Sunday, 26 May 2013

नक्सली तांडव : नई रणनीति की जरूरत



छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा शुरु हिंसा का तांडव थमने के कोई आसार नजर नहीं आते। 25 मई को बस्तर में कांग्रेस के काफिले पर हमला कर कई वरिष्ठ नेताओं सहित कोई तीस व्यक्तियों को मार देने का जो जघन्य अपराध उन्होंने किया है उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। यह तय है कि नक्सलवाद अपने प्रारंभिक दौर के सिध्दांतों को पूरी तरह छोड़ एक नई राह पर चला गया है। नक्सली दस्ते जिस दु:साहस के साथ अविचारित हत्याएं कर रहे हैं उससे जाहिर होता है कि वे न सिर्फ छत्तीसगढ़ प्रदेश बल्कि अपने सारे प्रभाव वाले क्षेत्र में आतंक की सत्ता कायम रखना चाहते हैं। महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और उनके बेटे को जिस नृशंसता से मारा गया, इसका प्रमाण हैं। आज के ये नक्सली किसी भी तरह से चारू मजूमदार और कनु सान्याल के वारिस नहीं हैं। देश का न्यायतंत्र इन्हें कब, क्या सजा दे पाता पाता है, पता नहीं। लेकिन समय आ गया है जब इनके अमानुषिक कृत्यों पर शाब्दिक निंदा या भर्त्सना करने की औपचारिकता निर्वाह करने से आगे बढ़कर समस्या को जड़मूल से समाप्त करने के बारे में विचार किया जाए।

छत्तीसगढ़ और उसके पड़ोसी प्रदेशों में व्याप्त नक्सली हिंसा का मुकाबला करने के लिए जरूरी है कि अतीत के अध्यायों को फिर से पढ़ा जाए, वर्तमान घटनाचक्र की विवेचना हो और इसके आधार पर भविष्य के लिए तर्कसंगत रणनीति अपनाई जाए। इस रणनीति के अल्पकालीन और दीर्घकालीन दो आयाम होंगे। दूसरी ओर राय विशेष की स्थितियों के आकलन के साथ-साथ राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी इस बारे में विचार करना होगा। कहने का आशय यह कि आग लगने पर कुंआ खोदना अथवा एक त्रासदी हो जाने पर दो-चार दिन चिंता व्यक्त कर भूल जाना और फिर सब कुछ पहले की तरह चलने देना, इसमें बात नहीं बनेगी। देश व प्रदेश की सरकार को इस हेतु व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है, ऐसा हम समझते हैं। 

यह गहरी विडंबना है कि कल जब विश्व को अहिंसा और मध्यमार्ग का संदेश देने वाले भगवान बुध्द की जयंती थी, उसी दिन नक्सलियों ने यह खूनी खेल खेला। इस त्रासदी के बाद यह प्रश्न जनमानस को अवश्य उद्वेलित कर रहा होगा कि अब आगे क्या होगा। इसके विश्लेषण के अनेक बिन्दु हमारे सामने उभरते हैं। एक दृष्टि से  गौर करें तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के सामने गहरी चुनौती खड़ी हो गई है। उसके तीन प्रमुख नेता- महेन्द्र कर्मा और नंदकुमार पटेल व उदय मुदलियार अन्यों के साथ मारे गए हैं, जबकि भारतीय राजनीति के एक वरिष्ठतम नेता विद्याचरण शुक्ल अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ मौत से लड़ रहे हैं। आने वाले दिनों में प्रदेश में कांग्रेस का क्या होगा? श्री कर्मा और श्री पटेल दूसरी पीढ़ी के चार प्रमुख नेताओं में थे जिनमें से अब दो ही बचे हैं- चरणदास महंत और रवीन्द्र चौबे। श्री चौबे के सत्तापक्ष के साथ मधुर संबंधों की चर्चा अक्सर सुनी जाती है। श्री महंत एक बार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं व फिलहाल केन्द्रीय मंत्री हैं। क्या कांग्रेस हाईकमान उन पर विश्वास करेगी कि वे प्रदेश में पार्टी का जनाधार मजबूत कर पाएंगे या फिर एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व पर विश्वास किया जाएगा?

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। कल की दुर्घटना के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह शायद इस बात पर पुनर्विचार कर रहे होंगे कि उनकी निजी लोकप्रियता व आम जनता के साथ समरसता, सुदृढ़  प्रशासन का पर्याय नहीं है। यह स्पष्ट दिख रहा है कि छत्तीसगढ़ पुलिस में नक्सल समस्या तो क्या, दैनंदिन स्थितियों को संभालने की क्षमता भी अपेक्षानुकूल नहीं है। एक तरफ यह पुलिस निहत्थे आदिवासियों को नक्सल मानकर उन पर गोलियां बरसाती है, तो दूसरी तरफ जहां सचमुच नक्सली मौजूद होते हैं वहां उसका  पूरा तंत्र विफल हो जाता है। केन्द्र सरकार प्रदेश में तैनात सीआरएफपी के संख्या बल में भले ही बढ़ोतरी कर दे, लेकिन राज्य की पुलिस अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी से कैसे बच सकती है?

यह स्थिति विकट है और इसके निराकरण के लिए कहीं से प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की बात हो रही है तो एक तबके से फिर आवाज आ रही है कि बस्तर को सेना के हवाले कर दिया जाए। हमारी राय में ये दोनों विकल्प स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। प्रदेश चलाने की जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार की है और बस्तर को छोड़कर प्रदेश में अन्यत्र कहीं भी ऐसी स्थिति नहीं है जिससे राष्ट्रपति शासन का औचित्य बनता हो। दीर्घकालीन नीति के तहत बस्तर में छठवीं अनुसूची लागू करने अथवा स्वायत्तशासी क्षेत्र निर्मित करने जैसे विचार भी सामने आते हैं। हम ध्यान दिलाना चाहेंगे कि पश्चिम बंगाल में गोरखालैण्ड क्षेत्रीय प्रशासन अभिकरण (जीटीए) का अनुभव बहुत संतोषजनक नहीं रहा है। छठवीं अनुसूची की मांग में दम है, लेकिन क्या इसके पहले पांचवीं अनुसूची याने पेसा कानून को प्रभावशाली ढंग से लागू करने पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए?

यह ऐसा विषय है जो स्वयं मुख्यमंत्री के ध्यानाकर्षण की मांग करता है। वे पिछले कई सालों की तरह इस साल भी भीषण गर्मी के बीच अपनी विकास यात्रा पर निकले हुए हैं। यह चुनाव का वर्ष है और स्वाभाविक है कि इस बार की यात्रा में राय की मुखिया का ध्यान मतदाताओं को रिझाने में कुछ ज्यादा ही हो। लेकिन हमारे विचार में मुख्यमंत्री को विकास यात्रा अब यहीं समाप्त कर देना चाहिए। शायद अधिक बड़ी जरूरत इस बात की है कि वे नियमित रूप से अपने कार्यालय में बैठें तथा प्रदेश की काबू से बाहर हो चली नौकरशाही को जवाबदेही के साथ काम करने के लिए प्रेरित करें। डॉ. रमन सिंह का जो जादू आम जनता पर चलता है उसका कुछ दर्शन मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय में भी होना चाहिए। उन्होंने पिछले साढ़े नौ साल के दौरान जनहित में बहुत से कदम उठाए जिनकी सराहना उनके विपक्षियों ने भी की, लेकिन अब शायद वक्त है कि सलवा जुड़ूम सहित उनके जिन निर्णयों का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा उसका विश्लेषण कर जहां भी स्थितियां बिगड़ी हैं, उन्हें ठीक करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

25 मई की नक्सली हिंसा की खबर पाते साथ मुख्यमंत्री ने अपने सारे कार्यक्रम स्थगित किए, राजकीय शोक घोषित किया, राजकीय सम्मान के साथ मृतकों की अन्त्येष्टि की घोषणा की- ये सब सही कदम थे। रायपाल शेखर दत्त ने देर रात पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में आए कांग्रेसी प्रदर्शनकारियों से भेंट की, शांतिपूर्वक उनकी बातें सुनीं, आज मुख्यमंत्री के साथ जगदलपुर के अस्पताल में घायलों से मुलाकात की, यह भी ठीक हुआ। केन्द्र सरकार व कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व में जो तत्परता और संवेदनशीलता दिखाई उसे भी नोट किया जाना चाहिए। राहुल गांधी तो तत्काल ही रायपुर पहुंचे, स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी भी तुरंत छत्तीसगढ़ आए, यह भी उचित हुआ, खासकर तब जबकि प्रधानमंत्री को 27 की सुबह विदेश यात्रा पर निकलना है।

महेन्द्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, उदय मुद्लियार ये सब प्रदेश की राजनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। इनके साथ मेरा कई बरसों का व्यक्तिगत संबंध था। इस त्रासदी में कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ अपनी डयूटी निभाते हुए जो सुरक्षाकर्मी, ड्रायवर आदि व कांग्रेस कार्यकर्ता मारे गए, उन सबको हमारी हार्दिक श्रृध्दांजलि तथा सभी घायल व्यक्तियों के स्वास्थ्य लाभ के लिए शुभकामनाएं। ऐसी दुर्घटना दुबारा न हो इस संकल्प के साथ एक नई कार्यनीति क्या, कैसे बने, सभी विचारशील जन इस बारे में सोचें।

देशबंधु में 27 मई 2013 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय