Wednesday, 16 April 2014

नक्सल समस्या : हल क्या है?


 
क्या सब कुछ इसी तरह चलता रहेगा? बस्तर के विकास की बातें होंगी, आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने का दावा होगा, उनके प्रगति करने के संदिग्ध प्रतीक नागर समाज के सामने पेश किए जाते रहेंगे, नक्सलवाद को जड़ मूल से उखाड़ फेंकने की बड़ी-बड़ी बातें होंगी, नक्सलियों द्वारा हिंसा का तांडव रुक-रुक कर चलता रहेगा, निर्दोष लोग मारे जाते रहेंगे-ऐसे लोग जिनके पास जीवनयापन के लिए और कोई अवसर नहीं है, कायराना हमलों की निंदा खोखली गूंज वाले बड़े शहरों में होती रहेगी, मरने वालों के परिवारों को मुआवजा मिल जाएगा, रायपुर की शहीद वाटिका में उनके नाम पर कुछ नए पौधे रोप दिए जाएंगे, अखबारों में चीखती हुई सुर्खियां छपती रहेंगी, संपादकगण अपने लेखों में बराए दस्तूर शीघ्र समाधान की वकालत करते रहेंगे, कुछ लोग मृतकों की याद में मोमबत्तियां जला देंगे, कुछ अधपढ़े लोग लेख लिखकर चिंता व्यक्त करेंगे, कुछ संस्थाएं सभा-सेमिनार कर लेंगी, कुछ दिन शांति का भ्रम बना रहेगा और फिर एक दिन धमाकों के साथ कुछ और निरीह लोग नक्सलियों की अविचारित हिंसा का शिकार हो जाएंगे।

पिछले शनिवार को बस्तर में नक्सलियों ने जो दो अलग-अलग सामूहिक हत्याकांड किए वे एकबारगी तो हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन इस तरह की नृशंस वारदातों को भुलाने में हम ज्यादा देर नहीं लगाते। क्या हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं? क्या हमने सरकार को ईश्वर मानकर सब कुछ उसके ही ऊपर छोड़ दिया है? क्या हमारी अपनी जीवन स्थितियां इतनी विकट हो गई हैं कि अब हमें सोचने का वक्त ही नहीं मिलता? क्या हम नियतिवादी हो गए हैं कि अब इस देश में कुछ हो ही नहीं सकता? क्या हमें किसी मसीहा की तलाश है या किसी जादूगर की जो अपनी छड़ी घुमाकर नरक को स्वर्ग में बदल देगा या फिर हमने एक समाज के रूप में विचार करने की, आत्ममंथन करने की, विमर्श की अपनी लंबी परंपरा को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है? लगता तो है कि ऐसा ही है तब फिर इससे बढ़कर दुर्भाग्यपूर्ण बात इस प्रदेश के लिए और कुछ नहीं हो सकती। जिस समाज ने विचारों से नाता तोड़ लिया है उससे ज्यादा गरीब और कौन होगा?

बस्तर में इस बार नक्सलियों ने एक नहीं, बल्कि दो भयानक घटनाओं को एक दिन एक साथ अंजाम दिया। इससे एक तो उन्होंने यह संदेश दिया है कि उनका आतंक कायम है और रहेगा। दूसरे उन्होंने उन सरकारी दावों को एक बार फिर झुठला दिया है कि हमारा सुरक्षातंत्र मजबूत और चौकस है। सवाल उठता है कि ऐसे वीभत्स कांडों से उन्हें क्या हासिल हुआ? यह सच्चाई तो नक्सली भी जानते हैं कि वे बस्तर में अनंतकाल तक अपनी लड़ाई जारी नहीं रख सकते। वे यह भी जानते होंगे कि जिस कथित माओवादी-लेनिनवादी राज्य व्यवस्था के प्रति उनकी प्रतिश्रुति है वह भारत में स्थापित कभी नहीं हो सकती। उनके सामने नेपाल का उदाहरण है जहां एक राजशाही के खिलाफ जीतने में वे सफल हुए, लेकिन अंतत: उन्हें जनतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होना पड़ा।  तो क्या फिर नक्सलवादी कुछ आदर्शवादी लोगों का ऐसा समूह है, जिसकी आंखों में बेहतर दुनिया के सपने पल रहे हैं या फिर वह एक ऐसा गिरोह है जो राजनीतिक शब्दावली की ओट में किन्हीं क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति में निमग्न हैं?
विश्व इतिहास बताता है कि बेहतर व्यवस्था कायम करने के लिए समय-समय पर जनक्रांतियां हुई हैं, लेकिन इनमें निरीह और निर्दोष जनता को जानबूझ कर कब निशाना बनाया गया? अमेरिका की युद्धप्रिय सत्ता ''कोलेटेरल डेमेज" का तर्क आगे बढ़ाए तो यह उसकी रणनीति और चरित्र का हिस्सा है, लेकिन क्या सर्वहारा के लिए लडऩे वाले भी इसी खोखले तर्क का सहारा लेंगे?बात साफ है। नक्सलबाड़ी से 1967 में जो आंदोलन शुरू हुआ था वह तो कब का समाप्त हो चुका उसके नेताओं को भी आगे चलकर समझ आया था कि उन्होंने हिंसा का जो रास्ता चुना था वह ठीक नहीं था। याने आज जो स्वयं को माओवादी कह रहे हैं, वे जनता की लड़ाई नहीं लड़ रहे बल्कि उनके मंसूबे कुछ और ही हैं!

बहरहाल, मेरा मानना है कि यदि बस्तर में नक्सली हिंसा समाप्त कर शांति स्थापना करना है तो उसके लिए नए सिरे से विचार करने की जरूरत होगी। अब घिसी-पिटी बातों और उपायों से काम नहीं बनेगा। इसमें नि:संदेह शासन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, लेकिन इसके साथ-साथ राजनैतिक दलों और अकादमिक संस्थाओं याने विश्वविद्यालयों आदि को भी आगे आना होगा। मुझे ध्यान आता है कि कुछ वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ विधानसभा में बंद दरवाजों के भीतर नक्सलवाद पर विचार किया गया था। इसमें पत्रकारों तक को आने की मनाही थी इसलिए कोई नहीं जानता कि ऐसे महत्वपूर्ण सत्र में क्या निर्णय लिए गए थे। शासकीय स्तर पर यदा-कदा सेमिनार भी हुए हैं, लेकिन वे भी एक तरह से बंद कमरे के भीतर ही। मुख्यमंत्री ने कई बार यह कहकर अपने सदाशय का परिचय दिया है कि वे नक्सलियों के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन यह बात कभी आगे नहीं बढ़ पाई।

मेरा मानना है कि प्रदेश के मुखिया होने के नाते मुख्यमंत्री को भी अपनी तरफ से अलग तरीके से एक उदार पहल करना चाहिए। अगर वे प्रदेश के सभी बड़े-छोटे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर मुक्तभाव से चर्चा करें तो इससे ऐसे सूत्र शायद मिलें जिनको पकड़कर आगे बढ़ा जा सके। दरअसल, मुख्यमंत्री की ओर से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की एक पूरी शृंखला आयोजित होनी चाहिए। वे हमारे इस सुझाव पर गौर करें कि प्रदेश के दो विश्वविद्यालयों- रायपुर और बस्तर में राष्ट्रीय स्तर पर दो-तीन दिन की संगोष्ठियां आयोजित हों जिनमें इस विषय से संबंध रखने वाले सभी अनुशासनों के जानकार लोग शामिल हों। इनमें प्रोफेसर, पत्रकार, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, आदिवासी, बुद्धिजीवी सभी हो सकते हैं।

इसी तरह उद्घाटन और समापन की व्यर्थ औपचारिकताओं को दरकिनार कर दिल्ली या रायपुर में भी ऐसा कोई सेमिनार हो सकता है जहां मुख्यमंत्री उन लोगों के साथ बैठें, जिनके पास बस्तर में शांति स्थापना के लिए प्रस्ताव और सुझाव हों। इस तरह की चर्चाओं के लाभ स्पष्ट हैं। सरकार के काम करने का अपना एक तौर-तरीका होता है। उसमें पूर्वाग्रह विकसित होने का डर हमेशा बना रहता है। तब एक ऐसा मोड़ आता है जब सत्तातंत्र के लिए अपनी ही बनाई दीवारों को तोड़कर आगे बढऩा लगभग रुक जाता है। जब खुली चर्चाएं होंगी तो नई बातें उठेंगी, और नए सिरे से समाधान ढूंढने की पहल होगी। प्रबंधशास्त्र में एक मुहावरा आजकल काफी प्रचलित है-''थिकिंग आउट ऑफ बॉक्सÓÓ याने बंधे-बंधाए दायरे से बाहर निकल कर सोचना। चूंकि यह मुद्दा सरकार से ताल्लुक रखता है इसलिए दायरे को तोडऩे की पहल सरकार के मुखिया को ही करना पड़ेगी। उनके मातहत इस काम के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

अगर ऐसा हो तो अच्छा ही होगा। इस बीच सरकार को कुछ बातों पर फौरी महत्व देना चाहिए। कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के बाद नक्सली होने के नाम पर जेल में बंद लोगों की प्रकरणों की समीक्षा के लिए सरकार ने एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। इस समिति के काम की क्या प्रगति है? छत्तीसगढ़ के जेलों में नक्सली होने के आरोप में कितने लोग कैद थे, उनमें से कितनों की रिहाई हुई है? हमें याद नहीं आता कि सरकार ने इस बारे में अब तक कोई रिपोर्ट जारी की हो। जबकि दूसरी ओर आए दिन नक्सली होने के नाम पर निर्दोष आदिवासियों को पकड़े जाने की खबरें आती रहती हैं। इस सिलसिले में सोनी सोढ़ी प्रकरण का जिक्र किया जा सकता है।

कुछ साल पहले एस्सार कंपनी द्वारा नक्सलियों को गुप्त तरीके से करोड़ों रुपया भेजने की खबर सामने आई थी। इसमें जिन लोगों के नाम सामने आए उनमें से कुछ गिरफ्तार हुए, कुछ को जमानत मिली और कुछ पर हाथ डाला ही नहीं गया। इसी मामले में सोनी सोढ़ी और उसके भतीजे लिंगाराम कोड़ापी को गिरफ्तार किया गया। सोनी सोढ़ी पर पुलिस ने क्या अत्याचार किए उसकी एक अलग कहानी है, लेकिन इस आदिवासी महिला को पति की मृत्यु हो जाने पर भी पैरोल पर नहीं छोड़ा गया, उसे उच्च न्यायालय तक से जमानत नहीं मिल पाई और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने उसे राहत दी। क्या उसकी यह कथा हमारी व्यवस्था के बारे में कोई सवाल खड़े नहीं करती?

सरकार को यह आकलन करने की भी आवश्यकता है कि बस्तर में पांचवी अनुसूची और पेसा कानून का क्रियान्वयन किस रूप में व किस सीमा तक हो रहा है। प्रदेश में यूं तो पंचायती राज व्यवस्था लागू है, लेकिन उसमें प्रशासन व सांसद-विधायकों का जो हस्तक्षेप है, वह किसी से छुपा नहीं है। बस्तर के विकास के लिए एक विशेष प्राधिकरण अलग से बना हुआ है, लेकिन जब पांचवी अनुसूची लागू है तो प्रदेश सरकार के सीधे नियंत्रण में ऐसे अभिकरण की जरूरत क्या सचमुच है? ऐसे और भी प्रश्न हैं। नक्सल समस्या के बारे में सरकार की भी कोई नीतिगत सोच अवश्य होगी, लेकिन उसके बारे में आदिवासी समाज कितना क्या जानता है? कुल मिलाकर हमारा आशय यही है कि नक्सल समस्या का हल तभी होगा जब समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर एक सुस्पष्ट नीति बनेगी और उस पर पारदर्शी तरीके से अमल होगा।

देशबन्धु में 17 अप्रैल 2014 को प्रकाशित


 

Wednesday, 9 April 2014

आम चुनाव और एन.जी.ओ.


यह
हर कोई जानता है कि जनतंत्र के तीन स्तंभ होते हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन तीनों की अपनी-अपनी स्वायत्त भूमिकाएं हैं और इनके बीच इस तरह से शक्ति संतुलन होने की अपेक्षा की जाती है कि जनतंत्र की इमारत में दरार न पड़ने पाए। इस व्यवस्था में एक नया आयाम पत्रकारिता के विकास के साथ आ जुड़ा और मीडिया को जनता के बीच चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता मिल गई। ऐसी सामान्य धारणा बन गई कि व्यवस्था के औपचारिक ढांचे में अगर कहीं कोई कमजोरी आएगी तो मीडिया एक सजग प्रहरी के तौर पर उसकी ओर ध्यान आकर्षित करेगा ताकि यथासमय उस कमजोरी को दूर किया जा सके। मैं समझता हूं कि पूरी दुनिया में एक दौर में अखबारों ने इस रोल को पूरी गंभीरता के साथ स्वीकार किया, आज की वास्तविकता भले ही कुछ और हो। यह याद रखना चाहिए कि औपचारिक रूप से स्थापित स्तंभों और जनमान्यता वाले चौथे स्तंभ के बीच कभी बहुत मधुर संबंध या नैकटय नहीं रहा और जब ऐसा होने लगा तो उसकी साख में कमी आने लगी।

इधर हमने देखा है कि इस संरचना में सिविल सोसायटी के नाम से एक पांचवां स्तंभ खड़ा हो गया है। इस नए स्तंभ के निर्माण के पीछे दो मुख्य कारण दिखाई देते हैं। एक तो जनतांत्रिक व्यवस्था की आधारभूत तासीर ही ऐसी है कि उसमें असहमति व मतवैभिन्न्य की गुंजाइश सदा बनी रहती है। दूसरे जनतंत्र का लक्ष्य लोककल्याण होता है और उसके लक्ष्यों को पाने के लिए प्रशासन की औपचारिक सरणियां कभी पर्याप्त नहीं होतीं याने कार्यक्रम लागू करने के लिए एक बंधे-बंधाएं ढांचे से बाहर निकलकर समाज के विभिन्न वर्गों का सहयोग लेना होता है। इस तरह सिविल सोसायटी में एक तरफ वे संस्थाएं हैं जो नीतियों और मुद्दों पर प्रश्न उठाती हैं, जनतांत्रिक सरकार को कटघरे में खडा करती हैं व उससे जवाबदेही की मांग करती हैं। दूसरी तरफ वे संस्थाएं हैं, जो कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू करने में व्यवस्था के साथ सहयोग करती हैं। इन दोनों श्रेणियों के बीच कोई अनिवार्य विरोधाभास नहीं है बल्कि ऐसी अनेक संस्थाएं हैं जो दोनों मोर्चों पर समान रूप से काम करती हैं।

यूं तो सिविल सोसायटी संज्ञा का दायरा बहुत बड़ा है। उसमें छात्रसंघ, ट्रेड यूनियन, चेम्बर ऑफ कामर्स, महिला मंडल- सब आ जाते हैं, लेकिन अभी हम सिविल सोसायटी के उस बड़े और प्रमुख अंग की बात करने जा रहे हैं जिसे एन.जी.ओ. (गैर सरकारी संगठन) कहा जाता है। इसका रूप इतना वृहद हो चुका है कि अब उसे सेक्टर कहा जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर विभिन्न देशों की सरकारें इस क्षेत्र को मान्यता देती हैं व उनके साथ संवाद करती हैं। ऐसा माना जाता है कि ये गैर सरकारी संगठन जमीनी स्तर पर काम करते हैं, और उनके साथ सलाह-मशविरा करते रहने से लोकहितैषी नीतियों व कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिल सकती है। कुल मिला कर एन.जी.ओ. सेक्टर को जनतंत्र के पांचवां स्तंभ के रूप में मान्यता मिल गई है।

भारत जैसे देश में जहां अभी समग्र व समावेशी विकास के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है स्वाभाविक रूप से एन.जी.ओ. सेक्टर व्यापक स्तर पर अपनी भूमिका निभा रहा है। यह दिलचस्प तथ्य है कि देश के अनेकानेक राजनेताओं ने, भले ही वे किसी भी पार्टी से संबंध रखते हाें, अपनी पहल पर ऐसे कई संगठन स्थापित कर लिए हैं।  इस मामले में सरकारी अधिकारी भी पीछे नहीं हैं। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि अपने एन.जी.ओ. के माध्यम से ये लोग ''इस हाथ दे उस हाथ ले'' की उक्ति को चरितार्थ कर रहे हों। हम ऐसे कई फर्जी एन.जी.ओ. के बारे में जानते हैं जो सत्ताधीशों द्वारा स्थापित किए गए हैं और  सरकार से किसी न किसी कार्यक्रम के नाम पर भरपूर मदद ले लेते हैं। यह एक अलग किस्सा है। अभी तो हमारी दिलचस्पी यह जानने में है कि व्यवस्था के औपचारिक ढांचे से बाहर पांचवें खंभे के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले एन.जी.ओ. कार्यकर्ता एकाएक पहला खंभा बनने के लिए बेताब क्यों हो उठे हैं याने वे चुनावी मैदान में क्यों कूद पड़े हैं?

एन.जी.ओ. के साथी भी इस देश के ही नागरिक हैं और उन्हें वही सारे अधिकार उपलब्ध हैं जो आपको-हमको हैं, इसलिए उनके निर्णय पर प्रश्नचिन्ह तो नहीं लगा सकते लेकिन यह जिज्ञासा मन में अवश्य उठती है कि इनकी सोच में ऐसा क्रांतिकारी परिवर्तन क्यों आ गया है! एन.जी.ओ. सेक्टर के एक प्रमुख अभिनेता अरविंद केजरीवाल तो अब पूरी तरह से राजनेता बन ही चुके हैं, लेकिन उनके समानांतर चलने वाले या उनका अनुसरण करने वाले एन.जी.ओ. नेताओं की अब कोई कमी नहीं दिखाई देती। उदाहरण के लिए एक नाम है- जयप्रकाश नारायण का। आंध्रनिवासी श्री नारायण पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी हैं। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर वे पिछले कई वर्षों से एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने लोकसत्ता नाम से एक संस्था बनाई जिसके मंच से वे चुनाव सुधाराें की वकालत करते रहे हैं।

श्री नारायण ने अब लोकसत्ता को एक राजनैतिक पार्टी में तब्दील कर दिया है। वे पहिले तो  भाजपा के साथ गठजोड़ करने की जुगत भिड़ाते रहे। बात नहीं बनी तो अब अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ रहे हैं। मेधा पाटकर का जिक्र मैंने पिछले हफ्ते किया ही था। उनके साथ 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' में बहुत से जुझारू कार्यकर्ता भी विभिन्न स्थानों से चुनाव लड़ रहे हैं। इस तरह एन.जी.ओ. क्षेत्र में काम करने वाले ऐसे अनेक जन हैं जो राजनीति के औपचारिक मंच पर अपनी भूमिका तलाश रहे हैं।  इनमें से किसे कितनी सफलता मिलती है यह तो आगे चलकर पता लगेगा, लेकिन यह बात कम से कम मेरी समझ में नहीं आती कि इनका राजनीति में आने का मकसद क्या है।

एक सरल उत्तर शायद यह हो सकता है कि वे जिन मूल्यों और आदर्शों के लिए अब तक संघर्षरत रहे उन्हें प्रभावी ढंग से अमल में लाने के लिए लोकसभा में बैठना जरूरी है। अगर ऐसा है तो मैं कहूंगा कि उन्होंने अपने जीवन का एक लम्बा समय यूं ही जाया किया।  मेधा पाटकर, अरविंद केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण- ये सब नेतृत्व क्षमता के धनी लोग हैं बल्कि इनमें नेतृत्व करने की नैसर्गिक प्रतिभा है। ये अगर बीस या पच्चीस साल पहले चुनाव लड़कर लोकसभा में आए होते तो बड़े बांधों का विरोध, सूचना का अधिकार, चुनाव सुधार जैसे मुद्दाें पर अपने तर्क प्रभावी ढंग से सदन में रख सकते थे और उससे शायद कुछ निश्चित नतीजे भी मिलते। लेकिन हो सकता है कि यह मेरी खामख्याली हो!

मेरे मन में एक और प्रश्न उठता है कि आज देश का जो राजनैतिक वातावरण है उसमें ये कहां हैं? आम चुनावों के बाद जिस भी पार्टी की सरकार बनेगी या जो पार्टी किसी संभावित गठजोड़ में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी वह अपनी घोषित नीतियों और कार्यक्रमों के अनुसार सरकार चलाना चाहेगी। स्पष्ट है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के आर्थिक कार्यक्रम लगभग एक जैसे हैं। यह उम्मीद फिलहाल दोनों से नहीं करना चाहिए कि वे वैश्विक पूंजीवाद के एजेंडे से हटकर काम कर पाएंगे। इन दोनों पार्टियों में अगर कोई फर्क है तो यह कि कांग्रेस बहुलतावाद में अनिवार्य रूप से विश्वास रखती है जबकि भाजपा बहुसंख्यकतावाद में। लेकिन क्या एन.जी.ओ. से जीतकर आने वालों की संख्या इतनी होगी कि वे अपने बलबूते सरकार बना सकें या गठबंधन को प्रभावित कर सकें? अगर ऐसा न हुआ तो क्या वे दो बड़ी पार्टियों के बीच कोई नया रास्ता निकालेंगे या फिर किसी एक तरफ झुक जाएंगे? उसका दीर्घकालीन परिणाम देश की राजनीति में किस रूप में सामने आएगा?
देशबंधु में 10 अप्रैल  2014 को प्रकाशित
 

Wednesday, 2 April 2014

'आप' की पॉलिटिक्स क्या है?




हिन्दी
साहित्य में जिनकी थोड़ी बहुत भी रुचि है वे जानते हैं कि मुक्तिबोधजी अपने से पहली बार मिलने वाले हर व्यक्ति से पूछते थे- ''पार्टनर, आपकी पॉलिटिक्स क्या है?'' आज यही सवाल अरविंद केजरीवाल और उनकी बनाई आम आदमी पार्टी से पूछने का मन हो रहा है। हम जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा, भाकपा, माकपा, बसपा इत्यादि दलों की पॉलिटिक्स क्या है। हमें यह भी पता है कि इस चुनावी मौसम में जो लोग अभूतपूर्व तेजी के साथ दलबदल में लगे हैं उनके लिए राजनीति क्या मायने रखती है। कांग्रेस और भाजपा अपनी किन नीतियों पर दृढ़ हैं और किन पर समझौता अथवा समर्पण कर चुके हैं यह भी अध्येता जान-समझ रहे हैं। क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक धरती क्या है व उनकी महत्वाकांक्षाओं का विस्तार कहां तक है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। हमें चेतन भगत, एम.जे. अकबर और रामचंद्र गुहा जैसे चर्चित बुध्दिजीवियों की राजनीति के बारे में भी कुछ अनुमान तो है ही, लेकिन इस प्रश्न का समुचित उत्तर अभी ढूंढा ही जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक दिशा क्या है!

'आप' ने दिल्ली की सात सीटों में से एक (पूर्वी दिल्ली) पर राजमोहन गांधी को अपना उम्मीदवार बनाया है। श्री गांधी को हम देश के अग्रणी बुध्दिजीवी के रूप में जानते हैं। यह सबको पता है वे महात्मा गांधी के पौत्र हैं। उन्होंने अपने दादा पर ''मोहनदास'' शीर्षक से जो जीवनी लिखी वह एक अनुपम कृति है। इसे लिखने में श्री गांधी ने जिस वस्तुपरकता व तटस्थता का परिचय दिया है उसकी कोई मिसाल मुझे तो याद नहीं आती। उनकी अन्य पुस्तकें भी भारत और उपमहाद्वीप के राजनैतिक इतिहास को समझने के लिए जैसे अनिवार्य है। राजमोहनजी की राजनीति में दिलचस्पी प्रारंभ से रही है। वे एक बार जबलपुर और फिर रायबरेली से लोकसभा चुनाव हार भी चुके हैं। इसके बाद वे लगभग पूरा समय पुस्तक लेखन को ही देते रहे। वे 78 वर्ष की परिपक्व आयु में चुनावी राजनीति में लौटेंगे इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी, लेकिन वे मैदान में हैं  यह एक सच्चाई है।  मैं समझना चाहता हूं कि 'आप'  के एजेंडा में ऐसी कौन सी बात थी जिसने उन्हें इस हद तक आकर्षित किया!

उधर मुंबई उत्तर-पूर्व से मेधा पाटकर 'आप' की ओर से मैदान में हैं। मेधाजी ने अपना पूरा जीवन जनसंघर्षों में बिता दिया। 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' में उन्होंने जो भूमिका निभाई उसने इस देश में अनगिन लोगों को अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बड़े बांधों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, विस्थापितों के हक के लिए बरसों बरस तकलीफें उठाईं, कितनी बार धरनों पर बैठीं, कितनी बार जेल गईं- इसका कोई हिसाब ही नहीं। वे नर्मदा पर बनने वाले बड़े बांधों को तो नहीं रोक सकीं, लेकिन यह संदेश तो उन्होंने जन-जन तक पहुंचाया ही कि बिना लड़ाई के हक नहीं मिला करते। कहने का आशय यह कि स्थापित राजनीति से हटकर उन्होंने समानान्तर राजनीति की और उसकी बदौलत जनता का, विशेषकर वंचित समाजों का प्यार और विश्वास हासिल किया। इसके बाद ऐसी क्या वजह थी जिसके चलते वे चुनाव के मैदान में उतरीं? इसके पहले पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की राजनीति को समर्थन देने का परिणाम क्या निकला, इस पर गौर करने का मौका शायद उन्हें नहीं मिला!

आप कहेंगे कि अगर ऐसे अच्छे लोग राजनीति में आते हैं तो इसमें गलत क्या है। मेरा कहना है कि गलत कुछ नहीं है, लेकिन यदि राजमोहनजी और मेधाजी किन्हीं आदर्शों को पूरा करने की इच्छा लेकर चुनावी राजनीति में आए हैं तो आगे चलकर उन्हें कहीं निराशा न हो! एक तरफ ऐसे लोग हैं तो दूसरी तरफ मीरा सान्याल व कुमार विश्वास जैसे भी  'आप' के परचम तले चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मीरा सान्याल ने मुंबई दक्षिण से ही 2009 में चुनाव लड़ा था और वे हार गई थीं। वे जिस रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की भारत में मुख्य अधिकारी थीं, वह बैंक उन दिनों विवादों के घेरे में था। जो विश्वव्यापी मंदी आई थी उसमें इस बैंक की भी भूमिका बताई गई थी। सुश्री सान्याल चुनाव लड़ें उसमें हमें क्या आपत्ति होने चली, लेकिन यह शंका तो मन में उठती ही है कि मेधा पाटकर और मीरा सान्याल दोनों एक मंच पर क्यों और कैसे हैं, जबकि उनका राजनीतिक दर्शन जुदा-जुदा है।

इसी तरह राजमोहन गांधी के साथ-साथ कुमार विश्वास को देखकर कुछ अचरज होता है। यह मेरा सौभाग्य या दुर्भाग्य था कि रायपुर के एक कार्यक्रम में कुछ माह पूर्व मुझे श्री विश्वास का प्रवचन व तथाकथित कविताएं सुनने मिलीं। मुझे उनके विचारों में गंभीरता नहीं, बल्कि उथलापन नज़र आया। उन्होंने जो चुटकुलेबाजी की उससे पता चला कि यह व्यक्ति नस्लवादी, पुरुषसत्तावादी, किसी हद तक यथास्थितिवादी होने के साथ स्त्री-विरोधी है और अहिंसा में विश्वास नहीं रखता। अब इस विरोधाभास का समाधान क्या है कि एक तरफ राजमोहन गांधी हैं, जो ताउम्र अहिंसा और समन्वय की बात करते रहे तथा दूसरी तरफ कुमार विश्वास हैं जो पड़ोसी देश को हथियारों का डर दिखा रहे हैं। सवाल उठता है कि श्री केजरीवाल व उनकी पार्टी के अन्य कर्णधार इस तरह के समीकरण कुछ सोच-समझकर बैठा रहे हैं, क्या इसके पीछे कोई रणनीति है या फिर सब कुछ अनजाने में होता चल रहा है? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ही इनका एकमात्र मकसद है या ये इसके परे कुछ और हासिल करना चाहते हैं?

अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने मिलकर तीन साल पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। उन्होंने दावा किया था कि यदि उनके बताए अनुसार जनलोकपाल नामक संस्था का ढांचा खड़ा दिया जाए तो देश से भ्रष्टाचार जड़मूल से समाप्त हो जाएगा। उस समय मीडिया ने इनके आंदोलन को 24x7 कवरेज दिया था और बड़ी संख्या में जनसमर्थन मिला था। इसमें नौजवान ज्यादा थे। लेकिन फिर क्या हुआ? आज अन्ना हजारे के बारे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि वे भाजपा का एजेंडा बढ़ाने का काम कर रहे हैं। उधर केजरीवाल एक ऐसे सिध्दहस्त कलाकार के रूप में आए जो कभी आंदोलनकारी की भूमिका निभाता है, तो कभी राजनेता की। बल्कि ये दोनों भूमिकाएं इस तरह गड्ड-मड्ड हो गई हैं कि समझना कठिन हो जाता है कि श्री केजरीवाल आखिरकार किस रास्ते पर चल रहे हैं। वे जब भ्रष्टाचार के खिलाफ बात करते हैं, अंबानी-अडानी पर सीधे-सीधे आरोप लगाते हैं, तो सुनकर अच्छा लगता है, लेकिन इन पर अंकुश लगाने के लिए उनके पास क्या योजना है इसका कोई जवाब नहीं मिलता।

यदि आम आदमी पार्टी के रूप में भारतीय राजनीति में एक तीसरी शक्ति का उदय होता है अथवा वैकल्पिक राजनीति का नया मंच बनता है, तो यह अच्छा ही होगा। लेकिन इसके लिए अरविंद केजरीवाल को अपनी नीतियों का खुलासा तो करना ही होगा। सिर्फ भ्रष्टाचार-विरोधी जुमले उछालने से दूर तक राजनीति नहीं की जा सकती, ऐसा हमारा मानना है। श्री केजरीवाल यदि विभिन्न मतों के प्रबुध्दजनों को एक मंच पर ला सकते हैं तो हम इसका भी स्वागत करेंगे, किन्तु क्या ये सब मिलकर देश को आगे ले जाने के लिए कोई नक्शा दे सकते हैं? दूसरे शब्दों में कहें तो विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इन गुणीजनों के पास क्या  कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम है या ये भी नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की तर्ज पर सिर्फ भावनाएं उभारने का खेल खेल रहे हैं?

श्री केजरीवाल को दिल्ली में एक मौका मिला था कि वे अपने घोषित संकल्पों के अनुरूप स्वच्छ व पारदर्शी सरकार चला सकें, लेकिन उन्होंने स्वयं ऐसी परिस्थितियां निर्मित कीं कि वे इस जिम्मेदारी से पलायन कर सकें। हम उसके विस्तार में फिलहाल नहीं जाना चाहते, लेकिन श्री केजरीवाल से यह अवश्य पूछना चाहते हैं कि यदि हम 'आप' का समर्थन करें तो किस बिना पर? कोई भी सरकार हो, भ्रष्टाचार रोकना उसके अनेक कामों में से एक काम हो सकता है पर मुद्दे इसके अलावा और भी बहुत से हैं- आपकी आर्थिक नीति क्या होगी, विदेश नीति क्या होगी, रक्षा नीति क्या होगी, लैंगिक नीति क्या होगी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आप क्या करेंगे इत्यादि। ढेरों प्रश्नों पर क्या आप अपने बीच एक राय कायम कर सकेंगे? जब मीरा सान्याल बड़े बांधों के लिए ऋण देंगी और मेधा पाटकर उसका विरोध करेंगी तब क्या होगा? जब कुमार विश्वास पाकिस्तान पर आक्रमण करने की वकालत करेंगे और राजमोहन गांधी पड़ोसी मुल्क के साथ मैत्री की बात करेंगे तब क्या होगा? हम समझते हैं कि 'आप' के समर्थकों को अपनी पार्टी से इन सवालों के जवाब मांगना चाहिए।

'आप' की पॉलिटिक्स का जहां तक सवाल है, मेरा अनुमान है कि यह उन लोगों का मंच है जो नेहरूवादी नीतियों के घोर विरोधी हैं, और अपने-अपने कारणों से साथ आ गए हैं, ऊपरी तौर पर भले ही वे कुछ भी दावा करें।

 
देशबंधु में 03 अप्रैल 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 26 March 2014

चुनाव 2014 : कुछ नजारे



हम
भारत के लोगों की राजनीति में दिलचस्पी जगजाहिर है। इसके लिए सबसे पहले तो हमें महात्मा गांधी का आभारी होना चाहिए जो राजनीति को सभाकक्षों में होने वाली बौध्दिक बहसों से निकालकर सड़कों और चौराहों तक लाए, कुछ इस तरह कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे और चूल्हा-चौके तक सिमटे रहने वाली घरेलू औरतें भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने सामने आ गईं। राजनीति को जन-जन तक लाने की दिशा में दूसरी बड़ी पहल पंडित नेहरू के नेतृत्व में हुई जब नवस्वतंत्र देश ने अपने संविधान में वयस्क मताधिकार की अवधारणा स्वीकार की। आज जब सोलहवीं लोकसभा के चुनावों की प्रक्रिया चल रही है तब इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जान लेने में कोई हर्ज नहीं है। यह कहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि पिछले सड़सठ साल में राजनीति हमारे सामाजिक जीवन में गहरे जाकर रच-बस गई है। एक आम हिन्दुस्तानी हर समय राजनीति पर बहस के लिए तैयार रहता है। यह तब जबकि समाज में ऐसे भी लोग हैं जो राजनीति को अक्सर कोसते हुए नज़र आते हैं और राजनेताओं का जहां तक सवाल है उनकी लानत-मलामत करने में हम सबको ही आनंद आता है।

एक जनतांत्रिक समाज में राजनीति को लेकर उत्सुकता अथवा उत्साह स्वागतयोग्य है। आखिरकार देश और समाज की बेहतरी के लिए जो भी फैसले लिए जाने हैं, जो कार्यक्रम बनना हैं और जो उन पर अमल होना है वह सब राजनीति के बिना कहां संभव है?  हम जानते हैं कि आम चुनावों के वक्त इस बारे में हमारा उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। सबकी अपनी-अपनी सोच और अपना-अपना नजरिया है कि देश में कैसी सरकार बनना चाहिए। इस लिहाज से अभी के चुनाव पिछले पन्द्रह चुनावों के मुकाबले कहीं ज्यादा दिलचस्प होने जा रहे हैं। इसके बहुत से कारण हैं। एक तो यही कि चुनावी मैदान में अभी जो अफरा-तफरी मची है वैसे पहले कभी देखने नहीं मिली। आप चाहें तो इस माहौल की तुलना मौसम के साथ कर सकते हैं। दिल्ली हो या रायपुर, भोपाल हो या हैदराबाद, कब बारिश हो जाएगी, कब धूप निकल आएगी, कब पारा चढ़ जाएगा और कब बर्फ गिरने लगेगी, कुछ पता ही नहीं चलता। इस अनिश्चितता से चुनावों का मंजर और दिलचस्प हो गया है।

इस बार एक बिल्कुल नया तथ्य भी चुनावों के साथ जुड़ गया है। मुझे यहां 1960 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का ध्यान आता है। अमेरिकी इतिहास में वह पहला मौका था जब राष्ट्रपति चुनावों के दो प्रमुख उम्मीदवारों के बीच टीवी पर आमने-सामने बहस हुई थी। अनेक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर टीवी न होता तो अनुभवी निक्सन के मुकाबले सुदर्शन युवा जॉन एफ. कैनेडी  चुनाव न जीत पाते। अब तो अमेरिका में बिना टीवी बहसों के राष्ट्रपति चुनाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसका सीधा-सीधा परिणाम यह हुआ है कि राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अनुभव और ज्ञान में भले ही कमतर हो, उसे चपल और वाकपटु अवश्य होना चाहिए। उम्मीदवार जितना युवा और स्मार्ट हो उतना ही अच्छा। ओबामा की विजय का बड़ा कारण यहां ढूंढा जा सकता है। भारत में भी अब कुछ ऐसी ही स्थिति निर्मित होती दिख रही है। यद्यपि यहां एक फर्क है। भारत के टीवी चैनवों ने काफी हद तक निष्पक्षता को ताक पर रख दिया है।

इस बार चुनाव प्रचार का जो रंग-ढंग है उसे देखकर लगता है कि भारत में चुनाव प्रणाली को ही बदलने की साजिश चल रही है। चूंकि किसी भी पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिलने की अगले कुछ चुनावों तक कोई गुंजाइश नहीं है इसलिए संविधान संशोधन होना फिलहाल मुमकिन दिखाई नहीं देता, किन्तु ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि देश में अब पार्टी नहीं व्यक्ति के आधार पर चुनाव होना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि सत्ता प्रतिष्ठान का एक धड़ा हमारी जानी-परखी संसदीय व्यवस्था को तहस-नहस करने पर तुला हुआ है। इसके चलते एक विरोधाभास उत्पन्न हो गया है। संविधान कहता है कि चुनावों के बाद सदन में बहुमत दल का नेता प्रधानमंत्री बनेगा, लेकिन यहां तो पार्टी ने हथियार डाल दिए हैं और एक व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित हो गया है। याने चुनावों के बाद संसदीय दल को कहीं और लिए गए निर्णय पर अपनी रजामंदी देने विवश होना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में यह संसद की सर्वोच्चता का अपमान होगा।

इस बार का एक नया दृश्य राजनीतिक दलों के बीच नेताओं के आवागमन का है। यूं तो 1967 में ही दल-बदल का खेल शुरू हो गया था, लेकिन अब उसने विकराल रूप ग्रहण कर लिया है। ऊपरी तौर से देखने में लगता है कि इस खेल में कांग्रेस को काफी नुकसान हुआ है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा या अन्य किसी दल में शामिल होने वालों की संख्या कहीं अधिक है, लेकिन गौर से देखें तो भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले कम नुकसान नहीं हुआ है।  भाजपा में शीर्ष स्तर पर जिस तरह से असंतोष मुखर हुआ है वैसी नौबत कांग्रेस में नहीं आई। सर्वश्री अडवानी, जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज का असंतोष आगे चलकर भाजपा को अपनी रीति-नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है!

अब की दफे क्षेत्रीय दलों के तेवर भी देखने लायक हैं। जिस दिन एच.डी. देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे उसी दिन से राजनीति में छोटी सी छोटी हैसियत रखने वाला व्यक्ति भी अपने आपको प्रधानमंत्री पद का काबिल समझने लगा है। आज प्रकाशसिंह बादल व उध्दव ठाकरे को छोड़कर हर क्षेत्रीय नेता सोच रहा है कि वह जोड़-तोड़ कर प्रधानमंत्री बन सकता है। टी.आर.एस. के नेता चन्द्रशेखर राव कांग्रेस से किए गए वायदे से पलट गए कि जरूरत पड़ेगी तो एनडीए में शामिल हो जाएंगे। मायावती, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, जयललिता व चन्द्राबाबू नायडू- इन सबको भाजपा से कोई परहेज नहीं है; उसके साथ पहले रह चुके हैं। अभी उन्हें सिर्फ अल्पसंख्यक वोटों का डर सता रहा है। चुनावों के बाद मतदाताओं को कौन पूछता है?

हमने अभी तक वामदलों की बात नहीं की। सीपीआईएम की अगुवाई में वामदलों ने तीन दशक तक अत्यन्त सफलतापूर्वक एक गठबंधन संचालित किया। इसका श्रेय प्रमुख रूप से प्रमोद दासगुप्ता और ज्योति बसु की जोड़ी को दिया जाना चाहिए।  ऐसा नहीं कि वाममोर्चे में कभी मतभेद न रहे हों, लेकिन जब भी कोई विवाद हुए उन्हें आपसी बातचीत  से सुलझा लिया गया। एक उल्लेखनीय मौका 2004 में आया जब सीपीआई यूपीए सरकार में शामिल होने के लिए तैयार थी, लेकिन सीपीआईएम की अलग राय देखकर उसने वह मौका वाम एकता की खातिर छोड़ दिया। इधर कुछ समय से लगने लगा है कि वामदल अतीत के बंदी होकर रह गए हैं और वर्तमान समय के संकेतों को समझने से इंकार कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण अभी हाल में तीसरे मोर्चे के लिए की गई उठापटक में देखने मिला।

वरिष्ठ नेता व भाकपा के पूर्व महासचिव ए.बी. वर्ध्दन ने करण थापर को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट कहा कि चुनाव पूर्व तीसरे मोर्चे के गठन का प्रस्ताव समयानुकूल नहीं था और इसीलिए बनने के पहले ही मोर्चा बिखर गया। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि इसके लिए माकपा का नेतृत्व जिम्मेदार है। बाद में माकपा के नेताओं ने भी स्वीकार किया कि चुनावों के पूर्व यह पहल नहीं की जाना चाहिए थी।  जो भी हो, वामदलों को यह देखना आवश्यक है कि देश के राजनीति में वे किस तरह से प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया के तमाम देशों की तरह नवपूंजीवादी शक्तियां यहां भी अपने पांव पसार चुकी हैं। उससे लड़ने के लिए नए विचारों की, नई ऊर्जा, नए प्रयत्न और नए सिरे से जनजागृति की आवश्यकता है। अब पुराने औजारों  से काम नहीं चलेगा।

कुछ यही बात भारत के उदारवादी बुध्दिजीवी तबके पर भी लागू होती है। इस वर्ग में बड़े-बडे नामचीन लोग शामिल हैं। उनके विद्वतापूर्ण लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं, उनकी लिखी किताबों का भी खूब जिक्र होता है, वे टीवी बहसों में भी भाग लेते हैं। सबके सब अंग्रेजी में। हिन्दी, मराठी, बंगला, तेलगू, तमिल आदि देशी भाषाओं से इनका कोई सरोकार नहीं है। ये एक तरफ देश में फासीवाद के खतरे की बात करते हैं और फिर अपने अध्ययन कक्ष में सिर गड़ाकर बैठ जाते हैं शुतुरमुर्ग की तरह। शायद इन्हें पक्का पता है कि भारत में फासीवाद नहीं आएगा। हो सकता है कि वे सही सोच रहे हों!

 
देशबंधु में 27  अप्रैल 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 19 March 2014

भाजपा का भविष्य



भारतीय
जनता पार्टी के कार्यकर्ता व समर्थक अतिउत्साहित हैं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में उनकी सरकार बनने जा रही है। इन दिनों मीडिया ने जैसी हवा बांध रखी है उसे देखते हुए इस उत्साह को गलत नहीं कहा जा सकता किन्तु हमारे विचार में भाजपाई एक बड़े सवाल की अनदेखी कर रहे हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बन भी गई तो एक राजनैतिक दल के रूप में भाजपा का भविष्य क्या होगा? हमारे सामने कुछ तस्वीरें हैं। 16 मार्च को होली के दिन भाजपा के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवानी एक तरह से कोप भवन में बैठे रहे। वे उस दिन कुछ गिने-चुने लोगों से ही मिले और मीडिया को उनके दरवाजे से भीतर घुसने की मनाही कर दी गई थी। जबकि इसके पहले तक आडवानी जी बहुत उल्लास के साथ रंगों के त्योहार का आनंद उठाया करते थे। भाजपा के दूसरे ज्येष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी की नाराजगी भी छिपाए नहीं छिप रही है। उन्होंने पिछले कुछ दिनों में पल-पल संदेश दिए कि वे वाराणसी की सीट नहीं छोड़ना चाहते, लेकिन उनकी एक न चली। यही नहीं, श्री आडवानी की टिकट भी इस कॉलम के लिखे जाने तक पक्की नहीं की गई है।

जो पार्टी देश की सत्ता हासिल करने के लिए इतनी बेचैन है उसमें बड़े नेताओं के साथ इस तरह का बर्ताव आश्चर्यजनक है। ये सिर्फ नाम से ही बड़े नेता नहीं हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन होम कर दिया। इस संदर्भ में सुषमा स्वराज का भी ध्यान आता है। उन्होंने कर्नाटक के बागी नेता श्रीरामुलु को दुबारा पार्टी में लेने का सार्वजनिक तौर से पुरजोर विरोध किया, लेकिन उनकी बात भी नहीं सुनी गई। कलराज मिश्र, लालजी टंडन, नवजोत सिंह सिध्दू एवं गिरिराज सिंह इत्यादि कुछ ऐसे नाम हैं जो अपनी पसंदीदा सीट हासिल नहीं कर सके। कुल मिलाकर ऐसा दृश्य है कि एक तरफ श्री आडवानी, श्री जोशी और श्रीमती स्वराज जैसे कद्दावर नेताओं को नीचा दिखलाया जा रहा है और दूसरी तरफ अमित शाह, बी.एस. येदियुरप्पा, कल्याण सिंह व श्रीरामुलु जैसे विवादित व्यक्तियों का पार्टी बांहें फैलाकर स्वागत कर रही है, गले लगा रही है।

इस दृश्य को देखकर सहज ही प्रश्न उठता है कि यदि श्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन सकी तो भारतीय जनता पार्टी में संगठन और विचार के स्तर पर किस तरह के परिवर्तन आएंगे। क्या ये बदलाव उसी तरह के होंगे जिसकी कल्पना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने की है? अभी दबी जबान में जो बातें सुनने मिल रही हैं उनके अनुसार संघ में एक बड़ा वर्ग इस घटनाचक्र से खिन्न और विचलित है। यह संभवत: मोहन भागवत की सोच रही होगी कि एक दृढ़ संकल्पित नेतृत्व के बिना भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का स्वप्न पूरा नहीं हो सकेगा! हो सकता है उनके मन में यह विचार भी रहा हो कि जिस लक्ष्य को पाने में उनके पूर्ववर्ती असफल रहे उसे वे पूरा कर के दिखाएंगे और इसी हिसाब से उन्होंने अपनी रणनीति तैयार की हो! चूंकि संघ ''एकचालकानुवर्ती'' के सिध्दांत पर काम करता है याने सरसंघचालक ने जो तय कर दिया वह पत्थर की लकीर इसलिए संघ के भीतर किसी ने उनका विरोध तो नहीं किया, लेकिन अब एक कसमसाहट नज़र आ रही है।

यह हम जानते हैं कि संघ परिवार (जिसमें विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल भी शामिल हैं) के कार्यकर्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की उपस्थिति में उनकी मौन स्वीकृति के साथ 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराने का जघन्य कृत्य किया था। इसके अलावा अडवानीजी की रथयात्रा, मुरली मनोहर जोशी की श्रीनगर में राष्ट्रध्वज फहराने की यात्रा, एकात्मकता यात्रा, श्रीरामशिला के नाम से ईंटें  एकत्र करने का अभियान- जैसे उपक्रमों के परिणामस्वरूप भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक लाभ तो हुआ, लेकिन वह कभी भी इतना पर्याप्त नहीं था कि भाजपा अपने बलबूते केन्द्र में सत्ता हासिल कर सके। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा को सत्तारूढ़ होने का मौका अवश्य मिला, किन्तु इसके लिए उन्हें बहुत सारे छोटे दलों का समर्थन हासिल करने के साथ-साथ अपने घोषणा पत्र के तीन मुख्य बिन्दुओं को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।

श्री वाजपेयी अनुभवी राजनेता थे और अच्छी तरह से जानते थे कि भारत जैसे देश की सरकार चलाने के लिए कट्टरता छोड़कर लचीला रुख अपनाना आवश्यक है। अपनी इस सूझबूझ के कारण ही वे भाजपा के नेतृत्व में सरकार चलाने में समर्थ हो सके। श्री आडवानी जिन्हें वाजपेयी जी के मुकाबले एक कट्टरपंथी नेता माना जाता था उन्हें भी आगे चलकर भान हुआ कि वे जब तक उदारवादी रवैय्या नहीं अपनाएंगे या वैसा अभिनय नहीं करेंगे वे प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे। उन्होंने अपनी इस नई सोच का परिचय जिन्ना की मजार पर जाकर श्रध्दांजलि देने जैसे काम से दिया। संघ को उनका यह नया रूप पसंद नहीं आया और परिणामस्वरूप उन्हें पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद पार्टी ने अपना दांव नितिन गडकरी पर लगाया। श्री गडकरी राष्ट्रीय स्तर के नेता नहीं थे, लेकिन उन्हें संघ का विश्वास तो प्राप्त था ही। फिर भी शायद वे संघ की आशाओं पर खरा नहीं उतर सके!  बिना अधिक विस्तार में गए अभी इतना कहना पर्याप्त होगा कि मोहन भागवत ने नरेन्द्र मोदी से आशा बांध रखी है कि वे भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने में समर्थ होंगे। यक्ष प्रश्न है कि क्या सचमुच ऐसा हो पाएगा?

श्री नरेन्द्र मोदी की दो विशेषताएं हैं जो उनके हिन्दू हृदय सम्राट बन सकने की संभावनाएं जगाती हैं। एक-2002 के गुजरात नरसंहार की पृष्ठभूमि में श्री मोदी भाजपा के सबसे बड़े कट्टरपंथी और अनुदार नेता के रूप में उभरे हैं। दो- वे एक ऐसे कठोर राजनेता के रूप में सामने आते हैं जिसने जो तय कर लिया सो कर लिया, जो समझौता जैसा शब्द नहीं जानता। दिलचस्प बात यह है कि उनके इन गुणों की परख करने वाले मोहन भागवत अकेले व्यक्ति नहीं हैं। भारत के टाटा, अंबानी, बिड़ला, अडानी, टोरेंट, एस्सार जैसे कारपोरेट घराने भी उनके गुणग्राहक हैं। यदि श्री भागवत का जोर उनके पहले गुण पर है तो कारपोरेट की आशाओं की डोर उनके दूसरे गुण से बंधी है।

एक अनुमान लगाने को जी चाहता है कि क्या नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इसीलिए हटाया गया कि वे नरेन्द्र मोदी के प्रतिद्वंद्वी न बन सकें?  हमारा अनुमान गलत हो सकता है किन्तु अभी यह बिन्दु विचारणीय है कि क्या नरेन्द्र मोदी एक तरफ मोहन भागवत और दूसरी तरफ कारपोरेट घरानों की आशाओं-आकांक्षाओं के बीच कोई तालमेल बैठा पाएंगे? श्री भागवत चाहे जो सोचें, क्या भारत का कोई भी प्रधानमंत्री इस विशाल देश को एक धर्म आधारित देश बना सकता है? श्री नरेन्द्र मोदी और हिटलर के बीच प्रकारान्तर से तुलना की जाती है, लेकिन क्या आज की दुनिया में और विशेषकर स्वतंत्र भारत की अपनी राजनीतिक परंपरा में किसी भी व्यक्ति का हिटलर बन पाना संभव है? दूसरी ओर यह प्रश्न भी उठता है कि देश के कारपोरेट घराने अपने साम्राय के निर्बंध विस्तार के लिए जो माहौल चाहते हैं, क्या वह सांप्रदायिक अशांति से उपजे माहौल में संभव हो पाएगा? मेरी दृष्टि में दोनों का ही जवाब नहीं में होना चाहिए।

मैं एक और संभावना देखता हूं। यदि नरेन्द्र मोदी ले-देकर प्रधानमंत्री बन भी गए तो उन्हें मजबूर होकर क्षेत्रीय व छोटे दलों से समझौता करना पड़ेगा, हाशिए पर डाल दिए गए बुजुर्ग नेताओं की अनुपस्थिति में भाजपा का नए सिरे से गठन करना होगा, देश-विदेश के तमाम मसलों पर निर्णय लेना पड़ेगा और तब परीक्षा होगी कि मीडिया और छविनिर्माण एजेंसियों ने भारी रकम और बड़ी मेहनत कर जो प्रपंच रचा है, उसमें नरेंद्र मोदी बोरिस येल्तसिन सिध्द होते हैं या ब्लीदीमिर पुतिन!!

 
देशबंधु में 20 मार्च 2014 को प्रकाशित

Thursday, 13 March 2014

नई संभावनाएं?


 मैं नहीं जानता कि मेरा अनुमान किस सीमा तक सही निकलेगा, लेकिन इन दिनों जो राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं उन्हें देखकर  संभावना बनती है कि सोलहवीं लोकसभा के चुनावों के साथ भारत की राजनीति में एक बिल्कुल नई तरह की शुरुआत होगी। ध्यान रहे कि मैं यह बात एक व्यापक पृष्ठभूमि में कर रहा हूं और इसमें किसकी जीत होगी या कौन प्रधानमंत्री बनेगा, इसकी कोई चर्चा फिलहाल मैं नहीं कर रहा हूं।

सबसे पहले दलबदल की ही बात क्यों न की जाए! अलमोड़ा, भिण्ड, भुवनेश्वर, पटना और न जाने कहां-कहां से महारथी समझे जाने वाले नेताओं के एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने की खबरें मिल रही हैं। अल्मोड़ा से भाजपा ने बच्ची सिंह रावत को टिकट नहीं दिया तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी। पटना में राज्यसभा सदस्य रामकृपाल यादव लोकसभा का टिकट न मिलने से लालू प्रसाद से खफा हो गए। ओड़िशा विधानसभा में विपक्ष के नेता भूपेन्द्र सिंह ने ही पार्टी छोड़ दी और बीजद में शामिल हो गए। इस मामले में कीर्तिमान स्थापित किया मध्यप्रदेश ने। पिछले साल विधानसभा में कांग्रेस के उपनेता चौधरी राकेश सिंह ने सदन के भीतर ही दलबदल किया। उनके बाद होशंगाबाद के लोकसभा सदस्य उदयप्रताप सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और उनके भी सिरमौर निकले भागीरथ प्रसाद। रात को कांग्रेस टिकट मिलने की घोषणा हुई, सुबह भाजपा दफ्तर माला पहनने पहुंच गए। अब उनके सामने क्या मजबूरी थी या कोई प्रलोभन, ये तो वही बता सकते हैं।  कुछ ऐसा ही किस्सा तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी विवेक तनखा के साथ हुआ। वे लगभग एक दशक तक दिग्विजय सिंह सरकार में महाधिवक्ता थे, फिर उन्होंने कांग्रेस विरोधियों का सहयोग लेकर राज्यसभा का चुनाव लड़ा, उसमें हार गए। वे कांग्रेस  विरोधी प्रबंधन गुरु शिव खेड़ा के 'इंडिया फर्स्ट' अभियान से जुड़े हुए हैं और इस बार उन्हें जबलपुर से कांग्रेस का टिकट मिल गया है।

ऐसे और न जाने कितने उदाहरण हैं। इनसे पता चलता है कि राजनीतिक दल व राजनेता क्षणिक एवं तात्कालिक मुनाफे की प्रत्याशा में किस तरह का आचरण कर रहे हैं। अगर इसे अनैतिक आचरण कहा जाए तो क्या गलत होगा? वैसे तो दल-बदल की यह प्रवृत्ति 1967 से शुरू हो गयी थी। डॉ. लोहिया के अनुयायी इसमें बेहद प्रवीण थे। जनसंघ, फिर भाजपा ने इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में हमेशा उत्साह का प्रदर्शन किया। इस मामले में कांग्रेसी भाजपा से उन्नीस बैठे। जो भी हो, आज देश के मतदाता के सामने खुलकर यह बात आ रही है कि राजनीति में सिध्दांतहीनता किस कदर हावी हो गयी है। ये नेता जो मौका ताड़कर दल बदलते हैं, वे इस अवांछित स्थिति को बढ़ावा देने के लिए बहुत बड़ी हद तक जिम्मेदार हैं। इसलिए आज आम चुनावों की बेला में भारतीय मतदाताओं के सामने यह अवसर और संभावनाएं हैं कि इस तरह के मौकापरस्त उम्मीदवारों को घर का रास्ता दिखाकर स्वस्थ राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया जाए। अगर मतदाता अपने वोट का इस्तेमाल विवेकपूर्ण ढंग से करे तो दल-बदल का रोग हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

इन चुनावों का एक दिलचस्प तथ्य यह है कि देश के अधिकतर हिस्सों में दो पार्टियों के बीच आमने-सामने का मुकाबला न होकर चतुष्कोणीय संघर्ष होगा। चार-पांच प्रांत ही ऐसे हैं जहां कांग्रेस व भाजपा के बीच सीधी-सीधी टक्कर होगी। अस्सी सीटों वाले सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में एक तरफ कांग्रेस-राष्ट्रीय लोकदल  गठबंधन, दूसरी तरफ भाजपा, तीसरी तरफ सपा व तीसरा मोर्चा व चौथी तरफ बसपा होगी। अड़तालीस सीटों वाले महाराष्ट्र में कांग्रेस, भाजपा-शिवसेना, मनसे और आप के बीच अनेक सीटों पर चतुष्कोणीय मुकाबले होंगे। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और द्रमुक ने किसी के साथ गठजोड़ नहीं किया है। वहां कांग्रेस अपने बूते पर लड़ेगी और वामदल भी। भाजपा छोटे दलों के साथ गठजोड़ करने की जुगत में है। बिहार में कांग्रेस-राजद, भाजपा, लोजपा और जदयू के बीच मुकाबला होना है। वाममोर्चे की पहल पर तीसरा मोर्चा बनने की पहल हुई है, लेकिन उसके आगे बढ़ने के पहले ही टूटने के आसार नजर आ रहे है। बंगाल में भी चार पक्षों के बीच मुकाबला होगा- कांग्रेस, तृणमूल, वाममोर्चा और भाजपा।

इस स्थिति में आज यह अनुमान लगा पाना कठिन है कि कहां से कौन जीतेगा। कल तक बिहार में नीतीश कुमार की छवि अजेय योध्दा की बनी हुई थी, जो अब बिखर गयी है। इसी तरह अन्य क्षेत्रीय नेता अपने-अपने उद्देश्य में क्या कमाल कर पाएंगे, इस पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। यहां मतदाताओं के सामने एक नया विकल्प खुलता है कि वे अपनी समझ से बेहतर उम्मीदवार को चुन सकें। जहां आमने-सामने मुकाबला हो वहां मतदाता एक बार पार्टी के प्रति निष्ठा या सिध्दांतों के आधार पर अपना वोट देने का निर्णय कर सकता है, लेकिन जहां एक तरह से सीमाएं धुंधला गयी हों वहां प्रत्याशी के अपने गुण व अपनी छवि के आधार पर फैसला होना संभव है। तो क्या इस बार हम ऐसी लोकसभा देखेंगे जिसमें बड़ी संख्या में सदस्य पार्टी के बजाय निजी छवि के कारण जीतकर आएंगे?

इसी सवाल से एक और संभावना उभरती है, बशर्ते राजनीतिक दल जनता से मिल रहे संकेतों को पढ़ने में सक्षम हों. कांग्रेस व भाजपा इन दोनों बड़े दलों के सामने आज यह अवसर है कि वे प्रत्याशियों को चुनने में सिर्फ ''जीत सकते हैं'' (विनेबिलिटी) को आधार न बनाएं बल्कि थोड़ी हिम्मत जुटाकर ऐसे लोगों को सामने लाएं जिनकी छवि स्वच्छ हो। हम याद करना चाहेंगे कि छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने पहले चरण में जिन अठ्ठारह प्रत्याशियों को टिकट दिए थे उनमें से बारह ने जीत दर्ज की। अगर कांग्रेसी मगरूर न हुए होते तो बाद के चरणों में भी नए लोगों को सामने लाकर बेहतर नतीजे हासिल कर सकते थे। इस दृष्टि से अभी कांग्रेस ने जो पहली सूची जारी की है उसमें बड़ी संख्या में नए लोगों को, युवाओं को और महिलाओं को टिकट दी गईं। क्या कांग्रेस इस नीति पर कायम रह पाएगी? क्या भाजपा भी ऐसी ही कोई नीति अपनाएगी? गर ऐसा हो सका तो इन पार्टियों के लिए भी अच्छा होगा और राजनीतिज्ञों के लिए भी। एक अच्छी बात यह हुई है कि आसन्न चुनावों में कांग्रेस व भाजपा दोनों के पास नया नेतृत्व है। ऐसा लगता है कि इधर डॉ. मनमोहन सिंह, उधर डॉ. लालकृष्ण अडवानी-दोनों बुजुर्गों की भूमिका नई पीढ़ी को आशीर्वाद देने तक सीमित रह गयी है। फिर कांग्रेस में यदि सोनिया गांधी खुद होकर अपनी भूमिका को समेट रही हैं तो भाजपा में सुषमा स्वराज और उनके समकालीनों को योजनाबध्द तरीके से हाशिए पर खिसकाया जा रहा है। यद्यपि नरेंद्र मोदी युवा नहीं हैं, लेकिन मीडिया के सहयोग से उनकी एक युवकोचित छवि बनाने की कोशिश चल रही है। इसके चलते दोनों पार्र्टियों में सांगठनिक स्तर पर नयी पीढ़ी का अभ्युदय होने की उम्मीद जागने लगी है। यह राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों पर निर्भर करता है कि वे अपनी-अपनी पार्टी के भीतर युवाओं को कितना आगे ला सकते हैं!

 इन सारे बिन्दुओं पर विचार करते हुए ऐसा विश्वास करने को मन होता है कि आगामी लोकसभा में हमें ऐसे सदस्य देखने मिलेंगे, जो राजनीति के घिसे पिटे तरीकों से दूर रहेंगे और कुछ इस तरह से अपना कामकाज करेंगे कि संसदीय लोकतंत्र व लोकतांत्रिक राजनीति में जनता का विश्वास फिर से जाग सके। क्या वास्तव में ऐसा हो सकेगा?


देशबंधु में 13 मार्च 2014 को प्रकाशित

Monday, 10 March 2014

गीता किसने लिखी?





भारतीय चिंतनधारा में श्रीमद्भागवतगीता अथवा संक्षेप में गीता को जो उच्चासन प्राप्त है वह सर्वविदित है। श्रुति, स्मृति और गीता अर्थात् वेद, उपनिषद व गीता ये तीनों मिलकर प्रस्थानत्रयी के नाम से जाने जाते हैं। इनको आधार बनाकर ही भारत की उस दार्शनिक परंपरा का विकास हुआ है जिसने भारत के बहुसंख्यक समाज का मनोगत रचने में अहम् भूमिका निभाई है। वेद व उपनिषद का अध्ययन इस समाज में अभी भी सीमित है और उसकी व्याख्या करने का काम पंडितों के जिम्मे है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए इतना जानना ही पर्याप्त है कि वह वैदिक संस्कृति का वारिस है। गीता के साथ ऐसी कोई उलझन नहीं है। गीता और उसके कई शताब्दियों बाद रचित रामचरित मानस ऐसे दो ग्रंथ हैं, जो संभवत: हर उस घर में मिल जाएंगे जो रूढ़ अर्थों में सनातन अथवा हिन्दू धर्म के अनुयायी माने जाते हैं। इनमें शैव, वैष्णव, शाक्त सब शामिल हैं। इस्लाम में कुरान शरीफ व ईसाईयत में पवित्र बाइबिल का जो ओहदा है वही हमारी इस परंपरा में गीता को हासिल है।

यह सामान्य तौर पर माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में महाभारत युध्द प्रारंभ होने की पूर्व बेला में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था ताकि वे संशयरहित होकर युध्द भूमि में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए प्रवृत्त हो सकें। गीता के सात सौ श्लोकों में जो उपदेश दिए गए हैं उनको हमारे यहां विभिन्न स्थितियों में दोहराया जाता है, उनसे प्रेरणा ली जाती है, मन को समझाया जाता है। अदालत में हिन्दू धर्म को मानने वाले गीता पर हाथ रखकर सच बोलने की कसम खाते हैं, तो मृत्यु के समय शरीर नश्वर और आत्मा अविनाशी की उक्ति स्मरण हो आती है। जीवन में सफलता-असफलता के बीच जब कभी उहापोह की स्थिति बनती है तो ''कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो'' का परामर्श किसी न किसी सयाने के मुख से सुनने मिल ही जाता है। गीता की इस लगभग निर्विकल्प श्रेष्ठता का सर्वप्रथम सूत्र संभवत: आदि शंकराचार्य की टीका में देखा जा सकता है। उनके बाद रामानुजाचार्य, निंबार्काचार्य, मध्वाचार्य से लेकर वल्लभाचार्य, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद तक अनेक मनीषियों ने अपनी-अपनी व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं।

गीता के इस दृढ़तापूर्वक स्थापित महत्व के बावजूद इस महान ग्रंथ के लेखन-समय एवं लेखक के बारे में समय-समय पर परस्पर विरोधी मत व्यक्त किए जाते रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण तो यही है कि गीता के विभिन्न अध्यायों  में दिए गए उपदेशों में ही कई जगह विरोधाभास देखने मिलता है। दूसरे गीता की भाषा में भी प्रारंभ से अंत तक एकरूपता नहीं है, जो एक लघुग्रंथ के लिए स्वाभाविक नहीं कही जा सकती और जिसकी ओर अनेक धुरंधर विद्वानों ने संकेत किया है। ये दो ऐसे कारण थे, जिन्होंने प्रोफेसर मेघनाद देसाई को गीता व उससे संबंधित साहित्य के विशद अध्ययन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इस बिना पर जो स्थापनाएं की हैं वे 2014 की शुरुआत में प्रकाशित उनकी अंग्रेजी पुस्तक ''अ सेकुलर इन्क्वायरी इन टू अ सेक्रेड टैक्सट'' याने ''एक पवित्र पाठ की आग्रहमुक्त पड़ताल'' का आधार हैं। स्मरणीय है कि प्रोफेसर देसाई अंतरराष्ट्रीय ख्याति के समाजचिंतक हैं तथा उन्हें टीवी दर्शक आए दिन किसी न किसी चैनल पर समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार रखते हुए देख सकते हैं।

श्री देसाई जैसा कि नाम से स्पष्ट है मूलत: भारतीय हैं। वे लगभग चालीस साल तक लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स में प्रोफेसर रहे हैं तथा ब्रिटिश संसद के उच्च सदन याने हाउस ऑफ लॉर्ड्स के भी सदस्य हैं। भारतीय इतिहास और संस्कृति पर कुछेक कार्यक्रमों में भाग लेते हुए उन्होंने अनुभव किया कि गीता का समदृष्टि विवेचन किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में वे अनेकानेक विद्वानों के विचारों से रूबरू होते हैं और फिर अपने निष्कर्ष निकालते हैं। उनकी एक स्थापना तो यह है कि प्राचीनकाल में आदि शंकराचार्य के पूर्व गीता का उल्लेख बहुत कम मिलता है। शंकराचार्य के एक शताब्दी पूर्व बाणभट्ट की कादंबरी में गीता का उल्लेख अवश्य है यद्यपि उसके दो अर्थ निकाले जाते हैं, जिनमें एक यह है कि महाभारत में अर्जुन को अनंत गीता सुनकर आत्मिक आनंद मिला था। इसी तरह कालिदास के रघुवंश एवं कुमारसंभव में भी गीता का उल्लेख है तो लेकिन पूरी तरह से प्रमाणित नहीं। महान चीनी यात्री शुआन जांग (ह्वेनसांग) ने सातवीं शताब्दी के अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता प्रसंग से मिलती-जुलती है। कुल मिलाकर इस ग्रंथ का विधिवत और नियमित अध्ययन व टीका का काम शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। पुराने आचार्यों ने इसे भक्त को सुनाई देववाणी की बजाय एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है।

प्रो. देसाई कहते हैं कि अधिकतर टीकाएं अभिजात समाज के लिए थीं जो संस्कृत जान-समझ सकते थे। तेरहवीं सदी में संत ज्ञानेश्वर ने मराठी अनुवाद कर इसे पहले-पहल आमजन के लिए उपलब्ध कराया यद्यपि उस समय भी दलित-वंचित जन इसे प्रवचन स्थल के बाहर बैठकर ही सुन सकते थे। आगे चलकर अकबर के नवरत्नों में एक फैज़ी ने गीता का फारसी में अनुवाद किया एवं अंग्रेजी राज में सबसे पहले वायसराय वारेन हेस्टिंग्स ने चार्ल्स विलकिंस से इसका हिन्दी अनुवाद कराया। इसके उपरांत अंग्रेजी तथा यूरोप की कुछ अन्य भाषाओं में भी गीता के अनुवाद हुए। तथापि सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं सर्वाधिक लोकप्रिय जो अनुवाद हुआ वह सर एडविन अर्नाल्ड ने किया। सर एडविन ने पूर्व में भगवान बुध्द के जीवन पर 'द लाइट ऑफ एशिया' पुस्तक लिखी थी। गीता का अनुवाद 'द सांग सेलेस्टियस' शीर्षक से 1885 में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक से ही गीता की जानकारी आधुनिक काल में दूर-दूर तक पहुंची।

वस्तुत: स्वयं महात्मा गांधी ने इस पुस्तक के द्वारा ही गीता से प्रथम परिचय प्राप्त किया था। प्रो. देसाई लिखते हैं कि उन्नीसवीं सदी के अंत में गीता भारतीय घरों में बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं थी। गांधीजी के पिता ने अपने जीवन के अंतिम समय में ही गीता का वाचन शुरू किया था। यही स्थिति लोकमान्य तिलक की थी। उन्होंने सोलह वर्ष की आयु में गीता का पहली बार अपने पिता की मृत्युशैय्या पर वाचन किया, जबकि उनके घर में संस्कृत प्रचलित थी। महात्मा फुले ने भी अपनी प्रसिध्द पुस्तक 'गुलामगिरी' में मनुस्मृति एवं भागवत का जिक्र तो किया है किन्तु गीता का नहीं। उधर बंगाल में महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने प्राचीन ग्रंथों के अनुवाद हेतु काफी उपाय किए, लेकिन उन पुस्तकों में गीता शामिल नहीं थी। कुल मिलाकर लेखक की स्थापना है कि बीसवीं सदी के प्रारंभ तक गीता को वह महत्व प्राप्त नहीं था जो आज देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह स्थिति कैसे बदली? एक तो पश्चिमी भाषाओं में अनुवाद से भारतीयों में यह भाव जागृत हुआ कि भारत एशिया के अन्य देशों से कुछ ऊंचे स्थान पर तथा पश्चिम के कुछ निकट है। इससे अपनी प्राचीन सभ्यता के प्रति गर्व का भाव उत्पन्न हुआ। बंकिम के उपन्यास 'आनंदमठ' से प्रेरित होकर जो क्रांतिकारी दस्ते बने उन्होंने स्वाधीनता संग्राम की अपनी लड़ाई में गीता से प्रेरणा ली। शहीद खुदीराम बोस गले में गीता को पहनकर फांसी के फंदे पर झूले। अपनी संस्कृति पर इस गर्व को पुष्ट करने का काम सबसे प्रमुख रूप से लोकमान्य तिलक रचित 'गीता रहस्य' से हुआ। यह सचमुच आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य है कि बर्मा के मंडाले जेल में कालापानी भुगतते हुए तिलक महाराज ने नवंबर 1910 से मार्च 1911 के बीच मात्र एक सौ पांच दिन में बारह सौ दस पेज की यह किताब लिख डाली।

यह हम जानते हैं कि लोकमान्य के बाद गांधी जी ऐसे राजनेता थे, जो साबरमती आश्रम में दैनिक प्रार्थना के बाद गीता पर प्रवचन दिया करते थे। गांधीजी गीता का पाठ सत् और असत् के बीच संघर्ष में सत्य की जीत के रूप में करते थे। महर्षि अरविन्द जो पहले क्रांतिकारी और बाद में आध्यात्मिक नेता बने, उनकी सोच तिलक जी के निकट थी। वे इसे कर्मयोग का सूत्र मानते थे। परवर्ती समय में डॉ. राधाकृष्णन ने गीता की व्याख्या की और उसकी गूढ़ दार्शिनिकता को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाया। प्रो. देसाई कालक्रम में वर्णन करते हुए हरेकृष्ण आंदोलन तक आते हैं और बतलाते हैं कि गीता इस सम्प्रदाय के अनुयायी के घरों में पढ़ी भले न जाए, ड्राइंगरूम में अवश्य रखी होती है।

अगले अध्यायों में प्रो. देसाई गीता की विषय वस्तु, भाषा, लेखक जैसे पेचीदा सवालों पर अपने विचार सामने रखते हैं। वे एक तरफ विवेकानंद के विचारों को उध्दृत करते हैं तो दूसरी ओर डी.डी. कोसाम्बी व बाबा साहेब आम्बेडकर को। वे सूचनार्थ प्रोफेसर ए.टी. तैलंग द्वारा 1892 में किए गए पहले गद्यानुवाद का भी उल्लेख कहीं करते हैं। दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी बीसवीं सदी के महान समाज चिंतकों में से एक थे। जो धारा गीता को एक सम्पूर्ण दार्शनिक एवं दैविक कविता मानती है, कोसाम्बी उससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि गीता का हरेक ने अपनी-अपनी तरह से ऐसा भाष्य किया है कि उससे समाधान की बजाय और अधिक प्रश्न उठते हैं। इससे आंतरिक द्वंद्व दूर होने की बजाय व्यक्तित्व खंडित होने की गुंजाइश बनती है। प्रो. देसाई इससे सहमत हैं। 


लेखक कोसाम्बी के हवाले से ही आगे प्रश्न उठाते हैं कि युध्द क्षेत्र में अर्जुन को संशयमुक्त होने के लिए विशद व्याख्यान की आवश्यकता थी या एक मित्रतापूर्ण फटकार की कि तुम अपना काम करो? श्री देसाई इसके आगे महाभारत के अश्वमेध पर्व में संकलित अनुगीता का उल्लेख करते हैं, जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को दुबारा गीता का संदेश संक्षेप में इसलिए देते हैं क्योंकि अर्जुन के चंचल मन में युध्द क्षेत्र के उपदेश की कोई स्मृति बाकी नहीं थी। प्रश्न उठता है कि यदि अर्जुन में गीता का उपदेश समझने की क्षमता नहीं थी जो कि कृष्ण को अवश्य पता रही होगी तो फिर क्या सचमुच यह उपदेश युध्द क्षेत्र में ही दिया गया था? श्री देसाई दूसरा सवाल उठाते हैं कि कृष्ण ने तो धाराप्रवाह उपदेश दिया होगा, फिर उसे अध्यायों में किसने बांटा और फिर हर अध्याय में जो समापन टीका की गई है वह किसने लिखी? इस बारे में वे डॉ. आम्बेडकर को उध्दृत करते हैं कि विद्वानों की विवेचना गलत रास्ते पर है। गीता ईश्वरीय उपदेश नहीं है बल्कि धर्म के पक्ष में दर्शनशास्त्र का उपयोग है।

डॉ. आम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनका मानना है कि बौध्द धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवतगीता का एक अस्त्र के रूप में उपयोग किया। यह प्रमाणित है कि ईसापूर्व से नवमीं शताब्दी के बीच लगभग एक हजार वर्ष तक इन दोनों के बीच द्वंद्व चलता रहा है। यह अभी हमारा विषय नहीं है। विद्वान लेखक कोसाम्बी को पुन: उध्दृत करते हुए कहते हैं कि गीता का उत्स प्राचीन दार्शनिक स्रोतों याने उपनिषद अथवा सांख्य दर्शन में है। वे स्वामी विवेकानंद के हवाले से कहते हैं कि ''गीता एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं।'' विवेकानंद पुन: कहते हैं कि- ''गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव और गीता की माला में पिरो दिया।'' इस बिंदु पर स्वामी विवेकानंद और डी.डी. कोसाम्बी एक साथ खड़े नजर आते हैं।

इस पुस्तक में इस बात की भी गवेषणा की गई है कि महाभारत और गीता का रचनाकाल क्या है। कोसाम्बी मानते हैं कि इसे दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच लिखा गया, क्योंकि इसकी भाषा उसी काल की है। प्रो. देसाई का कहना है कि महाभारत और गीता दोनों के रचनाकाल के बारे में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना कठिन है। महाभारत के बारे में अनेक विद्वान एकमत हैं कि इसे पहले 'जय' नामक संक्षिप्त ग्रंथ के रूप में लिखा गया, फिर 'भारत' नामक अपेक्षाकृत बड़े ग्रंथ के रूप में इसे बढ़ाया गया जिसे अंतत: महाभारत का रूप दे दिया गया। 'भारत' में चौबीस हजार वर्ष श्लोक थे, जबकि महाभारत में एक लाख। संभवत: महाभारत का यह विकास लगभग एक हजार वर्ष की अवधि में हुआ। हरिवंश पुराण को पहले महाभारत का उन्नीसवां पर्व माना जाता था, जिसे बाद में अलग किया गया। इसी के साथ कृष्ण की ऐतिहासिकता पर भी सवाल उठते हैं। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि कृष्ण के व्यक्तित्व को लेकर बहुत से संदेह है। प्राचीनकाल में हमारे देश में इतिहासशोधन के द्वारा सत्यान्वेषण की परंपरा लगभग नहीं थी इसलिए बिना तथ्य और प्रमाण के जिसको जैसा मन आए वैसी स्थापना कर सकता था। जब कृष्ण को लेकर संदेह है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि गीता की ऐतिहासिकता क्या है! यद्यपि गीता को एक स्वतंत्र पृथक ग्रंथ के रूप में पढ़ा जाता है, लेकिन वह मूलत: महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है। गीता के बारे में सामान्य धारणा है कि यह महाभारत युध्द के पहले दिन दिया गया उपदेश है, लेकिन भीष्म पर्व तो युध्द के दसवें दिन प्रारंभ होता है! इसमें जो विरोधाभास है, वह स्पष्ट है।

प्रो. देसाई ने गीता में निहित दर्शन की भी विस्तारपूर्वक व्याख्या की है, लेकिन उनकी प्रमुख चिंता गीता के लेखक को खोजने की है। वे विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि इसके लिखने वाले कम से कम तीन लोग थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी। उनके अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे। इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं जिन्होंने मराठी में मूल गीता की खोज नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का अपना मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।

प्रो. मेघनाद देसाई के इस विविधतापूर्ण शोधग्रंथ पर आने वाले दिनों में पांडित्यपूर्ण चर्चाएं होंगी इसमें मुझे संदेह नहीं। गीता कब लिखी गई और किसने लिखी यह विद्वानों के बीच चर्चा का विषय है लेकिन मैं रेखांकित करना चाहता हूं कि लेखक ने वर्तमान  समय में गीता की प्रासंगिकता पर भी प्रश्न उठाए हैं। वे मानते हैं कि यह एक कठिन और भ्रम में डालने वाला पाठ है। उनका यह भी कहना है कि भारत के संविधान में सामाजिक न्याय एवं जनतांत्रिक स्वतंत्रताओं की जो प्रतिश्रुति है गीता उसके उपयुक्त नहीं है। वे बहुत स्पष्टपूर्वक कहते हैं कि - ''समय आ गया है कि गीता की समालोचना आज की कसौटियों पर की जाए।'' 


अक्षर पर्व मार्च 2014 अंक में प्रकाशित