Friday, 25 October 2013

इक्कीसवीं सदी में गांधी की प्रासंगिकता


आज अगर कोई पूछे कि 21वीं सदी में गांधी की क्या प्रासंगिकता है तो सुनने वाले प्रश्नकर्ता की बुध्दि पर तरस ही खाएंगे। एक औसत व्यक्ति की नजर में यह एक अहमकाना सवाल होगा। अधिकतर लोग तो यही मानेंगे कि गांधी और उनके विचारों की कोई समय-सीमा अथवा एक्सपायरी डेट नहीं है और यह कि वे सौ साल या पचहत्तर साल पूर्व जितने प्रासंगिक थे उतने आज भी हैं और आगे भी बने रहेंगे। कुछ विचारवान लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि आज गांधी की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज़यादा है। कुछेक का तर्क शायद यह भी हो कि गांधी को भारत की सीमाओं में बांधकर नहीं रखा जा सकता कि उनके विचार तो पूरी दुनिया के लिए मूल्यवान और ग्रहण करने योग्य हैं। इस फौरी प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर सोचें तो समझ आता है कि उपरोक्त प्रश्न का उत्तर बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति अपने तईं गांधी को किस तरह से देखता-समझता है। आखिरकार गांधी का जीवन उन असाधारण और अभूतपूर्व अवधारणाओं से ढला था जिनकी खोज खुद उन्होंने की थी और जो इन अवधारणाओं पर आधारित नाना प्रयोगों और हस्तक्षेपों से पग-पग पर भरा हुआ था। ऐसे में क्या आश्चर्य कि हर व्यक्ति का गांधी को देखने का नजरिया अपना ही है। 
 
भारत उपमहाद्वीप में बहुसंख्यक जनता के लिए गांधी महात्मा थे और हैं। उनका हर शब्द एक आदेश था और बिना कोई सवाल उठाए उनके हर इंगित का अनुसरण कर  हर व्यक्ति अपने को धन्य समझता था। अपनी मृत्यु के पैंसठ वर्ष बाद गांधी आज एक और ऊंचे आसन पर विराजित हैं तथा उन्हें लगभग भगवान का दर्जा दे दिया गया है। यही नहीं, उनके जीवनकाल में भी दुनिया के अन्य मुल्कों में उनके विचार और कर्म से प्रभावित लोगों की कोई कमी नहीं थी। आज यह संख्या कई गुना बढ़ गई है। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'गांधी' आने के बाद तो दुनिया का ऐसा कौन सा कोना है जहां गांधी के नए अनुयायी न बने हों! यह भी एक विचित्र तथ्य है कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों में दीक्षित और अनुप्राणित व्यक्ति ने गांधी की हत्या की थी उसी संघ ने गांधी को अपने आराध्यों की सूची में शामिल करने में बहुत देर नहीं लगाई। संघ के विचारों में इस बीच कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, तब यह अनुमान लगाना कठिन है कि संघ गांधी के बारे में वास्तव में क्या सोचता है!

 
गांधी के चरित्र का एक अन्य पहलू यह भी है कि वे एक महान लेखक व महान पत्रकार थे तथा दुनिया के तमाम विषयों पर वे अपने विचार विभिन्न माध्यमों से नियमित रूप से व्यक्त करते थे। उन्होंने जितना कुछ लिखा उतना जवाहरलाल नेहरू को छोड़कर विश्व के किसी अन्य नेता ने शायद नहीं लिखा। इसके चलते एक सुभीता, बहाना और अवसर उन बहुत से टीकाकारों अथवा लेखकों को मिल गया है जो अपने निजी विचारों की पुष्टि में गांधी दर्शन से बिना किसी संदर्भ के सामग्री उठाना चाहते हैं। इसे आप चाहे तो बौध्दिक बेईमानी कहें या बौध्दिक चतुराई। मिसाल के तौर पर ऐसे विचारकों की कमी नहीं है जो हर तरह से प्रमाणित करना चाहते हैं कि 1909 में प्रकाशित 'हिन्द स्वराज' गांधी के विचारों का उत्स व चरमसीमा है, गोया इसके बाद गांधी ने न तो कुछ नया लिखा और न उनके विचारों का ही विकास हुआ। इसी तरह कुछ वर्ष पूर्व मैं एक छोटी सी पुस्तक पाकर हतप्रभ रह गया, जिसमें ईसाईयत पर गांधी के विचारों को मनमाने ढंग से संकलित किया गया था। 1999 में ओडिशा में काम कर रहे आस्ट्रेलियाई पादरी ग्राहम स्टेंस की बर्बर हत्या, उग्र हिन्दूवाद से जुड़े कुछ लोगों ने कर दी थी। उसके कुछ हफ्ते बाद ही इस पुस्तक का प्रकाशन मानो उक्त हत्याकांड को जायज ठहराने का प्रयत्न था। 

 
जैसा कि हम जानते हैं कि महात्मा गांधी का व्यक्तित्व बहुमुखी था: वकील, लेखक, पत्रकार, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद्, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, स्वाधीनता सेनानी,राजनीतिक रणनीतिकार, राजनीतिक चिंतक और न जाने क्या-क्या। इसके अलावा उनकी जीवनशैली बेहद सादी थी, जिसका खूबसूरत चित्रण उस स्कैच में हुआ है, जिसमें सिर्फ चश्मे की फ्रेम और छड़ी देखकर गांधी की तस्वीर उभर आती है। गांधी के इस समृध्द व्यक्तित्व के चलते हर उस व्यक्ति को बड़ी सुविधा हो गई है जो अपने माथे पर गांधीवादी होने का लेबल चस्पा करना चाहता है। मसलन कोई भी व्यक्ति जो कभी-कभार कुष्ठ रोगियों के बीच जाकर थोड़ा समय बिता आता है अथवा वह जो हरिजन सेवक संघ जैसी संस्था का सदस्य बन जाता है, अपने आपको गांधी का सच्चा अनुयायी घोषित कर सकता है। यह अधिकार उस व्यक्ति को भी मिल जाता है जो जब-तब खादी पहन लेता है या अपनी बीमारी में प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लेता है या फिर उसे जो 2 अक्टूबर अथवा 30 जनवरी को अपने नगर की गांधी प्रतिमा के सामने बैठकर रामधुन गाता है। अगर हम राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र दौड़ाएं तो वे तमाम लोग भी गांधीवादी हैं जो मानते हैं कि पंडित नेहरू नहीं बल्कि सरदार पटेल, गांधी जी के सच्चे उत्तराधिकारी थे। वे यह जानने की कोशिश नहीं करते कि आखिरकार गांधी ने क्या सोचकर नेहरू को अपना वारिस बनाया। 

 
ऐसे तमाम विचारों से गुजरते हुए सचमुच यह उलझन पैदा होती है कि इक्कीसवीं सदी में गांधी की प्रासंगिकता को कैसे निर्धारित किया जाए। मुझे लगता है कि गांधी के व्यक्तित्व के बहुत से आयामों को छोड़कर हमें उनके राजनीतिक दर्शन पर गौर करना चाहिए। कुछ भी हो, गांधी मुख्यत: एक विचारवान राजनेता थे और उस भूमिका में ही हमें अपने सवाल का संतोषजनक उत्तर मिल सकता है। एक राजनैतिक विचारक और कार्यकर्ता के रूप में गांधी ने हमें दो बुनियादी सिध्दांत दिए हैं- अहिंसा और सत्याग्रह। इन सिध्दांतों पर अमल करने के लिए उन्होंने कुछ औजार या पध्दतियां भी दीं जैसे- सविनय अवज्ञा, निडरता, सादा जीवन इत्यादि। उन्होंने इस पथ पर चलते हुए, अपनी गतिविधियों का परीक्षण करते हुए कुछ कसौटियां निर्धारित की जिनमें से दो का उल्लेख मैं यहां करना चाहूंगा। एक तो उन्होंने कहा कि इस धरती पर प्रत्येक व्यक्ति की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त साधन है किन्तु एक व्यक्ति के लालच के लिए सब कुछ अपर्याप्त है। दूसरे- उन्होंने कहा कि हमें हमेशा कतार के अंतिम छोर पर खड़े हुए व्यक्ति के बारे में सोचना चाहिए याने अंत्योदय। मेरा निवेदन है कि यदि हम इन दोनों मंत्रों को हृदयंगम करते हैं और उनके अनुसार काम करने के लिए तैयार हैं; यदि हम अपने डर पर विजय पा लेते हैं व निजी सुख-दुख की परवाह किए बिना बड़े उद्देश्यों के लिए लड़ने तैयार हैं और यदि अहिंसा और सत्याग्रह के प्रति हमारी निष्कंप प्रतिश्रुति है तो गांधी हमारे लिए हर समय प्रासंगिक हैं। 

 
मैं अपने विचारों को एक विशेष संदर्भ में स्पष्ट करना चाहता हूं। आज समूची दुनिया में आणविक शक्ति एक चुनौतीभरा और जटिल मुद्दा बन गया है। ऐसा कोई भी देश नहीं है जो आणविक क्षमता हासिल नहीं करना चाहता या है तो उसे बढ़ाना नहीं चाहता। इसके पीछे सामरिक उपयोग की भावना भी हो सकती है अथवा शांतिपूर्ण उपयोग का इरादा भी हो सकता है किन्तु आणविक ऊर्जा के जो खतरे हैं उसके बारे में हर देश खुलकर बात करने में कतराता है। अब मान लीजिए कि कोई देश सचमुच अहिंसा में विश्वास रखता है तो वह युध्द की बात तो नहीं ही करेगा बल्कि इसके विपरीत अपनी सुरक्षा के मुद्दों पर शांतिपूर्ण समाधान निकालने का हरसंभव यत्न करेगा। दूसरी तरफ कोई दूसरा देश जो गांधी के आदर्शों पर चलता है तो पहले तो वह देश ऊर्जा के विवेकपूर्ण खपत के बारे में सोचेगा उसके बाद सौर ऊर्जा, जैविक ऊर्जा जैसे उपायों पर विचार करेगा जिससे पर्यावरण को नुकसान न हो। इस दोनों प्रकरणों में राष्ट्रीय संसाधनों की बचत होगी, बहुत सारे अनचाहे खतरे टल जाएंगे और लोगों को जीने के लिए एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण माहौल मिल सकेगा। 

 
एक अन्य दृश्य देखिए। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां दुनियाभर में आंतरिक और बाह्य खतरे मंडरा रहे हैं। जहां तक बाह्य खतरों की बात है, देखना कठिन नहीं है कि साम्रायवाद एक नई ताकत के साथ वापिस लौट आया है। अमेरिका के विश्व पर वर्चस्व के सपने की कोई सीमा नहीं है। क्या उस नवसाम्रायवाद को गांधीवादी तरीके से रोका जा सकता है? पहली नज़र में असंभव लगता है, लेकिन फिर यह भी याद रखिए कि इराक, अमरीका के सैन्य बल का मुकाबला नहीं कर सका और उसकी संप्रभुता नष्ट हो गई। कुछ ऐसा ही हाल अफगानिस्तान का और लीबिया का भी हुआ। यही नहीं बहादुर फिलीस्तीनी पिछले साठ साल से तमाम तकलीफें झेलते हुए भी अपना वतन वापिस पाने के संघर्ष में जुटे हुए हैं, फिर भी वे इजराइल के निरंतर हमलों को रोकने में असमर्थ हो रहे हैं। मैं पूछता हूं कि क्या यह वक्त नहीं आ गया है कि जब हम कुछ नए उपायों पर, विकल्पों पर सोचें। क्या गांधी के विचार यहां हमारी मदद कर सकते हैं। सोचकर देखिए!

 
जहां तक आंतरिक संघर्षों का प्रश्न है इसकी मुख्य वजह सत्ताधारी वर्ग की हृदयहीनता और संवेदनहीनता है। जिन देशों में जनतांत्रिक व्यवस्था है वहां भी यही स्थिति है। आप सत्ताधारियों के चेहरों से टपकते हुए लालच को साफ-साफ देख सकते हैं। ऐसे में यदि समाज में अंत्योदय का विचार जीवित हो, यदि कतार के अंत में खड़े व्यक्ति का ध्यान हो तो यह स्थिति बदल सकती है। इसी तरह अनेक समाजों में हम नस्लभेद, रंगभेद व साम्प्रदायिकता को पनपता हुआ देखते हैं। ऐसे संघर्ष बहुधा इसलिए होते हैं कि एक वर्ग अपने रीति-रिवाज, परंपरा व विश्वासों पर गर्व करता है किन्तु अन्य के बारे में वह अज्ञान व पूर्वग्रह से प्रेरित होता है। याद दिलाने की जरूरत नहीं कि महात्मा गांधी ने दो समुदायों के बीच में गहरी खाई को पाटने की राह में ही अपने प्राणों की बलि दी।  समुद्र पार उनका अनुसरण मार्टिन लूथर किंग, अल्बर्ट लुथुली और नेल्सन मंडेला ने और हमारे पड़ोस में आंग-सांग सू ची जैसे महान लोगों ने किया। 

 
मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि जिस अहिंसा का पाठ हमें गांधी ने पढ़ाया वह साहस व वीरता का सर्वोच्च स्वरूप है। अहिंसा का अर्थ किसी गरीब की मदद करना या किसी पशु के प्रति दया दिखलाना या गौमाता की सेवा करना मात्र नहीं है जैसा कि बहुत से लोग समझते हैं। अहिंसा और सत्याग्रह गांधी दर्शन के मूल में हैं। इनका उपयोग उन्होंने सफलतापूर्वक राजनीतिक अस्त्र के रूप में किया और शायद वक्त आ गया है कि हम इनका उपयोग करने के बारे में नए सिरे से सोचें।

(इंदौर में ''गांधी : निशस्त्रीकरण और विकास'' पर 4, 5, 6 अक्टूबर 2013
को संपन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत वक्तव्य)