Wednesday, 16 October 2013

देहलीज पर चुनाव-2





ज्यों
ही 11 अक्टूबर को कांग्रेस पार्टी ने छत्तीसगढ़ में प्रथम चरण के अठारह में से सोलह उम्मीदवारों की घोषणा की, प्रदेश की राजनीति में एक छोटा सा जलजला आ गया। अधिकतर लोगों की कल्पना से यह परे था कि इस तरह से एकाएक इतने सारे नए चेहरों को मैदान में उतार दिया जाएगा। दंतेवाड़ा से स्व. महेन्द्र कर्मा की पत्नी श्रीमती देहुती कर्मा को और खरसिया से स्व. नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश को टिकट मिलना तय माना जा रहा था, लेकिन राजनांदगांव सीट को लेकर संशय बना हुआ था। वर्तमान में स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस क्षेत्र से विधायक हैं। इसलिए सवाल उठाये जा रहे थे कि कहीं स्व. उदय मुदलियार की पत्नी श्रीमती अलका मुदलियार मुख्यमंत्री के सामने कमजोर तो नहीं पड़ेंगी! इस तर्क के आधार पर वहां से पूर्व महापौर विजय पांडे और वर्तमान महापौर नरेश ढाकलिया का नाम उनके अपने-अपने समर्थकों के द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था। राजनांदगांव सम्पन्न व्यापारियों की नगरी है। वहां ऐसे प्रभावशाली लोग भी हैं जो कांग्रेस व भाजपा दोनों में बराबरी से दखल रखते हैं। आज की परिस्थिति में वे भी इन नामों का शायद यह सोचकर उछाल रहे थे कि श्रीमती मुदलियार के मैदान में न रहने से डॉ. रमन सिंह के लिए चुनौती आसान होगी।

इसी तरह बस्तर संभाग की जगदलपुर सीट पर अचानक एक नए चेहरे की घोषणा होने से बहुत सारे समीकरण गड़बड़ा गए। बताया जाता है कि कांग्रेस के गजराज पगारिया जो रायपुर के निवासी और उपमहापौर रहते हुए यहां से विधानसभा चुनाव नहीं जीत सके, वे बस्तर में अपना भाग्य आजमाने के लिए बेहद उत्सुक थे। कांग्रेस हो या भाजपा, बहुत लोगों का ख्याल है कि धनबल से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। बहरहाल इन तमाम नामों की घोषणा होने के बाद जनसामान्य के अलावा राजनीतिक प्रेक्षकों की भी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि चुनाव की बिसात पर कांग्रेस ने अपनी पहली चाल सधे हुए ढंग से चल दी है। इसका श्रेय मुख्य रूप से राहुल गांधी की राजनीति को दिया जा रहा है। अगर ऐसा है तो इसकी पुष्टि तो चरणदास महंत ही कर सकते हैं। श्री गांधी के ''वार रूम'' में क्या हो रहा है, बाकी को क्या पता!

जो भी हो, पहले चरण में ही बस्तर व राजनांदगांव के अलावा खरसिया से उम्मीदवार का नाम घोषित कर देने का यह अर्थ तो निकलता ही है कि कांग्रेस ने 25 मई को जीरमघाटी में नक्सली हमले में शहीद हुए अपने नेताओं की स्मृति का सम्मान तो किया ही, उसने पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं व जनभावनाओं का भी ध्यान रखा है। धरसींवा से यदि स्व. योगेन्द्र शर्मा की पत्नी या परिवार के किसी अन्य सदस्य को टिकट नहीं दिया गया है तो उसका कारण यह हो सकता है कि खरसिया, राजनांदगांव और दंतेवाड़ा तीनों के शहीद पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व व वर्तमान विधायक थे। याने जिनके जनाधार और चुनावी मशीनरी के बारे में पार्टी किसी हद तक आश्वस्त थी। संभव है कि योगेन्द्र शर्मा की पत्नी अगर सक्रिय राजनीति में आए तो उन्हें भी अपने अनुभव के आधार पर यथासमय उचित अवसर मिले।

अनुमान होता है कि कांग्रेस की इस पहली घोषणा के बाद भाजपा के भीतर भी नए सिरे से विचार मंथन शुरू हो गया है। उसका ध्यान अब इस बात पर लगा है कि कांग्रेस के नए-नवेले उम्मीदवारों के सामने जीत की संभावना वाले प्रत्याशी कैसे तय किए जाएं। आम चुनावों के दौरान एक संज्ञा का बहुत इस्तेमाल होता है- 'एंटी इनकंबेंसी' याने वर्तमान प्रतिनिधि से असंतोष। इसे आधार बनाकर पार्टियां नए लोगों को टिकट देती रही हैं। 2008 में भी भाजपा ने छत्तीसगढ़ में काफी नए उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इस बार मामला कुछ पेचीदा नजर आता है। डॉ. रमन सिंह स्वयं चाहे जितने लोकप्रिय हों, उनके अधिकतर मंत्रियों और विधायकों के प्रति जनता में गहरी नाराजगी है। यदि वर्तमान के टिकट काटे गए तो वे अब इतने साधन-सम्पन्न हैं कि भीतरघात कर सकते हैं। यदि प्रत्याशी न बदले गए तब भी टिकट न मिलने से असंतुष्टों द्वारा भीतरघात करने की आशंका कम नहीं है।

मैंने यह दिलचस्प तथ्य मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों प्रदेशों में नोट किया कि मुख्यमंत्री अभी कुछ दिन पहले तक अपनी आमसभाओं में लोगों से यह निवेदन कर रहे थे कि आप मुझे मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं तो पार्टी के विधायक को जरूर जिताइए। शिवराज सिंह जी हों या रमन सिंह जी, दोनों को यह अपील इसलिए करना पड़ी कि बहुत जगहों पर जनता भाजपा के वर्तमान विधायकों को दोबारा मौका देने के लिए राजी नहीं है। दोनों प्रदेशों में भाजपा के दस साल के शासन के दौरान यह भी हुआ है कि विधायक ही नहीं, ढेर सारे कार्यकर्ता भी काफी शक्ति-सम्पन्न और साधन-सम्पन्न हो चुके हैं। वे अब विधायक बनना चाहते हैं। उन्हें टिकट न मिला तो बिफर कर वे क्या कर बैठेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। रायपुर में भाजपा कार्यालय के बाहर समर्थन सेअधिक विरोध में रोज जो प्रदर्शन हो रहे हैं, वे और क्या संकेत करते हैं?

कांग्रेस में भीतरघात का यह चलन पहले से रहा है। अब भाजपा ने भी उसे अपना लिया है। कांग्रेस में जब टिकट देने की बात उठती है तो उसके धनी-धोरी उम्मीदवारों के बारे में बताया जाता है कि वे अपनी सीट के अलावा आसपास की दो-तीन सीटें और संभाल लेंगे। दूसरे शब्दों में वे साधनहीन प्रत्याशियों की रुपए-पैसे से मदद कर देंगे। यह कोई आज की बात नहीं है। मैंने रायपुर में कांग्रेसी सेठों के घर आर्थिक रूप से कमजोर सांसदों और विधायकों को डेरा जमाते हुए बहुत बार देखा है। उनके लेटरहेड का इस्तेमाल सेठ के व्यापारिक हितों के लिए चिट्ठियां लिखने के लिए अकसर होते आया है। इस इतिहास को जानते हुए कांग्रेस ने अभी जो टिकटों की घोषणा की है वह सचमुच चौंकाने वाली है। इससे कांग्रेस के भीतर एक नई सोच पनपने का आभास भी होता है।

कांग्रेस पार्टी में एक लंबे समय से जो निष्क्रियता, संवादहीनता और अहंकार तारी है वह बहुत यादा आश्वस्त तो नहीं करता; पार्टी के भीतर जो घात-प्रतिघात चलते हैं उसमें कब किसका सिक्का चलने लगे, यह कहना भी मुश्किल है; राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक हैं या नहीं यह अभी कोई नहीं जानता, लेकिन वे अपनी पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं इस नाते उनकी राजनीतिक सोच स्पष्ट रूप से जनता के सामने आना चाहिए। वे किस दिशा में देश को ले जाना चाहते हैं, यह जाने बिना कोई उनका अनुसरण करे भी तो क्यों? पांच रायों के उपचुनावों को वे किस रूप में ले रहे हैं, यह बात भी तो कुछ पता चले। इस कुहासे के बीच भी 11 अक्टूबर के इकलौते निर्णय को लेकर कोई पक्की राय बनाना ठीक नहीं होगा, फिर भी मन बहलाने के लिए कुछ माथापच्ची करने में क्या बुराई है!

यूं तो मीडिया और विपक्षी दल राहुल गांधी पर कांग्रेस का युवराज कहकर कटाक्ष करते हैं, लेकिन मेरी नजर में छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों की पहली सूची प्रमाणित करती है कि कांग्रेस में राहुल गांधी के नेतृत्व में एक नई पीढ़ी कामकाज संभालने के लिए तैयार है। इस पहली सूची में शामिल अधिकतर लोग नए और युवा हैं। उम्मीद की जा रही है कि बची हुई बहत्तर सीटों पर भी बहुत सारे युवजनों को टिकट दी जाएगी। इसका एक इशारा कटघोरा के विधायक बोधराम कंवर के बयान से मिलता है। अजय माकन को मुख्य प्रवक्ता एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्यप्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाने से भी यही संकेत मिलता है। अगर पांच राज्यों की सवा छह सौ विधानसभा सीटों पर पांच सौ युवा उम्मीदवार आगे आते हैं तो कांग्रेस का चेहरा कितना बदल जाएगा, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है।

यह तो जानी हुई बात है कि कांग्रेस के सारे के सारे प्रत्याशी जीतेंगे तो नहीं, फिर भी अगर जीतने वालों में बड़ी संख्या युवाओं की रही तो अगले दो दशक तक कांग्रेस में एक नई स्फूर्ति बने रहने की उम्मीद की जा सकती है। आदिवासी गढ़ बस्तर की एकमात्र सामान्य सीट जगदलपुर से एक आदिवासी युवक को टिकट देने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इससे आदिवासी हितों के प्रति पार्टी की प्रतिबध्दता व्यक्त होती है तथा देश की राजनीति को एक नयी दिशा में ले जाने की चाहत भी प्रकट होती है।

 देशबंधु में 17 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित