Wednesday, 9 November 2016

दिल्ली में धुआँ क्यों है?



 यह पिछले हफ्ते की ही तो बात है। दो नवंबर को सुबह साढ़े ग्यारह बजे के आसपास दिल्ली विमानतल पर हवाई जहाज उतरा तो खिडक़ी से बाहर का दृश्य देखकर मैं हैरान ही नहीं हुआ बल्कि किसी हद तक भयभीत हो गया। दोपहर होने को थी जबकि ऊपर चढ़ते सूरज का प्रकाश चारों तरफ प्रखरता के साथ फैला हुआ होना चाहिए था किन्तु वहां तो नीम अंधेरा छाया हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो कोहरे ने दिल्ली को अपनी चादर में लपेट लिया है। लेकिन यह कोहरा नहीं था जिसका सामना दिल्ली में अमूमन हर साल दिसंबर-जनवरी में करना होता है। यह तो धुआं छाया हुआ था। हवाई अड्डे से बाहर निकल कर टैक्सी में अपने गंतव्य की ओर रवाना हुआ तो भी पूरे रास्ते भर धुआं साथ-साथ चल रहा था। टैक्सी की खिड़कियों के कांच चढ़े हुए थे, लेकिन धुआं भीतर आकर फेफड़ों में समा रहा था। उस दिन शाम तक दिल्ली के आकाश से सूरज नदारद रहा, बल्कि यूं कहें कि बेदखल कर दिया गया था।

अगली सुबह मौसम कुछ खुला हुआ था, उजाला कुछ-कुछ फैल रहा था, लेकिन वातावरण में धुएं का भारीपन था, सडक़ों पर आते-जाते लोगों को देखा तो बड़ी संख्या में लोग मुंह पर मास्क याने नकाब लगाए हुए दिखे ताकि धुआं नथुनों से होकर फेफड़ों पर आक्रमण न कर सके। मैंने इसकी चर्चा कुछ  दिल्लीवासियों से की तो वे सब इस प्रदूषण से परेशान थे। मेरी बेटी ने तो मुझको यह सलाह दे दी कि आप इस मौसम में दिल्ली आया ही न करें। मेरी चिंता अपने बारे में न होकर जिनके बारे में थी उनका कहना था कि हमारे पास तो कोई विकल्प है नहीं, यहां रहना है तो इस प्रदूषण का भी सामना करना है। अलबत्ता राजधानी के निवासियों को इस बात का कोई इल्म नहीं था कि आखिरी अक्टूबर या शुरूआती नवंबर में महानगर का वातावरण इतना प्रदूषित हो जाएगा। अब उसके कारणों की पड़ताल चल रही है तो आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी बराए-दस्तूर चल पड़ा है।

पाठकों को ध्यान होगा कि पिछले साल दिल्ली की आप सरकार ने प्रदूषण मुक्ति के लिए वाहनों के सम-विषम नंबरों के आधार पर परिचालन का प्रयोग किया था। मेरी राय में यह एक सुविचारित कदम था जिसका अध्ययन दलीय राजनीति से अलग हटकर किया जाना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भी दिल्ली में वाहन प्रदूषण की रोकथाम हेतु कुछेक निर्देश समय-समय पर दिए थे उनका भी कोई खास नतीजा नहीं निकला। कोई पन्द्रह साल पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रदूषणकारी लघु और मध्यम उद्योगों को दिल्ली से बाहर ले जाने का निर्णय सुनाया था। वह भी एक आधा-अधूरा कदम साबित हुआ। अब दिल्ली के उपराज्यपाल ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए आप सरकार द्वारा नियुक्त पर्यावरण सचिव को हटा दिया है। इससे क्या होगा? राजधानी की सरकार निर्वाचित मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मनोनीत उपराज्यपाल चला रहे हैं तब केजरीवाल सरकार को दोष देने में क्या औचित्य है?

दीपावली की रात से ही दिल्ली में धुआं छाने लगा था। उस समय यह समझ आया कि बड़ी मात्रा में पटाखे फोड़े जाने के कारण बारूदी जहर फैल रहा है। किन्तु एक-दो दिन बाद एक नया तर्क सामने आया कि पंजाब, हरियाणा आदि में फसल के ठूंठ जलाए जाने के कारण उसका धुआं उडक़र दिल्ली की तरफ आ रहा है। केन्द्र सरकार ने सीमावर्ती राज्यों पर दोष डाल दिया कि ये प्रदूषण रोकने के उपायों का समुचित पालन नहीं कर रहे हैं। हो सकता है कि उनकी बात सही हो, लेकिन उन दिनों हवा का बहाव दिल्ली की दिशा में याने उत्तर से दक्षिण की ओर नहीं था। खैर! हम चाहे जितने कयास लगाते रहें, समस्या उत्पन्न होने के कारण और उपचार तो विषय-विशेषज्ञ ही बता सकते हैं। इसमें दो पेंच हैं- एक तो क्या सर्व बुद्धिमान सरकार विशेषज्ञों की राय को कोई अहमियत देती है या नहीं। दूसरे- समाज का वर्चस्ववादी शक्तिसम्पन्न तबका विशेषज्ञों की राय के अलावा सरकार द्वारा बनाए गए कायदे-कानूनों को मानने के लिए तैयार है या नहीं।

हम अपने अनुभव से कह सकते हैं कि निर्वाचित सरकारों और सरकार चलाने वाले अहंकारी अधिकारियों की दृष्टि में विशेषज्ञों की राय कोई अहमियत नहीं रखती। उन्हें जो करना है वही करते हैं। और यह सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है। हाल के बरसों में यह मानसिकता और प्रबल हुई है। बात चाहे ताजमहल के बिल्कुल निकट तेलशोधन संयंत्र लगाने की हो, चाहे मुंबई में नमक की खेती वाले डालों पर कब्जा करने की हो, चाहे गोवा और तमिलनाडु में मैंग्रोव के कुंज काटकर भूमाफिया को जमीन देने की हो और चाहे छत्तीसगढ़ में किसानों की भूमि और बांधों का पानी उद्योगपतियों को देने की हो, या फिर ओडिशा में समुद्र तट के केतकीकुंज काटकर इस्पात का कारखाना लगाने की हो। मतलब यह कि न किसी को पर्यावरण की चिंता है, न प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की और न भावी पीढिय़ों की सुरक्षा की। इसलिए छत्तीसगढ़ में नदी का एक हिस्सा कांग्रेस सरकार द्वारा उद्योगपति को बेच दिया जाता है किन्तु भाजपा सरकार उस ठेके को निरस्त करने का कदम नहीं उठाती।

यह तो हुई एक बात। दूसरी बात हमारी जीवन शैली से ताल्लुक रखती है। महान लेखक टाल्सटॉय ने भले ही नीति कथा लिखी हो कि मरने के बाद मनुष्य को दफनाने के लिए दो गज जमीन से अधिक की आवश्यकता नहीं होती और भले ही साधु-संत कहते हों कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है, किन्तु आज तो ऐसा लगता है जैसे हर मरने वाला अपनी पूरी संपत्ति साथ लेकर ही ऊपर जाएगा। क्या मालूम ऊपर जाकर चित्रगुप्त को रिश्वत देना पड़े या कि धर्मराज को ताकि नरक में भी स्वर्ग का सुख मिल सके। अगर ऐसी सोच नहीं है, तो फिर यह संचय वृत्ति क्यों कर समाज में विकसित हो रही है? भारत की स्थिति तो बिल्कुल विचित्र है। भोगवादी पश्चिम में धनी-धोरी लोग अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा दान कर देते हैं, लेकिन यहां जो सत्ताइस मंजिल का महल खड़ा करते हैं वे परमार्थ के लिए कौड़ी भी खर्च नहीं करते।

भारतीय समाज में लंबे समय से संग्रहवृत्ति तो नहीं, बचत करने की आदत रही है। उसकी यह आदत देश की अर्थव्यवस्था को संतुलित करने में काफी काम आई है। लेकिन बदलते समय के साथ अब यह अच्छी आदत खत्म होते दिखाई दे रही है। नवपूंजीवाद ने इसमें खासी भूमिका निभाई है। आज के मीडिया और आज के बाजार को नवपूंजीवाद ने अपने मनमर्जी ढाला है। उसके फैलाए इंद्रजाल में लोग चाहे-अनचाहे फंसते जा रहे हैं। क्षणिक आनंद के लिए अथवा अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अब जिस तरह गैरउत्पादक गतिविधियों में धन का अपव्यय हो रहा है वैसा बीस-पच्चीस साल पहले तो नहीं था या एक सीमा के भीतर था। दिल्ली हो या रायपुर, दीपावली पर पटाखे तो पहले भी चलाए जाते थे। तब तो धुआं आकाश पर इस तरह नहीं छाता था और न सूरज को इस तरह निगलता था। इससे यही समझ आता है कि अब लोग बिना सोचे- समझे दीवाली में आतिशबाजी पर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि इससे कितना जहर फैलेगा और जिन बच्चों की खुशियों के लिए वे ऐसा कर रहे हैं उनको ही इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा।

हमें एक तीसरे बिन्दु पर भी ध्यान देना चाहिए। 1947 में भारत की आबादी बत्तीस करोड़ थी वह आज बढक़र एक अरब तीस करोड़ हो गई है याने चार गुने से अधिक। इस बढ़ी हुई आबादी के लिए भी सब तरह की व्यवस्थाएं चाहिए। अन्न और जल से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, यातायात और मनोरंजन तक। देश का क्षेत्रफल तो वही है जो सत्तर साल पहले था। इसका अर्थ यह हुआ कि अब प्रत्येक के हिस्से में पहले के मुकाबले एक चौथाई जमीन है। जहां एक मकान था वहां अब चार मकान चाहिए, जिसके पास एक एकड़ जमीन है अनाज और पानी की व्यवस्था करने में कोई भी योजना कारगर नहीं हो रही है, घातक रासायनिक तत्वों का प्रयोग बढ़ते जा रहा है, जंगल कट रहे हैं, यातायात व्यवस्था चरमरा रही है। नई-नई मशीनों के कारण रोजगार के अवसर घट रहे हैं और ऐसी तमाम बातें हैं। दिल्ली का धुआं एक दिन की समस्या नहीं है। इस पर सर्वांग दृष्टि से विचार करेंगे तभी हल खोज पाएंगे।

देशबंधु में 10 नवम्बर 2016 को प्रकाशित