Wednesday, 21 May 2014

कुछ यात्रा चित्र : 2




मेरा
मन था कि बचपन के उस स्कूल को भी देखूं जहां गुरुजी खूबचंद मंडलोई ने मुझे पढ़ाया था। होशंगाबाद जिला लंबे समय तक समाजवादियों का गढ़ था तथा पिपरिया नगरपालिका में अध्यक्ष अमूमन समाजवादी ही हुआ करते थे। इसलिए नगरपालिका द्वारा संचालित स्कूल का नाम आज से चौसठ-पैसठ साल पहले जयप्रकाश प्राथमिक शाला रख दिया गया था, लेकिन मैं स्कूल नहीं देख सका और अब कभी देख भी नहीं पाऊंगा, क्योंकि स्कूल को जमींदोज कर दिया गया है और अब वहां एक शापिंग काम्पलेक्स का निर्माण चल रहा है। यह स्थिति सिर्फ पिपरिया की नहीं है। दो-तीन साल पहले में ग्वालियर गया था तो देखा कि मेरे हाई स्कूल के सामने जो कन्या माध्यामिक विद्यालय था उसे तोड़कर मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल ने वहां एक भव्य शापिंग काम्पलेक्स खड़ा कर दिया था। रायपुर में ही पिछले चार-पांच साल के दौरान शासकीय विज्ञान महाविद्यालय और शासकीय संस्कृत महाविद्यालय का भूगोल बदल कर रख दिया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार को रईसजादों के लिए स्वीमिंग पुल बनाने के निमित्त संस्कृत कॉलेज के  खुले मैदान से बेहतर और कोई जगह नहीं जंची। इसी तरह साइंस कॉलेज की छाती को चीरकर उस पर सड़क बना दी गई। जिनके बच्चे एयर कंडीशन निजी स्कूलों में बढ़ते हैं उन्हें आम जनता की सुख- सुविधा से क्या लेना देना?
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इधर पिछले कुछ दिनों में मैंने जो यात्राएं कीं उनमें बार-बार यही कड़वी सच्चाई सामने आई कि देश में विकास का मतलब सिर्फ सम्पन्न-सुविधाभोगी वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। आप रायपुर से दुर्ग चले जाइए। फोरलेन सड़क कार वालों के लिए तो ठीक है, लेकिन कुम्हारी, चरौदा, भिलाई-3 आदि बस्तियां दो हिस्सों में बंट गई हैं और किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया कि बस्ती में रहने वाले सड़क पार कैसे करेंगे। यह समस्या राजमार्ग पर स्थित छोटी-मोटी बस्तियों की ही नहीं, महानगरों की भी है। दिल्ली, बंबई, हैदराबाद : अब जिस तरह से नगर नियोजन हो रहा है उसमें सामान्यजन की फिक्र किसी को नहीं। भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर कहीं-कहीं पैदल पुल बना दिए गए हैं, लेकिन बूढ़े और कमजोर लोगों के लिए पुल पर चढऩे-उतरने में कितना कष्ट हो सकता है इस ओर कोई गौर नहीं किया गया। योजना बनाने वाले भूल जाते हैं कि शहरों में लोग पैदल भी चलते हैं, सायकिल पर भी और वे रिक्शे की सवारी भी करते हैं !
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पिछले माह हैदराबाद गया तो वहां एक और बात समझ आई। अब देश के सारे बड़े और मशहूर शहर एक जैसे दिखने लगे हैं। कोई पन्द्रह साल पहले आगरा में एक ऐसा इलाका देखा था, जहां ज्यादातर विदेशी पर्यटक भोजन के लिए आते थे। वहां पिज्जा हट जैसे रेस्तरां खुल गए थे। बाकी आगरा वैसा ही था, जैसा जमाने से चला आ रहा था, लेकिन अब हैदराबाद हो या आगरा, लखनऊ हो या जयपुर, सर्वत्र विदेशी ब्रांड वाली हर तरह की दुकानें खुल गई हैं। बड़े शहरों की क्या बात, गोंदिया, बालाघाट तक में डोमिनो पिज्जा पार्लर हैं, मतलब यह कि अब आप कहीं भी जाएं सब तरफ आपको एक जैसे दृश्य और एक जैसी वस्तुएं मिलेंगी। पहले लोग यात्रा पर जाते थे तो मथुरा का पेड़ा या आगरे का पेठा, या भोपाल से जरी का बटुवा लेकर आते थे, बल्कि आस-पड़ोस के लोग याद दिलाते थे कि फलानी जगह से हमारे लिए फलाना सामान लेकर आना। अब इस सब की जरूरत खत्म हो गई हैं। कौन बोझा बढ़ाए, अपने शहर में भी सब कुछ मिल जाता है।
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विदेशी ब्रांड और विदेशी नाम देश में जिस तरह से छा गए उसे देखकर सचमुच आश्चर्य होता है। हैदराबाद में एक छोर पर सिंगापुर सिटी है, तो दूसरे छोर पर मलेशियन टाउनशिप। ये दोनों आज की भाषा में गेटेड कम्युनिटी हैं। याने चारदिवारी और चाक-चौबंद पहरेदार। इनके अलावा हर शहर में नए-नए  मॉल और मल्टीप्लेक्स बनते जा रहे हैं। बताते हैं कि मल्टीप्लेक्स में आधी कमाई तो दस रुपए की पानी बोतल चालीस रुपए में बेचने से होती है।  मॉल में देशी-विदेशी कंपनियों के रिटेल आउटलेट सजे हुए हैं, इनमें जो कपड़े, जूते आदि बिकते हैं वे सब लगभग एक जैसे, एक डिजाइन के सौ-सौ कमीज, सौ-सौ सलवार सूट आदि। ऐसा लगता है मानो स्कूल यूनीफार्म की दुकान में आ गए हों। फिर ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की स्कीमें हैं। हैदराबाद में सामान खरीद रहे हैं, चिंता की कोई बात नहीं, बोनस पॉइंट रायपुर के मॉल में हमारे आउटलेट पर भुना लीजिए। सब कुछ इतना एकरस कि बिल्कुल नीरस। घूमते-घूमते पैर दुखने लगते हैं, देखते-देखते आंखें थक जाती हैं, और मन ऊब जाता है।
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एक समय लोग हैदराबाद जाते थे तो पहले चारमीनार देखते थे, फिर सालारजंग म्युजियम, फिर गोलकुंडा का किला, लेकिन अब उनकी बात ही कोई नहीं करता। वहां के रहवासी सिफारिश करते हैं कि आपको रामोजी फिल्म सिटी अवश्य देखना चाहिए। हो सकता है कि किशोरों और युवाओं के लिए इसमें आकर्षण हो कि फिल्म की शूटिंग देख रहे हैं। यह भी शान के साथ बताया जाता है कि अब फिल्म सिटी में शादियां भी होने लगी हैं। याने अब सारा ध्यान नए किस्म के आकर्षणों पर है। और कुछ नहीं तो शमशाबाद स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय विमानतल ही देख लीजिए जो अपने आप में एक छोटे शहर से कम नहीं है। बहुत से व्यस्तजन तो विमानतल के पास स्थित बड़े होटल में अपनी बैठकें या सभाएं कर लेते हैं। सुबह के जहाज से उतरे, शाम के जहाज से घर वापिस। इस तरह हैदराबाद जैसे चार शहरों में बंट गया है- एक हवाई यात्रियों का, दूसरे साइबर जगत के निवासियों का, तीसरा राजधानी के हुक्मरानों का और चौथा आम जनता का।
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एक संक्षिप्त यात्रा बीते दिनों जगदलपुर तक की। यूं तो पहले साल में दो-तीन बार बस्तर जाना हो जाता था, लेकिन अब की बार मैं दो साल बाद वहां जा रहा था। मुख्य प्रयोजन था एक साहित्यिक कार्यक्रम में शरीक होना। बस्तर के कुछ युवा रचनाकारों ने 'बस्तर पाती' शीर्षक से साहित्यिक पत्रिका प्रारंभ की है। उसका लोकार्पण था। एक कस्बानुमा शहर से पत्रिका प्रकाशन होना अपने आप में प्रसन्नता का बायस था। मैं सोचता हूं कि हिन्दी में जितनी भी पत्रिकाएं निकलें कम हैं। हिन्दी भाषियों की जनसंख्या सत्तर करोड़ के लगभग होगी। वह भी एक विस्तृत भूभाग में फैली हुई। ऐसी कोई पत्रिका नहीं है जो हिन्दी समाज में चारों तरफ पहुंच सके। साहित्यकारों का भी एक-दूसरे से परिचय स्थापित होना कठिन काम है। अगर एक बड़ी पत्रिका निकल भी जाए तो उसमें कितने रचनाकारों को स्थान मिल सकता है? ऐसे में यह निहायत जरूरी है कि छोटे-बड़े केन्द्रों से पत्रिकाएं निकलें, उनमें स्थानीय या कि क्षेत्रीय लेखकों की रचनाएं छपें, अंचल से संबंधित अन्य विषयों पर भी प्रामाणिक जानकारी उसमें शामिल हो और इस तरह से पत्रिका क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सामने आए। ऐसी पत्रिकाओं के माध्यम से ही हिन्दी जगत में एकता के सूत्र विकसित हो सकते हैं।
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'बस्तर पाती के लोकार्पण में भाग लेना एक सुखद अनुभव था। इसमें जगदलपुर के अलावा आसपास के नगरों से भी साहित्यप्रेमी आए थे। यह पूरे दिन का कार्यक्रम था। पहले खंड में लोकार्पण, दूसरे खंड में एक परिचर्चा और अंत में कवि गोष्ठी। लोकार्पण के समय स्वाभाविक रूप से उपस्थिति अधिक थी, लेकिन शाम को आयोजन समाप्त होने तक अच्छी खासी संख्या में सुधीजन वहां उपस्थित रहे यह देखकर स्वाभाविक प्रसन्नता हुई। परिचर्चा में अनेक महिलाओं ने भी भागीदारी की जिससे पता चला कि दूर बसे जगदलपुर में भी किस रूप में साहित्यिक चेतना विद्यमान है।
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इस यात्रा के दौरान कुछ वर्ष पूर्व ही स्थापित बस्तर विश्वविद्यालय देखने का भी पहला अवसर आया। कुलपति डॉ. चन्द्रा ने मुझे व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित कर लिया था। मैंने ''हमारी साझा विरासत विषय पर अपनी बात रखी और वहां भी मुझे यह देखकर संतोष हुआ कि विद्यार्थियों और अध्यापकों के साथ-साथ नागरिक बंधुओं ने भी प्रश्नोत्तर में पर्याप्त दिलचस्पी दिखलाई। बहरहाल, इस प्रवास के दौरान मुझे यह जानकर तकलीफ हुई कि अब बस्तर में कोसा बनना लगभग बंद हो गया है। वहां चांपा से आए रेशम पर ही काम होता है। इसी तरह एक और चिंताजनक तथ्य की ओर ध्यान गया कि बस्तर के जो शिल्पकार थे वे धीरे-धीरे कर कारीगरों में तब्दील होते जा रहे हैं। बस्तर शिल्प एक बड़ा व्यवसाय बन गया है जिसके स्वामित्व का एक अंश भी उनके पास नहीं है। हां! इतना शायद हो कि पहले से कहीं ज्यादा मजदूरी उन्हें मिल रही है। आदिवासियों के जंगल और जमीन तो उनसे पहले ही छीन चुके हैं, सांस्कृतिक पहचान भी उनसे छिन रही है।
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और अंत में, मुझे सड़क मार्ग से यात्रा करने पर दो अड़चनों का जिक्र करना चाहिए। यूं तो अब कदम-कदम पर पेट्रोल पंप खुल गए हैं किन्तु मुझे जानकर हैरत हुई कि ज्यादातर पंपों पर डीजल ही उपलब्ध था, पेट्रोल नहीं। इसके पीछे क्या गणित है यह या तो पंप संचालक बता सकते हैं या तेल कंपनियों के अधिकारी। दूसरे इन रास्ते पर कहीं भी यात्रियों के लिए प्रसाधन की व्यवस्था नहीं है। इसमें महिला यात्रियों को निश्चित ही परेशानी होती है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि टोल-टैक्स नाके के बाजू में ही पेट्रोल पंप, कैफेटेरिया व प्रसाधन की व्यवस्था कर दी जाए। मैंने यह भी नोटिस किया कि पहले ढाबों में जितनी साफ-सफाई के साथ और जैसा स्वादिष्ट चाय-नाश्ता मिल जाता था, अब वह बात नहीं रही।

देशबन्धु में 22 मई 2014 को प्रकाशित