Wednesday, 1 May 2013

क्रिकेट के नक्शे पर रायपुर




एक 
पत्रकार से अपेक्षित सामान्य ज्ञान के चलते क्रिकेट के बारे में मैं कुछ मोटी-मोटी बातें अवश्य जानता हूं, लेकिन मैं क्रिकेट प्रेमी तो बिलकुल ही नहीं हूं बल्कि आप मुझे किसी हद तक क्रिकेट विरोधी भी कह सकते हैं।  हमारे ऐसे कुछ पत्रकार और बुध्दिजीवी मित्र हैं जो यह समझते हैं कि गाहे-बगाहे इस खेल पर विद्वतापूर्ण टिप्पणी किए बिना वे पूर्ण पंडित नहीं कहला सकते। वे इस मामले में ब्रिटिश पत्रकारों का अनुसरण करते दिखाई देते हैं, लेकिन मेरे लिए तो, जैसी कि एक अंग्रेजी कहावत है- 'इट इज नॉट माइ कप ऑफ टी।'

अपने अज्ञान की इस स्वीकारोक्ति के बावजूद मैं कहना चाहूंगा कि रायपुर में पिछले दिनों आईपीएल के बैनर तले टी-20 के जो दो मैच हुए उससे मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। इस प्रदेश के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर था क्योंकि इसके पहले तक क्रिकेट जगत के लिए रायपुर एक अनजाना स्थान था। क्रिकेट के इन मैचों के आयोजन के लिए स्टेडियम का निर्माण प्रारंभ होने से लेकर अंतिम समय जिस बड़े पैमाने पर साधन-सुविधाओं की आवश्यकता थी उनका मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह की व्यक्तिगत रुचि के बिना उपलब्ध होना असंभव था इसलिए इस आयोजन के लिए अगर किसी को बधाई दी जाना चाहिए तो वे डॉ. सिंह ही हैं।

यह जब तय हो गया कि छत्तीसगढ़ में आईपीएल के दो मैच इस सीजन में होंगे उस समय से आयोजन को लेकर दोनों तरह की बातें सुनने मिल रही थीं। एक तरफ बड़ी संख्या में वे लोग थे जो आयोजन को लेकर खासे उत्साहित थे। दूसरी ओर दबे स्वर में कहीं-कहीं आलोचना भी हुई। एक बात यह उठी कि मुख्यमंत्री ने चुनावी वर्ष में लाभ उठाने के लिए ये मैच कराने में इतनी रुचि प्रदर्शित की। मैं नहीं जानता कि आईपीएल के मैचों से आमचुनाव पर क्या असर पड़ता है। फिर तो यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने चुनावी लाभ उठाने के लिए सचिन तेंदुलकर को रायसभा में मनोनीत किया। अगर ऐसा है भी तो इसमें बुराई क्या है? यह कौन नहीं जानता कि क्रिकेट भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है! किसी गुजरे जमाने में हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल रहा होगा, लेकिन उसे लेकर कब तक रोते रहेंगे! आज इस देश का युवा अगर क्रिकेट खेलना चाहता है या क्रिकेट मैच देखना चाहता है तो, उसे यह अवसर देने में गलत क्या है? रायपुर में 28 अप्रैल को सम्पन्न पहले मैच में पचपन हजार दर्शक उपस्थित थे। इनमें युवा ही बहुत बड़ी संख्या में थे। जब सरकारें इन युवाओं को आगे बढ़ने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम चलाती हैं तब उन्हें अपने घर के मैदान पर देश-विदेश के कुछेक नामी खिलाड़ियों को खेलते हुए देखने का मौका दिया तो अच्छा ही किया। यह एक सलमान खान अथवा करीना कपूर को राज्योत्सव में बुलाने से तो कहीं ज्यादा अक्लमंदी का काम था।

जब क्रिकेट और खेलों की बात चली है तो इनसे जुड़े कुछेक मुद्दों पर ध्यान अपने आप जाता है। पुराने मध्यप्रदेश में क्रिकेट का अगर कोई केन्द्र था तो वह था इन्दौर जहां से सी.के. नायडू, मुश्ताक अली और जगदाले पिता-पुत्र जैसे खिलाड़ी निकले। माधवराव सिंधिया के केन्द्रीय मंत्री बनने के बाद ग्वालियर में भी एक दिवसीय मैचों का आयोजन शुरू हुआ। इस बीच देश के अनेक प्रांतीय केन्द्रों में भी क्रिकेट मैच होना शुरू हुए। खेल का कुछ जनतंत्रीकरण भी हुआ। इन छोटे नगरों में भी खिलाड़ी तैयार होने लगे। उन सबके नाम पाठकों को मुझसे बेहतर याद होंगे। मध्यप्रदेश में इस नए दौर में दो खिलाड़ी उभरे- एक इंदौर से नरेन्द्र हिरवानी तथा उनके दसेक साल बाद भिलाई से राजेश चौहान। इन दोनों का कॅरियर यद्यपि बहुत चमकदार तो नहीं रहा, लेकिन इन्होंने अपने प्रदेश को क्रिकेट के नक्शे पर परिचित कराने का काम तो किया ही।

छत्तीसगढ़ में क्रिकेट नहीं बल्कि हॉकी और फुटबॉल की लंबी परम्परा रही। इस प्रदेश ने भारत की ओलंपिक टीम को दो हॉकी खिलाड़ी दिए। राजनांदगांव के एरमेन सेबेस्टीयन व बिलासपुर के लेस्ली क्लाडियस जिनका निधन हुए अभी ज्यादा समय नहीं बीता है। महिला हॉकी में भी नीता डुमरे और सबा अंजुम ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बनाया। एक और नाम याद आता है- राजनांदगांव की शतरंज खिलाड़ी किरण अग्रवाल का। प्रसंगवश कहना होगा कि राजनांदगांव में बहुत पहले से खेलकूद के लिए माकूल वातावरण था। आज यदि इस प्रदेश में खेलों के प्रति एक नई जागरुकता उत्पन्न हो रही है तो हमें अपने इन खिलाड़ियों को याद कर लेना चाहिए। मुझे इस बात पर थोड़ी हैरत हुई कि आईपीएल के इन मैचों के दौरान राजेश चौहान का नाम कहीं भी सुनने नहीं मिला। इसका क्या कारण था आयोजक ही जानते होंगे।

आज जब प्रदेश की नई राजधानी याने नया रायपुर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट स्टेडियम बनकर तैयार हो गया है, उसमें खेलों का आयोजन भी होने लगा है, तब प्रदेश के खेल मैदानों की ओर ध्यान जाना भी स्वाभाविक है। मैं जब राजनांदगांव का जिक्र कर रहा था तब मुझे बरबस याद आ रहा था कि 1973 में जब यह नया जिला बना तब जिले के पहले कलेक्टर अरुण क्षेत्रपाल और पहले पुलिस अधीक्षक आर.एस.एल. यादव की जोड़ी ने नागरिकों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उनका सक्रिय सहयोग लेकर कैसे दिग्विजय स्टेडियम का निर्माण करवाया था। मैं अगर गलत नहीं हूं तो वह उस वक्त प्रदेश का सबसे बेहतरीन खेल परिसर था। एक तरफ अगर यह उत्कृष्ट उदाहरण है, तो दूसरी तरफ प्रदेश में खेल मैदानों की बर्बादी के किस्से भी कम नहीं। मुझे याद है कि आज रायपुर में जिसे सुभाष मिनी स्टेडियम के नाम से जाना जाता है वह डेढ़ सौ साल पुराने गर्वनमेंट हाईस्कूल का मैदान था। उसे नगर निगम ने इस शर्त पर लिया था कि स्कूल के लिए मैदान हमेशा उपलब्ध रहेगा, लेकिन इस वायदे को जल्दी ही भुला दिया गया। इस स्कूल का दुर्भाग्य कि स्कूल परिसर में ही जो छोटा सा खेल मैदान था वह भी हाल में किसी मंत्री की जिद में सड़क चौड़ीकरण की बलि चढ़ गया और न तो मुख्यमंत्री का ध्यान उस ओर गया, न नागरिकों ने ही विरोध किया। इसी तरह माधवराव सप्रे स्कूल के प्रशस्त खेल मैदान का भी ऐसी ही दुर्गति हुई। एक बड़ा हिस्सा सड़क चौड़ीकरण में चला गया और भी न जाने वहां क्या-क्या दूसरे काम हो गए।

28 अप्रैल की रात आईपीएल का पहला मैच समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री ने प्रदेश में शीघ्र ही क्रिकेट अकादमी स्थापित करने की घोषणा की है। मैं उनके इस मंतव्य का स्वागत करता हूं, लेकिन वे अगर बुरा न मानें तो सवाल भी पूछना चाहता हूं कि प्रदेश की खेल मैदानों को बचाने के लिए वे क्या कर रहे हैं! साइंस कॉलेज के मैदान पर आए दिन व्यापार मेले भरते रहते हैं। इसी कालेज के परिसर को सड़क निकालने के लिए दो हिस्सों में बांट दिया गया है। संस्कृत कॉलेज के खेल मैदान में जाने किसके लिए भव्य तरण पुष्कर बन रहा है। यह तो राजधानी की बात है, प्रदेश में और जहां-जहां भी स्टेडियम और खेल के मैदान हैं उनके रखरखाव की क्या व्यवस्था है, बच्चे खेल के मैदान तक आएं, इसके लिए क्या नीति है, यह सब भी मुख्यमंत्रीजी को देखना चाहिए। वे देखें इसके लिए यह भी जरूरी है कि जनता भी चुपचाप न बैठे बल्कि अपनी आवाज उठाए। रायपुर के ये क्रिकेट मैच अरुण जेटली के सहयोग के बिना संभव नहीं थे। डेल्ही डेयरडेविल्स ने रायपुर को अपना दूसरा 'होम ग्राउंड' मान लिया है। डॉ. रमनसिंह तैयार रहें कि कल कहीं जेटलीजी भी रायसभा में दोबारा जाने के लिए छत्तीसगढ़ को अपना दूसरा घर न बना लें! 

देशबंधु में 2 मई 2013 को प्रकाशित