Wednesday, 2 October 2013

संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की जरूरत

भारत के राजनीतिक ढांचे में बहुत सी विशेषताएं हैं। इनमें सर्वोपरि है विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कामकाज का स्पष्ट विभाजन। विधायिका की जिम्मेदारी नियम- कानून बनाने की है, कार्यपालिका को उन पर अमल करना है और न्यायपालिका को यह देखना है कि अमल करने में कोई गड़बड़ी न हो। ऐसी सुंदर व्यवस्था विश्व के अनेक सुंदर जनतांत्रिक देशों में नहीं है और इसके लिए हमें अपने संविधान निर्माताओं का आभार मानना चाहिए। ये तीनों संस्थाएं अपने आप में स्वतंत्र हैं, लेकिन तीनों अपने-अपने स्तर पर जब सही ढंग से काम करती हैं तभी कड़ियां जुड़कर आदि से अंत तक व्यवस्था सुचारु बनती है । यूं तो तीनों संस्थाओं की अपनी-अपनी प्रतिष्ठा है, लेकिन यह मानना चाहिए कि विधायिका की स्थिति अन्य दो संस्थाओं के मुकाबले थोड़ी ऊंची हैं क्योंकि वह सार्वभौम देश की स्वाधीन जनता का सीधे-सीधे प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसका जयघोष हर आम चुनाव के समय प्रतिध्वनित होता है।

यह दुर्भाग्य का विषय है कि पिछले तीस साल के दौरान भारतीय संसद की इस प्रतिष्ठा में कहीं कोई कमी आई है। इसके कारणों की समीक्षा समय-समय पर होती रहती है। इसी तरह कार्यपालिका के प्रति जनता के विश्वास में भी धीरे-धीरे कर कमी आई है। प्रतिष्ठा और विश्वास की इस गिरावट को दूर करने का काम किसी हद तक न्यायपालिका ने किया है। एक आम धारणा बन गई है कि अगर देश में स्थितियां बिगड़ती हैं तो उन्हें न्यायपालिका का सहारा लेकर ही सुधारा जा सकता है। यह भावना इस नाते तो ठीक है कि जनतंत्र के एक आधार स्तंभ की विश्वसनीयता अब भी कायम है; लेकिन इससे यह प्रश्न भी उठता है कि सिर्फ एक खंभे के आधार पर इमारत कब तक खड़ी रह सकती है। दूसरे शब्दों में, जनता को यह विचार करना ही होगा कि अन्य दो स्तंभों की विश्वसनीयता को दुबारा कायम कैसे किया जाए! 


यह जो स्थिति है, इसमें न्यायपालिका के प्रति ऐसी अंधश्रध्दा रखना भी शायद उचित नहीं है। कहीं हम अपनी निराशा के चलते न्यायतंत्र में जो कमजोरियां घर कर गई हैं उनकी अनदेखी तो नहीं कर रहे हैं, यह प्रश्न अपने आपसे हमें करना चाहिए। इस बारे में हाल के बरसों में जो सूचनाएं और प्रमाण मिले हैं उनका संज्ञान लेना भी उतना ही आवश्यक है, जितना विधायिका और कार्यपालिका की गड़बड़ियों के बारे में। याद करें कि 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हमला हुआ था तब उसे सीधे-सीधे लोकतंत्र पर हमला माना गया था इसलिए कि संसद सिर्फ एक इमारत नहीं है, वह हमारी जनतांत्रिक महत्वाकांक्षा का कोरा प्रतीक भी नहीं है, बल्कि संसद ही वह मंच है जिसके माध्यम से हम अपने लिए शक्ति पाते हैं। जब हम अभिमान से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तब यह याद रखना उचित होगा कि इसका स्रोत और आधार कहां है।  


अभी हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की जो व्याख्या दो अवसरों पर की है वह हमारे मन में चिंता उपजाती है।  जनभावना अपनी जगह बिल्कुल उचित है कि जो व्यक्ति अपराध में लिप्त रहे हों वे विधान सदनों में प्रवेश न कर सकें, लेकिन क्या यह सिर्फ कानून बना लेने या कानून की व्याख्या कर देने मात्र से संभव है या इसके लिए अलग हटकर सोचने की जरूरत है? मैंने दो माह पूर्व अपने एक लेख में कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या के बाद राजनीतिक दलों को इसका विरोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि जनभावना संसद और विधानसभा में अपराधियों को नहीं देखना चाहती। इसके बाद भी यदि केन्द्र सरकार ने अध्यादेश लाकर न्यायालय के फैसले को बदलने की कोशिश की तो उसकी पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। आज सारे राजनीतिक दल सिध्दांत की राजनीति के बजाय महज चुनावी राजनीति कर रहे हैं और सबसे पहले जरूरत है तो इस प्रवृत्ति को बदलने की। यह महती कार्य न्यायालय के फैसले से नहीं हो सकता।


सर्वोच्च न्यायालय का दूसरा फैसला मतदान प्रक्रिया के संबंध में आया है। अब मतदाताओं को अधिकार है कि वे चुनाव में खड़े सारे उम्मीदवारों को खारिज कर दें। इससे एक विचित्र स्थिति पैदा होती है। इस तरह से नकारने वाले जो वोट डाले जाएंगे उनकी गिनती अलग से होगी और वे नतीजों को प्रभावित नहीं कर सकेंगे। यदि पचास प्रतिशत से अधिक मतदाता भी सारे उम्मीदवारों को खारिज कर दें तो भी चुनाव दुबारा नहीं होंगे। यह कुछ वैसी ही स्थिति होगी कि मतदाता घर बैठा रहे और वोट डालने जाए ही नहीं। मेरे हिसाब से यह निठल्लेपन की कसरत है। संविधान में राजनीतिक दलों की व्यवस्था है, निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव लड़ सकते हैं, एक शक्ति सम्पन्न चुनाव आयोग है जो चुनावी प्रक्रिया का नियमन करता है। यदि राजनीतिक दलों ने सही उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे तो उसका विरोध सिर्फ वोट न डालकर नहीं हो सकता। 


देश में एक ऐसी सुविधाभोगी जमात है, जिसका जनतंत्र में सचमुच विश्वास नहीं है। इस तबके के लोग वोट डालने जैसे कामों में अपना वक्त बर्बाद नहीं करते। उनके लिए मतदान का दिन  छुट्टी का एक और दिन होता है। अब इनमें से कोई नहीं का विकल्प देने का एक ही परिणाम होगा कि मतदान केन्द्र तक जाकर कुछ अन्य लोग अपनी खीझ उतारकर वापस आ जाएंगे। दरअसल, यहां जरूरत इस बात पर विचार करने की है कि आमजन के मन में राजनीतिक दलों, प्रत्याशियों और कुल मिलाकर जनतांत्रिक व्यवस्था के प्रति निराशा का जो भाव पनप रहा है उसे कैसे दूर किया जाए। इसके लिए बहुत कुछ सोचने और करने की आवश्यकता है, लेकिन इतना तो तय है कि अदालत के ऐसे फैसलों से आप कुछ खास हासिल नहीं कर सकते।  यदि मतदाता को पहले से ही कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो वह भला वोट डालने जाएगा ही क्यों, जबकि हमारा लक्ष्य तो अधिकतम मतदाताओं को मतदान केन्द्र तक लाने का होना चाहिए।


मेरा सदैव से मानना रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था सिर्फ कानून से नहीं चलती, जबकि हमारी विडंबना यह है कि कुछ भी गड़बड़ होने पर हम तुरंत एक नया कानून बनाने की मांग करने लगते हैं। जब कानून बन जाता है तो उस पर अमल हो भी रहा है या नहीं, यह देखने की सुध किसी को नहीं रहती। जहां अधिनायकवाद, राजतंत्र या सैन्यतंत्र है वहां शासन चलाने में न तो इतिहास की परवाह की जाती और न भविष्य की। सत्ताधीश की जुबान से निकली बात ही प्रथम और अंतिम होती है। इसके विपरीत जनतंत्र आम सहमति के आधार पर एक दीर्घकालीन दृष्टि को लेकर चलता है, जिसमें इतिहास से सबक लेकर वर्तमान की जमीन पर भविष्य के सपने बुने जाते हैं। 


मुख्य रूप से यह कार्य राजनीतिक दलों का है, क्योंकि जनता उन पर विश्वास करती है, उनकी नीतियों और कार्यक्रमों से प्रभावित होती है और इसी आधार पर उन्हें चुनने के लिए अपना मत देती है। इसलिए यह जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है कि वे देश में राजनीति के लिए एक स्वस्थ माहौल का निर्माण करें। इसके लिए पंचायतीराज से शुरू कर संसद तक उनकी भूमिका ऐसी हो कि वे जनता का विश्वास जीत सकें।  बात सिर्फ दागी या नाकाबिल लोगों को टिकट देने की नहीं है। इसके आगे निर्वाचित सदनों में उनका व्यवहार कैसा है, वे किस तरह से नीतियां व कार्यक्रम बनाते हैं, वे भय व राग से मुक्त होकर अपना दायित्व निभाने में सक्षम हैं या नहीं, वे संसदीय गरिमा का पालन करते हैं या नहीं- ऐसे तमाम सवाल भी उठते हैं। जाहिर है कि विधायिका की सारी की सारी जिम्मेदारियां न्यायपालिका अपने ऊपर कभी नहीं ले सकती। इसके लिए तो राजनीतिक दलों को ही आत्मालोचन करने की आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में यह संदेश निहित है कि भारत के राजनीतिक दलों को समय रहते अपने आचरण में वांछित परिवर्तन कर लेना चाहिए। एक बार यदि जनता का विश्वास खंडित हो गया तो फिर देश पहले अराजकता और फिर अधिनायकवाद की तरफ जा सकता है। हमारे संसदीय जनतंत्र को चोर दरवाजे से अमेरिका के व्यक्ति केन्द्रित जनतंत्र में बदलने की जो कोशिश चल रही है उससे इसी खतरे का संकेत मिलता है। 


देशबंधु में 3 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित