Thursday, 23 April 2015

साझा मोर्चे की उम्मीद!


 


भारतीय राजनीति के रंगमंच पर विगत सप्ताह दो प्रमुख घटनाएं घटीं। एक तो छह समाजवादी पार्टियों ने आपस में विलय करने का फैसला कर लिया और दूसरे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अंतत: सीताराम येचुरी को अपना नया महासचिव चुन लिया। मैं समझता हूं कि इन दोनों घटनाओं का देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और इसीलिए इनका नोटिस लिया जाना चाहिए। जैसा कि हम देख रहे हैं इस समय देश पांच राजनीतिक धाराओं में बंटा हुआ है। सबसे पहले भाजपा है और उसके साथ महाराष्ट्र में शिवसेना व पंजाब में अकालीदल। ये तीनों दल संकीर्ण राष्ट्रवाद व धार्मिक आस्था से पोषित हैं। दूसरी धारा कांग्रेस की है जिसके वर्तमान और भविष्य को लेकर गंभीर चर्चाएं कम और अटकलबाजियां ज्यादा हो रही हैं। क्षेत्रीय दल अपनी सोच में एक समान नहीं है, फिर भी उन्हें सुविधा के लिए तीसरी धारा माना जा सकता है। चौथी और पांचवीं धारा के रूप में समाजवादी और साम्यवादी क्रमश: उपस्थित हैं। इन सबके विश्लेषण से ही बात आगे स्पष्ट होगी।

सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी की बात करें। यह तथ्य अपनी जगह पर है कि लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और इस नाते मोदी सरकार को अगले चार साल कोई खतरा नहीं है। लेकिन क्या सिर्फ इसी से पार्टी और सरकार को मनमानी का अधिकार मिल जाता है? यह प्रश्न भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अपने आप से पूछना चाहिए। आम जनता महसूस कर रही है कि केन्द्र ही नहीं, प्रदेशों में भी जहां-जहां भाजपा सरकार है वहां उसका अहंकार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पार्टी के नेता अब अधिकतर आक्रामक मुद्रा में दिखाई देते हैं और संवाद का स्थान एकालाप ने ले लिया है। ऐसा अनुमान होता है कि भाजपा का गढ़ इस समय तीन रक्षा पंक्तियों के घेरे में है। एक रक्षा पंक्ति कारपोरेट पूंजी की है, दूसरी संघ के कार्यकर्ताओं की और तीसरी मीडिया की। भाजपा के लिए यह उचित होगा कि वह जांच लें कि ये रक्षा पंक्तियां क्या सचमुच अभेद्य हैं?

जहां तक कारपोरेट पूंजी की बात है उसका अति उत्साह अब डगमगाता प्रतीत होता है। वरना रतन टाटा को कारपोरेट भारत से यह कहने की आवश्यकता क्यों पड़ती कि वह मोदी सरकार पर भरोसा रखे! जाहिर है कि उसने नई सरकार से जो उम्मीदें बांध रखी थीं वे पूरी नहीं हो रही हैं। ऐसे में यह रक्षा पंक्ति कभी भी चरमरा सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ के लिए स्वाभाविक है कि वह मोदी सरकार की प्राणपण से रक्षा करें किन्तु संघ के कार्यकर्ता वे चाहे मुख्यमंत्री हों या संसद सदस्य या पार्टी पदाधिकारी, जिस तरह के फैसले ले रहे हैं, जैसी बातें कर रहे हैं उससे देश का जनसामान्य ही अचंभित और भयभीत होने लगा है। वह समझ नहीं पा रहा है कि सुशासन के बुनियादी मुद्दों को छोड़कर पार्टी व सरकार यहां वहां क्यों भटक रही है। दूसरे शब्दों में इस रक्षा पंक्ति को आगे-पीछे देश की बहुसंख्यक जनता के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है। रही बात मीडिया की तो यह रक्षा पंक्ति वास्तविक न होकर आभासी है और इसकी विश्वसनीयता में तेजी के साथ गिरावट आई है।

क्षेत्रीय दलों का मामला विचित्र सा है। नवीन पटनायक का बीजू जनता दल कारपोरेट उद्यम को बढ़ावा देने में केन्द्र में भाजपा के साथ है, लेकिन ओडिशा में सांप्रदायिक के मुद्दे पर वह भाजपा से दूर है। आंध्रप्रदेश में चंद्राबाबू के सामने भाजपा का साथ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। गोकि अगले चुनाव के पहले वे पलटी मार सकते हैं। तेलंगाना में टी.एस.आर. सुप्रीमो चंद्रशेखर राव पर अब शायद किसी को भी भरोसा नहीं है। असम में प्रफुल्ल महंता पूरी तरह चुक गए हैं। तमिलनाडु में जयललिता का रुख लगभग वही है जो ओडिशा में नवीन पटनायक का है। जम्मू-काश्मीर में पीडीपी-भाजपा दोस्ती कब तक चलेगी कहा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अकेले चलने में  ही विश्वास करती हैं। कुल मिलाकर क्षेत्रीय दलों की राजनीति तात्कालिक और सीमित एजेंडे की है। 

कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है और चुनावी हार के बावजूद वह इतनी कमजोर नहीं है कि उसे चुटकी बजाकर खारिज किया जा सके। पार्टी ने लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद पिछले एक साल में समय-समय पर संघर्षशीलता का परिचय दिया है। यह भी नोट करने योग्य है कि उसने समय की आवश्यकता को समझते हुए गैर-भाजपाई दलों का सहयोग लेने में कोई संकोच नहीं दिखाया। यह बिल्कुल संभव है कि आने वाले दिनों में वह इन दलों के साथ सहयोग मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए। यहां आकर समाजवादी दल और वामपंथी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो उठती है। एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ गैर-भाजपाई दल, इनके बीच शक्ति परीक्षण का पहला अवसर कुछ माह बाद ही आएगा जब बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। 

आज विभिन्न समाजवादी दलों ने आपस में विलय का जो फैसला किया है उसका स्वागत होना चाहिए। विशेषकर इसलिए कि यह आमधारणा बनी हुई है कि समाजवादी कभी एकजुट नहीं रह सकते। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है और समाजवादियों की वर्तमान पीढ़ी के सामने चुनौती है कि वे कम से कम एक बार इस धारणा को मिथ्या साबित कर दें। बीते वर्षों में समाजवादियों के बीच एका नहीं रहा तो उसकी एक बड़ी वजह नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा थी। आज मुलायम सिंह अपने बेटे को मुख्यमंत्री बना चुके हैं; लालू प्रसादजी की संतानों के लिए भी बेहतर अवसर दिख रहे हैं; शरद यादव और नीतीश कुमार के समक्ष ऐसी कोई समस्या नहीं है तब इनकी एकजुटता आसन्न बिहार चुनाव में और उसके आगे भी रंग ला सकती है। मोदी सरकार की साख में जो कमी आई है तथा पड़ोसी झारखंड में विधानसभा के नतीजे भाजपा के मनोनुकूल नहीं आए। ये दोनों बातें भी समाजवादियों को बेहतर भविष्य के प्रति आश्वस्त कर सकती हैं।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने आखिरकार अपना नया महासचिव चुन लिया। राजनीतिक प्रेक्षकों को उम्मीद थी कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों में मिली करारी पराजय के बाद अपने ऊपर जिम्मेदारी लेते हुए प्रकाश करात महासचिव पद छोड़ देंगे। किन्तु तब उन्होंने इस अनुमान को झुठला दिया। केरल में भी माकपा की पराजय श्री करात की हठधर्मी से हुई तथा लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने दीवार पर लिखी इबारत पढऩे से इंकार कर दिया। इसके बावजूद वे अपने पद पर कायम रहे आए। बहरहाल सीताराम येचुरी के महासचिव बनने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि वे आज की वास्तविकताओं को समझबूझ कर ही पार्टी को आगे ले जाने की रणनीति तैयार करेंगे। उधर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में भी सुधाकर रेड्डी दुबारा महासचिव बने हैं। ऐसे में वाम समर्थक आशा कर रहे हैं कि ये दोनों दल नए सिरे से राजनीति के वामपक्ष को मजबूत करने के लिए व्यवहारिक और प्रभावी कदम उठाएंगे।

एक समय था जब डॉ. लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद का नारा दिया था। उस समय कांग्रेस के खिलाफ जो साझा मोर्चा बना था उसमें तत्कालीन जनसंघ के साथ समाजवादी और साम्यवादी भी शामिल थे। वह तब जबकि जनसंघ के साथ इन दलों की कोई सैद्धांतिक मैत्री नहीं थी। बाद में हमने देखा कि जनसंघ ने कैसे इन दलों की कीमत पर अपनी ताकत बढ़ाई। आज स्थिति बदल चुकी है। आज जब भाजपा सत्ता में है तब आवश्यकता इस बात की है कि गैर-भाजपावाद या गैर-संघवाद की रणनीति बनाई जाए। इसमेंं सफलता तभी मिल सकती है जब कांग्रेस, समाजवादी और साम्यवादी तीनों मिलकर साझा मोर्चा बनाएं। यद्यपि कांग्रेस में एक खेमा है जो कारपोरेट पूंजी का पक्षधर है; वह इसमें बाधा उत्पन्न कर सकता है। इस पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को ही विचार करना होगा। इस एक बड़े मुद्दे को छोड़कर कांग्रेस व अन्य गैर-भाजपाई दलों के बीच ऐसे कोई सैद्धांतिक मुद्दे नहीं हैं जिन पर आम राय न बन सके। यह देखना होगा कि बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले क्या कोई ऐसा गठजोड़ बन पाएगा?

देशबन्धु में 23 अप्रैल 2015 को प्रकाशित