Saturday, 5 July 2014

पत्रकार अच्छे लगते हैं

 

विज्ञापन की दुनिया में विचरने वाली
सुघड़ गृहणियों को
दाग अच्छे लगते हैं  जिस तरह,
उसी तरह कुछ-कुछ,
इस दुनिया के कितने ही वासियों को
पत्रकार अच्छे लगते हैं।
मसलन फरियादियों को-
न्याय की आस में बरसों-बरस भटकते
इस-उस ड्यौढ़ी पर मत्था टेकते
जहां-तहां  दरवाजे पर दस्तक देते
प्रहरी की घुड़कियों से बचते
भव्य गेट के आजू-बाजू कहीं
डरते-सहमते, प्रतीक्षा करते
फरियादी, फिर एक दिन
राष्ट्रपति से लेकर कलैक्टर तक
प्रार्थना पत्र, निवेदन,आवेदन,
ज्ञापन पटाते
जिसकी अंतिम प्रति पाने वाला
होता है कोई पत्रकार ही.
फरियादी को पत्रकार अच्छे लगते हैं

मसलन नगर-सेठ को-
(भले ही संज्ञा पुरानी पड़ गई हो)
चंदे की आस में जिसे बुलाया है
किसी कीड़ा प्रतियोगिता में
मैच का शुभारम्भ करने,
गणतंत्र दिवस पर विद्यालय में
झंडा फहराने,
नाटक में दीपक प्रज्जवलित करने
या फिर
सेवाभावी क्लब में कैलिपर, ट्राईसिकल,
चश्मे के फ्रेम बाँटने,
हर जगह उसे मौके के मुताबिक
दो  शब्द व्यक्त करना है,
ऐसी ही किसी पूर्व संध्या में
भाषण तैयार कर सके जो,
नगर के किसी अखबार का
संवाददाता उसे
याद आता है।
नगर- सेठ को पत्रकार अच्छे लगते हैं।

मसलन कारपोरेट प्रभु को-
सिर्फ वही है  अमल-विमल-निर्र्मल,
कीचड़ में कमल, पूंजी के बाजार  में,
सिर्फ उसके ही पास है हिकमत
सिर्फ  वही है बुद्धिमान और उद्यमशील
कुबेर उसकी कोठी का दरबान और
लक्ष्मी की अनंत-असीम कृपा उस पर,
उसकी भौंहों के इंगित पर चलती है
राजनीति और देश की सरकार,
वह जो सोचता और करता है
उसी में देश का, समाज का हित है,
और यह सीधी-सच्ची बात
अनपढ़ अज्ञानी जनता तक
पहुंचना चाहिए
संपादकों को शेयर अलॉट करना हुई पुरानी बात,
आधा-अधूरा उपकार,
अखबार की स्याही अब उसकी ही है और
सूत्रधार-उद्घोषक की जिव्हा पर भी,
अब वही विराजता है।
कारपोरेट प्रभु को पत्रकार अच्छे लगते हैं।

मसलन राजनेताओं को-
सबके अपने-अपने बड़े या छोटे दायरे
सबका अपना-अपना
स्वभाव और इतिहास
किसी के पास पूंजी की ताकत,
किसी के पास भुजाओं की,
पिस्तौल-रिवाल्वर की
कोई टाटपट्टी बेचने वाला,
कोई मछलीमार,                  
किसी की छपाई मशीन,
कोई अनाज कारोबारी,
कोई जिस पर
एक ही शब्द फबता है-गुंडा।
सबके सब दौड़ में शामिल-
डॉक्टर, वकील, अध्यापक,
प्रोफेसर भी- पीछे नहीं,
वक्तव्यों की व्यायामशाला में वर्जिश कर
सब पेपर टाइगर बन आगे की जुगाड़ में,
हर मोड़ पर काम आते हैं पत्रकार-
लिफाफे से खुश,
दीवाली पर मिठाई से खुश,
•जमीन का टुकड़ा मिले तो
और ज्यादा खुश
फिर कुछ आगे चलकर बेकाम,
कुछ साथ-साथ आगे तक चलते
ऐंठ से तनी गर्दन,
नेता से मित्र होने का दावा।
राजनेताओं को पत्रकार अच्छे लगते हैं।

जो भले ही उपरोक्त में
कोई भी न हों, और जो
खुद को शुमार करते हों
आम आदमी की सूची में,
फिर भी गर
पत्रकार से परिचय है जिनका
वे अपने-आप खास हो उठते हैं,
बहुत काम आती है पत्रकारों  से दोस्ती-
कभी अस्पताल में तो कभी स्कूल में,
कभी ट्रैफिक पुलिस से हुज्जत करने में,
तो कभी तबादला करने या रुकवाने में,
और इन सबसे बढ़कर
दावत में, स्वागत-समारोह में
पत्रकार बंधु के शामिल होने से
जो होता है  रसूख में, इज्जत में इजाफा
उसका तो आनंद ही कुछ और ,
मंच पर पत्रकार चमकते हैं
विजेता को हासिल ट्रॉफी की तरह,
इस तरह
आम से जो खास हुए,
उन्हें भी पत्रकार अच्छे लगते हैं।

किस्सा-कोताह कि कौन है
जिसे पत्रकार अच्छे नहीं लगते ?
जिसे भी जरुरत हो
उसको काम आते हैं पत्रकार
कम से कम यही है उनका दावा
कि दुनिया को उनकी ज़रुरत है,
शायद हो कि वे सही कह रहे हों,
वैसे ही जैसे शायद
विज्ञापन की गृहिणी भी
सच कह रही हो
तो किसी को दाग अच्छे लगते हैं
तो किसी को पत्रकार,
तब यह भी मानने में है क्या हर्ज कि
पत्रकार और चंद्रमा में नहीं कोई फर्क
चंद्रमा पर भी दाग और
उसका भी उजाला उधार का।

देशबन्धु में 6  जुलाई 2014 को प्रकाशित