Wednesday, 28 May 2014

भारत और पड़ोसी देश



प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों सहित मॉरिशस के शासनाध्यक्ष के सम्मिलित होने का सब तरफ स्वागत हुआ है। यह माना गया कि श्री मोदी ने इन समकालीन नेताओं को आमंत्रित कर अपनी कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है। वे तमाम लोग जो चाहते है कि दक्षिण एशिया मेें शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का स्थायी वातावरण बने उन्हें नवनिर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री की इस पहल से आशा की एक किरण फूटती नज़र आती है।  जैसा कि पाठक जानते हैं कांग्रेस सहित अधिकतर विरोधी दलों ने इस पहल का स्वागत किया है। सच पूछें तो इसमें आलोचना की कहीं कोई बात ही नहीं है। यद्यपि यह सच्चाई अपनी जगह पर कायम है कि वह भारतीय जनता पार्टी ही थी जिसने पड़ोसी देशों खासकर पकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की पिछले दस साल की हर पहल का आक्रामक ढंग से विरोध किया था। जाहिर है कि सत्ता हासिल करने के साथ भाजपा को जमीनी हकीकतों से रूबरू होना पड़ रहा है।  यह संतोष का विषय है कि कम से कम इस मुद्दे पर मोदीजी ने इस सच्चाई को देखने से इंकार नहीं किया कि कोई भी देश अपने पड़ोसी नहीं बदल सकता।

यूपीए-1 और 2 के दौरान भी पड़ोसी देशों के साथ बेहतर वातावरण बनाने के लिए समय-समय पर पहलकदमी की गई थी। उस समय भाजपा के अलावा शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक और द्रमुक इत्यादि दलों ने भी हठीलेपन का परिचय दिया था। अब जब भाजपा की सरकार बन गई है तब भी तमिलनाडु के विभिन्न राजनीतिक दलों के अलावा शिवसेना ने भी श्री मोदी की पहल का अपने-अपने कारणों से विरोध किया। प्रधानमंत्री पर इस विरोध प्रदर्शन का कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और जैसा कि मैंने 17 मई को लिखा था कि अब सरकार दबावमुक्त होकर निर्णय ले सकती है। इसलिए जयललिता शपथग्रहण में नहीं आईं तो उससे श्री मोदी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वाइको और उनके एमडीएमके के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया तो वह भी व्यर्थ गया।  उद्धव ठाकरे ने पहले शपथ ग्रहण का बहिष्कार करने की धमकी दी, लेकिन जब उन्हें समझ आ गया कि वे कितने पानी में हैं तब उन्होंने अपना निर्णय वापिस ले लिया।

यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन श्री मोदी ने एक जो साहसिक यद्यपि सांकेतिक पहल की है उसे सही अंजाम तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं है।  यह चूंकि नए प्रधानमंत्री द्वारा उठाया गया पहला महत्वपूर्ण कदम था इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्येता आने वाले दिनों में यह जानने को उत्सुक रहेंगे कि अपने पड़ोसी देशों के साथ बेहतर रिश्ते कायम करने की दिशा में नई सरकार कितना आगे बढ़ सकती है और कितनी हिम्मत का परिचय दे सकती है। इस बारे में आगे जो भी होगा, प्रेक्षक अटलबिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को स्वाभाविक रूप से याद करेंगे। तब और अब के बीच एक पीढ़ी का फर्क आ गया है और यह दिलचस्प संयोग है कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं। वाजपेयी- शरीफ वार्ता ने उस समय उपमहाद्वीप में एक नई आशा का संचार किया था, लेकिन पाकिस्तान का सैन्यतंत्र उस समय इसके विरोध में था तथा तब के सैन्यप्रमुख जनरल मुशर्रफ ने भारतीय प्रधानमंत्री को सैल्यूट करने या हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था।

लाहौर बस यात्रा प्रसंग रेखांकित करता है कि सिर्फ अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते। दूसरी तरफ यह भी ध्यान देने योग्य है कि सिर्फ शक्ति प्रदर्शन से बात बनती नहीं है। भारत ने आण्विक परीक्षण किया तो पाकिस्तान ने उसका जवाब देने में देर नहीं की। जो बात विश्व के रक्षा विशेषज्ञ जानते थे वह खुलकर सामने आ गई कि दोनों देशों के पास संहारक आण्विक अस्त्र हैं। इसके बाद कारगिल का शीतयुद्ध, कुछ और समय बाद ऑपरेशन पराक्रम, इनसे भी न तो पाकिस्तान को कोई लाभ मिला और न भारत को। इसलिए पाकिस्तान के संदर्भ में यह नोट करना होगा कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की स्वागतेय भारत यात्रा के बावजूद दोनों देशों के बीच मीठे तो क्या कामकाजी संबंध बढ़ाने के रास्ते में बहुत सी बाधाएं हैं जिन्हें पार करना चुनौतीपूर्ण होगा।

हमारी समझ में प्रधानमंत्री मोदी को इस दिशा में आगे बढऩे के पूर्व प्रथम तो विपक्षी दलों को विश्वास में लेना होगा। पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर भाजपा पिछले वर्षों में जो जुमलेबाजी करते आई है, उसकी अब कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन विपक्ष यदि विरोध करना चाहे तो उसके सौ तरीके हैं।  ज्ञातव्य है कि राज्यसभा में भाजपा फिलहाल अल्पमत में है और अगर सत्तादल और विपक्ष के बीच कोई तालमेल स्थापित नहीं हो पाया तो सरकार को तकलीफ हो सकती है। इसके अलावा यह भी स्मरण रखना होगा कि पाकिस्तान में सत्तासूत्र वास्तविकता में सेना के हाथों में हैं तथा निर्वाचित सरकार के लिए उसकी उपेक्षा करना संभव नहीं है। हमारे दोनों देशों के बीच कड़वाहट के दो बड़े कारण हैं- पहला कश्मीर और दूसरा 1971 की हार का दंश।  फिर भारत और पाक दोनों में ऐसे सलाहकारों की बड़ी संख्या है जो किसी भी तरह की रियायत या लचीलेपन के लिए तैयार नहीं होते। भारत की बात करें तो विदेशमंत्री सुषमा स्वराज जिस स्वर में बात करेंगी क्या वही स्वर उनके राज्यमंत्री जनरल वी.के. सिंह का भी होगा? इन दोनों का स्वर यदि एक हुआ तो एनएसए प्रत्याशी अजीत डोभाल इत्यादि क्या उनसे सहमत होंगे?

पाकिस्तान के अलावा अन्य सार्क देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ करने की दिशा में इसी तरह की और अड़चनें हैं। श्रीलंका में महेन्द्र राजपक्ष ने सैन्य शक्ति के बल पर जाफना में तमिल टाइगर्स को खत्म तो कर दिया है, लेकिन इसमें मानवाधिकारों की जो अनदेखी की गई वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद का विषय बना हुआ है। श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली व अल्पसंख्यक तमिलों के बीच जो खाई बहुत लंबे समय से बनी हुई है वह कहीं से भी पटती नज़र नहीं आती।  एक चन्द्रिका कुमारतुंग को छोड़ दें तो श्रीलंका में एक भी ऐसा शासन प्रमुख नहीं हुआ, जिसने तमिलों के प्रति सहानुभूति दर्शाई हो। इसका एक अन्य आयाम यह है कि तमिलनाडु में जिसकी भी सरकार हो वह श्रीलंका की संप्रभुता का अतिक्रमण कर जाफना के तमिलों का हर संभव समर्थन करती है। अगर जाफना में आत्मनिर्णय का अधिकार मान लिया जाए तो फिर कश्मीर में क्यों नहीं, इस द्वैत पर ध्यान देना वे जरूरी नहीं समझते।

बंगलादेश के साथ हमारे संबंध स्वाभाविक रूप से मधुर होना चाहिए। शेख हसीना ने इस दिशा में अपनी ओर से कभी कोई कमी नहीं की, लेकिन इसके चलते वे हमेशा खालिदा जिया व अन्य कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं। बंगलादेश की आर्थिक, भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि वहां के लोग स्वेच्छा से नहीं मजबूरी में रोजी-रोटी की तलाश में भारत आते हैं। अब यदि भाजपा बंगलादेशियों को वापिस खदेडऩे के अपने पुराने नारों पर कायम रही तो इससे शेख हसीना की स्थिति कमजोर पड़ेगी। तीस्ता जल संधि तथा ग्रामीण संकुलों का विनिमय जैसे कुछ रुके मुद्दे भी हैं जिन पर नरेन्द्र मोदी को ममता बनर्जी के साथ जूझना पड़ेगा। ऐसी ही कुछ स्थिति नेपाल में भी है। विश्व हिन्दू परिषद इत्यादि चाहेंगे कि नेपाल में हिन्दू राष्ट्र की पुर्नस्थापना  हो, जबकि वहां की नई पीढ़ी आगे निकल चुकी है। नेपाल के साथ नदीजल वितरण, आतंकवाद, नेपालियों को भारत में रोजगार जैसे मुद्दे भी हैं जिन पर नेपाल में भी एक राय नहीं है।

भारत के भूटान के साथ संबंध दोस्ताना है, लेकिन इस आकार में लघु देश में भी जनतंत्र दस्तक दे चुका है तथा हमें बदलते हुए समय का संज्ञान लेना ही होगा। अफगानिस्तान के साथ भी हमारे अच्छे संबंध हैं, लेकिन याद रखें कि हामिद करजई का कार्यकाल समाप्ति पर है। उनके जाने के बाद वहां की राजनीति में क्या बदलाव आएंगे इस पर भारत को सतर्क निगाह रखना होगी। वहां आंतरिक अशांति बनी हुई है तथा यह भय भी है कि अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद क्या होगा। कल को अगर अफगान सत्ता तालिबान के हाथ आती है तो भारत के प्रति उनका रुख क्या होगा। दक्षिण में मालदीव में भी स्थितियां सामान्य नहीं हैं। इस विराट फलक पर चीन की सक्रिय उपस्थिति भी आशंका को जन्म तो देती ही है। भारत और चीन के बीच पहले से बेहतर संबंध हुए हैं किन्तु यह भी हमें पता  है कि चीन सार्क देशों में लगातार अपनी पैठ बनाने में लगा हुआ है। इस सच्चाई के बरक्स भारत किस तरह शक्ति संतुलन कर पाएगा, यह देखना होगा।

एक आखिरी बात। श्री मोदी ने मॉरिशस के प्रधानमंत्री नवीन  रामगुलाम को आमंत्रित किया यह तो उचित था। किन्तु एक और पड़ोसी देश म्यांमार को भी न्यौता चला जाता तो बात पूरी बन जाती।


 
 देशबन्धु में 29 मई 2014 को प्रकाशित