Sunday, 3 July 2016

सातवां वेतनमान: खेतों में सूखा : बाजार में बहार


 केन्द्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी हैं। इससे केन्द्र पर एक लाख करोड़ रुपया प्रतिवर्ष का व्यय भार बढ़ेगा जबकि सैंतालीस लाख केन्द्रीय कर्मचारी और तिरपन लाख पेंशनभोगी इस तरह एक करोड़ व्यक्ति लाभान्वित होंगे। ये आंकड़े देखे तो अनायास ही ध्यान यूपीए-1 के उस निर्णय पर चला गया, जिसमें किसानों को कर्जमुक्त करने के लिए सत्तर हजार करोड़ का प्रावधान किया गया था। तब अर्थनीति के बड़े-बड़े पंडितों ने इस कदम की आलोचना की थी। उन्हें इसके दुष्परिणाम ही दिखाई दे रहे थे। सच तो यह है कि इस देश के नीति-नियंताओं ने खेती-किसानी को व्यर्थ का काम समझ लिया है। वे बार-बार जीडीपी में कृषि क्षेत्र के न्यून योगदान का मुद्दा उठाते हैं। उन्हें जानबूझ कर यह समझ नहीं आता कि यदि खेती ठीक से न हो और किसान की खुशहाली पर ध्यान न दिया जाए तो बिना अनाज के जिएंगे कैसे?

भारतीय समाज का यही वर्ग सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से बहुत खुश हैं। उसे लगता है कि खजाने से सालाना एक लाख करोड़ की रकम निकलेगी तो बाजार में बहार आ जाएगी।  टीकाकारों ने इसके दुष्प्रभावों की चिंता यदि की भी है तो दबी जुबान से। विडंबना यह है कि सरकारी कर्मचारी स्वयं इन सिफारिशों से खुश नहीं हैं। वे जिस बढ़ोतरी की मांग और उम्मीद कर रहे थे वह उन्हें नहीं मिली। सैन्य व अद्र्ध सैन्य बल तो काफी नाराज़ हैं। इससे कांग्रेस पार्टी को बैठे बिठाए मोदी सरकार पर आक्रमण करने का अवसर मिल गया है। कांग्रेस दावा कर रही है कि छठवें वेतन आयोग की जो सिफारिशें आई थीं उसमें अपनी तरफ से अच्छी खासी बढ़ोतरी कर यूपीए ने कर्मचारियों को तोहफा दिया था जबकि वर्तमान सरकार कंजूसी का परिचय दे रही है। देश की जो वित्तीय  स्थिति है उससे कांग्रेस भी परिचित है और एनडीए सरकार उसी के अनुसार सावधानी बरत रही है, लेकिन विरोधी दल अगर विरोध न करेंगे तो क्या करेंगे?

यह बात बिल्कुल समझ नहीं आती कि केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए हर दस साल में वेतन आयोग गठित करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है। एक कर्मचारी नियत वेतनमान पर नियुक्ति पाता है।  उसे हर साल वेतनवृद्धि मिलती है।  महंगाई बढ़ती है तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के अनुसार महंगाई भत्ता भी बढ़ता है। ऐसे में वेतन आयोग की यह परिपाटी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने का ही काम करती है। जब इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे तब पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गई थीं। उस समय आर्थिक स्थिति वैसे ही कमजोर थी और कर्मचारियों के वेतन एकाएक बढऩे से और अधिक परेशानियां खड़ी हो गई थीं। प्रशासनिक आवश्यकताओं के मद्देनजर कर्मचारियों की श्रेणी में परिवर्तन या नई श्रेणियों का सृजन करने की आवश्यकता दस-बीस साल में हो सकती है, लेकिन फिर प्रशासनिक सुधार आयोग भी तो है, जिसकी रिपोर्टें धूल खाती पड़ी रहती हैं।

सरकारी कर्मचारियों को उनके काम के मुताबिक संतोषजनक वेतन मिले इसमें किसी को आपत्ति नहीं होगी, किन्तु यहां पहला बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सरकारी कर्मचारी देश के अन्य नागरिकों से भिन्न किसी प्रजाति के हैं। दूसरे- वे जो काम कर रहे हैं वह किसके लिए? मात्र अपने लिए वेतन अर्जित करने  अथवा समाज की बेहतरी के लिए? तीसरे- यदि प्रशासनतंत्र में कसावट नहीं है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन? क्यों आए दिन भ्रष्टाचार की खबरें सुनने मिलती हैं? क्यों प्रधानमंत्री को सफाई देना पड़ती है कि उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है? एक सवाल तो यह भी पूछा जा सकता है कि पांचवें वेतन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बहुत से अभिकरणों को और बहुत से पदों को समाप्त करने की सिफारिश की थी उस पर अमल क्यों नहीं हुआ? इसके विपरीत नए-नए अभिकरण और नए-नए पद सृजित हो रहे हैं। हमारे यहां ई-गर्वर्नेंस की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन कुछेक क्षेत्रों को छोडक़र बाकी सबमें कागजों का अंबार लगा रहता है, सो क्यों?

केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए नया वेतनमान जैसे ही लागू होगा राज्यों में भी उसे लागू करने की मांग उठने लगेगी। जब राज्य सरकार के कर्मचारी मांग करेंगे, तो विश्वविद्यालय, नगर निगम, जिला पंचायत तथा अन्य अनुदान प्राप्त संस्थाओं के कर्मचारी भी मांग उठाने में पीछे नहीं रहेंगे। यह एक विचित्र स्थिति है। समान काम के लिए समान वेतन जायज है, लेकिन समान परिस्थिति की शर्त भी तो उसके साथ होना चाहिए। केन्द्रीय कर्मचारी का तबादला देश में कहीं भी हो सकता है। राज्य के कर्मचारी का सिर्फ प्रदेश के भीतर तथा स्थानीय निकायों के कर्मचारी तो जहां नियुक्त होते हैं वहीं से रिटायर होते हैं। याने उनके काम करने की स्थिति अपेक्षाकृत सुविधापूर्ण है। यह भी विडंबना है कि कोई भी राज्य सरकार या मुख्यमंत्री किसी तरह का विरोध मोल लेना नहीं चाहता और वह कर्मचारियों की संगठित शक्ति के आगे झुक जाता है। इसके चलते राज्य पर जो व्यय भार पड़ता है उसकी भरपाई कहां से होगी, इसकी चिंता कोई नहीं करता।

देश के अधिकतर राज्य कर्ज से दबे हुए हैं।  वे अपने खर्चों के लिए रिजर्व बैंक से ओवर ड्राफ्ट लेते हैं। कुछ राज्यों में तो पूरी सालाना आय कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में चली जाती है। नतीज़ यह होता है कि विकास के मदों में खर्चों में लगातार कटौती होते जाती है। एक तरह से देखें तो कर्मचारियों के लिए यह स्थिति आत्मघाती है। जब सरकार के पास पैसे नहीं होते तो वह पूर्णकालिक कर्मचारी नियुक्त करने के बजाय अंशकालिक, तदर्थ अथवा अनुबंध पर कर्मचारी नियुक्त करती है। इसका सीधा दुष्परिणाम शासकीय कार्य की गुणवत्ता पर पड़ता है। सबसे खराब स्थिति शिक्षा और स्वास्थ्य में देखने मिलती है। सारे प्रदेशों में पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति पिछले पच्चीस साल से बंद हो रखी है। आईआईटी, आईआईएम और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद खाली पड़े हुए हैं। शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति में 
कटौती हो रही है और ऐसी अनेक बातें हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारें न्यूनतम प्रतिरोध की अवधारणा से संचालित हो रही है। दूसरे शब्दों में सत्ताधीश अपने पद पर बने रहने के लिए हर तरह के समझौते कर रहे हैं। वे कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते। इस मनोवृत्ति के चलते प्रशासनतंत्र निरंतर पंगु होते जा रहा है। जिन जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच में धंस कर उनकी आशा-आकांक्षा जानना चाहिए वे अब बिना गनमैन के नहीं चलते ताकि जनता उससे थोड़ी दूरी बनाकर ही रहे। अफसरशाह जो फैसले लेते हैं उसी से सरकार चलती है। फलत: जनता की समस्याओं की निराकरण के चाहे जितने वायदे किए जाएं उनमें से अधिकतर पूरे नहीं होते। इसके बाद जब सरकारी कर्मचारियों पर छापे डालकर करोड़ों की संपत्ति मिलने की खबरें सुनने में आती हैं तो पूछने का मन होता है  कि इन्हें वेतन की आवश्यकता ही कहां है?

बहरहाल, आज हमारी सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि नए वेतनमान के बाद देश में संगठित और असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच अभी जो खाई है वह और अधिक चौड़ी हो जाएगी। निजी क्षेत्र के लघु एवं मध्यम उद्यमियों के पास इतने साधन ही नहीं हैं कि वे अपने कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों के बराबर वेतन दे सकें। इससे देश के व्यापार जगत में एकाधिकारवाद की मनोवृत्ति पनपेगी। छोटे कल-कारखानों का चलना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि उन्हें कम वेतन पर अच्छे कर्मचारी नहीं मिलेंगे। तब माल और मल्टीप्लेक्स की आर्थिक संस्कृति को ही पनपने का मौका मिलेगा। इसके अलावा बाजार में महंगाई बढ़ेगी तथा मुद्रा स्फीति की दर भी बढ़ेगी। सरकारी कर्मचारी के हाथ में आई रकम गैर-आवश्यक वस्तुओं की खरीद में जाएगी। हर तरह की जिंस के भाव बढऩा ही बढऩा है। ऐसे में एक बार सत्तर हजार करोड़ की रियायत पा चुका किसान क्या करेगा? उसे तो मनरेगा में भी ठीक से काम नहीं मिल पाता और उसका साथी मजदूर-कारीगर क्या करेगा? उसके रोजगार के साधन तो पहले ही मशीनीकरण ने छीन लिए हैं। अंत में यक्ष प्रश्न कि सरकार वेतन हेतु अतिरिक्त धनराशि की व्यवस्था इस मंदी के दौर में कैसे करेगी?
देशबन्धु में 2 जुलाई 2016 को प्रकाशित