Thursday, 25 April 2013

वे आपसे मिलना चाहते हैं




एक सज्जन 
संदेश लेकर आए कि वे आपसे मिलना चाहते हैं। मैं उनकी बात सुनकर कुछ अचरज, कुछ चिंता में पड़ गया। अपने मनोभावों को दबाने का प्रयास करते हुए मैंने उनसे पूछा कि वे जिनका संदेश लाए हैं वे मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं। संदेशवाहक थोड़ा बिगडे- यह भी कोई सवाल हुआ। एक तो वे इतना कष्ट उठाने को तैयार हैं कि चलकर आप तक आएं और आप हैं कि खुश होने के बजाय उलटे सवाल पूछ रहे हैं।  मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि मैं खुश ही नहीं, धन्य हो जाऊंगा। मेरे बड़े भाग होंगे कि वे मेरे द्वार पधारेंगे, लेकिन मैं तो सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि मुझ अकिंचन पर ऐसी अयाचित कृपा क्यों? मेरा उत्तर सुनकर संदेशवाहक थोड़ा पिघले, उनके तेवर कुछ ढीले हुए- हां आपका यह सवाल तो ठीक है। मैं सोचता था कि इस सवाल का उत्तर तो आपको स्वयं मालूम होगा और आप ऐसा नहीं पूछेंगे।
मैंने कहा- चलिए छोड़िए, मैं नहीं समझ पाया, आप ही बता दीजिए कि उनका प्रयोजन क्या है। वे बोले- देखिए, आप एक नागरिक हैं, अच्छे शहरी हैं इसलिए वे आपसे मिलना चाहते हैं। मैंने कहा- तो इसके लिए उन्हें यहां आने की जरूरत क्या है। वे जब चाहें, जहां चाहें बुला भेजें। मैं हाजिर हो  जाऊंगा। वैसे भी उनकी कोठी, बंगला या निवास, जो कुछ भी हो पर सुबह से मुझ जैसे नागरिकों की लाइन लगी रहती है। आप कहेंगे तो मैं उस लाइन में खड़े होकर उनसे मिलने का इंतजार कर लूंगा।
अरे नहीं भाई, कुछ समझा करो, बात इतनी सीधी नहीं है। लाइन में तो वे लोग खड़े होते हैं जिन्हें अपना कोई काम होता है और लाइन सिर्फ सुबह नहीं बल्कि दिन भर लगा करती है। कितने ही लोग तो रात के एक-एक बजे तक उनसे मिलने के लिए बैठे रहते हैं। इन दिनों वे थोड़ा जल्दी सो जाते हैं, फिर भी ग्यारह बजे तक तो दर्शनार्थियों का रेला लगा रहता है।
मैंने कहा- अच्छा। तो क्या इन तमाम लोगों के लिए वहां कुछ चाय-पानी की व्यवस्था होती है!
अरे! आपने भी कहां की लगाई। तीन-चार-पांच बैरिकैड्स के बाहर पुलिस वाले लोगों को खड़े रहने की अनुमति दे देते हैं, यही क्या कम है। हां, कभी-कभी कुछ लोगों के साथ वे फोटो खिंचवा लेते हैं, जिससे पता चलता है कि उनके मन में आम लोगों के प्रति कितना दयाभाव है। आपको इस जहमत में न पड़ना पडे ऌसलिए वे ही आपसे मिलने आना चाहते हैं।
-यह सब मैं समझ गया, लेकिन यह बिन मौसम बरसात कैसी?
- लगता है कि आप सठियाने लगे हैं। मौसम तो आ गया है और आप कह रहे हैं कि आपको पता नहीं। जनाब कैसे भूले जा रहे हैं कि आम चुनाव में अब यादा वक्त नहीं है।
- हां, यह तो मैं जानता हूं कि चुनाव निकट है, लेकिन इसका उनके मिलने आने से क्या ताल्लुक?
- फिर वही बात। आप पत्रकार हैं इसलिए वे चुनाव पूर्व आपसे कुछ जरूरी मंत्रणा करना चाहते हैं।
- मैं पत्रकार हूं तो क्या हुआ? मेरे पास तो सिर्फ अपना एक वोट है। पत्नी भी किसे वोट देगी, मैं नहीं जानता। ऐसे में मैं उनका कीमती वक्त जाया करने का अपराधी क्यों बनूं? बेहतर हो कि वे अपना समय मतदाताओं से सम्पर्क साधने में बिताएं।
- आपको समझाना बहुत कठिन हैं। वे आपका वोट मांगने नहीं आ रहे हैं। उन्हें आपसे इस मौके पर आपसे कुछ और सहयोग की आवश्यकता है। रही बात मतदाताओं की, तो वे जिस दिन से राजनीति में आए हैं उस दिन से मतदाताओं का दिल जीतने में ही तो लगे रहे हैं, चुनाव हो या कोई और मौका।
- जब मतदाताओं से उनका इतना निरंतर सम्पर्क है, तो फिर चिंता की क्या बात है। मेरा जहां तक सवाल है, मैं तो एक छोटे से शहर का छोटा सा पत्रकार हूं। मुझसे उन्हें क्या हासिल होगा। 
- नहीं ऐसा नहीं है। वे आपकी बहुत इात करते हैं। आप इतने पुराने पत्रकार हैं। उन्हें तब से जानते हैं जब वे राजनीति में पहला कदम रख रहे थे। आपकी राय से उन्हें कुछ न कुछ लाभ जरूर होगा।
- आप कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे, लेकिन भारतवर्ष में बहुत बड़े-बड़े पत्रकार हैं। मैं तो समझता था कि वे उनके ज्यादा काम के हैं। देखिए न, एक को उन्होंने राज्यसभा में भेजा, दूसरे को फैक्ट्री का लाइसेंस दिया, तीसरे को खदान का पट्टा, चौथे को सरकारी जमीनों पर बेजा कब्जा करने की इजाजत, पांचवें को चिटफंड चलाने दिया, छठवें को कलेक्टर-एसपी के ट्रांसफर-पोस्टिंग करवाने से मालामाल किया, सातवें से पुलिस में मुखबिरी करवाई, आठवें को राजदूत बनाया, नौवें को अपना प्रेस सलाहकार, दसवें को पार्टी प्रवक्ता नियुक्त किया, ग्यारहवें को पद्मश्री। कहिए और कितना गिनाऊं। 
-यही तो रोना है। जिन पत्तों पर तकिया था, वे पत्ते हवा देने लगे। जो उनकी शान में कल तक कशीदे काढ़ रहे थे वे अब और कुछ न मिलने की उम्मीद देखकर किनाराकशी करने लगे हैं। उनके पास तो अब ऐसी रिपोटर्ें आ रही हैं कि जो उनके सामने उनके हितैषी बनते थे वे ही रात के अंधेरे में उनके विरोधियों से हाथ मिला रहे हैं।
- तो भाई! इसमें मैं क्या कर सकता हूं। मैं तो कहीं आता-जाता नहीं। घर बैठे जितना पढ़-सुन लेता हूं उतना ही मेरा ज्ञान है। चुनावों में क्या होगा ये मैं कैसे जानूं? हां, इतना जरूर जानता हूं कि अपने कई बरसों के राज में उन्होंने जो दर्जनों क्या सैकड़ों जनहितैषी योजनाएं लागू कीं, वे अगर ठीक चली होंगी तो उसका फायदा उन्हें जरूर मिलेगा।
- अब आप आए मुद्दे पर। वे आपसे मिलकर शायद यही जानना चाहेंगे कि उनकी घोषणाओं, योजनाओं, कार्यक्रमों का जनता को कितना लाभ मिला और जनता उनसे कितनी खुश है। इस बारे में आप उन्हें सही-सही तस्वीर बतला सकेंगे।
- नहीं बंधु! मेरी इतनी क्षमता नहीं है। मैं इतना कह सकता हूं कि सिर्फ योजनाएं लागू करना काफी नहीं है। यह तो सरकार का काम है, लेकिन जनता इसके अलावा और भी कुछ चाहती है। 
- अच्छा ऐसा है। इस बात का थोड़ा खुलासा कीजिए।
भाई, खुलासा तो उस बात का हो जो छिपी हो। यहां तो जाहिर है कि जनता आपको काम करने के लिए चुनती है। आपकी इात भी करती है, लेकिन जब आप अहंकार में आ जाते हैं, भ्रष्टाचार करते समय आगा-पीछा नहीं सोचते, आम आदमी से दुर्व्यवहार करने लगते हैं, आपकी लालबत्ती उसे डराने लगती है, आपके काफिले को रास्ता देने के लिए उसे दुबकना पड़ता है, आपके मीठे आश्वासन जब झूठे हो जाते हैं, जब आप अवसरवादियों और खुशामदखोरों के चक्कर में पड़ जाते हैं, जब आप मोटा चंदा देने वालों के चंगुल में फंस जाते हैं, जब आप जनता को अधिकार नहीं, दया का पात्र मान  बैठते हैं, तब ऊपर से जनता भले ही खामोश रहे, भीतर-भीतर वह तड़पती रहती है और सबक सिखाने के लिए मौके का इंतजार करती है।
- बाबा रे बाबा! आप ऐसी बात सोच रहे हैं। वे जब आपसे मिलेंगे तब क्या यही बातें कहेंगे?
- हां भाई! मिलूंगा तो यही कहूंगा। आप कहें तो आपके साथ चलकर वे दिल्ली, भोपाल, जयपुर, रायपुर जहां भी रहते हों  उनसे सामने-सामने यह बात कर सकता हूं। 
- ऐसा कहकर तो आप मेरी नौकरी खा जाएंगे। बेहतर है कि आप उनसे ना ही मिलें।
- यही तो मैं शुरू से ही कह रहा था कि मेरे जैसा आम आदमी उनके काम का नहीं है।

देशबंधु में 25 अप्रैल 2013 को प्रकाशित 

 

Wednesday, 17 April 2013

नए माध्यम : सदुपयोग की संभावनाएं


पिछले सप्ताह अंग्रेजी पत्रकार प्रशांत झा का एक ट्वीट देखा कि भारत में सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं की संख्या छह करोड़ का आंकड़ा पार कर गई है। इनमें से अधिकतर जन फेसबुक के सदस्य हैं, लेकिन अन्य समूहों में भी सदस्यता लगातार बढ़ रही है। श्री झा ने ही 'द हिन्दू' में छपे एक लेख में संभावना व्यक्त की है कि सोशल मीडिया के ये उपयोगकर्ता लोकसभा की एक सौ साठ सीटों पर चुनावी नतीजों को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर सकते हैं। इन टिप्पणियों से स्वाभाविक ही निष्कर्ष निकलता है कि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में ये नए माध्यम एक बड़ी भूमिका निभाएंगे। सच पूछिए तो इस दिशा में उत्साही लोगों द्वारा इसकी पहल की जा चुकी है। टयूनीशिया और इजिप्त में घटित तथाकथित अरब के साथ ही हमारे यहां भी बहुत लोगों को लगने लगा था कि डिजिटल मीडिया के माध्यम से भारत में भी क्रांतिकारी परिवर्तन संभव हो सकता है। अन्ना हजारे का नया अवतार तथा बाबा रामदेव व अरविन्द केजरीवाल का राष्ट्रीय क्षितिज पर प्रकट होना इस सोच का ही फलितार्थ था। (आगे बढ़ने के पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मैं सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, डिजिटल मीडिया, माध्यम आदि संज्ञाओं का उपयोग यहां पर्यायवाची के रूप में कर रहा हूं।)

 यह हमारी जानकारी में है कि एक लम्बे समय तक समाचार पत्रों ने देश में वही भूमिका निभाई जिसकी उम्मीद आज नए माध्यमों से की जा रही है। चार सौ वर्ष पहले प्रिंटिंग मशीन के आविष्कार से पूरी दुनिया में एक नई लहर उठी व समय आने पर भारत भी उससे अछूता नहीं रहा। उसके बाद रेडियो व सिनेमा ने भी इसी तरह का रोल अदा किया। अपने अनुभव से मुझे मालूम है कि छत्तीसगढ़ में कृषि की उन्नति में आकाशवाणी के कृषि संबंधी कार्यक्रमों ने कितना योगदान किया। जैसा कि हम जानते हैं दूरदर्शन को भी यही सोचकर प्रोत्साहन दिया गया था कि बेहतर सामाजिक प्रक्रिया के निर्माण में उससे मदद मिलेगी। यह दीगर बात है कि कालांतर में व्यवसायिक सिनेमा की तरह टीवी भी मनोरंजन के साधन तक सिमट कर रह गया। इसके बावजूद टीवी की एक सकारात्मक भूमिका मैं इस रूप में देखता हूं कि वह वृध्दजनों, घरेलू, महिलाओं और एकाकी लोगों के लिए मन बहलाव व समय बिताने का एक अच्छा अवलंब बन गया है। एक बड़ा वर्ग जिसके जीवन में रसाभाव है उसके लिए टीवी ही शायद एकमात्र मित्र है!

हम यहां टीवी के कार्यक्रमों की गुणवत्ता की समीक्षा नहीं कर रहे, बल्कि उसकी उसी भूमिका को रेखांकित कर रहे हैं जो सामाजिक परिस्थितियों के चलते अपने आप बन गई है। इस पृष्ठभूमि में गौर करने पर स्पष्ट हो जाता है कि नए जमाने में नए माध्यम वह भूमिका निभाने के लिए सामने आ गए हैं।  सिनेमा, रेडियो और टीवी इन तीनों में एक कमी भी है कि वहां संवाद एकपक्षीय होता है। श्रोता या दर्शक को अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए अनिवार्यत: अन्य माध्यमों की तलाश करनी पड़ती है। एक समय गांव-गांव में रेडियो क्लब इसीलिए बने और अनेक स्थानों पर फिल्म सोसायटियों की स्थापना होने का भी शायद यही कारण रहा। सोशल मीडिया ने इस पुराने इंतजाम को ऊपर से नीचे तक बदलकर रख दिया है। इसने उपयोगकर्ता को अपने विचार व्यक्त करने के लिए एक तरह से लंदन के हाईड पार्क जैसा खुला मंच दे दिया है और भौगोलिक सीमाएं डिजिटल संसार में आकर पूरी तरह से पिघलकर लुप्त हो गई है। इसने समाज के जनतंत्रीकरण की एक धुंधली सी संभावना भी जगाई है। राजेश जोशी की एक कविता में कल्पना की गई है कि कवि अपना टेलीफोन नंबर प्रधानमंत्री को दे देता है ताकि प्रधानमंत्री को जरूरत पड़े तो वे भी एक सामान्य नागरिक से बात कर सकें। सोशल मीडिया ने राजेश की कल्पना को इस हद तक तो साकार कर ही दिया है कि एक आम आदमी भारत के प्रधानमंत्री अथवा अमेरिका के राष्ट्रपति को टि्वटर अथवा फेसबुक पर संदेश भेज सकता है।

इन नए माध्यमों के इस्तेमाल पर मेरे अपने कुछ निजी अनुभव हैं। पाकिस्तान के पत्रकार मजीद शेख और मैं कार्डिफ, वेल्स (यूके) में कुछ माह तक एक फेलोशिप कार्यक्रम में साथ-साथ थे। 1977 अप्रैल के बाद हमारा सम्पर्क टूट गया था, लेकिन गूगल सर्च की मेहरबानी से 2012 में हम एक-दूसरे से नेट पर मिले और अब फेसबुक के माध्यम से संवाद जारी है। इसी तरह स्कूल के सहपाठी डॉ. विजय भटनागर से 1986 के बाद सम्पर्क खत्म हो गया था, 2012 में ही उनसे फिर मुलाकात हुई। मैंने दो साल पहले फेसबुक, टि्वटर, गूगल प्लस व लिंकड् इन- इन चार माध्यमों का उपयोग करना प्रारंभ किया और अब मैं प्रतिदिन एक से डेढ़ घंटे तक का समय इन पर बिताता हूं। मेरे प्रिय अखबार लंदन से प्रकाशित गार्जियन और न्यू स्टेट्समेन भी मुझे अब नेट पर पढ़ने मिल जाते हैं। इधर मैं गंभीरतापूर्वक सोच रहा हूं कि दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुम्बई से एक दिन बाद रायपुर पहुंचने वाले अखबार खरीदना बंद कर दूं क्योंकि रोज सुबह मैं अपने स्मार्ट फोन में ही पढ़ लेता हूं।

इन माध्यमों के प्रयोग से देश-विदेश में न सिर्फ पुराने मित्रों से सम्पर्क सूत्र दोबारा जुड़े हैं, बल्कि बहुत बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता आदि से भी परिचय होकर संवाद प्रारंभ हो गया है। मेरा यह लेख भी इसके पहले लिखे अनेक लेखों की तरह मेरे ब्लॉग पर आ जाएगा तथा दूरदराज में निवास कर रहे बहुत से मित्र इसे पढ सकेंगे। मैं देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में छपे अपने पसंदीदा लेखों की सूचना व लिंक टि्वटर आदि पर डाल देता हूं ताकि समान रुचि के साथी उन्हें पढ़ सकें। ऐसे प्रदेशोें में जहां 'देशबन्धु' का प्रसार नहीं है वहां के पाठकों को मैं यह सलाह देता हूं कि वे इंटरनेट पर जाकर 'देशबन्धु' पढ़ सकें। दरअसल विदेशों में बसे छत्तीसगढ़वासियों के लिए तो देशबन्धु का ई-संस्करण ही घर की खबरें जानने का प्रमुख माध्यम है। 

इस तरह इन नए माध्यमों की उपादेयता स्वयं सिध्द है, लेकिन इसके आगे यह सवाल उठाना लाजमी है कि हम इनका उपयोग किस रूप में करते हैं। यह बात समझ में आती है कि दूर देश में बसे पारिवारिक सदस्यों व मित्रों से स्काइप के द्वारा बातचीत हो जाए। इसमें समय की बचत भी है और आमने-सामने बात करने का सुख भी। एक तरह से स्काइप और फेसबुक जैसे अभिकरण डाकघर की भूमिका में आ गए हैं। समाचारों का आदान-प्रदान हो जाए, जन्मदिन की बधाई दे दी जाए, तस्वीरें दिखला दी जाएं- यह सब उचित है। लेकिन इन माध्यमों में जो अपार संभावनाएं निहित हैं यह उनका एक प्रतिशत भी नहीं है। दूसरे जिस तरह के संवादों का विनियम इन पर होता है, वे कई बार बचकाने और कैशोर्य अनुभूति से भरे होते हैं, जिन्हें एक बड़े समूह के साथ बांटना मेरी दृष्टि में मूर्खतापूर्ण ही है।

इस बचकानेपन को एक सीमा तक बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन इन माध्यमों का कुछेक राजनीतिक शक्तियों द्वारा जैसा दुरुपयोग किया जा रहा है उससे मन में चिंता होती है। एक उदाहरण सामने रखूं। देश के नागरिक भ्रष्टाचार से चिंतित हो, उसके खिलाफ आवाज उठाएं, आन्दोलनकारियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करें, स्वयं आन्दोलन में शामिल हों यहां तक तो ठीक है, लेकिन इसमें व्यक्तिगत आक्षेप व चरित्र हनन क्यों हो? याहू अथवा गूगल पर ऐसे समूह बन गए हैं, जो राजनेताओं के चरित्र हनन में तमाम मर्यादाओं को लांघ जाते हैं। इसी तरह यह लोगों का जनतांत्रिक अधिकार है कि वे प्रधानमंत्री पद पर किसे देखना चाहते हैं। उन्हें अपने प्रिय नेता के समर्थन में चर्चा करने का पूरा अख्तियार है, लेकिन यह अधिकार उन्हें क्यों दिया जाए कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों पर कमर के नीचे वार करें! जिस तरह से इन माध्यमों पर घृणा फैलाने वाली सामग्री परोसी जा रही है, वह विचारों की अभिव्यक्ति का दुरुपयोग कर रही है और इस पर सभ्य समाज को गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

मेरा अंत में कहना यह है कि सोशल मीडिया के सदुपयोग की अपार संभावनाएं हैं। इस तरफ ध्यान देंगे तो उससे समाज को विचार सम्पन्न बनाने में सहायता मिलेगी और अगर छुटभैय्येपन में लगे रहेंगे तो इन माध्यमों की भूमिका नुक्कड़ पर होने वाली अनर्गल चर्चाओं का माध्यम बनकर खत्म हो जाएगी।

देशबंधु में 18 अप्रैल 2013 को प्रकाशित 
 
 

Thursday, 11 April 2013

बौने टिड्डी बनकर छा गए



यह बताने की जरूरत शायद नहीं है कि हमारे समाज में शरीर से बौने लोगों के साथ क्या बर्ताव किया जाता है। अक्सर तो उन्हें उपहास का लक्ष्य बनाया जाता है या फिर कभी-कभी उन्हें बेचारगी की दृष्टि से भी देखा जाता है। शादी, ब्याह या जन्मदिन की आलीशान पार्टियों में कई बार बौने लोगों को अतिथियों का मनोरंजन करने के लिए दरवाजे पर खड़ा कर देते हैं। सर्कसों में तो इसी लिहाज से उनकी उपस्थिति कोई सौ साल से चली आ रही होगी। इधर यदा-कदा उन्हें फिल्मों में भी जोकर का रोल मिलने लगा है। यद्यपि कुछ समय पहले जेम्स बांड की एक फिल्म में एक बौने को खलनायक के जरखरीद क्रूर हत्यारे के रूप में भी चित्रित किया गया था। फिल्म के अंत में जेम्स बांड उसे किसी पेटी में बंद कर देता है। कुल मिलाकर बौने व्यक्ति की देहयष्टि ही उसके लिए अभिशाप बन जाती है और यह जानने की कोशिश कोई नहीं करता कि उसकी मानसिक क्षमता कितनी है। 

यह हमारे समय की विडम्बना है कि एक तरफ यह नजारा है तो दूसरी तरफ बड़ी संख्या में ऐसे लोग जो बुध्दि विवेक में बौने हैं, आए दिन किसी न किसी रूप में सम्मानित, पुरस्कृत और अलंकृत होते रहते हैं। उन्हें सर-आंखों पर बैठाते समय कोई भी यह सवाल नहीं पूछता कि उनका बौध्दिक स्तर क्या है। बौध्दिक स्तर से आशय यहां सिर्फ कॉलेज या विश्वविद्यालय की डिग्री से नहीं है। ऐसा व्यक्ति विवेक सम्पन्न है या नहीं, उसमें सिध्दांतों पर टिके रहने की जिद है या नहीं, वह बौध्दिक रूप से कितना ईमानदार है- इन बातों की तरफ शायद ही किसी की तवज्जो जाती हो। इस अनदेखी का ही परिणाम है कि देश की जनतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण और निर्णयकारी स्थानों पर ऐसे-ऐसे लोग काबिज हो चुके हैं जो कि उसके सर्वथा अयोग्य थे और इस गफलत की भारी कीमत हमें सामूहिक रूप से चुकाना पड़ रही है।

ये बौने लोग सत्ता के शिखरों पर पहुंचने के बाद जिस तरह का गर्हित आचरण कर रहे हैं उसकी बानगी आए दिन देखने मिल रही है। अभी चार दिन पहले महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने आन्दोलनकारी जनता के प्रति जिस अभद्र शब्दावली का उपयोग किया, वह इसका एक प्रमाण है। ये वही पवार हैं जिन्हें सिंचाई घोटाले में नाम आने के कारण कुछ माह पूर्व अपना पद छोड़ना पड़ा था। फिर ऐसी क्या मजबूरी हुई कि उन्हें ससम्मान उसी पद पर वापिस ले आया गया। महाराष्ट्र की जनता चुपचाप और शायद हताशा के भाव से यह खेल देखती रही। अजीत पवार ने भाषण के दौरान जो हाव-भाव दिखाए जिसकी झलकी टीवी पर देखने मिली, उससे उनका बौध्दिक बौनापन ही प्रकट हुआ। महाकवि रहीम ने ऐसे लोगों के लिए ही पांच सौ साल पहले कहा था- 'प्यादा सो फरजी भयो टेढ़ो-टेढ़ो जाए।' 

अजित पवार का यह उदाहरण ताजा-ताजा है, लेकिन एक दिन भी नहीं जाता जब कहीं न कहीं से इस तरह की ओछी बातें सुनने न मिलती हों। अगर काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है तो कहना पड़ेगा कि ऐसा टुच्चापन हर प्रदेश में देखने मिल रहा है। महाराष्ट्र अपवाद नहीं है। बाकी प्रदेशों में और बाकी पार्टियों में भी यही सब रोज हो रहा है। और तो और, जिन तथाकथित साधु संतों के प्रवचन सुन लोग अपना परलोक सुधारने में लगे रहते हैं वे भी विचारों से बौने होने का परिचय आए दिन देते रहते हैं। संत (?) आसाराम के हाल के वक्तव्यों को देख लें। निर्भया कांड में उन्होंने जैसी टीका की वह मानो पर्याप्त नहीं थी। इसके बाद होली के अवसर पर भी पानी की बर्बादी का प्रश्न उठने पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में शब्दों पर संयम नहीं रखा।

यह बौनापन सिर्फ व्याख्यानों और वक्तव्यों तक सीमित नहीं है। इसका प्रदर्शन और भी बहुत रूपों में हो सकता है और होता है। मिसाल के तौर पर मुकेश अंबानी के सत्ताइस मंजिला महल को ही लें। सुना है कि कई अरब की लागत से बने इस भव्य प्रासाद में कोई वास्तुदोष निकल जाने के कारण अंबानी परिवार यहां रहने अभी तक नहीं आया है। संभव है कि कोई वास्तुपंडित कोई टोटका करके यह दोष खत्म कर दे, लेकिन हमें तो सत्ताइस मंजिल की इस मीनार को देखकर भारत की सबसे बड़े धनकुबेर की सोच के बौनेपन का ही अनुमान होता है। एक समय था जब राजा-महाराजाओं ने अपने लिए बड़े-बड़े महल बनवाए;  उनके सामने शायद इतिहास के दृष्टांत नहीं थे, लेकिन आज जब कई हजार साल के इतिहास की सूचनाएं उपलब्ध हैं तब भी उससे कोई सबक न लेने में कौन सी बुध्दिमानी है।

देश में जो हजारों पुरस्कार बांटे जाते हैं उनमें भी यही बौध्दिक कंगाली परिलक्षित होती है। ऐसी सैकड़ों गैर-सरकारी संस्थाएं हैं जिनकी स्थापना सिर्फ फर्जी अलंकरण देने के लिए ही की गई है। इन संस्थाओं के सूत्रधार किसी भूतपूर्व रायपाल, भूतपूर्व राजदूत या ऐसे किसी व्यक्ति को अपना अध्यक्ष बना लेते हैं और फिर उसके नाम का उपयोग कर पुरस्कार अभिलाषी लोग से सहयोग राशि इकट्ठी कर उसी से उनको कोई आकर्षक नाम वाला पुरस्कार दे देते हैं।  'जिसका जूता उसी का सिर'। जो सूत्रधार हैं उसके लिए तो यह कमाई का जरिया है, लेकिन जो महानुभाव उसे अपने नाम का इस्तेमाल करने देते हैं उनकी बुध्दि के बारे में क्या कहा जाए! अपने जीवन में बड़े-बड़े पदों पर रह चुके लोग यदि इस तरह के फर्जीवाड़े में शामिल होते हैं तो वे अपनी अपूर्ण, तुच्छ आकांक्षा को ही प्रदर्शित करते हैं। हमारे साहित्यकार और कलाकार तो पुरस्कार और प्रसिध्दि के लिए जैसे पागल हुए जाते हैं।  उनका सारा समय इसी जोड़-तोड़ में लगा रहता है कि कब कौन बुलाकर माला पहना दें और बन सके तो एकाध लिफाफा भी थमा दे। कुछेक संस्थाएं इसी उद्देश्य से स्थापित होती हैं  कि उसके माध्यम से रायपाल, मुख्यमंत्री या ऐसे प्रभावशाली लोगों में मेलजोल बढ़ाया जा सके। बहुत से लोग इन फर्जी संस्थाओं के कार्यकमों में शामिल भी इसीलिए होते हैं कि मंत्री-मुख्यमंत्री उनके ऊपर एक अनुग्रह भरी दृष्टि डाल दें। अभी पच्चीस-तीस साल पहले तक संत कवि कुंभनदास को साक्षी रखकर लेखक कहता था- संतन को कहा सीकरी सौ काम,  लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि सारे के सारे संत न सिर्फ सीकरी में बस गए हैं, बल्कि राजसत्ता की गोद में बैठने के लिए मचल रहे हैं और एक दूसरे से झगड़ रहे हैं।

यही स्थिति टीवी पर अवतरित होने वाले विशेषज्ञों की भी है। अधिकतर का लक्ष्य यही होता है कि वे जो बात कर रहे हैं उसके चलते उन्हें या तो रायसभा की मेम्बरी मिल जाएगी या फिर लाभ देने वाला ऐसा ही कोई अन्य पद। इस तरह से तमाम बौने लोग हमारे सामाजिक जीवन पर टिड्डियों की तरह छा गए हैं- कोई निर्वाचित प्रतिनिधि बनकर,  कोई रायसभा सदस्य बनकर, कोई पद्म अलंकरण पाकर, कोई विश्वविद्यालय से मानद उपाधि लेकर, कोई किसी संगठन में किसी पद पर, तो कोई स्वयं को लेखक या विचारक के रूप में स्थापित करके। यह पाने के लिए पैसा खर्च करना पड़े, साष्टांग दण्डवत करना पड़े, कोई भी मक्कारी करना पड़े, सब कुछ क्षम्य है। बुध्दि विवेक के इन बौनों से तो सर्कस के वे जोकर अच्छे जो अपनी मेहनत की रोटी खाते हैं।

देशबंधु में 11 अप्रैल 2013 को प्रकाशित 

Friday, 5 April 2013

यात्रा वृत्तांत : एक अनूठे गाँव की कहानी



गो दरगावां। बिहार के बेगूसराय जिले का एक छोटा सा गांव। इतना छोटा कि गोदरगावां सहित चार गांवों को मिलाकर एक ग्राम पंचायत बनी है। सर्वे ऑफ इंडिया के रोड एटलस याने सड़क मानचित्र में इस गांव को एक बिन्दु भर जगह भी नहीं मिल पाई है। फिर भी यह एक ऐसा गांव है, जिसे हिन्दी जगत में साहित्य तीर्थ की मान्यता मिली हुई है। नामवर सिंह, कमलेश्वर, विश्वनाथ त्रिपाठी, अशोक वाजपेयी- कौन नहीं आया यहां! तो ऐसा क्या खास है इस जगह में!

मैं खुद पिछले कई सालों से गोदरगावां जाने का कार्यक्रम बना रहा था, लेकिन किसी न किसी कारण से यात्रा टल जाती थी। लगभग दस साल की इच्छा अब जाकर पूरी हुई। जिन मित्रों को पता था कि मैं वहां जा रहा हूं उनमें से कुछ ने कहा- बेगूसराय बिहार का लेनिनग्राड है। यह उपमा मैंने पहले भी सुन रखी थी। पटना से गोदरगावां पहुंचा तो वहां भी नए-पुराने दोस्तों से बार-बार सुनने मिला कि आप लेनिनग्राड आ गए। यह इसलिए कि स्वाधीनता संग्राम में इस जिले ने तो देश के बाकी हिस्सों की तरह बढ़-चढ़ कर भाग लिया ही, हिन्दी भाषी क्षेत्र में यहीं कम्युनिस्ट पार्टी को एक मजबूत जमीन मिली और यहां के खेतों में समाजवाद के विचार बीज बोए गए।

पटना से गंगा के दक्षिणी किनारे के साथ-साथ पूरब की दिशा में चलते हुए सेमरिया घाट पर राजेन्द्र सेतु पार कर कोई तीन घंटे में हम बेगूसराय पहुंचे।  यहां निकट ही बरोनी में इंडियन ऑयल का तेलशोधन संयंत्र है और जो बिहार में औद्योगिक विकास का एकमात्र उदाहरण है। बेगूसराय में राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही महाकवि दिनकर की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है। थोड़ा आगे बढ़कर गांव की तरफ रास्ता मुड़ता है। तीस-पैंतीस मिनट बाद गोदरगावां पहुंचते हैं। प्रवेश करते साथ ही चन्द्रशेखर आजाद की आदमकद मूर्ति लगी है। गांव के ही एक किसान ने अपने स्वर्गवासी अनुज की स्मृति में इस प्रतिमा की स्थापना की है। देश में ऐसे उदाहरण कम ही होंगे जहां प्रियजन की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए एक महान क्रांतिवीर की प्रतिमा लगाई जाए। यहां एक ओर निजी स्मृतियों को संजोए रखने की भावुकता थी, तो दूसरी ओर समाज को बदलने का अधूरा सपना वास्तविकता में बदलने का एक मौन संकल्प भी। 


बहरहाल, गोदरगावां को जो पहचान मिली है वह इसके अस्सी साल पुराने विप्लवी पुस्तकालय के चलते है। 1991 में गांव के लोगों ने महावीर पुस्तकालय की स्थापना की थी। कालांतर में इसका नाम बदलकर विप्लवी पुस्तकालय कर दिया गया। एक छोटे से गांव में जनता के सहयोग से एक पुस्तकालय की स्थापना हो सकती है, वह अस्सी साल तक चल सकता है, उसका अपना सुनियोजित भवन हो सकता है- इन सारी बातों की कल्पना कम से कम रायपुर में बैठकर तो नहीं की जा सकती; जहां पहले से चले आ रहे पुस्तकालय बंद हो गए हैं, जहां स्वाधीनता संग्राम का केन्द्र आनंद समाज पुस्तकालय मरणशय्या पर है और जिसकी तरफ देखने की किसी को फुरसत नहीं है।


विप्लवी पुस्तकालय का अपना दोमंजिला भवन है। इसमें नीचे एक वाचनालय है जहां बिहार के सारे अखबार और देश की तमाम महत्वपूर्ण पत्रिकाएं आती हैं। लाइब्रेरी में बाइस हजार पुस्तकों का भंडार है जिनमें अंग्रेजी की भी कुछ पुस्तकें हैं। इस विशाल भंडार में कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृत्तांत आदि तो हैं ही, धर्म, दर्शन, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र आदि पर भी पर्याप्त पुस्तकें हैं। सारी पुस्तकें तरतीबवार रखी गई हैं और उनका सूचीकरण भी विधिवत् किया गया है। अंदाज लगाइए, मुझे कितनी खुशी हुई होगी जब 2003 में प्रकाशित मेरा निबंध  संकलन ''समय के साखी'' लाइब्रेरियन महोदय ने मेरे सामने लाकर रख दिया। पुस्तकालय के प्रवेश द्वार पर ही शहीदे आजम भगत सिंह की प्रतिमा जनसहयोग से ही स्थापित की गई है, जिससे पुस्तकालय के नाम को सार्थकता मिलती है। 


पुस्तकालय के सामने सड़क पार एक तिमंजिला भवन भी लगभग दस साल पहले बनाया गया है, जिसमें अभी हाल तक निर्माण कार्य चलते रहा है। यहां देवी वैदेही सभागार है, जिसका निर्माण गांव के ही एक अन्य सेवाभावी सान ने अपनी स्वर्गीया पत्नी की स्मृति में करवाया है। इस सभागार की क्षमता साढ़े तीन सौ व्यक्तियों की है। मंच पर फिल्म आदि प्रदर्शन के लिए एक बड़ा परदा लगाया गया है। ऐसा सुंदर हाल, एक बार फिर कहूं कि रायपुर में भी नहीं है। इस प्रेक्षागृह के भवन में ही अनेक अतिथि कक्ष व बैठक कक्ष आदि बनाए गए हैं। जिनके नामकरण में साहित्यिक अभिरुचि का परिचय मिलता है- रंगभूमि, कर्मभूमि, सेवा सदन, प्रेमाश्रम आदि, याने प्रेमचंद की प्रसिध्द कृतियों का स्मरण। अभी हाल में राहुल सांकृत्यायन के सुप्रसिध्द उपन्यास सिंह सेनापति के नाम पर एक कक्ष का नामकरण किया गया है। एक छत को नाम दिया गया है- कैफी आामी संस्कृति विहार। एक और छत है जो विवेकानंद वाटिका के नाम से पुकारी जाती है।


इस भवन के सामने की दीवार पर मीराबाई की आदमकद प्रतिमा उकेरी गई है। प्रवेश द्वार के एक तरफ प्रेमचंद की प्रतिमा स्थापित है तो दूसरी ओर कबीर की। जनवरी 1931 में शहीद पांच देशभक्तों का एक भित्तिचित्र भी सामने ही लगा है। दोनों भवनों में जगह-जगह पर देश के महान साहित्यकारों के चित्र दीवारों पर लगाए गए हैं। इनमें आप महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र से लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई व मन्नू भंडारी तक के चित्र देख सकते हैं। यहां शेक्सपीयर, मार्क्स तथा लेनिन भी मौजूद हैं तथा गालिब, फौ, मााज व कैफी आामी भी। यहां जो भोजनकक्ष है उसे कबीर चौका नाम दिया गया है। अपने साहित्य मनीषियों के प्रति ऐसा समादर उनकी स्मृति को जीवित रखने का ऐसा प्रयत्न, और इस सबमें सरकार की नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी और कहां देखने मिलेगी?


विप्लवी पुस्तकालय में हर साल 23 मार्च को भगतसिंह का बलिदान दिवस बहुत शिद्दत के साथ मनाया जाता है। आयोजनकर्ता देश के जाने-माने साहित्यकारों को मनुहार करके बुलाते हैं। हर साल की तरह इस साल भी 23 मार्च को 12 बजे भगतसिंह प्रतिमा से एक जुलूस निकला जो एक किलोमीटर दूर चन्द्रशेखर आजाद की प्रतिमा तक जाकर लौटा। इस जुलूस में कोई ढाई-तीन हजार लोग शामिल थे। वहां से लौटे नहीं कि ''नवसाम्राज्यवाद और प्रगतिशील आंदोलन की चुनौतियां''- इस विषय पर वैदेही सभागार में संगोष्ठी प्रारंभ हो गई। साढ़े तीन सौ लोग कुर्सियों पर, सौ-एक लोग अतिरिक्त कुर्सियों पर अथवा बालकनी की सीढ़ियों पर, गलियारे में और सौ लोग, फिर बाहर खुले मैदान में पंडाल के नीचे लाउड स्पीकर से चर्चा सुनते पांच सौ से ज्यादा। इस तरह एक हजार लोगों की उपस्थिति में यह पहली संगोष्ठी हुई जो एक बजे से साढ़े चार बजे तक साढ़े तीन घंटे निरंतर चलते रही। बाहर से आए वक्ता भूख से बेहाल थे, लेकिन श्रोता बराबर जगह पर जमे हुए थे। उस शाम हम लोगों को पांच बजे दिन का भोजन नसीब हुआ।


शाम सात बजे से इप्टा लखनऊ द्वारा ब्रैख्त के नाटक का मंचन था। गांव के लोग, खासकर महिलाएं अपना काम-काज निपटा कर आईं। सो आठ-सवा आठ बजे से शुरु होकर ग्यारह बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम चलता रहा, उसमें भी ढाई हजार की भीड़। अगले दिन 11 बजे दूसरी विचार गोष्ठी प्रारंभ हुई वह भी दो बजे तक चली। इसमें श्रोताओं की संख्या पिछले दिन के मुकाबले कम, लेकिन चार सौ के आसपास थी। चार बजे अंतिम कार्यक्रम के रूप में जनसभा का आयोजन किया गया। इसमें भी खासे उत्साह के साथ ग्रामवासियों ने भाग लिया। 


कुल मिलाकर गोदरगावां की यात्रा एक नायाब अनुभव था। इस गांव के निवासी और बिहार में तीन बार विधायक रह चुके लेखक मित्र राजेन्द्र राजन पुस्तकालय व इस कार्यक्रम के प्रमुख सूत्रधार हैं। उनके साथ हमउम्रों के अलावा युवा सहयोगियों की एक समर्पित टीम है। इनके बल पर ही 2008 में इस छोटे से गांव में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन सम्पन्न हो सका था। एक आखिरी बात। 23 तारीख की शाम मैं ठेलेनुमा दूकान पर बिस्किट खरीदने गया तो पहले तो दूकानदार ने पैसे लेने से मना कर दिया। वहां खड़े अन्य लोगों ने भी कहा कि आप हमारे अतिथि हैं, हम पैसा नहीं लेंगे। मैं बहुत मुश्किल से उस युवा दूकानदार को कीमत अदा कर सका।


देशबंधु में 4 अप्रैल 2013  को प्रकाशित

Tuesday, 26 March 2013

केन्द्र-राज्य संबंध और क्षेत्रीय दल




 यह कॉलम लिखने बैठा ही था कि यूपीए से उसके प्रमुख सहयोगी दल द्रमुक के स्वयं को अलग कर लेने की खबर मिली। वैसे इस आशय के संकेत पिछले कुछ दिनों से लगातार मिल रहे थे। उसने यह निर्णय श्रीलंका में तमिलों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में केन्द्र सरकार द्वारा जाहिरा तौर पर कोई कठोर कदम न उठाने से नाराज होकर लिया है। राष्ट्र महासभा में अमेरिका ने श्रीलंका के खिलाफ मानवाधिकारों के हनन का प्रस्ताव पेश किया है और द्रमुक चाहती थी कि भारत सरकार इस प्रस्ताव को संशोधित कर इसे नरसंहार की संज्ञा देकर अपना विरोध दर्ज करती। उल्लेखनीय है कि पिछले साल भी इस तरह का प्रस्ताव महासभा में लाया गया था और तब भारत ने श्रीलंका के खिलाफ मतदान किया था। फिर आज द्रमुक एवं उसके सुप्रीमो करुणानिधि को गत एक दशक से चले आ रहे गठबंधन को तोड़ने की जरूरत क्यों आन पड़ी- यह एक विचारणीय प्रश्न है। 

श्रीलंका में तमिलों की क्या स्थिति है, वहां की सरकारें इस बारे में क्या रुख अपनाते आई हैं, लिट्टे की क्या भूमिका रही है, राजीव गांधी की हत्या क्यों की गई, महेन्द्रा राजपक्ष की सरकार द्वारा सैनिक कार्रवाई किस सीमा तक न्यायसंगत थी- ऐसे बहुत से सवाल  हैं जिनका अध्ययन किए बिना श्रीलंका पर भारत के रुख को नहीं समझा जा सकता और यह पृथक विश्लेषण का विषय है। फिलहाल हम यह समझना चाहेंगे कि करुणानिधि ने श्रीलंका में तमिलों की स्थिति से क्षुब्ध होकर यह ताजा निर्णय लिया है अथवा इसके कोई अन्य कारण भी हैं। यह प्रश्न आज के दौर में इसलिए मौजूं हैं क्योंकि करुणानिधि ही नहीं, अनेक क्षेत्रीय नेता इन दिनों सामंतयुगीन क्षत्रपों की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

अभी पिछले सप्ताह की ही बात है जब प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल के मालदा किसी काम से गए तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनसे अपेक्षित शिष्टाचार का पालन नहीं किया।  वे न तो प्रधानमंत्री की अगवानी के लिए हवाई अड्डे गईं और न ही मालदा के कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत की। इसके पहले उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ बंगलादेश की यात्रा पर जाने का निमंत्रण ठुकरा दिया था तथा उनकी जिद के चलते तीस्ता जलसंधि अभी तक नहीं हो पाई है। यह उन्होंने ऐसे नाजुक वातावरण में किया जब बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत के साथ रिश्तों को बेहतर करने और देश में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की पुर्नस्थापना के लिए जी-जान से जुटी हुई हैं।

एक उदाहरण गुजरात का है जहां कारपोरेट घरानों के भुलावे में आकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी से अपने को देश का प्रधानमंत्री मानने लगे हैं और प्रधानमंत्री अथवा कांग्रेस अध्यक्ष की कारण-अकारण आलोचना करने का कोई मौका नहीं छोड़ते और न इसके लिए अपने शब्दों और भाषा पर संयम रखने की जरूरत समझते। इनके बरक्स बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं जिनका रुख हाल-हाल में केन्द्र सरकार के प्रति नरम हुआ है। उन्होंने भी बीते रविवार दिल्ली आकर शक्ति प्रदर्शन और अपनी महत्वाकांक्षा प्रकट करना आवश्यक समझा। यद्यपि यह दिख रहा है कि वे कट्टरपंथी मोदी तथा मितभाषी मनमोहन सिंह के बीच स्वयं को तीसरे विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। हमें याद आता है कि लगभग बीस वर्ष पूर्व हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल ने दिल्ली के बोट क्लब पर इसी तरह शक्ति प्रदर्शन किया था।

फिलहाल अलग-अलग प्रदेशों में इस तरह जो दृश्य बन रहा है उसका अर्थ निकालना शायद बहुत कठिन नहीं है। यह तो हमारे संविधान में ही लिखा है कि भारत एक संघीय गणराज्य होगा, लेकिन इन दिनों संघ के अलग-अलग घटक याने प्रांतीय सरकारें एक तरह से केन्द्र सरकार पर हावी होने की और उससे अपनी उचित-अनुचित हर तरह की मांग पूरी करवाने के लिए दबाव डालने में लगी हैं। इसी में इन दलों के नेता अपनी राजनीतिक हैसियत का प्रमाण पाते हैं। ऐसा करते हुए वे इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि भारत अमेरिका नहीं है और यहां केन्द्र के कमजोर होने से देश की संप्रभुता व एकता पर भी आंच आ सकती है। ऐसा हम सोवियत संघ में देख चुके हैं जहां सोवियत सत्ता का विघटन होने के साथ ही देश  पन्द्रह हिस्सों में बंट गया।

भारत में केन्द्र-राज्य संबंधों को लेकर एक लंबे समय से बहस चलते आई है। केन्द्र-राज्य संबंधों में तनाव भी कोई नई बात नहीं है। इसे हमने सबसे पहले 1957 में देखा, जब केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी और दो साल बीतते न बीतते 1959 में उस सरकार को अपदस्थ कर दिया गया। यह अगर एक अपवादस्वरूप प्रसंग ही था तो एक बड़ी लहर 1967 में उठी जब गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर  बहुत से प्रदेशों में संविद सरकारों का गठन हुआ। इस प्रयोग से तत्कालीन जनसंघ को ही सबसे ज्यादा फायदा हुआ और कितने ही धुरंधर कांग्रेसियों की सत्ता लोलुपता का परिचय भी इसमें मिला। खैर! इसके बाद इंदिरा गांधी के लगभग एकछत्र शासनकाल में अनेक प्रदेशों में एक ओर यदि विपक्षी सरकारों के बर्खास्त करने के प्रकरण घटित हुए तो दूसरी ओर तमिलनाडु में एक या दूसरी क्षेत्रीय पार्टी के सामने कांग्रेस के झुक जाने के उदाहरण भी सामने आए। विपक्षी सरकारों को बर्खास्त करने का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय तक गया और बहुचर्चित बोम्मई फैसला आया जिसमें बिना पर्याप्त कारण के राष्ट्रपति शासन लागू करना अवैधानिक करार दिया गया। इस बीच में न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में केन्द्र राज्य संबंधों की समीक्षा करने के लिए सरकारिया आयोग बना जिसकी सिफारिशों को कोई तवज्जो नहीं दी गई।

बहरहाल पिछले बीस-बाइस साल से देश में गठबंधन सरकारों का युग चल रहा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि अब केन्द्र में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा। 1989 से लेकर 1999 के बीच जो अस्थिरता आई उसके चलते बहुत से नेता लोकसभा का चुनाव लड़ने से कतराने लगे हैं कि न जाने कब लोकसभा भंग हो जाए।  यह गठबंधन का युग क्षेत्रीय नेताओं को भले ही रास आता हो, लेकिन कुल मिलाकर इससे देश का नुकसान हो रहा है। जो क्षेत्रीय दल हैं वे अपने सुप्रीमो याने महज एक व्यक्ति के इंगित से संचालित होते हैं और इनमें एक व्यापक दृष्टि का अभाव स्पष्ट ही परिलक्षित होता है। उन्हें न तो आर्थिक मामलों की कोई समझ है, न कूटनीति की और न अंतरराष्ट्रीय मसलों की।

करुणानिधि हो या जयललिता उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि भारत-श्रीलंका के बीच अगर एक नाजुक संतुलन कायम नहीं रहेगा तो चीन वहां हावी हो सकता है। नेपाल में ऐसा हुआ ही है। इसी तरह ममता बनर्जी इस बात को नहीं समझना चाहतीं कि उनकी अहंमन्यता से बंगलादेश की कट्टरपंथी ताकतों को ही बल मिलेगा। जम्मू-काश्मीर की स्थिति इससे अलग है। केन्द्र में जो भी रहे वहां के क्षेत्रीय दल के साथ बने रहना इसलिए जरूरी है ताकि उस प्रदेश में अलगाववादी ताकतों से प्रांतीय सरकार ही निपटें, लेकिन भारतीय जनता पार्टी इस बारे में जानबूझ कर  भी अनजान बनी हुई है।

मैं मानता हूं कि एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले देश में क्षेत्रीय दलों का उभरना स्वाभाविक है, लेकिन ये दल यदि सिर्फ चुनावी गणित को ध्यान में रखकर चलेंगे तो उससे बात नहीं बननी। हमने यह देखा है कि अटल बिहारी वाजपेयी  और मनमोहन सिंह इन दोनों ने क्षेत्रीय दलों के साथ संबंध बनाए रखने में बेहद धीरज और संयम का परिचय दिया है, लेकिन साथ-साथ इन क्षेत्रीय नेताओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे कोरी भावनाओं की राजनीति करने की बजाय एक व्यापक राष्ट्रीय सोच विकसित करें। 

देशबंधु में 21 मार्च 2013 को प्रकाशित 

 

Wednesday, 13 March 2013

पत्रकारिता: भावना बनाम तर्कबुध्दि





मेरा हमेशा से मानना रहा है कि वंचित समाज के प्रति संवेदना रखे बिना कोई भी व्यक्ति अच्छा तो क्या, बुरा पत्रकार भी नहीं बन सकता। यहां अच्छे पत्रकार से मेरा आशय मोटे तौर पर उस व्यक्ति से है जो अपने पत्रकार जीवन के प्रारंभ काल में सीखे हुए पाठ को कभी नहीं भूलता और जिसकी कलम की प्रतिबध्दता अंत तक शोषित, वंचित, पीड़ितजन के साथ बनी रहती है। बुरे पत्रकार की परिभाषा भी मैं कुछ स्पष्ट कर दूं- वह एक अच्छा मिलनसार, व्यवहारकुशल व्यक्ति हो सकता है, जिसके पास शायद खबरों का खजाना भी हो, लेकिन जिसकी कलम ने शायद निजी लाभ की दिशा पकड़ ली हो! यह मानना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता के पेशे में अमूमन वही व्यक्ति प्रवेश करता है, जो अपनी कलम से समाज और व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों और विसंगतियों को दूर करना चाहता है।

अपने बावन साल के पत्रकार के जीवन में मुझे हर तरह के पत्रकारों से मिलने और उनमें से बहुतों के साथ काम करने का मौका मिला है। मैंने यह पाया कि शुरुआती दौर में जो जज्बा और जोश  होता है वह धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगता है। ज्यादातर के सामने घर-परिवार को संभालने की बात होती है, लेकिन ऐसे भी कम नहीं है, जो नेता, अफसर, ठेकेदार के त्रिगुट में फंस जाते हैं और कई बार तो उस तिकड़ी के एजेंट ही बन जाते हैं। जो ज्यादा समझदार हैं वे अपनी उपलब्धि और ख्याति को बेहतर तरीके से भुनाने की कोशिश करते हैं। एक बड़ी संख्या उनकी भी है, जिनके लिए पत्रकारिता पूर्णकालिक व्यवसाय नहीं है। ये किसी छोटे से गांव में अखबार के विक्रेता और पत्रकार दोनों एक साथ हो सकते हैं। संभव है कि इनमें ऐसे लोग भी हों जो अपने छोटे-मोटे व्यापार या राजनीति को चलाने के लिए पत्रकार का रुतबा हासिल कर लेते हैं। इस सबके बावजूद कुछेक अपवादों को छोड़कर पत्रकार के कान हमेशा जमीन से लगे होते हैं और उसके आसपास क्या घटित हो रहा है, उसकी सही जानकारी उसे होती है।

इसीलिए पत्रकार से यह अपेक्षा हर वक्त की जाती है कि वह जनता की आवाज को उठाएगा और आम आदमी के जीवन में जो मुश्किलात हैं उन्हें हल करने में सहायक बनेगा। पत्रकार के पास प्रकाशन के जो माध्यम हैं याने अखबार या टीवी- वे सब इस धारणा पर ही चलते हैं। देश में जनतांत्रिक व्यवस्था के चलते जिस राजनीतिक चेतना का विकास हुआ है उसमें पत्रकार और उसके पास उपलब्ध माध्यम, दोनों का काम कई गुना बढ़ गया है। गांव-गांव से निकलने वाले अखबार, बड़े अखबारों के प्रादेशिक या जिला संस्करण, टीवी के प्रादेशिक चैनल, स्थानीय केबल समाचार इत्यादि उसके प्रमाण हैं। क्या इसके बावजूद यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि पत्रकारिता देश की जनांकाक्षाओं पर खरी उतरी है? कम से कम मेरा उत्तर नहीं में है।

मेरे ध्यान में यह बात आती है कि हमारी पत्रकार बिरादरी में सामाजिक मुद्दों की जानकारी तो है, लेकिन उनका उपचार करने में जिस कौशल का परिचय दिया जाना चाहिए, वह अकसर नहीं दिया जाता और जरूरी बात अंजाम तक पहुंचने के पहले ही दम तोड़ देती है। मेरा कहना है कि अधिकतर समय पत्रकार पवित्र भावनाओं से प्रेरित होते हैं, लेकिन उन्हें ठोस रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश नहीं होती, जिसके चलते शासन-प्रशासन में बैठे लोग अपनी जिम्मेदारि
यों से बच निकलते हैं। उन्हें उल्टे यह कहने का मौका मिल जाता है कि आप तो हवा में बात करते हैं। मैं रोजमर्रे की ही बातों से एक-दो उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा।

यह सब जानते हैं कि देश में नहीं सारे विश्व में जल संकट की अभूतपूर्व स्थिति है। आजकल यह भी अक्सर कहा जाता है कि अगर तीसरा विश्वयुध्द छिड़ा तो वह पानी के लिए छिड़ेगा। शहरों और गांवों में जल सकंट को लेकर आए दिन खबरें छपती ही हैं, लेकिन लगभग सारी की सारी खबरें समस्या का वर्णन करने से ज्यादा कुछ नहीं बतातीं। इस तरह यथास्थिति का वर्णन छपने से प्रभावित लोगों को भले ही थोड़ी तसल्ली मिल जाए या पत्रकार स्वयं अपनी पीठ थपथपा ले, नगरपालिका या जलप्रदाय विभाग के संबंधित लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि वस्तुस्थिति को वे पहले से ही जानते हैं।

ऐसे में हमें करना क्या चाहिए? मेरी राय में जिस भी पत्रकार की दिलचस्पी पानी के मसले में हो, उसे राष्ट्रीय जलनीति और यदि प्रदेश की जलनीति हो तो उसका भी अध्ययन करना चाहिए। तभी उसे मालूम होगा कि जलसंकट के विभिन्न आयाम क्या हैं और मूल कारण क्या हैं। जल के आवर्धन, संरक्षण, वितरण और स्वच्छता-इन चारों पहलुओं के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाने में उसे तत्पर रहना चाहिए। एक पत्रकार जहां भी पदस्थ है वहां जलस्रोत क्या हैं, वर्षाजल की क्या स्थिति है, जल संरक्षण की पारंपरिक विधियां क्या हैं, नई तकनीकी का इस्तेमाल किस रूप में हो रहा है, उसकी लागत नागरिक की जेब पर भारी है या उचित, जलस्रोत प्रदूषित कैसे हो रहे हैं, स्थानीय निकायों की क्या भूमिका है, जलप्रदाय के लिए आर्थिक प्रावधान क्या हैं, श्रमशक्ति का कैसा इंतजाम है- इन सबको जान-समझकर जब रिपोर्ट बनेगी तब ही उस पर समुचित व प्रभावी कार्रवाई होने की संभावना बन सकती है। इसी सिलसिले में एक पुराना उदाहरण याद आता है। सन् 1970-71 में रायपुर का मास्टर प्लान पहली बार बना, उसकी बहुत तारीफ हुई, लेकिन किसी भी पत्रकार ने ध्यान नहीं दिया कि नगर की जल आपूर्ति को लेकर इस भारी-भरकम दस्तावेज में महज पांच पंक्तियों का एक पैराग्राफ था। याने नीतिगत स्तर पर ही खामी थी, लेकिन उस पर हमने ध्यान नहीं दिया।

इसी तरह स्वच्छता अभियान या सेनीटेशन का मामला है। एक अभियान बड़े जोर-शोर से चला कि सबको साबुन से हाथ धोना चाहिए। इसे लेकर किसी ने भी यह नहीं पूछा कि यह साबुन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय रासायनिक कंपनियों द्वारा प्रेरित अभियान है या इसमें सचमुच कोई सार है। अब बहुत से डॉक्टर भी कह रहे हैं कि दिन में कई बार साबुन से हाथ धोने से त्वचा संवेदनहीन हो सकती है। लेकिन इस पहलू पर पत्रकारों को ध्यान गया ही नहीं। स्वच्छता से जुड़े ऐसे और भी बिन्दु हैं। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए स्कूल व अस्पतालों की दशा, बिजली, सड़क आदि के बारे में प्रश्न उठाए जा सकते हैं और उठाए जाना चाहिए।

आशय यह है कि एक पत्रकार को अपनी भावनाओं से समझौता किए बिना, बल्कि उन्हें जीवित रखते हुए एक तर्कप्रणाली विकसित करना चाहिए। किसी भी सामाजिक समस्या से जुड़ी हुई घटना से तात्कालिक रिपोर्टिंग करना एक बात है, लेकिन उसके निराकरण के लिए कार्य-कारण पध्दति विकसित करना बिल्कुल दूसरी। आजकल कुछ ऐसा चलन हो गया है कि जनता को मूर्ख बनाने के लिए या उसे भ्रम में डालने के लिए लुभावने आंकड़ों को समाचार की शक्ल में परोस दिया जाता है। जिनके निहित स्वार्थ हैं वे तो यह करेंगे ही, लेकिन पत्रकार क्यों उनके झांसे में आएं! यह योजना दस करोड़ की, वही योजना छह सौ करोड़ की, तो कोई योजना एक हजार करोड़ की- इस सबका अंतत: क्या मतलब है? हम और कुछ न करें, इतना तो कर ही सकते हैं कि जब सौ रुपए की कोई योजना सामने आए तो उसे हम अपने शीर्षक में पंद्रह रुपए ही लिखें, क्योंकि सबको पता है कि जनता के पास तो अंतत: पंद्रह पैसे ही पहुंचते हैं!



देशबंधु में 14 मार्च 2013 को प्रकाशित 









 

Friday, 8 March 2013

जनतांत्रिक संस्थाओं की साख का सवाल



भारत जैसे विशाल, विविधवर्णी, संघीय गणराज्य  का राजकाज चलाना कोई आसान काम नहीं है। देश में जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना का विकास हो रहा है, यह काम और भी कठिन होते जा रहा है। जितनी अपेक्षाएं हैं उतनी ही परेशानियां भी हैं और सरकार में जो भी रहे उसे एक अद्भुत संतुलन विकसित करने की आवश्यकता होती ही है। हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत आगे की सोचकर ऐसे प्रावधान किए थे, जिनके सही ढंग से पालन होने पर काफी कुछ ठीक-ठीक चल सकता है। इसके उपरांत भी समय-समय पर संविधान में नए-नए प्रावधान किए जाते रहे हैं ताकि सुशासन कायम करने में मदद मिल सके। देश में जनतंत्र के अनुरूप तीन बुनियादी संस्थाएं  हैं जिनका काम संविधान की अपेक्षा के अनुसार राजकाज चलाना है। इस व्यवस्था के अंतर्गत ही अनेक अन्य सहायक संस्थाओं या अभिकरणों की स्थापना की गई है जो अलग-अलग विषयों के कार्य संपादन के लिए जिम्मेदार हैं।

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका-  इन तीनों बुनियादी अंगों की स्वतंत्र एवं स्वायत्त सहायक संस्था या अभिकरण के रूप में चुनाव आयोग, सीएजी, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, आईबी, सीबीआई, प्रेस परिषद, अल्पसंख्यक आयोग, मानवाधिकार आयोग जैसी कितनी ही संस्थाएं कार्य कर रही हैं। ऐसा माना जाता है कि शासनतंत्र का अंग होने के बावजूद ये तमाम अभिकरण उससे अलग हैं तथा इनके कामकाज में भय या राग (फीयर ऑर फेवर) का कोई स्थान नहीं होता। ऐसा भी मानकर चला जाता है कि ये राजनीतिक आग्रहों से मुक्त होकर अपना कार्य संपादित करते हैं। यह तो हुई आदर्श स्थिति। परंतु देश की राजनीति में पिछले बीस साल में जो अस्थिरता आई है उसके चलते इन अभिकरणों की विश्वसनीयता अथवा उपयोगिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं।

देश में एक सीमित समय तक या चुनाव अवधि के  बीचएक राजनीतिक दल का वर्चस्व रहे, कम से कम लोकसभा में उसके पास पूर्ण बहुमत हो, तो राजनीति में अनावश्यक बवाल उठने की गुंजाइश कम होती है। बहुमत से एक निर्णय ले लिया सो ले लिया, फिर भले ही कोई निजी तौर पर उससे असहमति क्यों न रखता हो। किंतु 1989 के बाद दृश्य पूरी तरह परिवर्तित हो चुका है। इस नए माहौल में जनतंत्र के तीनों आधार स्तंभों के क्रियाकलाप भी आलोचना से नहीं बच पा रहे हैं और इनके जो सहायक अभिकरण हैं उन पर आरोप मढ़ देना तो जैसे बच्चों का खेल हो गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि देश की लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और वैधानिकता पर प्रश्न खड़े करने का जो राजनीतिक तमाशा इन दिनों चला हुआ है वह किसी के लिए भी श्रेयस्कर नहीं है।

कुछ माह पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात के रायपाल द्वारा मनोनीत लोकायुक्त की नियुक्ति को जब वैध ठहराते हुए इस प्रदेश के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की राय को जो वजन दिया तब उसे भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने उचित नहीं माना था। एक अन्य प्रसंग में थोड़े समय बाद सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भी आई कि राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त कोई सेवानिवृत्त जज ही होना चाहिए। इसके पहले चुनाव आयुक्त नवीन चावला की नियुक्ति पर सवाल उठाए गए तो प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू के बारे में लगातार असंतुलित टिप्पणियां की जा रही हैं। सीएजी विनोद राय तो विवादों में हैं ही। पूर्व में सेवानिवृत्त सीएजी टी.एन. चतुर्वेदी को यदि भाजपा ने रायसभा में भेज दिया तो कांग्रेस ने भी पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एम.एस. गिल को मंत्री बनाने से संकोच नहीं किया।

ऐसे तमाम प्रसंगों से क्या सिध्द होता है? अव्वल तो यही कि राजनीतिक दल इन संवैधानिक अभिकरणों की विश्वसनीयता को दांव पर लगाकर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। उन्हें स्वस्थ परंपराएं स्थापित करने का कोई ख्याल नहीं है। दूसरे यह कि इन पदों पर बैठे हुए लोग भी निजी लाभ-लोभ की भावना को छोड़ नहीं पा रहे हैं या जैसा कि जस्टिस काटजू के बारे में हमें लगता है कि वे हर समय वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने की धुन में लगे रहते हैं। अभिकरणों के बारे में रोज-रोज सवाल खड़े किए जाएंगे तो इनको स्थापित करने का मकसद कैसे पूरा होगा?

यह ऐसा बिन्दु है जिस पर सत्तापक्ष, विपक्ष और इन संस्थाओं के पीठासीन अधिकारी- सभी को  विचार मंथन करने की तत्काल आवश्यकता है। आज के राजनीतिक परिदृश्य में शायद यह पुनर्विचार करने का वक्त है कि इन संस्थाओं में नियुक्ति अथवा मनोनयन के आधार और प्रक्रिया क्या हाें। यह बात केन्द्रीय संस्थाओं पर भी लागू होती है और राज्य की संस्थाओं पर भी। अभी केंद्र स्तर पर नियुक्ति की जो प्रक्रिया है उसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, संबंधित विभाग का मंत्री, लोकसभा के अध्यक्ष अथवा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ऐसे कुछ शीर्षस्थ व्यक्तियों में से तीन या चार की चयन समिति बनाकर किसी को चुन लिया जाता है। इसी तरह के प्रावधान प्रदेश स्तर पर भी हैं। जाहिर तौर पर इस समिति में बहुमत सत्तापक्ष का ही होता है, उसका प्रस्तावित प्रत्याशी मनोनीत हो जाता है, जिसके चलते विपक्ष को बाद में आक्रमण करने का अवसर भी मिल जाता है। विनोद राय संभवत: एकमात्र ऐसे अपवाद हैं जिनका समर्थन विपक्ष ही कर रहा है।

यह तो तय है कि जब भी कोई नियुक्ति होगी उसकी पहल केन्द्र या राज्य में सत्तारूढ़ दल की ओर से याने प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की ओर से ही होगी। लेकिन इसके बाद प्रक्रिया को यादा व्यापक और यादा पारदर्शी बनाया जा सकता है। सत्ता पक्ष जिसे भी मनोनीत करना चाहे करे; इसके लिए संसद अथवा विधानसभा के स्तर पर एक चयन समिति गठित की जा सकती है, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के निर्वाचित सदस्यों का समावेश हो। सत्तापक्ष जिस भी व्यक्ति को चुनाव आयोग इत्यादि के लिए मनोनीत करे वह इस चयन समिति के सामने पेश हो और खुले परीक्षण-प्रतिपरीक्षण के बाद बहुमत से उसकी नियुक्ति हो। ऐसी व्यवस्था अमेरिका में है। एक अच्छी बात उनसे ले लें तो इसमें क्या हर्ज है। ऐसे व्यक्ति से फिर अपेक्षा की जा सकती है कि वह भय अथवा राग से मुक्त होकर अपना काम कर सकेगा। इसमें अगर बंदिश रहे कि ऐसे व्यक्ति को दुबारा कोई शासकीय पद नहीं मिलेगा तो इसके लिए भी वह व्यक्ति मानसिक रूप से तैयार हो।

हम समझते हैं कि अनावश्यक आरोप-प्रत्यारोपों से बचने और इन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इस तरह के नए उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।

देशबंधु में 7 मार्च 2013 को प्रकाशित