Thursday, 3 March 2016

बजट क्या कहता है-2


 2016-17 के बजट में जो बेहतरीन प्रस्ताव हैं उनमें से एक मोटरकार पर लगने वाले कर में  बढ़ोतरी का है, लेकिन यह वृद्धि बहुत अधिक नहीं है। महंगी गाडिय़ों का शौक रखने वाले सुविधाभोगी वर्ग को बढ़ी हुई कीमतों से बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। जिस समाज में मोटर-गाडिय़ों की बिक्री को सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का प्रतीक माना जाए और वित्त मंत्री भी जिसका  उदाहरण बजट भाषण में दें तो समझा जा सकता है कि हमारा सामाजिक परिवेश किस तरह बदल रहा है। वित्त मंत्री ने सड़क निर्माण को अपनी प्राथमिकता सूची में जोड़ा और सड़क मार्ग से यात्रा को सुगम बनाने का वायदा किया है। हम इसका स्वागत करते हैं किन्तु मुझे यहां दो कमियां नज़र आ रही हैं। एक तो सार्वजनिक यातायात के प्रमुख साधन याने बसों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रस्ताव वित्त मंत्री ने नहीं दिया है। दूसरे मोटर बाइक पर कराधान में कोई बदलाव नहीं किया गया है। हमें खुशी होती कि वित्त मंत्री निजी वाहनों को महंगा करने और दूसरी तरफ सार्वजनिक वाहनों को प्रोत्साहन देने के लिए कोई नीति बनाते।

एक और अच्छा प्रस्ताव बीपीएल परिवारों को रियायती दर पर रसोई गैस उपलब्ध कराने का है। इसके लिए बजट में दो हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है और इससे डेढ़ करोड़ परिवारों को लाभ होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। दूसरी तरफ इस बात पर भी वित्त मंत्री ने संतोष व्यक्त किया है कि पचहतर लाख उपभोक्ताओं ने रसोई गैस पर सब्सिडी का त्याग कर दिया है। मुझे गणित बहुत समझ नहीं आता किन्तु लगता है कि पुराने उपभोक्ताओं द्वारा छोड़ी गई सब्सिडी से बीपीएल श्रेणी के नए उपभोक्ताओं को रियायती दर पर रसोई गैस मिल जाएगी। यह एक अच्छी पहल है किन्तु इस घोषणा के साथ श्री जेटली अगर यह बताते कि इसके बाद कितने बीपीएल परिवार बच जाएंगे तो पूरा दृश्य स्पष्ट हो जाता।

वित्त मंत्री ने सिंचाई सुविधा बढ़ाने पर भी काफी जोर दिया है। उन्होंने बताया कि जो अधूरी सिंचाई योजनाएं हैं उन्हें समयबद्ध कार्यक्रम हाथ में लेकर पूरा किया जाएगा। इस वर्ष वे ऐसी तेईस योजनाओं को हाथ में लेंगे। यह स्वागत योग्य कदम है। किन्तु देश के किसान यह समझना चाहेंगे कि खेती के नाम पर सिंचाई सुविधाओं का विस्तार कर अंतत: लाभ किसे मिलेगा? यह कौन सुनिश्चित करेगा कि आगे चलकर पूंजीपतियों की नज़र इस सिंचित भूमि पर नहीं गड़ेगी और वे कारखाने लगाने के नाम पर कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं करेंगे? श्री जेटली ने गांवों में तालाब और कुएं खोदने व पुनर्जीवित करने की मद में राशि आबंटित की है। यह प्रस्ताव भी सराहनीय है। किन्तु यहां फिर सवाल उठता है कि देश के तालाबों तथा जलाशयों को संरक्षित करने के लिए भारत सरकार की नीति क्या है? हम सिर्फ एनडीए सरकार की बात नहीं कर रहे हैं। यह खेल तो पिछले चालीस साल से चला आ रहा है और इस बारे में कोई भी सरकार स्पष्ट नीति बनाने में असफल रही है।

जैसा कि हम जानते हैं देश के सभी राष्ट्रीयकृत बैंक गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि इन बैंकों की चार लाख करोड़ से अधिक राशि डूबत खाते में चली गई है। इसके लिए एक बढिय़ा संज्ञा गढ़ ली गई है- एनपीए अथवा नॉन परफार्मिंग असेट। असेट याने संपत्ति। जो पैसा डूब गया हो उसे संपत्ति कैसे माना जाए? बहरहाल बजट में इन बैंकों की माली हालत सुधारने के लिए पच्चीस हजार करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है। इतनी कम राशि से बैंकों को पुनर्जीवन कैसे मिलेगा? दूसरी ओर जो राशि डूबत खाते में चली गई है उसकी वसूली कैसे संभव होगी? इस पर सरकार अभी तक मौन है। बजट में भी बस इतना ही कहा गया है कि सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर इस बारे में त्वरित सूचनाएं एकत्र की जाएंगी इत्यादि। हमारी समझ में सरकार को बजट के माध्यम से नीति स्पष्ट करना चाहिए थीं कि जो बड़े बकायादार या डिफाल्टर हैं उनके साथ सरकार किस तरह पेश आएगी।

इस बजट में कृषि क्षेत्र से संबंधित एक और घोषणा है। इसके अनुसार खाद्यान्न उत्पादन, प्रसंस्करण एवं वितरण में शत-प्रतिशत एफडीआई की अनुमति होगी। वित्त मंत्री का मानना है कि इससे किसानों को फायदा होगा तथा रोजगार के विपुल अवसर निर्मित होंगे। हम श्री जेटली की तरह आशावादी नहीं हैं। इस नीति से होगा यह कि विदेशी कंपनियां हमारे कृषि संसाधनों पर कब्जा जमा लेंगी। यह काम दबे हुए अभी भी चल रहा है, लेकिन अब खुलकर छूट मिल जाएगी। इससे यह भी होगा कि हमारा किसान अपने ही खेत में विदेशी पूंजीपतियों का ताबेदार बन जाएगा। खेत में वही फसल ली जाएगी जो विदेशी मालिक चाहेगा। एक तरह से यह खेती का कारपोरेटीकरण करना होगा। यहां शंका होती है जो सड़क व सिंचाई की बातें हो रही हैं वह भी कहीं इन नए मालिकों के फायदे के लिए तो नहीं है?

इसी तरह यह आशंका भी बलवती होती है कि सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों का पूरी तरह निजीकरण करने की ठान ली है। सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश तो एनडीए-1 में ही प्रारंभ  हो गया था। इसके लिए जो विनिवेश मंत्रालय बनाया गया था उसका नाम अब बदलकर निवेश एवं सार्वजनिक संपदा प्रबंधन विभाग किया जा रहा है। सार्वजनिक संपदा का प्रबंधन कैसे होगा यह वित्तमंत्री ने बिना लाग-लपेट स्पष्ट कर दिया है। वे कहते हैं कि सरकार सार्वजनिक उद्यमों को प्रोत्साहित करेगी कि वे अपनी संपदाएं यथा जमीन, मशीन इत्यादि बेच दें और उससे जो पैसा मिले उसे नई योजनाओं में लगाएं। नीति आयोग ऐसे सार्वजनिक उद्यमों की सूची बनाएगा। हम पुराने अनुभव से जानते हैं कि विनिवेश से जो राशि प्राप्त हुई उससे कोई नई परिसंपत्तियां खड़ी नहीं की गईं। बल्कि सरकारी अमले के वेतन भत्तों में ही अरबों-खरबों की राशि चली गई। अब सिर्फ नाम बदल देने से ही कुछ नया हो जाएगा इस पर कौन विश्वास करेगा?

वित्तमंत्री ने ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर जोर देते हुए एक ऐसी घोषणा की है जिस पर सहसा विश्वास करने का मन नहीं होता। वे चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के मुकाबले ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं को लगभग तीन लाख करोड़ की राशि आबंटित करने जा रहे हैं। इससे हरेक ग्राम पंचायत को औसतन अस्सी लाख रुपया और प्रत्येक नगरीय निकाय को औसतन इक्कीस करोड़ रुपए की ग्रांट मिलेगी। इसके लिए पंचायती राज मंत्रालय राज्यों के साथ बातचीत कर नीति निर्धारित करेगा। एक तो हमें डर लगता है कि यह भी कहीं स्मार्ट सिटी जैसा झुनझुना तो नहीं है। फिर भी चूंकि चौदहवें वित्त आयोग का संदर्भ आया है तो इस घोषणा को खारिज नहीं किया जा सकता। यह राशि स्वायत्तशासी संस्थाओं को किश्तों में मिलेगी, विभिन्न मदों में मिलेगी, एकमुश्त मिलेगी, संस्था को सीधे मिलेगी या राज्य के माध्यम से- इन सब प्रश्नों के उत्तर अभी आना बाकी है। यहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी भी राज्य में पंचायतों और नगरीय निकायों की स्वायत्तता बराएनाम होती है। राज्य सरकार उनके कार्यक्षेत्र में निरंतर हस्तक्षेप करती है और अगर निकाय पर विपक्षी दल काबिज हो तब तो कहना ही क्या? अगर केन्द्र से पंचायतों को राशि सीधे और एकमुश्त मिले तब तो इस प्रावधान का कोई महत्व है वरना वही ढाक के तीन पात होंगे।

आखिरी बात कौशल विकास के बारे में। पिछले कुछ सालों में सरकार का इस मुद्दे पर काफी जोर रहा है। वित्त मंत्री ने दावा किया है कि अब तक छिहतर लाख युवाओं को कौशल उन्नयन प्रशिक्षण दिया जा चुका है।  इस कार्यक्रम की भावना सही है, लेकिन यह बात छिपी हुई नहीं है कि प्रशिक्षण सामग्री तैयार करने, प्रशिक्षक तैयार करने और प्रशिक्षण देने के नाम पर ऐसी अनेक संस्थाएं खड़ी हो गई हैं जो सच्चे-झूठे आंकड़े पेश कर इस कार्यक्रम में सेंध लगा रही हैं।  इन पर कैसे रोक लगाई जाए यह भी वित्तमंत्री को विचार करना होगा। (समाप्त)

देशबन्धु में 04 मार्च 2016 को प्रकाशित