Wednesday, 14 May 2014

कुछ यात्रा चित्र-1


 
महाकवि रॉॅबर्ट फ्रॉस्ट का कथन है कि  ''शिक्षक दो तरह के होते हैं, एक वे जो विद्यार्थी को खूंटे से बांध कर रख देते हैं और दूसरे वे जो कुछ ऐसा करते हैं कि विद्यार्थी आकाश में उड़ान भरने के योग्य हो जाएं। दूसरे प्रकार के एक शिक्षक हैं- खूबचंद मंडलोई। मंडलोई गुरुजी जयप्रकाश प्राथमिक शाला पिपरिया (मप्र) में 1952 से 1954 तक मेरे कक्षा शिक्षक थे। अपने चालीस साल के अध्यापक जीवन में उन्होंने मुझ जैसे हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया। मंडलोईजी ने मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया था। उन्हें सेवानिवृत्त हुए भी दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन विद्यार्थियों में ही नहीं, पिपरिया के नागरिकों के बीच वे उसी तरह सम्मान के पात्र व लोकप्रिय हैं जैसे कि वे शुरू से रहे आए हैं।

मुझसे तो पिपरिया कब की छूट गई, लेकिन उनके जो विद्यार्थी आज भी वहीं हैं उन्होंने गुरुजी का नागरिक अभिनंदन करना तय किया। मुझे भी आदेश मिला कि मैं 10 मई को आयोजित नागरिक सम्मान में अवश्य शामिल होऊं। ऐसे अवसर पर मना तो खैर कर ही नहीं सकता था, लेकिन अपने शिक्षक के नागरिक अभिनंदन में उपस्थित रहना सचमुच एक आह्लादकारी अनुभव था। कार्यक्रम तीन घंटे चला व इसमें पिपरिया की नगरपालिका अध्यक्ष सहित समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल हुए। हम पूर्व विद्यार्थी अपने गुरु का ऐसा सम्मान देखकर गद्गद् हुए जा रहे थे। तिरासी वर्षीय मंडलोईजी स्वयं भी अभिभूत थे। आज जब भारतीय समाज में शिक्षकों का तिरस्कार व अवमानना हो रही है उस समय एक गुणी शिक्षक का सम्मान होना विरल अपवाद ही था। एक और महान लेखक जॉन स्टाइनबैक ने कहा था कि ''दुनिया की तमाम कलाओं में अध्यापन शायद सबसे बड़ी कला है और शिक्षक एक महान कलाकार ही होता है। मैं सोचता हूं कि यह कथन भी मंडलोईजी पर खरा उतरता है।

इस अभिनंदन समारोह के दौरान ही मंडलोईजी द्वारा लिखित खंड काव्य ''अपयश का आचमन; कैकेयी उत्कर्ष का भी लोकार्पण हुआ। उन्होंने अपनी इस सुदीर्घ रचना में कैकेयी को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश की है। उनकी स्थापना है कि राम का जन्म रावण-राज्य की समाप्ति के लिए हुआ था। वे अगर अयोध्या का राजपाट संभाल लेते तो कथा वहीं समाप्त हो जाती व उनके जीवन का महत्तर लक्ष्य पूरा न हो पाता। इसलिए कैकेयी ने स्वयं को अपयश का पात्र बना राम को कर्तव्यपथ पर प्रवृत्त किया। हम जानते हैं कि पूर्व में भी अनेक लेखकों ने इसी भांति साहित्य में उपेक्षित विस्मृत या लांछित पात्रों के प्रति न्याय करने का प्रयत्न किया है- जैसे मैथिलीशरण गुप्त ने 'साकेत में उर्मिला को नए आलोक में देखा, हरिऔध ने 'प्रिय प्रवास' में यशोधरा को व शिवाजी सावंत ने मृत्युंजय की कर्ण को। मंडलोईजी की भावना भी ऐसी ही रही है।

मैं उनकी इस रचना को एक और दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता हूं। भारतीय समाज में व उसी के अनुरूप भारतीय साहित्य में औरत जात का एक तरह से लगातार निरादर ही होते आया है। बात चाहे शकुंतला की हो, सीता की हो, द्रौपदी की हो एक पुरुषवादी मानसिकता साहित्य में निरंतर दिखाई पड़ती है। इस रूढि़ को सबसे पहले शरतचंद्र ने तोड़ा, जिसका अनुसरण उनके जीवनीकार 'अवारा मसीहा के लेखक विष्णु प्रभाकर ने किया। इस दौर में जबकि नवपूंजीवाद ने सारी चीजों की पवित्रता नष्ट कर दी है तथा स्त्री हर तरह से भोग्या बना दी गई है तब बहुत जरूरी हो गया है कि बुद्धिजीवी समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा कायम करने के लिए हर संभव उपाय करें और इसमें साहित्य पीछे क्यों रहे। समाज में स्त्री के हक में सिर्फ लेेेखिकाएं ही आवाज उठाएं यह भी पर्याप्त नहीं है। पुरुषों को भी आगे आना चाहिए और यह काम मंडलोईजी ने किया है।

मैंने पिपरिया का निमंत्रण तो खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया था, लेकिन यह ध्यान नहीं था कि छुट्टियों और शादी के मौसम में रेलगाड़ी में आरक्षण मिल पाएगा या नहीं। परिणाम यह हुआ कि मुझे पांच सौ पैसठ किलोमीटर की यात्रा सड़क मार्ग से करनी पड़ी। अमरकंटक एक्सप्रेस में सोते-सोते आना-जाना होता; यहां दिन में सफर करना पड़ा, क्योंकि अब रात को सड़क यात्रा में असुविधा महसूस होती है। यह लेकिन अच्छा ही हुआ। मैं पिपरिया कोई चार-पांच साल बाद जा रहा था। उस इलाके की दृश्यावली देखे लंबा समय बीत गया था सो पुरानी स्मृतियों को ताजा करने का एक अच्छा मौका मिल गया। कुछ नई छवियां भी स्वाभाविक रूप से देखने-समझने मिल गईं।
 
इस सफर की सबसे बढिय़ा बात तो यह थी कि रायपुर से पिपरिया तक का रास्ता जैसा कि बोलचाल की भाषा में कहेंगे ए-वन था। रायपुर से देवरी तक फोरलेन है। राजनांदगांव में पूरब से पश्चिम तक शहर की लंबाई में फ्लाईओवर बन गया है। देवरी से गोंदिया होकर मध्यप्रदेश की सीमा तक महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग की सड़क चुस्त-दुरुस्त है। वहां से सिवनी तक टोल रोड है। उसका भी रख-रखाव बढिय़ा है। सुना था कि नागपुर-जबलपुर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-7 दुर्दशाग्रस्त है, लेकिन मुझे जिस सिवनी-लखनादौन खंड पर चलना था वह हिस्सा एकदम बढिय़ा था। सबसे ज्यादा मजा आया लखनादौन से नरसिंहपुर तक फोरलेन वाले एनएच-26 पर। यह हिस्सा कुछ समय पहले ही बनकर तैयार हुआ है। चिकनी-सपाट सड़क पर गाड़ी दौड़ रही है और कुछ भी पता नहीं चलता। नरसिंहपुर से पिपरिया तक टोल टैक्स वाले प्रादेशिक राजमार्ग-22 का भी रख-रखाव ठीक था।

यह तो ठीक था कि यहां से वहां तक सड़क अच्छी थी, लेकिन रास्ते में पांच या छह जगह पर टोल टैक्स देना पड़ा। आते-जाते में पांच सौ रुपए तो खर्च हो ही गए। जहां सड़क नई बनी है वहां टैक्स लेना समझ आता है, लेकिन जहां लागत निकल चुकी हो वहां टोल टैक्स क्यों जारी रहना चाहिए? यह सवाल भी मन में उठता है कि जब निजी ठेकेदारों को ही सड़कें बनाना है तो पीडब्ल्यूडी में इतने सारे इंजीनियरों की फौज से क्या काम लिया जा रहा है? इस यात्रा में इस तथ्य पर भी ध्यान गया कि अब नगरों के बाहर जगह-जगह बाईपास बन गए हैं याने यात्री को शहर की भीड़-भाड़ से नहीं गुजरना पड़ता। इसका एक नुकसान भी हुआ है। बाहर-बाहर निकल गए तो न तो लखनादौन में रुककर खोए की जलेबी का स्वाद चख सके और न किसी छोटे गांव में रुककर इस मौसम में चूसने वाले देशी आम भी देखने मिले। रफ्तार ने इत्मीनान को छीन लिया है।

इन दिनों शादियों का सीजन है तो जगह-जगह उनके नजारे देखने मिले। लखनादौन के पास  किसी गांव से एक दामाद अपने ससुरजी को लेकर डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गाडरवारा के पास किसी गांव मोटर सायकल पर लिए जा रहे थे। टोल-टैक्स नाके पर वे मिल गए तो फिर बुजुर्गवार हमारी कार में थोड़ी देर के लिए सहयात्री हो लिए। एक और युवक अपनी पत्नी और दो बच्चों को बाइक पर लेकर कहीं शादी में जा रहा था। पत्नी अपने हाथों में सूटकेस को संभाल रही थी। ऐसे लोग भी क्या करें? बसों का ठिकाना है नहीं, फिर बाइक में समय और पैसा तो बचता ही है। रतन टाटा ने शायद इन्हीं के लिए नैनो कार बनाई थी। इस यात्रा का बड़ा हिस्सा ग्राम्यांचल में था इसलिए एक और रोचक दृश्य देखने मिला कि जगह-जगह खेतों में शामियाने तने हुए हैं और आती-जाती बारात का स्वागत हो रहा है।  ज्यादातर बाराती या तो सूमोनुमा गाडिय़ों में यात्रा कर रहे हैं या ट्रेक्टर ट्रालियों मेें।
(अगले सप्ताह जारी)

देशबन्धु में 15 मई 2014 को प्रकाशित