Wednesday, 24 February 2016

त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह




नागरिक स्वतंत्रता और स्वच्छंदता (मनमानी) में क्या अंतर है इसका निर्णय भी क्या स्वतंत्र भारत में पुलिस वाले करेंगे? नागरिक स्वतंत्रता का हनन हुआ है या नहीं हुआ है, नागरिक स्वतंत्रता की सीमा लांघ कर स्वच्छंदता का व्यवहार हुआ या नहीं हुआ है यह निर्णय भी यदि स्वयं पुलिस वाले ही करने लग जाएं तो अंग्रेजों का शासन ही क्या बुरा था? क्यों हम जलियांवाला बाग के नर हत्याकांड के खलनायक जनरल डायर को गाली देते हैं। (राष्ट्रबंधु 18 सितंबर, 1950)

ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने यह लेख लिखने के कुछ दिन पूर्व 4 सितंबर 1950 को ही अपना अर्द्ध-साप्ताहिक पत्र राष्ट्रबंधु प्रारंभ किया था। 12 सितंबर को रायपुर के किसी सिनेमाघर में छात्रों का कुछ लोगों से झगड़ा हो गया था। सिनेमाघर एक प्रभावशाली राजनेता का था, और झगड़े में लिप्त नागरिक भी शायद रसूखवाले रहे होंगे इसलिए आधी रात को पुलिस हॉस्टल में गई और सोते छात्रों को बिस्तरों से उठा-उठा गिरफ्तार कर ले आई। ठाकुर साहब इससे क्षुब्ध हुए। कुछ अन्य उदाहरण देते हुए उन्होंने अग्रलेख के अंत में लिखा-

विद्यार्थियों का अपमान कर हम देश की उन्नति नहीं कर सकते। उनके आत्मसम्मान पर आघात करना भयंकर बात है।
छियासठ वर्ष पूर्व रायपुर में घटित एक छोटे से प्रसंग की अनुगूंज आज देश के स्तर पर जो हो रहा है उसमें सुनी जा सकती है। 
ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ के एक प्रखर और संघषशील राजनेता थे। उन्हें त्यागमूर्ति की उपाधि जनता ने दी थी। यह उनकी 125वीं जयंती का वर्ष है। उनसे जुड़े दो प्रसंगों की छाप मेरे मन पर गहरी पड़ी है। एक तो जब वे बीएनसी मिल राजनांदगांव के श्रमिकों के हक में लड़ रहे थे तब राजा ने उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया था। इस परिस्थिति में उन्होंने राजनांदगांव के रेलवे स्टेशन पर आकर सभा की थी और राजा कुछ नहीं कर सके क्योंकि रेलवे स्टेशन ब्रिटिश इंडिया में था न कि रियासत में। दूसरे- उनके बारे में हबीब तनवीर का संस्मरण है जिसमें उन्होंने लिखा कि रायपुर नगरपालिका के अध्यक्ष रहते हुए ठाकुर साहब ने स्कूलों की नाट्य स्पर्धा करवाई थी, जिसमें ठाकुर साहब के हाथ से मिले स्वर्ण पदक से उनकी हौसलाअफजाई हुई और वेे रंगमंच के क्षेत्र में आगे बढ़ सके।

अभी तक हमने ठाकुर प्यारेलाल सिंह के व्यक्तित्व के तीन पहलू देखे- जुझारू श्रमिक नेता, कल्पनाशील और सुसंस्कृत नगरपालिका अध्यक्ष और छात्रों व नौजवानों का हितैषी। वे मध्यप्रदेश की पहली विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। कांग्रेस को छोड़कर उन्होंने समाजवादी साथियों द्वारा स्थापित कृषक मजदूर प्रजापार्टी की सदस्यता ले ली थी। इस पद पर विपक्षोचित तेवरों के साथ अपना काम करते हुए  ठाकुर साहब को लगा कि उन्हें गांधी जी द्वारा निर्देशित रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाना चाहिए, क्योंकि राजनीतिक दल विशुद्ध तौर पर राजनीतिक हो गए हैं, खासकर कांग्रेस, और वहां रचनात्मक कार्यों की गुंजाइश खत्म हो गई है। इस भावना से वे विनोबा भावे के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। इस बीच उन्होंने तत्कालीन सीपी एंड बरार प्रांत में सहकारिता आंदोलन के लिए भी पुरजोर काम किया। छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ उनकी सोच का जीवंत स्मारक है।
ठाकुर साहब अपनी पीढ़ी के अनेक नेताओं की मानिंद एक विचारशील राजनेता थे, जिन्हें सिर्फ अपने विधानसभा क्षेत्र की ही नहीं बल्कि व्यापक समाज की चिंता व्यापती थी और जो देश-विदेश के घटनाचक्र पर पैनी नजर रखते थे।
महात्मा गांधी, पंडित नेहरू और सरदार पटेल की परंपरा में ठाकुर प्यारे लाल सिंह वकील थे यद्यपि स्वाधीनता संग्राम में पूरी तरह समर्पित रहने के कारण उन्होंने कभी ठीक से वकालत नहीं की। इन राष्ट्रीय नेताओं का अनुकरण करते हुए ही उन्होंने अखबार निकालने की भी सोची। देश को तब तक स्वतंत्रता मिल चुकी थी, किन्तु ठाकुर साहब का उद्देश्य अखबार के माध्यम से सार्वजनिक प्रश्नों पर विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का अवसर मिला। इस बारे में उन्होंने लिखा-

अनेक पत्र-पत्रिकाएं होते हुए भी इस पत्र को निकालने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि साधारणत: आजकल पत्र-पत्रिकाएं पार्टी विशेष की होने से हर प्रश्न पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं करतीं।

मुझे अनुमान होता है कि यह बात लिखते हुए उनके मन में पंडित रविशंकर शुक्ल के नागपुर टाइम्स व महाकौशल, सेठ गोविंददास के जयहिंद व ऐसे अन्य पत्रों का ध्यान रहा होगा। बहरहाल इस अखबार में उन्होंने अपने विचार खुलकर व्यक्त करने में कभी संकोच नहीं किया यद्यपि उन्होंने भाषा का संतुलन भी कभी नहीं खोया। इसके एक-दो नमूने नीचे देखिए-

1. जब लोगों को मालूम हो जाए कि पंडितों के स्थानीय नन्दियों से अपने कर्मों का मोचन हो सकता है तो मनमाने अपराध करने में हिचकिचाहट क्यों?

2. रियायतों के विलीनीकरण से बिरादरीवाद को सचमुच बड़ी सहायता मिली है। ऐसी जनता की धारणा है। यह इस बात से ही मालूम होता है कि इस प्रांत में एक नये शब्द 'राजवंशी' का आविष्कार हुआ है जिसका उपयोग हमेशा अखबारों में देखने में आता है और लोगों से सुनने में।

राष्ट्रबंधु में वे विविध विषयों पर लिखते थे। आज उन लेखों को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि यही सब तो वर्तमान में भी हो रहा है। दो अक्टूबर को खादी जयंती मनाने पर वे कहते हैं-''हिन्दुस्तान में महापुरुषों की जयंतियां जितनी मनाई जाती हैं शायद दुनिया के किसी देश में उतनी जयंतियां नहीं मनाई जातीं।"  वे साथ में यह भी कहते हैं-

''इसका कारण यह है कि हम लोग आदतन व्यक्ति उपासक हैं। सिद्धांत की उपासना की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता।"

''राजा की नीयत और किसान" इस शीर्षक के लेख में उन्होंने जो कहा है वह कितना मौजूं है, देखिए-

जब इस तरह की अकर्मण्यता के लिए इन पर टीका होती है तो कहते हैं कि अभी तो हम तीन साल के हैं। इतने बड़े देश में हम तीन साल में कर ही क्या सकते हैं? जरा पांच सालों के लिए हमें और शासन करने दो फिर देखना हम क्या-क्या कमाल करेंगे। फिर पांच साल गुजर जायेंगे तब कहेंगे पांच ही साल में हम क्या कर सकते थे? पांच साल और रहने दो फिर देखना हम क्या कमाल करते हैं? बस इसी धुन में कि अभी तो हम तीन साल के हैं, हमें और मौका दो तब देखना, अधिकारी मस्त हैं।

1 जनवरी 1951 के अंक में ठाकुर साहब ने ''अमेरिकन गुट के दलाल" शीर्षक से जो लेख लिखा उसके कुछ अंश भी देख लेना चाहिए-

दुनिया के गरीब, साधारण जन, विचारशील लोग शांति चाहते हैं। युद्ध के परिणामों को इन्हीं को भोगना पड़ता है। पूंजीपतियों और उनके दलालों को इन युद्धों से लाभ होता है। इस बात का अनुभव जनसाधारण को दोनों विश्वयुद्ध से हो ही गया है। आज दिन में अपने देश में फैली हुई महंगाई, कालाबाजारी, घूसखोरी, आचरणहीनता आदि बातों की तरफ जब सरकारी नेताओं का ध्यान आकर्षित किया जाता है तब वे कहते हैं कि ये लड़ाई के दुष्परिणाम हैं। अब यह प्रश्न होता है कि ऐसा जानते हुए लड़ाई के पक्षपातियों की ओर झुकाव कैसे और क्यों है?

युद्ध में मरते और मारे जाते हैं गरीब किसान, मजदूर और साधारण जन के नवजवान बच्चे। ये ही तो सिपाही बनते हैं और ये ही कारखानों में एक-दूसरे को मारने के लिए हथियार तैयार करते हैं। इन गरीबों के मरने-मारने की योजना में पूंजीपतियों का धन बढ़ता है। कोई जोखिम नहीं, आराम ही आराम हैं। इन्हें नहीं मरना पड़ता।

हमारी नेहरू सरकार तटस्थ है। वह न अमेरिका के गुट में शामिल होना चाहती, न रशिया के। हिन्दुस्तान के लिए यही हितकर है। इस नीति को अमेरिका पसंद नहीं करता इसलिए उसने बहुत से दलाल हिन्दुस्तान भर में पाल रखे हैं। हमारे देश को निर्णय करना है कि हमें शांति चाहिए कि युद्ध।

ठाकुर साहब अपने लेखों में सोवियत संघ की भी बात करते हैं और चीन में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी सरकार की भी। वे यह भी बतलाते हैं कि फ्रांस की राज्य क्रांति की परिणति नेपोलियन के उदय में कैसे हुई। नेता जब जनता को भुलाकर पूंजीवादियों से सांठगांठ कर लेते हैं तब तीन का गुट बन जाता है एक- अवसरवादी, दो-पूंजीवादी, तीन-सत्ताधारी। इनके इस मिलन से कालाबाजारी, रिश्वतखोरी और बिरादरीवाद के फल मिलते हैं। 
आज इन सारे विचारों पर मनन करने की आवश्यकता है। ठाकुर प्यारेलाल सिंह को उनकी 125वीं जयंती पर मैं श्रद्धासुमन अर्पित करता हूं।
टीप:- 21 फरवरी को रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित संगोष्ठी में दिए व्याख्यान का संवर्द्धित रूप।

देशबन्धु में 25 फ़रवरी 2016 को प्रकाशित