Thursday, 16 April 2015

शिक्षा: सरकार बनाम समाज

 



एक
सज्जन कुछ दिन पहले मिलने आए। उनका एक बेटा शहर के किसी नामी स्कूल में पढ़ता है। इस साल उन्हें अपने दूसरे बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाना है। उन्होंने सहज ही सोचा कि जहां पहले से एक संतान पढ़ रही है वहीं दूसरी को भी प्रवेश मिल जाएगा। वे जब इस कार्य के लिए प्राचार्य से मिले तो सुनकर हैरान रह गए कि पहली कक्षा के लिए दिसम्बर-जनवरी में ही प्रवेश की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। यह इस तरह का इकलौता प्रकरण नहीं है। मां-बाप अपने बच्चों को अपनी जेब के मुताबिक बेहतर से बेहतर शाला में दाखिल करवाना चाहते हैं, लेकिन जिन स्कूलों ने अपनी श्रेष्ठता की छवि गढ़ ली है वहां किसी का भी वश नहीं चलता। यह छवि पैसे, प्रचार और संबंधों के बल पर गढ़ी जाती है तथा संचालक जानते हैं कि उनकी मनमानी रोकने का हौसला किसी में नहीं है।

इन दिनों एक तरफ जब स्कूली परीक्षाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं और नतीजे आने लगे हैं तो वहीं दूसरी तरफ नामी स्कूलों में प्रवेश पाने के लिए लंबी कतारें लगी हुई हैं। कहीं बच्चों की परीक्षा ली जा रही है, तो कहीं पालकों की। नियमित फीस तो लगना ही है, इसके अलावा अन्य मदों में भी पैसे की उगाही हो रही है, फिर वह जायज हो या न हो। सवाल उठना लाजिमी है कि अभिभावकगण अपने पाल्यों को इन शालाओं में पढ़ाने के लिए ही इस कदर परेशान क्यों हैं। सामान्य तौर पर उत्तर यही मिलता है कि अच्छे स्कूल में पढ़ेंगे तो बच्चे की जिन्दगी संवर जाएगी। वे यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह वास्तविकता है या उनका भ्रम। मुझे ध्यान नहीं आता अगर किसी संस्था ने यह शोध की हो कि इन स्कूलों से पढ़कर निकले बच्चे क्या सचमुच अपने अभिभावकों के सपनों को साकार करने में कामयाब हो सके और इससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह भी है कि आखिरकार कामयाबी का पैमाना क्या है?

प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जब शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने की पहल की गई और जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया गया तो मुझ जैसे लोगों को बेहद खुशी हुई थी क्योंकि इसके साथ देश की नई पीढ़ी के लिए विराट संभावनाएं खुलती प्रतीत हो रही थीं। मैंने पांच साल पहले जितनी प्रसन्नता अनुभव की थी आज उतनी ही हताशा महसूस कर रहा हूं। मैं देख रहा हूं कि न सरकार, न समाज, न अध्यापक, न अभिभावक- किसी की भी दिलचस्पी शिक्षा का अधिकार कानून की भावना को समझकर उसे सही तरह से लागू करने में नहीं है। इस कानून की जब भी बात होती है तो सबका ध्यान सिर्फ एक बिन्दु पर जाकर रुक जाता है तथा कानून के बाकी प्रावधान अनछुए रह जाते हैं।

यह बात लगभग सबको पता है कि शिक्षा का अधिकार कानून में निजी स्कूलों में पहली कक्षा से शुरु होकर पच्चीस प्रतिशत स्थान सुविधाहीन परिवारों के बच्चों के लिए आरक्षित किए गए हैं। हो यह रहा है कि हर अभिभावक अपने पाल्य को इस प्रावधान के अंतर्गत किसी निजी स्कूल में येन-केन-प्रकारेण प्रवेश दिलाना चाहते हैं। वे इसके लिए दौड़ धूप करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। सरकार ने नियम तो बनाए हैं कि सरकारी स्कूल के प्राचार्य नोडल अधिकारी होंगे और सुनिश्चित करेंगे कि आस-पास के निजी स्कूलों में पच्चीस प्रतिशत सीटें उन बच्चों को दी जाएं जो फीस नहीं भर सकते।  इससे निजी स्कूल को जो आर्थिक क्षति होगी उसकी भरपाई करने का नियम भी सरकार ने बनाया है, लेकिन इस प्रावधान का लगातार उल्लंघन हो रहा है और छत्तीसगढ़ सरकार ने तो कानून को सिर के बल खड़ा कर दिया है। वह भी तब जबकि शिक्षामंत्री स्वयं एक आदिवासी युवक हैं।

पिछले पांच साल से पूरे देश से लगातार खबरें आ रही हैं कि निजी स्कूल गरीब बच्चों को अपने यहां प्रवेश नहीं देते। इन शालाओं की फीस पचास-साठ हजार साल से लेकर पांच लाख रुपए साल तक की होती है। कानून का पालन करने में उन्हें घाटा ही घाटा न•ार आता है। अर्थहानि तो खैर है ही, क्योंकि सरकार उनकी फीस का कुछ हिस्सा ही वापिस लौटाती है; किन्तु इससे बढ़कर उनका डर है कि गरीबों के बच्चे अगर इनके स्कूलों में पढ़ेंगे तो दूसरे बच्चे बिगड़ जाएगे। स्कूल का प्रबंधन और शिक्षक तो ऐसा मानते ही हैं, सम्पन्न अभिभावकों के मन में भी यही भावना होती है। इन सबके मन में दुराग्रह है कि गरीबों के बच्चे अनिवार्यत: बिगड़े  हुए होते हैं। भारतीय समाज में आदिवासी, दलित, किसान, मजदूर- इन सबके प्रति जो घृणा का भाव कथित सभ्य समाज में है यह उसका ज्वलंत उदाहरण है।  इसके अलावा अपने बच्चों को महंगे, निजी, विशिष्ट स्कूलों में पढ़ाने और गरीब बच्चों को उनसे दूर रखने के पीछे यह प्रयोजन भी है कि उनके अभिजात्य की दीवार न टूटने पाए।

यह सचमुच एक दु:खद स्थिति है, खासकर तब जब यही अभिजात समाज इस गर्व से इठला रहा है कि एक चाय बेचने वाला आज देश का प्रधानमंत्री है। हम नहीं सोचते कि प्रधानमंत्री ने अपनी भांति-भांति की व्यस्तताओं के बीच इस ओर कभी ध्यान दिया होगा, लेकिन अगर वे अब भी इस बारे में विचार करने के लिए कुछ समय निकाल सकते तो अच्छा होता। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति भाजपा द्वारा सच्चा सम्मान भी तभी व्यक्त होगा जब उनकी भावना के अनुरूप देश के हर बच्चे को बिना किसी भेदभाव के अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त होगी। प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया का नारा बुलंद किए हुए है किंतु भारत की नई पीढ़ी का एक बहुत बड़ा भाग सही ढंग से शिक्षित नहीं होगा तब तक उनका यह नारा भी कार्यरूप में परिणित नहीं हो पाएगा। हम यह भी याद दिला दें कि अमेरिका में तो राष्ट्रपति के बच्चे भी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, चाहे क्लिंटन हो या ओबामा।

दरअसल शिक्षा और शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर समाज में भी कुछ गलत धारणाएं व्याप्त हैं और कुछ अपने उत्तरदायित्व को सरकार पर मढ़ देने की प्रवृत्ति भी है। यह तथ्य स्मरणीय है कि देश के नब्बे प्रतिशत स्कूल सरकारी क्षेत्र में है।  याने निजी शालाओं का आंकड़ा दस प्रतिशत के आस-पास है। यदि हर अभिभावक अपने बच्चे को निजी शाला में ही दाखिला कराना चाहेगा, तो यह असंभव स्थिति होगी। निजी स्कूल पालकों की इस भावना का शोषण करने से बाज नहीं आते। इस सच्चाई को समझकर पालकों को भी अपने विचारों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। अपने बच्चों को किसी निजी शाला में ले जाने से पहले उन्हें यह पूछताछ भी कर लेना चाहिए कि उस स्कूल से पढ़ कर निकले बच्चों ने आगे चलकर क्या उपलब्धियां हासिल कीं। सिर्फ गलत अंग्रेजी बोलने और टाई लगाने से बच्चे काबिल नहीं बन जाते।

शिक्षा के क्षेत्र में जो सिविल सोसायटी संगठन काम कर रहे हैं जैसे आरटीई फोरम (राइट टु एजुकेशन फोरम) इत्यादि। उन्हें भी इस बारे में नए सिरे से सोचने और नई रणनीति तैयार करने की सलाह मैं दूंगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि कार्पोरेट के दबाव में सरकार शिक्षा के निजीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है। पिछले दो-तीन साल से किसी संस्था द्वारा जारी 'असर' नामक रिपोर्ट भी प्रकारांतर से निजीकरण की वकालत करती है। अगर शिक्षा का अधिकार कानून को सही तरीके से लागू करना हो तो उसके लिए जो सबसे बड़ा कदम उठाया जा सकता है वह है कि सरकारी स्कूलों की दशा सुधारी जाए। इसके लिए हर गांव और हर मुहल्ले के नागरिकों को आपस में बैठकर तय करना होगा कि वे अपने पुरा-पड़ोस के स्कूल को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं।

मेरा मानना है कि सरकार की मंशा चाहे जो हो, कार्पोरेट चाहे जो चाहे, उत्तम शिक्षा की चाबी तो समाज के हाथों में है। अगर निजी स्वार्थ से उठकर नागरिक अपने नजदीकी स्कूल की उन्नति करने का बीड़ा उठा लें, तो उन्हें सफलता निश्चित ही मिलेगी। इसमें उन्हें शिक्षकों का भी योगदान मिलेगा और उन नागरिकों का भी जिनके बच्चे वहां नहीं पढ़ते। जनप्रतिनिधियों को अगर वोट चाहिए तो उन्हें भी विवश होकर ऐसे प्रयोगों में सहयोग देना होगा।

देशबंधु में 16 अप्रैल 2015 को प्रकाशित