Wednesday, 8 April 2015

चाय का स्वाद


 



कहा
जाता है कि अखबार पढऩे का आनंद सुबह चाय की चुस्कियों के साथ ही मिलता है। हो सकता है कि इस समय जब आप इस लेख को पढ़ रहे हैं, चाय का प्याला बाजू में तिपाई पर रखा हो। यूं  तो चाय को भारत में आए सौ साल ही हुए हैं लेकिन वह इस कदर हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गई है कि उसके बिना दिन अधूरा लगता है। वे जन जो आए दिन उपवास करते हैं,  उन्हें भी चाय से सामान्यत: परहेज नहीं होता। घर आए मेहमान को चाय ऑफर करना आज का सामान्य शिष्टाचार है। इसका पालन नहीं किया तो पीठ पीछे बुराई होती है- एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछा। अहमदाबाद और पुणे जैसे नगरों में चाय पिलाने को लेकर जो चुटकुले प्रचलित हैं वे आप किसी गुजराती या पुणेरी मित्र से जान सकते हैं।

जैसा कि हम जानते हैं चाय भारत में चीन से आई है, लेकिन जैसी चाय हम पीते हैं वह चीन वालों को रास नहीं आएगी। वे या तो हरी चाय याने ग्रीन टी पीते हैं जिसमें न दूध होता  है न शक्कर। बस पत्ती का कड़वा कसैला स्वाद ही मुख में आता है। इसका दूसरा पहलू है कि पर्यटकों के लिए चीन ने टी सेरिमनी की अपनी परिपाटी विकसित कर ली है जिसमें आपको गुलाब, बेला, चमेली, जवा कुसुम आदि फूलों की खुशबू और स्वाद वाली चाय परोसी जाती है। चीन से ही चाय जापान भी गई होगी। वहां जो टी सेरिमनी होती है उसके बारे में लेख तो क्या पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। जापान की सुरुचि-सम्पन्नता और कलाप्रियता, सुघड़ता और नज़ाकत जैसे कितने ही गुणों का परिचय उस सुदीर्घ चाय पार्टी से मिल जाता है। चीन और जापान से ही प्रेरणा लेकर हमारे यहां भी विभिन्न फ्लेवरों वाली चाय मिलने लगी है। सेहत के लिए फिक्रमंद लोग अब ग्रीन टी की खूबियों का बखान करते भी आपको मिल जाएंगे।

सात समंदर पार अंग्रेजों ने भी चाय पीने की आदत चीन से ही सीखी है। अभिजात ब्रिटिश घरों में शाम को चार बजे ''टी" का आयोजन उनकी विशिष्ट जीवन शैली का हिस्सा है। भारत तो खैर चाय का दीवाना है ही लेकिन चाय पीने का सलीका सीखना हो तो मौलाना अबुल कलाम आजाद से बेहतर कोई नहीं बता सकता। उन्होंने चालीस-पचास के दशक में अपने एक ललित निबंध में बताया था कि चाय किस न फासत के साथ पी जाना चाहिए। वे दूध, पानी, चाय, शक्कर एक साथ डालकर उबालने के हिमायती न होकर सेपरेट चाय की खूबियां गिनाते हैं। वे कहते हैं कि जब प्याला होठों से लगाया जाए तो चीनी मिट्टी का स्वाद बीच में बाधा नहीं बनना चाहिए। छत्तीसगढ़ के पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल कुछ इसी अंदाज में चाय पीते थे।

पाठकगण! आप के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि मैं आज यह विषय क्यों ले बैठा। सो पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि प्रधानमंत्री की चाय की चर्चा से इसका कोई ताल्लुक नहीं है। दरअसल कुछ दिन पहले सुबह चाय के प्याले के साथ-साथ कोई पत्र-पत्रिका पढ़ते हुए मेरी निगाह एक समाचार पर जाकर ठिठक गई। वह समाचार चाय पर ही था और उसने मुझे चाय के बारे में मन भटकाने के लिए एक बड़ा विस्तार दे दिया। खबर अच्छी है और यह है कि गुवाहाटी के किसी शिक्षण संस्थान ने एक ऐसी डलिया का निर्माण किया है जो चाय बागानों में पत्तियां तोडऩे वाली मजदूर औरतों के लिए ज्यादा आरामदायक है। उससे उनकी पीठ पर और रीढ़ की हड्डी पर कम वजन पड़ेगा। जबकि दूसरी ओर वे डलिया में लगभग ड्योढ़ी मात्रा में पत्तियां संचित कर सकेंगी। यह आविष्कार सुनने में छोटा लगता है लेकिन लाखों मेहनतकश स्त्रियों को इसका जो लाभ होगा, वह बड़ी खुशी की बात है।

मैंने जब इस आविष्कार की खबर पढ़ी तो विचार आया कि चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन कितना दूभर होता है। असम और बंगाल में इन मजदूरों को टी गार्डन ट्राइबल या चाय बागान आदिवासी की संज्ञा से जाना जाता है। इनमें से अधिकतर मजदूरों के पुरखे छत्तीसगढ़ और झारखंड से ले जाए गए थे। हमारी मिनीमाता के पुरखे भी उन्हीं में से थे। इन लोगों ने बागान मालिकों और मैनेजरों के हर तरह के अत्याचार बर्दाश्त किए। मेहनत का जितना मुआवजा मिल जाए उसी को गनीमत जानो। लेकिन आज जनतांत्रिक व्यवस्था में इन्हें जिस तरह संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और आज भी जब उन पर अत्याचार होता है तो मन को क्लेश पहुंचता ही है। हम सुबह, दोपहर, शाम जब कभी भी चाय का प्याला हाथ में लेते हैं, उसकी खूशबू से मगन होते हैं, एक घूंट पीकर ताजगी का अहसास करते हैं तब शायद कभी भी यह ध्यान नहीं आता कि यह चाय हम तक पहुंची कैसे?

मुल्कराज आनन्द ने 1937 में लिखे अपने उपन्यास 'दो पत्ती और एक कली' में चाय बागानों के मजदूरों की दारुण दशा का वर्णन किया है। इस उपन्यास पर  ही पंद्रह साल बाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने 'राही' फिल्म बनाई जिसके नायक देवानन्द थे। उस समय चाय बागानों के मालिक अंग्रेज थे और आज हिंदुस्तानी हैं, लेकिन परिस्थितियों में कोई बहुत फर्क नहीं आया है। हो सकता है कि आज मजदूरी की शर्तों में कुछ सुधार हुआ हो, लेकिन यह जितना हाड़ तोड़ देने वाला काम है वह सच्चाई तो अपनी जगह कायम है। ये जहां रह रहे हैं वहां इन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है यह बात भी कम दर्दनाक नहीं है। ऐसे में यदि एक छोटा सा आविष्कार इन श्रमशील महिलाओं को यदि थोड़ी राहत दे पाता है तो मैं समझता हूं कि हमारी चाय कुछ ज्यादा स्वादिष्ट हो सकेगी।

चाय के बारे में सोचते-सोचते मेरा ध्यान नर्मदा कछार की ओर चला गया। जबलपुर से लेकर नरसिंहपुर, गाडरवारा, होशंगाबाद तक नर्मदा के किनारे ठंड के दिनों में मटर की खेती होती है। दिसम्बर-जनवरी में उस तरफ निकले तो खेतिहर महिलाएं साथ में टोकरी रखे मटर तोड़ते नज़र आ जाएंगी। मीलों तक यही दृश्य चला आता है। मन ललचाता है कि खेत में उतरकर मटर की कच्ची मीठी फलियां तोड़कर खाई जाएं, लेकिन हम यह कहां जानने की कोशिश करते हैं कि दिनभर खेत में मटर की फली तोडऩे का काम करते हुए इन महिलाओं की पीठ किस तरह दुखती होंगी। यह सच्चाई सतपुड़ा के जंगलों में साल और महुआ बीनने वाले आदिवासियों पर भी तो लागू होती है। मैं कभी विद्यार्थियों से बात करता हूं तो उन्हें कहता हूं, यह मत भूलना कि तुम जिस चाकलेट को पंसद करते हो, उसमें साल बीज का तेल है और ये साल बीज बस्तर या सरगुजा के जंगल में किसी आदिवासी ने बड़ी मेहनत से इकट्ठे किए हैं।

साल बीज के तेल से बनी चॉकलेट, डिब्बाबंद मटर और चायपत्ती इनके चित्ताकर्षक विज्ञापन टीवी पर देखने मिलते हैं। चॉकलेट का विज्ञापन युवा पीढ़ी को भरमाता है कि उन्हें यदि प्रेम में सफल होना है तो फलानी चॉकलेट को माध्यम बनाना चाहिए। इसी तरह अमिताभ बच्चन त्यौहार पर देसी मिठाई के बजाय चॉकलेट उपहार में देने की वकालत करते हैं। मटर के विज्ञापन में उसके सूप के सेहतकारी गुण बताए जाते हैं। चायपत्ती के एक विज्ञापन में ट्रेन के ड्रायवर और गार्ड भी ट्रेन को भूलकर चाय पीने के लिए रुक जाते हैं, तो दूसरे विज्ञापन में उस्ताद जाकिर हुसैन अपनी पसंदीदा चाय का गुणगान करते हैं। नवपूंजीवाद ने बाजार का रूप जिस तरह से बदला है, उसमें यह सब होना ही था। उसकी बात करने का अभी कोई अर्थ नहीं है। किंतु फिलहाल हम इतना तो कर ही सकते हैं कि गुवाहाटी के उन युवा आविष्कारकों को बधाई दें जिनकी खोजी निगाह चाय बागान के मजदूरों पर जा टिकी और जिन्होंने उनके प्रति संवेदना अनुभव करते हुए अपने ज्ञान का इस्तेमाल इस सुंदर और उपयोगी आविष्कार के लिए किया।
देशबन्धु में 09 अप्रैल 2015 को प्रकाशित