, उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया। श्री सिंह का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कुछ ही माह पूर्व रिटायर हुए एक अन्य मुख्य सचिव सुनील कुमार कैबिनेट मंत्री के ओहदे के साथ उपाध्यक्ष मनोनीत किए गए। इस आयोग में किशोर रोमांस के लेखक चेतन भगत को भी सदस्य बनाया गया है। वे इस संस्था के कामकाज में क्या योगदान कर पाएंगे, यह संदिग्ध है। इस विवरण से पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह प्रदेश स्तर पर योजनाबद्ध तरीके से विकास और निर्माण का कार्य करना चाहते हैं तथा इसके लिए एक सक्षम व अधिकार-सम्पन्न संस्था की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं।

आज जब प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी योजना आयोग को समाप्त करने की घोषणा कर चुके हैं, तब इस विरोधाभास पर ध्यान जाए बगैर नहीं रहता कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व मंडल में ही इस मुद्दे पर एक राय नहीं बन पाई है। ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं होता कि नरेन्द्र मोदी पार्टी के भीतर इस विषय पर लोकतांत्रिक तरीके से बहस का मौका देते और बाकी की न सही, कम से कम अपने मुख्यमंत्रियों की ही राय ले लेते। यदि प्रधानमंत्री को अपने विचार पर ही दृढ़ रहना था तो वे रमन सिंह व पार्टी के अन्य मुख्यमंत्रियों को निर्देश दे सकते थे कि वे भी अपने-अपने राज्य में संचालित योजना मंडल अथवा योजना आयोग को समाप्त करने की कार्रवाई शुरू कर दें। ऐसा नहीं हुआ और इससे यही संदेश जाता है कि राष्ट्रीय महत्व के बड़े मुद्दों पर भी भाजपा में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। इस धारणा की पुष्टि जीएसटी को लेकर भाजपा में जो मतभेद उभरे हैं उनसे भी होती है।

स्वाधीनता दिवस पर परंपरा चली आ रही है कि लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री लोकहित के मुद्दों पर कुछेक महत्वपूर्ण घोषणाएं करते हैं। नरेन्द्र मोदी से भी यही अपेक्षा थी। प्रधानमंत्री जन-धन योजना की घोषणा में इस परंपरा का पालन भी किया गया। यद्यपि इसमें कोई नई बात नहीं थी। आधारकार्ड एवं विशिष्ट पहचान पत्र की पूरी कवायद के पीछे यही भावना थी कि हर नागरिक का बैंक खाता खुलना चाहिए। खैर! प्रधानमंत्री ने जो दूसरी घोषणा योजना आयोग को समाप्त करने के बारे में की, वह पूरी तरह से एक नकारात्मक विचार था, जो एक मायने में परंपरा के विपरीत ही था। यह घोषणा तो प्रधानमंत्री लोकसभा में भी कर सकते थे; खासकर तब जबकि मानसून सत्र चल ही रहा था। योजना आयोग से आम जनता का कोई प्रत्यक्ष लेना-देना नहीं है। इस नाते उसके बारे में की गई घोषणा की जनमानस में कोई व्यापक प्रतिक्रिया नहीं होना थी और न हुई।

नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल के सौ दिन अब पूरे होने जा रहे हैं। इस बीच में सरकार का कामकाज जैसा देखने में आया है, उससे यह धारणा प्रबल होती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जिस तरह से ''एकचालकानुवर्ती के सिद्धांत पर काम होता है वही परिपाटी श्री मोदी सरकार में भी चलाना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में केन्द्र सरकार में निर्णय के लगभग सारे अधिकार उन्होंने अपने पास सुरक्षित रख लिए हैं। उनकी कार्यशैली में वरिष्ठ मंत्रियों के लिए भी जो सम्मान है वह सिर्फ दिखावे के लिए दिखता है। यह स्थिति जनतंत्र के लिए कितनी अनुकूल है यह तो भाजपा के मंत्रियों और सांसदों को ही सोचना है। श्री मोदी जो भी निर्णय लेते हों, यह तो तय है कि वे निर्णय लेने के पूर्व कुछ विश्वासपात्रों से परामर्श करते होंगे। ऐसा सुनने में भी आता है कि उन्होंने मंत्रिमंडल के समानांतर सलाहकारों की एक अलग टीम बना रखी है! यह हम नहीं जानते कि यह बात कितनी सच है।

योजना आयोग को समाप्त करने का निर्णय प्रधानमंत्री ने स्वयं होकर लिया हो या कथित सलाहकारों से मशविरा करने के बाद, इसमें अनावश्यक जल्दबाजी नज़र आती है। शंका होती है कि यह निर्णय श्री मोदी ने अपने कारपोरेट समर्थकों की खुशी के लिए लिया है! यह हम जानते हैं कि देश की आर्थिक नीतियां तय करने में 1991 याने पी.वी. नरसिम्हाराव के काल से कारपोरेट घरानों की दखलंदाजी लगातार चली आई है और समय के साथ बढ़ती गई है। कांग्रेस और यूपीए के सरकारों के दौरान भी ऐसे शक्तिसंपन्न पैनल आदि बनाए गए जिसमें कारपोरेट प्रभुओं को सम्मान के साथ जगह दी गई। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने राज्य योजना मंडल में अंबानी समूह के किसी डायरेक्टर को मनोनीत किया था, ऐसा मुझे याद आता है। जिस तरह से राज्य सभा में पूंजीपति सदस्यों की संख्या जिस तरह लगातार बढ़ी है, वह भी इस प्रवृत्ति का उदाहरण है।

कहने का आशय यह है कि कारपोरेट घराने नहीं चाहेंगे कि सरकार योजनाएं बनाएं। चूंकि सरकार जनता के वोटों से चुनी जाकर बनती है, इसलिए यह उसकी मजबूरी है कि वह दिखावे के लिए ही सही, जनता के हित व कल्याण की बात करे।  योजना आयोग या योजना मण्डल नीतियां बनाएंगे तो उनमें जनहित के मुद्दों को प्रमुखता के साथ उठाया जाएगा। यही स्थिति कारपोरेट जगत को नागवार गुजर रही है। उसे अपने खेलने के लिए खुला मैदान चाहिए जहां किसी भी तरह का प्रतिबंध न हो। वह जो अकूत कमाई करे उसमें से रिस-रिस कर नीचे तक जितना पहुंच जाए, जनता उतने में खुश रहे और खैर मनाए। योजना आयोग अगर समाप्त हो जाए, तो फिर कहना ही क्या है। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।

प्रधानमंत्री की इस योजना से जो लोग खुश नज़र आ रहे हैं, कहने के लिए उनका तर्क है कि योजना आयोग अपनी उपादेयता और प्रासंगिकता खो चुका है। वे यह भी कहते हैं कि आयोग के कामकाज में बहुत सी खामियां हंै। हमारा इनसे सवाल है कि जीवन में ऐसा क्या है जो बिना योजना के सुचारु सम्पन्न होता हो? क्या कारपोरेट घरानों का कारोबार बिना किसी योजना के चलता है? वे जब अगले पांच-दस व पन्द्रह साल में अपनी कंपनी की प्रगति के संभावित आंकड़े बताते हैं तो उसके लिए उन्हें कोई दैवीय आदेश मिलता है? क्या बड़ी-बड़ी कालोनियां, बहुमंजिलें अपार्टमेंट, हवाई अड्डे, मैट्रो रेल सब बिना योजना के ही बन जाते हैं? जब बैंक वाले कारखानेदारों को ऋण देते हैं, तो अगले दस या पन्द्रह साल की संभावित प्रगति की तालिकाएं क्यों मांगते हैं? जब कोई मध्यवित्त व्यक्ति घर बनाने या कार खरीदने के लिए कर्ज लेता है तो आने वाले सालों में ऋण अदायगी क्या बिना कोई योजना बनाए हो सकती है?

पाठकों को जीवन बीमा निगम का वह विज्ञापन ध्यान होगा, जिसमें एक गृहिणी बेटी को विदा करने के बाद स्वर्गीय पति की तस्वीर को पोंछते हुए कहती है- यह अच्छा हुआ वे अपने सामने ही पूरी व्यवस्था कर गए थे।  एक सामान्य व्यक्ति के जीवन में योजना का जितना महत्व है वैसा ही व्यापार व्यवसाय में भी है और इसलिए जब देश की बात होगी तो योजना बनाने की अनिवार्यता से कैसे इंकार किया जा सकता है? गौर कीजिए कि प्रधानमंत्री ने यद्यपि योजना आयोग को समाप्त करने की घोषणा की है, लेकिन लगे हाथ उन्होंने इसके स्थान पर कोई नई संस्था गठित करने का ऐलान भी कर दिया है। यह बात कुछ विचित्र है कि इस नई संस्था का नाम क्या होगा, नीति क्या होगी, सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है, उल्टे जनता से ही इस संबंध में सुझाव मांगे जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने घोषणा करने के पूर्व उनके समक्ष जो विकल्प थे उनका अध्ययन संभवत: हड़बड़ी में नहीं किया! योजना आयोग के काम-काज में यदि त्रुटियां हैं तो उन्हें सुधारा जा सकता था। मोदीजी अपनी पसंद के अमेरिका-रिटर्न अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ अंबानी, अडानी, टाटा को आयोग का सदस्य बना सकते थे। दूसरे, घोषणा करने के बाद जनता से सुझाव मांगने का क्या औचित्य है? यह काम पहले होना चाहिए था और जनता से वैकल्पिक व्यवस्था पर सुझाव मांगे जाने चाहिए थे। तीसरे, अगर सब कुछ तय कर ही लिया था तो नई संस्था का नाम भी तय कर लेते। अंत में, हमें लगता है कि जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रारंभ परंपरा का निर्वाह करते हुए लालकिले की प्राचीर से भाषण देने का मोह भले ही श्री मोदी न छोड़ पाएं, लेकिन वे नेहरूजी की विरासत को समूल नष्ट कर देना चाहते हैं। शायद इसीलिए उन्होंने अपने भाषण में पंडित नेहरू का नाम लेना उचित नहीं समझा जबकि इसी वर्ष उनकी पचासवीं पुण्यतिथि एवं 125वीं जयंती है।
देशबन्धु में 28 अगस्त 2014 को प्रकाशित