Wednesday, 2 March 2016

बजट क्या कहता है-1



देश का बजट हो या प्रदेश का, उस पर अमूमन तीन तरफ से प्रतिक्रियाएं आती हैं। पहली सत्तापक्ष से, दूसरी प्रतिपक्ष से और तीसरी आम जनता से। सत्तापक्ष का यह पुनीत कर्तव्य होता है कि वह अपने वित्तमंत्री द्वारा लाए गए बजट की सराहना करे और उसमें जितनी संभव है अतिशयोक्ति भर दे। इसी तरह प्रतिपक्ष भी बजट की अतिरंजना की हद तक जाकर बजट आलोचना कर अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि बजट आने के पहले ही तय कर लिया जाता है कि क्या बोलना है। आम जनता का जहां तक सवाल है तो वह अधिकतर बजट की पेचीदगियों से अवगत नहीं होती और अपने हित-अहित के तात्कालिक मुद्दे देख कर राय व्यक्त कर देती है। आप पूछेंगे कि अर्थशास्त्रियों का रोल इस समय क्या होता है तो वे भी मोटे तौर पर उपरोक्त तीनों श्रेणियों में विभाजित किए जा सकते हैं। याने कुछ सत्तापक्ष से जुड़े होते हैं, कुछ प्रतिपक्ष से और अधिकतर विषय की गहराई में जाने का कष्ट ही नहीं करते।

मैं हर साल यह देखकर हैरान होता हूं कि हमारे पत्रकार वे चाहे टीवी के हों, चाहे अखबारों के, नेताओं के पास बजट पर प्रतिक्रिया लेने जाते ही क्यों हैं। क्या उन्हें पता नहीं होता कि नेताजी क्या कहेंगे? एक तरह से यह हमारी बिरादरी के सामूहिक आलस्य का बढिय़ा उदाहरण है। इस कारण टीवी पर समय और अखबार में स्थान की जो बर्बादी होती है उस पर कोई नहीं सोचता। अभी तीन दिन के अंतराल में देश का रेल बजट और फिर वार्षिक बजट संसद में पेश किए गए। इन पर अधिकतर प्रतिक्रियाएं हल्के-फुल्के ढंग से ही आईं। आर्थिक मामलों के जो विशेषज्ञ हैं उनके साथ पर्याप्त चर्चा करके ही बजट के प्रभावों को समझा जा सकता है। यह प्रयत्न बहुत कम लोग करते हैं। हमारी एक बड़ी कमी यह भी है कि हिन्दी में इस विषय पर गंभीर अध्ययन करने वाले विद्वान गिने-चुने ही हैं।

इन वर्गों के अलावा उद्योग और व्यापार जगत में अर्थनीति का जो विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ अवश्य हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि वे सरकार के खिलाफ कभी भी खुलकर नहीं बोलते। बजट चाहे चिदंबरम पेश करें, चाहे जेटली- उनसे आप तारीफ के अलावा कुछ नहीं सुनेंगे। इस सबके मुकाबले शेयर मार्केट में बजट पेश होने के तुरंत बाद जो उतार-चढ़ाव होता है वह किसी हद तक बजट के परिणामों का संकेत दे देता है। यद्यपि उसे भी पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता। दरअसल, सामान्य तौर पर जनता इन्कम टैक्स की छूट तथा कुछ अन्य वस्तुओं के महंगे या सस्ते होने के आधार पर बजट का आकलन करती है। इस साल अगर आयकर में छूट की सीमा बढ़ाई गई होती तो जनता एकदम खुश हो जाती। ऐसा न होकर सेवाकर में और आधा प्रतिशत की वृद्धि हुई तो जनता दुखी हो गई। कार की कीमतें बढ़ गईं तो वह भी चिंता का कारण बन गया। उनके लिए भी जिन्हें हाल-फिलहाल कार नहीं खरीदना है।

यह तथ्य संभवत: स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि बजट भाषण के दो हिस्से होते हैं। भाग-ब या भाग-दो में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर की दरों में छूट या बढ़ोतरी के ब्यौरे होते हैं। जबकि भाग-अ या पहले हिस्से में वित्तमंत्री देश की भावी अर्थनीति का खुलासा करते हैं और इसे जाने बिना बजट को नहीं समझा जा सकता। अब जैसे वर्ष 16-17 के बजट में प्रचारित किया गया है कि यह किसानों का और ग्रामीण भारत का बजट है। हमें यह बात अच्छी लगना चाहिए कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शा रही है। लेकिन प्रश्न उठता है कि यह सिर्फ आश्वासन के स्तर पर है या ठोस कदम उठाए जाएंगे और इसके सुपरिणाम कब सामने आएंगे।  प्रधानमंत्री ने रविवार को बरेली की सभा में जो कहा वह बात वित्तमंत्री ने बजट में दोहराई कि अगले पांच वर्षों में किसानों की आय दुगुनी हो जाएगी। सुनकर अच्छा लगा।

अब हम वित्तमंत्री से जानना चाहेंगे कि वर्तमान में किसान की औसत आय कितनी है और पांच साल बाद याने 2022 में बढ़कर वह कितनी हो जाएगी। इन पांच सालों में महंगाई और मुद्रा स्फीति की दर क्या होगी। याने दूसरे शब्दों में अगर आज आमदनी एक हजार है और पांच साल बाद दो हजार और इस बीच बाजार में वस्तुएं एवं सेवाएं भी उतनी ही महंगी हो गईं तो फिर हासिल क्या आएगा? हम देख रहे हैं कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण हो रहा है। आज गांव के किसान या खेतिहर मजदूर का बेटा बिना फीस वाले सरकारी स्कूल में जाता है। वहां उसे मध्याह्न भोजन भी मिलता है। युक्तियुक्तकरण के नाम पर सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। पांच साल बाद ग्रामीण को अगर अपने बच्चे को निजी स्कूलों में भेजना पड़ा या परिवार का इलाज निजी अस्पताल में करवाना पड़ा तो उसकी कथित अतिरिक्त आमदनी तो वहीं खत्म हो जाएगी?

श्री जेटली ने दावा किया है कि एनडीए सरकार ने इस साल मनरेगा में सर्वाधिक प्रावधान किया गया है, अड़तीस हजार करोड़ का। अच्छी बात है किन्तु यूपीए में इससे अधिक प्रावधान इकतालीस हजार करोड़ का किया गया था। पिछली सरकार पर आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने जितना प्रावधान किया उतना खर्च नहीं किया।  लेकिन फिर इस बात की क्या गारंटी है कि आप जो प्रावधान कर रहे हैं उसे पूरा खर्च कर पाएंगे। अभी तो हम छत्तीसगढ़ में देख रहे हैं कि मनरेगा के पिछले कामों का कई करोड़ का भुगतान अभी तक नहीं हुआ है क्योंकि केन्द्र से राशि जारी नहीं हुई। फिर मनरेगा में जो भ्रष्टाचार है उस पर रोक लगाने का कौन सा मंत्र आपके पास है?  आज भी जे
सीबी मशीन से काम होता है और फर्जी मस्टररोल से भुगतान। इसे अगर नहीं रोका तो ग्रामीण जनता की आमदनी क्या सचमुच बढ़ जाएगी?

भारत उन देशों में से है जिन्होंने सामाजिक कल्याण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के सहस्राब्दि लक्ष्यों को लागू करने के लिए संकल्प व्यक्त किया था। पिछले साल उसका स्थान टिकाऊ विकास लक्ष्यों ने ले लिया है, उसमें भी सरकार की सहमति है। इसके तहत शिक्षा और स्वास्थ्य इन दो क्षेत्रों में हमें सकल घरेलू आय का कम से कम छह प्रतिशत एवं तीन प्रतिशत खर्च करना चाहिए। यूपीए-1 में इस बारे में सरकार कुछ उत्साहित थी, लेकिन नवपूंजीवादी दौर में इस मोर्चे पर हमारी प्रतिबद्धता दिनोंदिन कमजोर होती जा रही है।  यूपीए-2 में भी यही हुआ और वर्तमान सरकार में भी। इसलिए इस बजट में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यस्था के प्रावधानों को लेकर चाहे जितनी चर्चा हो रही हो, सामाजिक कल्याण के मुद्दों पर शायद ही किसी टीकाकार ने चर्चा की हो। स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में तो खासकर यही समझ आता है कि सरकार ने बीमा कंपनियों और उसके माध्यम से निजी अस्पतालों के लिए राजमार्ग खोल दिया है।

केन्द्रीय बजट का एक अहम् बिन्दु रक्षा बजट होता है। उस पर भी इस बार कोई विशेष चर्चा नहीं हुई है। रक्षा बजट के लिए आबंटन में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। यहां तक तो ठीक है लेकिन यह ध्यातव्य है कि उस बिना बढ़े बजट में से ही एक बड़ा हिस्सा समान पद समान वेतन (ओआरओपी) के लिए चला जाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि रक्षा क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिए जो योजनाएं बनाई गई थीं वे अधर में लटक जाएंगी। इसका कुल मिलाकर क्या परिणाम निकलेगा यह तो रक्षा विशेषज्ञ ही बतला पाएंगे। प्रस्तुत बजट के बारे में एक-दो बातें और, जो तर्कसंगत प्रतीत नहीं होतीं। एक तो एक तरफ आप विदेशों में पारित जमा धन के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, कड़े कानून बनाते हैं, दूसरी तरफ देश में जिनके पास कालाधन है उनसे पैतालीस प्रतिशत कर और पैनाल्टी लेकर उन्हें काले को सफेद में लाने का सरल अवसर दे रहे हैं। यद्यपि इसकी सफलता हमें संदिग्ध प्रतीत होती है। दूसरे, भविष्यनिधि यानी पीएफ पर टैक्स लगाने की सलाह वित्तमंत्री को किसने दी और उन्होंने कैसे मान ली? यह बात तो बिल्कुल भी समझ नहीं आती। इस एक बिन्दु से ही यह शंका बलवती होती है कि वर्तमान सरकार को कारपोरेट भारत के हितों की जितनी चिंता है आम जनता की नहीं।
 (कल दूसरी और अंतिम किश्त)


देशबन्धु में 03 मार्च 2016 को प्रकाशित